सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

( २६ )

भाव सु पंच प्रकार के सुनि बिभाव अनुभाव ।
थाइ सात्विक कहत हैं व्यभिचारी कबिराव ॥६।२
विभाव और अनुभाव को भी भाव कहना शास्त्रीय नहीं है। स्थायी भाव,
व्यभिचारी और सात्त्विक भाव को तो रसतरंगिणीकार 'भाव' कहते हैं—
रसानुकूलो विकारो भावो विकारोऽन्यथाभावः । विकारश्च द्विविध आन्तर
श्शारीरश्चान्तरोऽपि द्विविधः स्थायी भावो व्यभिचारी भावश्च । शारीरास्तु
सात्त्विकभावादयः ।
रस के अनुकूल विकार को भाव कहते हैं। विकार का अर्थ है परिवर्तन
( अन्यथाभाव ) । यह परिवर्तन दो प्रकार का होता है — अंतःकरण का और
शरीर का । आंतरिक परिवर्तन दो प्रकार का होता है— स्थायी भाव और
व्यभिचारी भाव ( अस्थायी भाव ) । शारीरिक परिवर्तन सात्त्विकभावादि
होते हैं। यह नहीं समझना चाहिए कि देहविकार के लिए 'भाव' पद का
व्यवहार गौण है। भेदकता है अन्य भावों को अपने शासन में रखने की शक्ति
की ! मनोविकार अन्य भावों को अपने शासन में रख सकता है, देहविकार
नहीं। स्थायी भाव और व्यभिचारी भाव में इतना ही अंतर है कि स्थायी
भाव चरम समय पर्यंत स्थिर रहता है इसी से स्थायी कहलाता है। दूसरा
अस्थिर होता है। इस प्रकार स्थायी भाव मनोविकार में प्रधान होता है।
प्रधान भाव होने के कारण यह सामाजिक के हृदय में उद्बुद्ध होकर रस-
चर्वणा करता है व्यभिचारी या संचारी ऐसा नहीं कर पाता ।
पर 'विभाव' भाव नहीं हैं। जो भाव को विशेषतया उत्पादित करते हैं
वे विभाव कहलाते हैं। जो रसों को अनुभावित करते हैं, अनुभव में लाते हैं,
वे अनुभाव कहलाते हैं। विभाव भाव के कारण होते हैं और अनुभाव उसके
कार्य। कदाचित् किसी के कारण और कार्य में भी उसका अंश होता है ऐसा
मानकर उन्हें भी भाव ही कह दिया गया है। विभाव का लक्षण करते हुए
केशव उन्हें रस-भाव का कारण कहते ही हैं—
जिनतें जगत अनेक रस प्रगट होत अनयास ।
तिनसों ²बिमति विभाव कहि, बरनत केसवदास ॥६।३
विभाव के दो भेद यथाशास्त्र ही हैं—आलंबन और उद्दीपन । इनमें
आलंबन का लक्षण यह है—
जिन्हें अतन अवलंबई ते आबलंन जानि ।
जिनतें दीपति होति है ते उद्दीप बखानि ॥६।५
यहाँ 'अतन' शब्द विचारणीय है। यदि आलंबन का लक्षण सभी रसों

( २७ )
के अनुकूल माना जाए तो इसका अर्थ 'काम' करने में बाधा है । तब इसका
अर्थ 'अशरीरी रस-भाव' करना चाहिए । पर केशव ने इसके अनंतर आलंबन-
स्थान और उद्दीपन का जो वर्णन किया है वहाँ केवल श्रृंगाररस के ही आलं-
बन-उद्दीपन कथित हैं । इसलिए जान पड़ता है कि इन्होंने 'काम' अर्थ में ही
इसका व्यवहार किया है । आलंबनस्थान-वर्णन भी ध्यान देने योग्य है—
दंपति जोबन रूप जाति लच्छनजुत सखिजन ।
कोकिल कलित बसंत फूल फल दल अति उपबन ।
जलचर जलजुत अमल कमल कमला कमलाकर ।
चातक मोर सुसब्द तड़ित धनु अंबुद अंबर ।
सुभ सेज दीप सौगंध गृह पान गान परिधान मनि ।
नव नृत्यमेव बीनादि रव आलंबन केसव बरनि ।।
इसमें 'दंपति' तो अवश्य शृंगाररस के आलंबन हैं, पर सखीजन, कोकि-
लादि की गणना उद्दीपन में ही की जाती है । उद्दीपन दो प्रकार के होते हैं-
संबद्ध और तटस्थ । आलंबन से संबद्ध उद्दीपन के अंतर्गत कुछ तो शारीरिक
चेष्टाएँ होती हैं, कुछ शरीर की साजसज्जा, कुछ शय्यादि उपकरण, कुछ
सहायक सखी आदि । तटस्थ के अंतर्गत प्राकृतिक स्थिति होती है । इनमें से
केशव ने शारीरिक चेष्टा को ही उद्दीपन कहा है—
अवलोकन आलाप परिरंभन नख-रद-दान ।
चुंबनादि उद्दीप हैं मर्दन परस प्रवान ।।६।७
पर अन्य सभी उद्दीपनों को इन्होंने आलंबन ही कहा है । इसका कारण
कदाचित् यह है कि प्रकृत आलंबन के अतिरिक्त स्थितिभेद से ये भी आलंबन
हो सकते हैं । इन्हें उद्दीपन कह देने से इनकी गणना फिर आलंबन के अंतर्गत
न हो सकती । पर ऐसा कर देने से इनका उद्दीपन होना स्पष्ट लक्षित नहीं
होता । हिंदी में प्राकृतिक दृश्य आलंबन होते हैं यह केशवदास ने ही कहा
है । यह कथन कम महत्त्व का नहीं है ।
अनुभाव का लक्षण यह है—
आलंबन उद्दीप के जो अनुकरन बखान ।
ते कहिये अनुभाव सब दंपति प्रीति-विधान ।।६।८
इसमें 'अनुकरण' शब्द 'अनुकृति' नहीं 'अनुगमन' अर्थ में प्रयुक्त जान
पड़ता है । अनुभाव शब्द के दो अर्थ किए जाते हैं— जो भावादि का अनुभव
कराते हों अथवा जो भाव के पीछे प्रकट होते हों । यहाँ दूसरा अर्थ लिया
गया है ।

