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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

नवमोऽध्यायः ४९

नवमोऽध्यायः ४९

बृहदस्य शरीरं यदप्रमेयं प्रमाणतः।
बृहद्विस्तीर्णमित्युक्तं ब्रह्मा तेन स उच्यते ॥४०॥

इनका बृहद् शरीर परिमाण में अप्रमेय है; बृहद् का अर्थ है—विस्तीर्ण। अतः वे ब्रह्मा कहे जाते हैं॥४०॥

पूज्यन्ते च सुरैः सर्वैर्महांश्चैव प्रमाणतः।
धातुर्मह तु पूजायां महादेवस्ततः स्मृतः॥४१॥

समस्त देवताओं से जो पूजित होते हैं तथा प्रमाणतः जो महान् हैं। मह धातु का अर्थ है—पूजा; अतः वे महादेव कहे गये हैं॥४१॥

सन्निवर्हति यद्वीक्षेद् यदुग्रो यत् प्रतापवान्।
मांस-शोणित-मज्जादौ यत्ततो रुद्र उच्यते ॥४२॥

जो निर्वाह करते हैं, जो देखते हैं, जो उग्र तथा प्रतापवान हैं, जो मांस, रक्त, मज्जादि में वर्त्तमान हैं, इसलिये वे रुद्र कहे जाते हैं॥४२॥

यस्मात् सृष्ट्यनुगृह्लीते गृह्यते चैव यत् पुनः।
गुणात्मना तु त्रैकाले तस्मादेकः स उच्यते ॥४३॥

जो गुणात्मस्वरूप है (सत्त्व, रज, तमरूप); जो सृष्टि तथा अनुग्रह करते हैं, पुनः ग्रहण करते हैं (लय करते हैं); इसीलिये उनको त्रैकाल कहा जाता है॥४३॥

अयं परमयं नेति ब्रुवन्ते भिन्नदर्शनाः।
तामसान् मूढभावाच्च दृष्ट्वा तान् विब्रुवन्ति च॥४४॥

भिन्न दर्शन वाले इन्हें 'हैं, नहीं हैं'—इत्यादि से कहते हैं। तामस तथा मूढ़ भाव वाले ऐसा कहते हैं॥४४॥

ब्रह्मणः कारणः केचित् केचिदाहुर्दिवाकरम्।
केचिद्भक्तिपरत्वेन त्वाहुः विष्णुं तथापरे ॥४५॥
कारणं तु स्मृता होते नानार्थेषु सुरोत्तमाः।
एकः स तु पृथक्त्वेन स्वयम्भुरिति विश्रुतः॥४६॥

कुछ लोग सूर्य को ही ब्रह्मा की उत्पत्ति में कारण मानते हैं, तो कुछ लोग भक्ति के वशीभूत होकर विष्णु को कारण मानते हैं। ये देवश्रेष्ठगण नाना अर्थ में 'कारण' कहे गये हैं। वे इन सबसे पृथक् रूप से अकेले ही स्वयम्भु हैं॥४५-४६॥

यथानुरुध्यते वर्णैर्विचित्रैः स्फटिको मणिः।
तथा गुणवशात्तस्य स्वयम्भोरनुरञ्जनात् ॥४७॥

जैसे स्फटिक मणि विचित्र वर्णाभा से युक्त होती है, वैसे ही गुणवशतः अनुरञ्जन हेतु वे स्वयम्भु नाना रूप से युक्त होते हैं॥४७॥

५० श्रीसाम्बपुराणम्

एको भूत्वा महामेघः पृथक्त्वेनावतिष्ठते।
वर्णतो रूपतश्चैव यथा गुणवशानुगः॥४८॥

जैसे महामेघ एक होने पर भी गुणवशात् वर्ण तथा रूपभेद से पृथक्-पृथक् रूप से अवस्थित रहता है, वैसे ही एक स्वयम्भु सूर्य गुणवशतः पृथक्-पृथक् रूप से प्रतीत होते हैं॥४८॥

नभसः पतितः तोयं याति तोयान्तरं यथा।
भूमे रसविशेषेण तथा गुणवशात्तु सः॥४९॥

जैसे आकाश से पतित जल भूमि तथा विशेष रस के साथ युक्त होकर अन्न-जलरूप में प्रतीत होता है, वैसे ही वे गुणवशात् पृथक् रूप में प्रतीत होते हैं॥४९॥

यथा दिव्यविशेषाद्वा वायुरेकः पृथग् भवेत्।
दुर्गन्धो वा सुगन्धो वा तथा गुणवशात्तु सः॥५०॥

जैसे आकाश में अविशेष एक वायु दुर्गन्ध अथवा सुगन्धभेद से पृथक् होती है, वैसे ही गुणवशात् वह सूर्य पृथक् रूपेण प्रतिभात होता है॥५०॥

यथा वा गार्हपत्योऽग्निरन्यत्संज्ञान्तरं व्रजेत्।
दक्षिणााहवनीयादि ब्रह्मादिषु तथा ह्यसौ॥५१॥

जैसे एक गार्हपत्य अग्नि दक्षिण, आहवानीयादि भेद से पृथक् संज्ञायुक्त हो जाती है, वैसे ही एक सूर्य ब्रह्मादि विविध नाम से अभिहित होते हैं॥५१॥

एकत्वे च पृथक्त्वे च प्रोक्तमेतन्निदर्शनम्।
तस्माद्भक्तिः परा कार्या देवे ह्यस्मिन् दिवाकरे॥५२॥

एकत्व तथा पृथक्त्व का यही कारण है। अतएव दिवाकर की परम भक्ति करना ही उचित है॥५२॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः।
एष वेदाश्च यज्ञाश्च स्वर्गश्चैव न संशयः॥५३॥

ये ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ये ही समस्त वेद, यज्ञ तथा स्वर्गलोक हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है॥५३॥

सूर्यव्याप्तमिदं विश्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
अद्यते पीयते चैव अन्नपानात्मको रविः॥५४॥

स्थावर-जङ्गमात्मक यह समस्त विश्व सूर्य से ही व्याप्त है। ये ही भक्षित तथा पीत होते हैं। अन्नपानात्मक रवि यही हैं॥५४॥