व्यभिचारी भाव के नामकथन में केशव ने परंपरागृहीत तैंतीस संचारियों
के प्रसंग में दो शब्द ऐसे रखे हैं जिनसे भ्रांति हो सकती है । एक शब्द
'बिबाद' है और दूसरा 'आधि' ।—
१—गर्व हर्ष आवेग पुनि निंदा नींद-बिबाद ।
२—उन्माद मरन अवहित्य है व्यभिचारी जुतआधि ॥
यदि 'बिबाद' को कोई नया संचारी माना जाए तो 'तर्क' और उसमें कोई
भेद नहीं होगा । इसलिए 'नींद-बिबाद' समस्तपद जान पड़ता है । 'नींद-
बिबाद' का 'निद्रा का बखेड़ा, निद्रा की बात' अर्थ है । ध्यान देने योग्य
है कि दोनों शब्द 'तुकांत' में आए हैं । ये तुकांत के अनुरोध से प्रयुक्त हैं,
इनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है । जैसे 'बिबाद' को 'निद्रा के साथ जोड़
लेने से स्थिति ठीक हो जाती है वैसे ही 'जुत आधि' को चाहें तो 'अवहित्य'
के साथ जोड़ दे सकते हैं । अन्यथा उस दोहे के प्रथम दल में 'व्याधि' है
उसी से इसे जोड़ लें—'आधि व्याधि' को एक मानें। यह 'जुत' शब्द 'आधि'
को किसी से जोड़ने के लिए ही प्रयुक्त है । उसकी स्वतंत्र सत्ता के द्योतन के
लिए प्रयुक्त नहीं जान पड़ता । शारीरिक क्लेश को व्याधि और मानसिक
क्लेश को आधि कहते हैं । बाह्य और आभ्यंतर भेद से एक ही क्लेश की
द्विधा स्थिति हो जाती है ।
हाव का लक्षण इन्होंने यह किया है —
प्रेम राधिका कृष्ण को है तातें सिंगार ।
ताके भावप्रभाव तैं उपजत हावबिचार ॥६।१५
यहाँ 'भावप्रभाव' शब्द विचारणीय है । राधाकृष्ण के प्रेम से शृंगार
होता है, उसके भाव के प्रभाव से हाव होता है । 'भाव' का अर्थ या तो
'स्थिति' मानें अथवा 'मनोविकार' मानें । नाट्य शास्त्र में 'हाव' दूसरे ढंग से
माना गया है । हिंदी में आलंबनगत 'अलंकार' को हाव कहते हैं । नाटघशास्त्र
में कहा गया है कि सामान्याभिनय तीन प्रकार से होता है—वाणी से, अंग
से और सत्त्व से । सत्त्व देहात्मक होता है । सत्त्व से भाव और भाव से हाव,
हाव से हेला होती है—
देहात्मकं भवेत् सत्त्वं सत्त्वात् भावः समुत्थितः ।
भावात् समुत्थितो हावो हावाद्धेला समुत्थिता ॥२४।७
वहीं नाटघर साश्रय अलंकारों का उल्लेख भी है । मुख और शरीर में यौवन
के समय होनेवाले स्त्रियों के शारीरिक विकार या चेष्टा का नाम अलंकार है—
अलंकारास्तु नाटघज्ञैर्ज्ञेया नाटघर साश्रयाः ।
यौवने ह्यधिकाः स्त्रीणां विकारा वक्त्रगात्रजाः ॥२४।४

( २६ )

ये तीन प्रकार के हैं—अंगज, स्वाभाविक और अयत्नज । अंगज ३,
स्वाभाविक १०, अयत्नज ७ । भाव, हाव और हेला ये तीन अंगज होते हैं ।
यहाँ ‘भाव’ का अर्थ है कामविकार । अल्पसंभोगेच्छाप्रकाशक भ्रू नेत्रादि विकार
को हाव कहते हैं । जब विकार बहुत स्फुट रूप में प्रकट हो तो उसे हेला कहते
हैं । ये अंगज कहलाते हैं, अंग या शरीर से प्रकट होने के कारण । स्वाभाविक
दस होते हैं—लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिंचित्, मोट्टायित,
कुट्टमित, बिब्बोक, ललित, विह्वत । ये स्वभावसिद्ध होते हुए भी कृतिसाध्य
होते हैं, यत्नज होते हैं । स्त्रियों में स्वाभाविक सात्त्विक अलंकार इनके
अतिरिक्त आठ और हो सकते हैं—मद, तपन, मौग्ध्य, विक्षेप, कुतूहल, हसित,
चकित तथा केलि ।* अयत्नज सात होते हैं-- शोभा, कांति, दीप्ति, माधुर्य,
प्रगल्भता, औदार्य और धैर्य । अंगज और अयत्नज ये दस पुरुषों में भी हो
सकते हैं । किंतु विशेष शोभाकारक होते हैं नायिकाओं में ही ।
केशव ने उपर्युक्त दस स्वाभाविक अलंकारों के अतिरिक्त 'हाव' शीर्षक
के अंतर्गत 'हेला', 'मद' और 'बोधक' को ग्रहण किया है । इस प्रकार
इन्होंने कुल १३ हाव माने हैं। 'हावों' की ऐसी कल्पना 'रसतरंगिणी'
से चली है । उसमें उक्त दस स्वभावज अलंकारों को 'हाव' नाम दिया गया है।
हिंदी में 'हेला' को भी उसी में मिला लिया गया है । पूर्वोक्त अतिरिक्त आठ
स्वभावज अलंकारों में से हिंदीवाले कुछ को या सभी को हाव के अंतर्गत कर
के कहते हैं । बोधक हाव का वर्णन सबसे प्रथम हिंदी में इन्होंने ही किया है—
गूढ़ भाव को बोध जहँ केसव ओरहि होइ ।
तासों बोधक हाव सब कहत सयाने लोइ ॥६।५४
कोई कोई इसे 'बोध' कहते हैं । भिखारीदास ने रससारांश में 'बोधक' को
'क्रियाचातुर्य' कहा है । पद्माकर जगद्विनोद में उसका लक्षण यों देते हैं—
ठानि क्रिया कछु तिय पुरुष बोधित करै जु भाव ।
रसग्रंथन में कहत हैं तासों बोधक हाव ॥ ४६६ ॥
'मौग्ध्य' के प्रतिपक्ष में 'चातुर्य'-सूचक 'बोधक' की कल्पना की गई है ।
'दास' ने शृंगारनिर्णय में भरतकथित दस स्वाभाविक अलंकारों में ही अन्य
अतिरिक्त स्वभावज अलंकारों को अंतर्भुक्त करने का प्रयास किया है ।
इस प्रसंग में दूसरी विचारणीय स्थिति यह है कि स्वभावज अलंकारों को
इन्होंने श्रीकृष्ण में भी माना है । इस संबंध में रसतरंगिणीकार ने स्थिति स्पष्ट
कर दी है । नारियों में ये स्वाभाविक होते हैं, परपुरुषों में औषधिक—

  • देखिए साहित्यदर्पण ।

( ३० )
नारीणां शृंगारचेष्टा हावः । स च स्वभावजो नारीणां । ननु बिब्बोक-
विलासविच्छित्तिविभ्रमाः पुरुषाणामपि संभवन्तीति चेत्सत्यम् । तेषां त्वौपा-
धिकाः स्वभावजाः स्त्रीणामेव । नन्वेवं यदि तासां सदैव ते कथं न भवन्तीति
चेत्सत्यम् । उद्दीपकान्वयव्यतिरेकाभ्यां नायिकानां हावाविर्भावतिरोभावाविति ।
रसरंगिणी में लीला विलास बिच्छित्ति विभ्रम ललित को शारीरिक,
मोट्टायित कुट्टमित बिब्बोक विहृत को आंतरिक और किलकंचित को उभय-
संकीर्ण कहा है । साथ ही इन सबके विभाव और अनुभाव का भी उल्लेख
विस्तार से किया है । जैसे लीला के संबंध में वे लिखते हैं—
प्रियमूषणवचनाद्यनुकृतिर्लीला । तत्र विभावः सखीकौतुककलापः । अनु-
भावः प्रियपरिहासः ।
भोजराज के शृंगारप्रकाश में इसका अत्यधिक विस्तार है। उन्होंने
अनुभाव के अंतर्गत ही इन्हें रखा है । रूपगोस्वामी ने भी अनुभाव के भीतर
ही इन्हें रखा है । भोजराज ने अनुभाव का लक्षण ही यों किया है—
इदानीमनुभावं व्याख्यास्यामः । तत्र विभावैः प्रबुद्धसंस्कारस्य नायकादेः
ये स्मृतीच्छाद्वेषप्रयत्नजन्मानः मनो वाग्बुद्धिशरीरारम्भाःतेऽनुभूयमानत्वादरत्यादी-
नामनन्तरभवनाच्च अनुभावाः ।
इस प्रकार मन, वाणी, बुद्धि और शरीर के आरंभ अनुभाव हैं । 'मन
आरंभ' में भाव, हाव, हेला, शोभा, कांति, उदीप्ति, माधुर्य, धैर्य, प्रागल्भ्य,
औदार्य, स्थैर्य और गांभीर्य हैं । 'वागारंभ' में हैं आलाप, प्रलाप, विलाप, अनु-
लाप, संल्लाप, अपलाप, संदेश, अतिदेश, निर्देश, उपदेश, अपदेश और
व्यपदेश ।* 'बुद्धयारंभ' भी बारह हैं—पांचाली, गौड़ी, वैदर्भी, लाटीया
रीतियां, भारती, आरभटी, कैशिकी, सात्त्विकी वृत्तियां और पौरस्त्या, उड्र-
मागधी, दाक्षिणात्या और आवंत्या । 'शरीरारंभ' में लीला, विलास,
विच्छित्ति, विभ्रम, किलकंचित, मोट्टायित, कुट्टमित, विब्बोक, ललित, विहृत,
क्रीड़ित और केलि का ग्रहण है ।
उज्ज्वलनीलमणि में 'विहृत' के स्थान पर 'विकृत' नाम है—
ह्रीमानेर्ष्यादिभिर्यंत्र नोच्यते स्वविवक्षितम् ।
व्यज्यते चेष्टयैवेदं विकृतं तद्विदुर्बुधाः ॥
भरत के नाट्यशास्त्र में भी 'विकृत' नाम मिलता है। हिंदी के कुछ
शृंगारयुगीन रीतिग्रंथों में भी यही नाम रखा गया है ।
नवीन कल्पना के लिए केशवदास ने क्षमार्थना भी की है—

  • मिलाइए नाट्यशास्त्र में अभिनयात्मक अलंकारों से । २४।५२-५७

( ३१ )
राधा राधारमन के कहे जथामति हाव ।
ढिठई केसवदास की छमियो कवि कबिराव ॥ ६।५७
सप्तम प्रभाव में 'खंडिता' का लक्षण भिन्न है। 'शृंगारतिलक' का
लक्षण यह है—
कुतश्चिन्नागतो यस्या उचिते वासके प्रियः ।
तदनागमसंतप्ता खण्डिता सा मता यथा ॥२।७६
'खंडिता' का अर्थ होता है 'परिस्थितिवश प्रिय पर से जिसके अपनत्व
का अभिमान खंडित हो'। यहाँ प्रिय के न आने से जिसको संताप हो वह
खंडिता कही गई है। हिंदी में खंडिता का जो लक्षण चला वह रसमंजरी के
अनुगमन पर—
अन्योपभोगचिह्नित प्रातरागच्छति पतिर्यस्याः सा खंडिता ।
केशव का लक्षण यों है—
आवन कहि आवै नहीं आवै प्रीतम प्रात ।
जाके घर सो खंडिता कहै जु बहुविधि बात ॥ ७।१६
यहाँ केशव ने 'आने की कहकर न आए' लिखकर एक ओर स्थिति
स्पष्ट की तो दूसरी ओर 'अन्योपभोगचिह्नित' को छोड़ दिया। उसे 'कहै जु
बहुविधि बात' के भीतर रखा है। इसका कारण उनके द्वारा गृहीत प्रच्छन्न-
प्रकाश' भेद है। उन्होंने प्रच्छन्न में तो 'उपभोगचिह्नों' का उल्लेख नहीं
किया, पर 'प्रकाश' में उनका संकेत किया है। (देखिए ७।१८)।
अभिसारिका के इन्होंने तीन विशेषण दिए हैं—
हित तें कै मद मदन तें पिय पै मिले जु आइ ।
सो कहिये अभिसारिका बरनी त्रिबिध बनाइ ॥ ७।२५
प्रेम, मद ( गर्व ) और मदन ( काम ) से प्रेरित होकर जो प्रिय के
पास जाए । इसमें के दो विशेषण तो नाट्यशास्त्र में मिल जाते हैं—मद और
मदन । प्रेम नूतन कल्पना है—
हित्वा लज्जां समाकृष्टा मदेन मदनेन वा।
अभिसारयते कान्तं सा भवेदभिसारिका ॥ २४।२१२
अष्टम प्रभाव में जड़ता का लक्षण विचारणीय है। 'शृंगारतिलक' में
उसका लक्षण यह है—
प्रकाण्डे यत्र हुंकारो दृष्टः स्तब्धा गता स्मृतिः ।
श्वासाः समाधिकाः काश्यं जडतेयं मता यथा ॥ २।१५
पर केशव ने यह लक्षण दिया है—

( ३२ )
भूलि जाइ सुधिबुधि जहाँ सुखदुख होइ समान ।
तासों जड़ता कहत हैंकेसवदास सुजान ॥ ८ ४८
इसमें 'गता स्मृतिः' का 'भूलि जाइ सुधिबुधि' ठीक है। पर 'सुखदुख
होइ समान' यह कदाचित् 'इष्टानिष्टापरिज्ञान' से संबद्ध है। क्योंकि सुख
अनुकूल-वेदनीय होता है और दुःख प्रतिकूलवेदनीय। उज्ज्वलनीलमणि में
'जडिमा' का लक्षण यह है—
इष्टानिष्टापरिज्ञानं यत्र प्रश्नेष्वनुत्तरम् ।
दर्शनश्रवणाभावो जडिमा सोऽभिधीयते ।
अत्राकाण्डेऽपि हुंकारस्तम्भश्वासभ्रमादयः ॥
इस प्रभाव के अंत में केशव ने अनुभव की मार्मिक स्थिति का उल्लेख
किया है। इनके अनुसार आदर, लोभ तथा अतिसंग से साधुओं के चित्त भी
चंचल हो जाते हैं (देखिए ८।५६ ) ।
नवम प्रभाव में केशव ने मान के प्रसंग में नायक के मान का भी विवे-
चन किया है। यह अंश श्रृंगारतिलक में नहीं है। साहित्यदर्पण में स्थिति
स्पष्ट है—
मानः कोपः स तु द्वेधा प्रणयेर्ष्यासमुद्भवः ।
द्वयोः प्रणयमानः स्यात्प्रमोदे सुमहत्यपि ॥३।१६८
उज्ज्वलनीलमणि में कहा गया है कि
स्नेहं विना भयं न स्यान्नेर्ष्या च प्रणयं विना ।
तस्मान्मानप्रकारोऽयं द्वयोः प्रेमप्रकाशकः ॥
दशम प्रभाव में मानापनोदन के साधन 'बताए गए हैं। इनमें एक
दान भी है। केशव ने इसके प्रसंग में मार्मिक विच र की चर्चा की है। 'दान'
तो वेश्या को भी दिया जाता है। फिर अन्यों से भेद किस प्रकार किया
जायगा। उनका निर्णय है—
जहाँ लोभ तें दान लें छाँडे मानिनि मान ।
बारबधू के लच्छनँहि पावै सबहि प्रमान ॥ १०।७
इसका अर्थ यह है कि जहाँ लोभ न हो वहीं दान-उपाय ठीक होगा। इसी
प्रकार 'प्रणति' में अपराध या काम का हेतु होना आवश्यक है। बिना इसके
प्रणति रस के लिए हानिकारक होती है ( देखिए १०।१८ ) । मान छूटने
की कुछ सहज या सरल स्थितियाँ भी होती हैं। इनका उल्लेख निम्नलिखित
दोहे में है—
देस काल बुधि बचन तें कल धुनि कोमल गान ।
सोभा सुम सौगंध तें सुख हो छूटत मान ॥१०।२६

३ ( ३३ )
उज्ज्वलनीलमणि में भी देशकालादि का उल्लेख है—
देशकालबलेनैव मुरलीश्रवणेन च ।
विनाप्युपायं मानोऽसौ लीयते व्रजसुभ्रुवाम् ॥
एकादश प्रभाव में करुणविरह का निरूपण केशव ने शृंगारतिलक
से भिन्न किया है । शृंगारतिलक में वही लक्षण है जो शास्त्रीय ग्रंथों में अन्यत्र
मिलता है । इसका प्रसिद्ध उदाहरण कादंबरी में महाश्वेता का विरह है ।
शृंगारतिलक में लक्षण यों है—
यत्रैकस्मिन्विपन्नेऽन्यो मृतकल्पोऽपि तद्गतम् ।
नायकः प्रलपेत्प्रेम्णा करुणोऽसौ स्मृतो यथा ॥२।६०
पर केशव यों लिखते हैं—
छूटि जात केसव जहां सुख के सबै उपाय ।
करुनारस उपजत तहाँ आपुन तें अकुलाय ॥११।१
केशव इसके वर्णन के पक्ष में भी नहीं हैं । उनका कहना है—
सुख में दुख क्यों बरनिये यह बरनत ब्यवहार ।
तदपि प्रसंगहि पाइ कछु बरनत मति-अनुसार ॥११।२
इसका वर्णन रूप गोस्वामी ने इसलिए छोड़ दिया है कि वे इसे भी एक
प्रकार का प्रवासविरह ही मानते हैं—
विप्रलम्भपरं कैचित्करुणाभिधमूचिरे ।
स प्रवासविशेषत्वान्नैवात्र पृथगीरितः ॥
कालियदह में प्रवेश श्रादि को वे करुणविप्रलंभ के अंतर्गत मानते हैं ।
केशव ने ‘मति-अनुसार’ कुछ नया विचार किया है । यह अवश्य विचारणीय है
कि कालियदह-प्रवेश श्रादि में करुणरस माना जाए या करुणविप्रलंभ । शास्त्रीय
व्यवस्था इतनी ही है कि जब तक प्रियमिलन की आशा बनी है तब तक
विप्रलंभ है, जहाँ नैराश्य आया वह करुण हो जाएगा । केशव ने संदिग्ध स्थिति
का परित्याग कर करुणविरह का वर्णन इस आधार पर किया है कि यदि
नायिका को विरहावस्था में कोई बाधक स्थिति क्लेशकारिणी उत्पन्न हो जाए
तो करुणविप्रलंभ मानना चाहिए । यदि प्रिय के पास सखी जाए और उससे
मिलकर वहीं रह जाए और विरहिणी को उसकी ऐसी करतूत का पता चल
जाए तो वह करुणविरह है ( देखिए ११।३ ) । प्रच्छन्न करुणविरह का
उदाहरण तो ठीक बन गया है, पर प्रकाश करुणविरह में 'प्रवासविरह' ही
है । जब विरह में कोई बाधक स्थिति भी श्रालंबन हो जाती है तब करुण-
विरह होता है । कोई बाधक स्थिति उद्दीपन रहती है तो वहाँ ‘विषाद’
संचारी ही भर है । इसी से इनका ‘प्रकाश करुणविरह’ ठीक उदाहरण नहीं
जान पड़ता ( देखिए ११।४ ) ।

( ३४ )

विरह के अंतर्गत इन्होंने 'भयविभ्रम' का वर्णन भी किया है, जिसका
कोई लक्षण नहीं दिया है। स्वरूप से स्थिति यह जान पड़ती है कि जहाँ
वियोग में संयोग की सुखद वस्तुएँ दुःखदायिनी हो जाती हैं उसके वर्णन को
ये 'भयविभ्रम' कहना चाहते हैं। सरदार ने ऐसे दुःखों की खतियौनी सात
खातों में की है—
नींद सेज सुमनो सभा संगित सालि सुगंध ।
सात बियोगिन कों करत महा विरह तें अंध ॥
केशव ने केवल 'निद्रा' के उदाहरण दिए हैं। इसके अतिरिक्त 'पत्री' के
उदाहरण भी इसी के साथ दिए गए हैं।
द्वादश प्रभाव में सखी-वर्णन शृंगारतिलक के अनुसार ही है। इसमें
कुछ नाम केशव ने और बढ़ाए हैं। इन्हें सखी कहा जाए या दूती । 'दास'
दूती के अंतर्गत ही इनमें से बहुतों को रखते हैं। सखी और दूती में स्वरूपभेद
उनके स्वातंत्र्य और पारतंत्र्य के ही आधार पर हैं। सखी में फिर भी कुछ
स्वाधीनता होती है, उसकी प्रतिष्ठा विशेष होती है। हिंदी में परंपरया सखी
और दूती के कर्मों का कुछ विभाजन भी कर दिया गया है। विरहनिवेदन
दूती का कार्य हो गया है ।
त्रयोदश प्रभाव में सखी के जो कर्म बताए गए हैं उनमें वह क्रुद्ध भी
हो सकती हैं (देखिए १३।१) । पर दूती की क्या मजाल कि वह रोष कर
सके । ऐसे ही संदेश आदि भी दूती के कर्म हैं। सखी की स्थिति कुछ अधिक
परिष्कृत है। उसका सुसंस्कृत होना आवश्यक है। इसलिए जिनको सखी
कहा गया है वे सब सखी के योग्य नहीं जान पड़तीं ।
चतुर्दश प्रभाव में अन्य रसों का विवेचन है। हास्यरस के परिहास
भेद की चर्चा पहले की जा चुकी है। रसों के वर्णन का उल्लेख भी केशव ने
किया है जो शृंगारतिलक में नहीं है। देवता का उल्लेख फिर भी नहीं है।
हास्यरस में वर्ण का भी उल्लेख छूट गया है। करुणरस का लक्षण शृंगार
तिलक से भिन्न है। वहाँ लक्षण है—
'शोकात्मा करुणो ज्ञेयः प्रियमृत्युधनक्षयात्'
यहाँ है—
'प्रिय के बिप्रिय करन तें आनि करुनरस होत'
केशव ने अन्य रसों को भी राधाकृष्ण से ही संबद्ध रखना चाहा है।
इसी से इस प्रकार का लक्षण उन्हें करना पड़ा। ऐसा उदाहरणों से स्पष्ट
है । अन्य रसों की भी यही स्थिति है। इसका परिणाम यह हुआ है कि रसों
का स्वरूप पूरा स्पष्ट नहीं हो सका है। उनके स्थायी भाव. शृंगार के संचारी

( ३५ )
होकर आए हैं। समरस या शांतरस के उदाहरणों में केवल तीसरा
( १४।४० ) ठीक है।
पंचदश प्रभाव में वृत्तियों का वर्णन है। इसमें सात्वती या सात्त्वकी
वृत्ति का लक्षण शृंगारतिलक से कुछ भिन्न है। इसमें रौद्र के स्थान पर
शृंगार है। वैसा ही पाठ प्राचीन पोथियों में है। अन्यत्र 'अद्भुत बीर सिंगार
रस' के स्थान पर 'अद्भुत रुद्र रु बीर रस' पाठ भी मिलता है जो उससे
ठीक मिल जाता है।
अंतिम षोडश प्रभाव में 'अनरस-वर्णन' है। इसमें 'नीरस लक्षण' कुछ
भिन्न रखा गया है। शृंगारतिलक में 'नीरस' का लक्षण ( काव्यमाला में
मुद्रित संस्करण में) दो बार कथित है। पहले के संबंध में टिप्पणी है कि कुछ
पुस्तकों में यह नहीं मिलता। केशव ने दूसरे ( ३।५१ ) से कुछ मिलता-
जुलता लक्षण (१६।४) किया है। अंत में नित्य रसवरोध का विचार किया
है (१६।१२) और रसोत्पत्ति भी (१६।१३) नाट्यशास्त्र के अनुसार दे दी है।
भाषा
केशवदास की भाषा बुंदेली समझी जाती है, यह भ्रम है। उन्होंने
अपने ग्रंथ साहित्य को सामान्य काव्यभाषा ब्रजी में लिखे है। जो कवि जिस
प्रदेश का होता है उस प्रदेश के कुछ शब्द और प्रयोग आ ही जाते हैं।
टकसाली ब्रजभाषा लिखना उन्हीं के लिए संभव है जो व्रज प्रांत के हैं। ब्रजी
काव्यभाषा के रूप में संस्कृत की भांति स्वतंत्र रूप प्राप्त कर चुकी थी। इस-
लिए जो लोक व्रजप्रदेश के होते थे वे ही उसमें ब्रज के प्रांतीय शब्दों का
व्यवहार किया करते थे। इसलिए उनकी ब्रजभाषा कहीं कहीं और लोगों के
लिए दुरूह हो जाती थी। कल की बात है कि सत्यनारायण कविरत्न ने
जिस ब्रजी का व्यवहार किया उसमें ब्रजमंडल के बहुतेरे शब्दों का प्रयोग कर
दिया। घनानंद, ग्वाल ब्रजमंडल के कुछ ऐसे शब्दों का व्यवहार करते हैं
जो दूसरों के द्वारा प्रयुक्त नहीं होते। ठीक उसी प्रकार अवध के कवि अवधी
शब्दों और प्रयोगों का व्यवहार करते हैं, मिथिला के मैथिली के शब्दों का,
पंजाब के पंजाबी शब्दों का, राजस्थान के राजस्थानी शब्दों का, गुजरात के
गुजराती शब्दों का आदि आदि। यही स्थिति केशवदास की भी थी। उन्होंने
ब्रजी में बुंदेली शब्दों और प्रयोगों का व्यवहार आवश्यकता पड़ने पर निस्संकोच
और प्रकाम किया है। इसलिए उनकी भाषा बुंदेलीरंजित साहित्यिक ब्रजी
है। बुंदेली भाषाविज्ञान की दृष्टि से ब्रजी के ही अंतर्गत आती है। इसीलिए
बुंदेली के कुछ प्रयोग दूर तक फैल गए। भविष्यत्कालबोधक 'पालबी', 'करबी'

( ३६ )

आदि प्रयोग दूर तक फैले, यहाँ तक कि भिखारीदास की कृति में भी ये
प्रयोग पाए जाते हैं। केशवदास से पहले होनेवाले तुलसीदास ने भी ऐसे
प्रयोग किए हैं। हो सकता है कि तुलसीदास बुंदेलखंड में भी कभी रहे हों,
जिसके कारण वैसे प्रयोग उनकी कृति में आ गए हों। उनके गुरुदेव नरहर्यानंद
नर्मदातट पर कुछ दिनों के लिए गए थे । उनसे भेंट करने तुलसीदास भी
उधर गए थे और यमुना तट पर उन्होंने यमुना से विवाह कर लिया था ।
नर्मदा तक पहुँचने में बुंदेलखंड बीच में पड़ता ही था । बुंदेली में कुछ क्रियाएँ
स्वरभेद से लिखी जाती हैं—जैसे ‘छूवो’ का ‘छीबो’, ‘भूमिबो’ का ‘भीमबो’।
केशवदास की रचनाओं में दो प्रकार की भाषा स्पष्ट है। रामचंद्रचंद्रिका
और विज्ञानगीता में जिस प्रकार की भाषा है उस प्रकार की भाषा अन्य ग्रंथों
में नहीं है। इन दोनों में संस्कृत की चाशनी कुछ कड़ी मिलाई गई है। इसके
कारण पर अभी भली भाँति विचार नहीं किया गया है। केशव रामचंद्र-
चंद्रिका लिखते हुए हिंदी में संस्कृत के महाकाव्य की परंपरा प्रवर्तित कर रहे
थे । उनकी लालसा थी कि उसमें संस्कृत के नाट्यतत्त्व का भी नियोजन कर
दिया जाए, जिससे लीला के उपयोग में वह आ सके। केशव ने उसमें संवाद
नाटकीय ढंग के रखे हैं। संस्कृत में रामकथा पर अनेक नाटक हैं। उनका
श्रनुवदन, उनकी छाया का ग्रहण भी केशव ने संस्कृत वर्णवृत्तों में ही किया ।
संस्कृत के वर्णवृत्त संस्कृत भाषा की लपेट अधिक रखते हैं। यह स्थिति केशव
की रचना में ही नहीं हिंदी के सभी प्राचीन कवियों की कृतियों में दिखाई
देती है। जहाँ जहाँ संस्कृत वर्णवृत्तों का प्रयोग है वहाँ वहाँ भाषा में संस्कृत
की झोंक अधिक है। आधुनिक युग में श्रीहरिऔध ने संस्कृत वर्णवृत्तों में
प्रबंध लिखा तो प्रियप्रवास में संस्कृत का रंग अधिक चढ़ गया । हिंदी में
स्तुति के प्रसंग में भी संस्कृत का सहारा लिया जाता रहा है। इसकी झलक
तुलसीदास की विनयपत्रिका में पूरी मिलती है ।
विज्ञानगीता एक तो संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक प्रबोधचंद्रोदय के आधार
पर लिखी गई, दूसरे उसमें अन्य धार्मिक ग्रंथों से भरपूर सहायता ली गई ।
इसमें उद्धरण संस्कृत में ही प्रमाण के लिए केशव ने स्थान स्थान पर रखे हैं।
छंद भी वहाँ वर्णवृत्त ही रखा गया है। फल यह हुआ कि भाषा संस्कृतमय
हो गई । यह सत्य है कि केशव की दुरूहता का कारण संस्कृत के प्रयोगों या
शब्दों का हिंदी में रखना है। पर यह कहना ठीक नहीं है कि उनकी शक्ति कम
थी। भाषा पर उनका अधिकार रसिकप्रिया, कविप्रिया आदि ग्रंथों की उक्तियों
में स्पष्ट दिखाई देता है। इसका कारण यही है कि इन ग्रंथों में संस्कृतग्रंथों से
लक्षण के संबंध में सहायता अवश्य ली गई, पर उदाहरण हिंदी के छंदों में

( ३७ )

प्रस्तुत किए गए। उसका परिणाम यह हुआ कि भाषा में वैसी कठिनाई नहीं है
जैसी रामचंद्रचंद्रिका और विज्ञानगीता में दिखाई देती है। इन दोनों में भी
जहाँ हिंदी के छंद प्रयुक्त हैं वहाँ वैसी दुरूहता नहीं है। अपवाद ही कहीं
मिल सकता है। वस्तुतः केशव संस्कृत वर्णवृत्तों का हिंदी में प्रयोग करते
समय हिंदी भाषा उसमें बैठा नहीं पाते थे। संस्कृत के वर्णवृत्तों का ढाँचा
हिंदी के अनुकूल नहीं पड़ता। उसमें भाषा को बैठाने में शब्दों को आगे पीछे
करना पड़ता है। हिंदी में शब्द आगे पीछे होने पर ठीक से अन्वित नहीं हो
पाते। इसी से अर्थ कुछ का कुछ करना पड़ता है। एक उदाहरण लीजिए।
रामचंद्रचंद्रिका में राम अपने भाइयों के साथ भोजन करने के अनंतर 'विशुद्ध
गृह' में जा बैठे। इस पर केशव ने लिखा—
बैठे बिसुद्ध गृह अग्रज अग्र जाई । देखी बसंत ऋतु सुंदर मोवदाई ।
यह संस्कृत का हरिलीला छंद है। वसंततिलका का अंतिम वर्ण लघु कर देने
से यह छंद बनता है। हिंदी के प्रसिद्ध कोश 'हिंदीशब्दसागर' में यह अंश 'अग्रज'
शब्द के अर्थ में उद्धृत किया गया है। एक तो वहाँ 'जाई' और 'दाई' कर
के इसे पूर्ण वसंततिलका ही बना दिया गया है, दूसरे 'अग्रज' शब्द का अर्थ
'श्रेष्ठ, उत्तम' किया गया है। केशव का अन्वय यह है—'अग्रज' अग्र जाइ
बिसुद्ध गृह बैठे' । बड़े भाई राम पहले या आगे जाकर विशुद्ध गृह में बैठे ।
पर 'शब्दसागर' ने 'अग्रज' और 'अग्र' को गृह से ही संबद्ध किया । 'गृह
अग्रज' = गृह का बड़ा भाई, श्रेष्ठ गृह, उत्तम गृह । उसका अर्थ यह जान पड़ता
है— (राम) उत्तम और विशुद्ध गृह के अग्रभाग में जा बैठे। यहाँ 'गृह'
शब्द के पहले 'विशुद्ध' विशेषण पड़ा है। आगे फिर अन्य विशेषण अपेक्षित
नहीं जान पड़ता । 'विशुद्ध अग्रज गृह' दो विशेषण व्यर्थ हैं। दो विशेषणों
की अगाड़ी-पिछाड़ी कैसी—एक 'गृह' के पूर्व, दूसरी उसके उत्तर । संस्कृत
वर्णवृत्त में शब्दों के ठीक से यथास्थान न बैठने के कारण ही ऐसी बाधा हुई
है। संस्कृत में कहीं 'अग्रज' शब्द श्रेष्ठ या उत्तम अर्थ में प्रयुक्त नहीं है।
तात्पर्य यह कि केशव की रचना को समझने में भी भ्रम होता आ रहा है।
रसिकप्रिया की भाषा की प्रशंसा वे महाशय भी करते हैं जो इनकी भाषा
के कटु आलोचक हैं। इसमें इन्होंने हिंदी काव्यप्रवाह के अनुरूप सशक्त,
समर्थ, प्रांजल भाषा रखी है। सहसा इस प्रकार की भाषा केशव की रचना में
और वह भी आरंभिक रचना में कैसे आ गई। इन्होंने सब प्रकार की भाषा में
रचना करने का पर्याप्त अभ्यास किया होगा । 'रतनबावनी' की भाषा
पुरानापन अधिक लिए हुए है। वह बतलाती है कि अपभ्रंशरूप हिंदी में
पारंपरिक प्रवाह के कारण चलते रहे हैं। यह इनकी सबसे पहली रचना

( ३८ )
कही जाती है। केशव ने अपने साहित्यिक नवयौवन में अपभ्रंश या पुरानी
हिंदी में हाथ माँजा । फिर उन्होंने ब्रजी में रचना की । उसे काव्य के अनुरूप
परिष्कृत किया । अंत में संस्कृत की ओर मुड़े । यही मोड़ वे सँभाल नहीं सके ।
रसिकप्रिया की भाषा सबसे अधिक वाग्योगपूर्णा है । उसमें ब्रजी का पूर्ण
वैभव दिखाई देता है । यदि केशव इसी प्रकार की भाषा लिखते रहते तो
उनका इस क्षेत्र में विरोध न होता ।
टीकाएँ और टीकाकार
केशवदास के तीन ग्रंथों पर टीकाएँ लिखी गई हैं— रसिकप्रिया, कवि-
प्रिया और रामचंद्रचंद्रिका पर । कविप्रिया के अंतर्गत आनेवाले 'शिखनख'
के हस्तलेख पृथक् भी मिलते हैं और उसपर एक टीका भी सं० १७६२ के पूर्व
हुई है (देखिए राजस्थान में हिंदी के हस्तलिखित ग्रंथों की खोज, दूसरा भाग,
पृष्ठ १४०) । रसिकप्रिया की सबसे पुरानी टीका संस्कृत में है। टीका सं० १७१५
में की गई । टीकाकार श्रीरतनमणि के शिष्य समर्थ हैं। टीका का नाम प्रमोदिनी
है और यह सुगमार्थप्रबोधिनी है। हिंदी में रसिकप्रिया के सबसे'प्राचीन टीका-
कार सूरति मिश्र हैं। इनकी टीका का नाम रसगाहकचंद्रिका या जोरावर-
प्रकाश है। यह सं० १७६१ वि० में निर्मित हुई थी। जोधपुर के राजपुस्त-
कालय में संवत् १७६४ आश्विन बदी एकादशी रविवार का लिखा एक खंडित
हस्तलेख रसिकप्रिया सटीक नाम से संगृहीत है ( खोज— १६०२-२५६ ) ।
कहीं यह सूरति मिश्र की टीका की ही प्रतिलिपि न हो। यदि उससे भिन्न है
तो यह दूसरी टीका है। टीकाकार का नाम अज्ञात है।
इसके तीसरे टीकाकार श्रीकुशलधीर हैं जिन्होंने गुर्जर-राजस्थानी में इसकी
टीका गद्य में प्रस्तुत की । टीका का निर्माणकाल अज्ञात है, लिपिकाल
सं० १७६६ आसोज ( आश्विन ) सुदी ४ शुक्रवार है । इसके पूर्व वह कभी
अवश्य लिखी गई । पर कब ? कहना कठिन है । सूरति मिश्र की टीका के
पूर्व की भी हो सकती है। इसके चौथे टीकाकार हैं 'कासिम' ( खोज, ६-
१४७ ) । इस टीका का रचनाकाल अज्ञात है। मियाँ कासिम ने अपने को
वाजिदसुत लिखा है। ये वाजिद कौन थे ? कहा नहीं जा सकता । इसकी
पाँचवीं टीका श्रीजगतसिंह की की हुई है, जो भिनगाराज्य के राजपरिवार
के महाराजकुमार थे । इनका समय सं० १८७७ वि० के आसपास है।
दिग्विजयभूषण के रचनाकार श्रीदिग्विजयसिंह के ये पुत्र थे। इन्होंने टीका
का नाम 'जगतविलास' रखा है ( खोज, २३-१७६ एच ) । टीका गद्य में
लिखने का कारण यों लिखा है—

(9), 1!
Why does 1 look weird? Because it was a battered type or a small १ or द.
Let's look at the character after रद:
Wait, could it just be rendered as:
सिवदृग ३ गगनो ० ग्रह ६ सुपुनि रद द गनेस की साल । or superscript?
Unicode superscripts: ³, °, ⁶, द or १?
Wait, using normal characters or unicode superscripts?
Usually, transcription is best with either superscripts or normal characters matching the visual.
Let's look at:
सिवदृग³ गगनो° ग्रह⁶ सुपुनि रदद गनेस की साल ।
Wait, if a user reads it, सिवदृग ३ गगनो ० ग्रह ६ सुपुनि रद द vs सिवदृग³ गगनो° ग्रह⁶ सुपुनि रदद:
Wait, look at how it appears:
सिवदृग ३ गगनो° ग्रह ६ सुपुनि रद द गनेस की साल ।
Let's look at गगनो°: there is no space between गगनो and °.
Between सिवदृग and ३: it's slightly elevated, like सिवदृग³.
Between ग्रह and ६: it's elevated, like ग्रह⁶.
Between रद and the small mark: it's elevated, like रदद or

( ४० )

कि उस पर तिलक लिखा जाए । इस तिलक के लिखने में श्रीमोहनवल्लभजी
पंत ने आरंभ में हाथ बँटाया । पर तीन प्रभाव तक कार्य होने के अनंतर
वे अन्य कार्यगौरव से सहयोग नहीं दे सके । अपने बलबूते पर ही इसकी
परिपूति का मैंने संकल्प किया । इसकी पूति में मेरे प्रिय शिष्य श्रीबदरीप्रसाद
त्रिपाठी ने भी कुछ कार्य किया । उस समय श्री राजेंद्रप्रसाद ने इसकी प्रतिलिपि
करने में सोत्साह योग दिया ।
टीका की पद्धति लालाजी की ही रखी गई है । पर इसमें पाठांतर भी दे
दिए गए हैं । पाठांतरों के देने में किसी प्रति के नाम का उल्लेख नहीं किया
गया है । इसका प्रयोजन अनुसंधान नहीं है, आलोचना या टीका-टिप्पणी
है । इसी से केवल स्वीकृत पाठ के अतिरिक्त अन्य जितने पाठ मिले उनमें से
प्रमुख दे दिए गए हैं ।
टीका में कठिन शब्दों का अर्थ ‘शब्दार्थ’ शीर्षक से और तदनंतर सुसंगत
अर्थ ‘भावार्थ’ शीर्षक से दिया गया है । यथास्थान प्रमुख अलंकारों का निर्देश
है । ‘सूचना’ के अंतर्गत अन्य ज्ञातव्य चर्चा की गई है । जहाँ सरलता है वहाँ
केवल ‘शब्दार्थ’ दे दिया गया है

( ४१ )

निर्णय किया गया है। रसिकप्रिया के अनेक हस्तलेखों को छानकर मिलावट
को पृथक् करने का प्रामाणिक कार्य पृथक् है। इस प्रकार का कुछ प्रयास मैंने
'केशवग्रंथावली' के संपादन में किया है। यहाँ शुद्ध अनुसंधान की ही दृष्टि न
रखकर साहित्यपरंपरा, शास्त्रपरंपरा का भी कुछ विचार रखा गया है। इससे
दोनों स्थानों पर पाठ का भी भेद है और मूल में स्वीकृत छंदों का भी । पर
ऐसा क्वाचित्क है । किसी ग्रंथ का मूल पाठ टीका-टिप्पणी करते समय कहीं
अधिक स्पष्ट होता है। प्राचीन ग्रंथों के संपादन में, कोरी वैज्ञानिक पद्धति
सर्वतोभावेन ठीक नहीं जँचती । वैज्ञानिक पद्धति जड़ यंत्र का सा कार्य है ।
साहित्यिक विवेचन चेतनतत्त्व है । दोनों के योग से ही मूल सत्ता की पूर्ण
अभिव्यक्ति हो सकती है । कोई एक प्रणाली पूर्ण नहीं है ।
अधिक या अतिरिक्त छंदों के भी पाठांतर रहे हैं तो दे दिए गए हैं।
अलंकार-निर्देश में केशव के मत से जो अलंकार बनता है उसका भी यथा-
संभव उल्लेख किया गया है। रसिकप्रिया के कुछ छंद कविप्रिया में भी रखे
गए हैं। इनकी यथास्थान सूचना दी गई है। कहीं कहीं अनावश्यक विस्तार
बचाने के लिए अन्य टीकाकारों के शंका-समाधान का विवरण नहीं दिया गया ।
इतना ही बता दिया गया है कि यहाँ अनेक शंका-समाधान किए गए हैं ।
कहीं पाठांतरों के अनुसार यदि कोई प्रकृष्ट अर्थ संभावित हुआ है तो सूचना
के अंतर्गत उसका भी उल्लेख किया गया है।
कहने का तात्पर्य यह कि अपनी विद्याबुद्धि के अनुसार जो भी अपेक्षित
समझा गया सबका संकलन है। संख्या प्रत्येक प्रभाव की पृथक् भी है और
आदि से अंत तक क्रमबद्ध भी। अंत में प्रतीकानुक्रम है, प्रारंभ में विषयक्रम ।
भूमिका में अनेक ज्ञातव्य तथ्य हैं ।
विभिन्न हस्तलेख
'रसिकप्रिया' और उसकी टीका के जितने हस्तलेखों का उल्लेख हस्तलिखित
हिंदी-ग्रंथों के विवरणों में आया है तथा विभिन्न पुस्तकालयों में इनके जितने
हस्तलेख सुरक्षित हैं उनका निर्देश नीचे किया जाता है। प्रस्तुत संस्करण के
पाठ के लिए मुख्य रूप से दो हस्तलेखों का तथा दो प्रमुख टीकाओं का आधार
रखा गया है। दोनों हस्तलेख स्वर्गीय बाबू राधाकृष्णदासजी के सुपुत्र
श्रीबालकृष्णदासजी उपनाम बल्लीबाबू से प्राप्त हुए । एक हस्तलेख खंडित है,
उसमें लिपिकाल का उल्लेख नहीं है। दूसरा पूर्ण है और उसका लिपिकाल
सं० १७२२ है । इससे प्राचीन किसी हस्तलेख का पता नहीं चलता । खंडित
प्रति कुछ समय बाद का हस्तलेख जान पड़ती है, उसकी शाखा पूर्ण प्रति से

( ४२ )
भिन्न है । टीकाओं में से सूरति मिश्र की टीका अप्रकाशित है । उनकी
इस रसगाहकचंद्रिका टीका का हस्तलेख मेरे प्रिय शिष्य श्रीलक्ष्मीशंकरजी
व्यास से प्राप्त हुआ है । पहली टीका पद्य में है दूसरी पुराने गद्य में । यद्यपि
पाठनिर्णय करने में बहुत सावधानी रखी गई है तथापि यत्रयत्र कुछ मतभेद
की संभावना है । अनेकविध कार्यों में लगे रहने से तथा दृष्टि में मांद्य आ
जाने से कुछ त्रुटियाँ संभावित हैं । उनके लिए क्षमार्थी हूँ ।
रसिकप्रिया—
१ पूर्ण । लिपिकाल—सं० १७२२ प्राप्तिस्थान—श्रीबालकृष्णदासजी भार-
तेंदुभवन, चौखंभा, वाराणसी ।
२ खंडित । लिपि०— × । प्राप्ति०—श्रीबालकृष्णदासजी, भारतेंदु-भवन,
चौखंभा, वाराणसी ।
३ पूर्ण । प्राप्ति०—काशिराज का पुस्तकालय ।
हस्तलिखित हिंदी-ग्रंथों का विवरण (काशी नागरीप्रचारिणी सभा)
४ (०३-८६) । पूर्ण । लिपि- × । प्राप्ति०-काशिराज का पुस्तकालय ।
५ (०४-१२८) । पूर्ण । लिपि०-सं० १८१४ । प्राप्ति०-उल्लिखित नहीं है ।
६ (१७-६६ ए) । पूर्ण । लिपि०- × प्राप्ति०-सेठ चंद्रशेखर, अनूपशहर,
जिला बुलंदशहर ।
७ (१७-६६ बी) खंडित । लिपि०- × । प्राप्ति०-श्रीदेवकीनंदनाचार्य
पुस्तकालय, कामवन, भरतपुर ।
८ (२०-८२ सी) खंडित लिपि०-सं १७७४ । प्राप्ति०-पं० महावीरप्रसाद
दीक्षित, मुहल्ला चंदनियाँ, फतेहपुर ।
६ (२६-२.७ आई) । खंडित । लिपि०- × । प्राप्ति-पं० शंभूनाथ, गाँव
बबुरी, डा० अलीगंज बाजार (सुलतानपुर) ।
१० (२६-१३३ एफू) । पूर्ण । लिपि० सं० १७३७ । प्राप्ति-आनंदभवन
पुस्तकालय, डा० बिसर्वां, जिला सीतापुर ।
११ (२६-१६२ एफू) । पूर्ण । लिपि०-सं० १६०८ । प्राप्ति०-पं० उलफतरी
बसायक नवीस, फतहाबाद, जिला आगरा ।
'सभा'-संग्रह
१२ (६१-२६) । खंडित । प्रति से संलग्न उसी हस्तलिपि में लिखी 'बिहारी-
सतसई' की पुष्पिका में लिपिकाल सं० १७७४ अंकित है ।
१३ (६१-३०) । खंडित । लिपि०-सं० १८३६ ।
१४ (४३४-३८२) पूर्ण ? पत्र १-२०८ । लिपि०- × ।

( ४१ )
१५ (५५२-३६७) । खंडित । लिपि०-सं० १७८६ ।
१६ (१५६४-६१३) । खंडित । लिपि०-सं० १७८७ ।
१७ (१२०१-७८५) । पूर्ण ? । पत्र १-१२८ । लिपि०- × ।
१८-(२७०२-१६२०) । खंडित । लिपि०- × ।
याज्ञिक-संग्रह
१६ (७३-६) खंडित । लिपि०- × ।
२० (२०२-६) । खंडित । लिपि०- × ।
२१ (२०३-६) । खंडित । लिपि०- × ।
२२ (७१-६) । खंडित । लिपि०- × ।
२३ (१६-६) पूर्ण । लिपि०-१८६८ वि० ।
राजस्थान में हिंदी के हस्तलिखित ग्रंथों की खोज
२४ (प्रथम भाग, १०७) पूर्ण । लिपि०-सं० १७०४ । प्राप्ति०-सज्जन-वाणी-
विलास, उदयपुर ।
२५ (तृतीय भाग, ५३) पूर्ण ? । प्राप्ति०-सरस्वती-भंडार, भींडर ।
२६ (तृतीय भाग, ५३) । पूर्ण ? । प्राप्ति०-राव मोहनसिंह, उदयपुर ।
प्राचीन हस्तलिखित पोथियों का विवरण (बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्, पटना
२७ (दूसरा खंड, ५ ) । पूर्ण । लिपि०-सं० १८६७ । प्राप्ति०-श्रीमन्नूलाल
पुस्तकालय, गया ।
२८ (दूसरा खंड, ५७) । पूर्ण । लिपि०-सं० १६१६ । प्राप्ति०-श्री मन्नूलाल
पुस्तकालय, गया ।
सरस्वती-भवन, संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
२६ नवीन संग्रह संख्या २; वेष्ठन नं० ७५ । संपूर्ण । लिपि० सं० १७३६ ।
३० नवीन संग्रह संख्या ३; वे० नं० ६८ । संपूर्ण । लिपि०-सं० १८२१ ।
३१ नवीन संग्रह संख्या १०; क्रम सं० २५०७; वे० नं० १३७ । संपूर्ण लिपि०- × ।
३२ आधुनिक प्रथम संग्रह; क्रम सं० ६२८; वे० नं० ६७ । अपूर्ण । लिपि०- × ।
३३ द्विवेदी संग्रह; क्रम सं० ८०३६ । अपूर्ण । लिपि०- × ।
३४ १८७४ । अपूर्ण । लिपि०- × ।
दि सेंसस आव् इंडिक मैनस्क्रिप्टस्
३५ (५८२६) लिपि०-सं० १७७६ । प्राप्ति०-न्यूयार्क पब्लिक लाइब्रेरी,
न्यूयार्क सिटी ।
३६ (५८२७) प्राप्ति०-हारवर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी, कैंब्रिज (१६८५)
३७ (५८२८) खंडित । लिपि०-१७ वीं शताब्दी । प्राप्ति०-मेट्रोपोलिटन
म्यूजियम आव् आर्ट, न्यूयार्क सिटी ।

( ४४ )
३८ (५८२६) । प्राप्ति०-हारवर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी, कैंब्रिज (१६८६) ।
३६ (५८३०) लिपि०-सं० १७४३ । प्राप्ति० हारवर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी,
कैंब्रिज (१७०७) ।
४० (५८३१) लिपि०-सं० १८१६ । प्राप्ति०-हारवर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी,
कैंब्रिज (११६२) ।
रसिकप्रिया-टीका
१ पूर्ण । लिपि०- x । प्राप्ति०-श्रीलक्ष्मीशंकरजी व्यास, दंडपाणि की गली,
वाराणसी । 'रसग्राहकचंद्रिका' सूरति मिश्र की टीका ।
हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों का विवरण ( काशी नागरीप्रचारिणी सभा ) ।
२ (०२-२५६) । खंडित । लिपि० सं० १७६४ । प्राप्ति०-जोधपुरराज का
पुस्तकालय ।
३ (०२-२६०) प्राप्ति०-जोधपुरराज का पुस्तकालय ।
४ (०४-५७) । पूर्ण । प्राप्ति०-काशिराज का पुस्तकालय । सरदार कवि
की 'सुखविलासिका' टीका ।
५ (०६-२४३ ए) लिपि०-सं० १८६६ । प्राप्ति०- चरखारीराज का पुस्त-
कालय । सूरति मिश्र की 'रसगाहकचंद्रिका' टीका ।
६ (०६-२४२ डी) । लिपि०-सं० १८८७ । प्राप्ति०-लाला विद्याधर,
होरीपुरा, दतिया । सूरति मिश्र की 'जोरावरप्रकाश' टीका ।
७ (०६-१४७) पूर्ण । प्राप्ति०- उल्लिखित नहीं है । टीकाकार-कासिम,
वाजिद के पुत्र ।
८ (१७-१८६ ए) पूर्ण । लिपि०-सं० १६१८ । प्राप्ति०-रमणलाल हरीचंद
चौधरी, बाजार कोसी (मथुरा) । सूरति मिश्र की 'जोरावरप्रकाश' टीका ।
९ (२३-१७६ एच्) । प्राप्ति० महाराज राजेंद्रबहादुरसिंह, भिनगाराज,
बहराइच ।
१० (२३ १७६ आई) । प्राप्ति०-बा० पद्मबक्ससिंह, लवेदपुर, बहराइच ।
११ (२३-१७६ जे) । खंडित । प्राप्ति०-बा० पद्मबक्ससिंह, लवेदपुर,
बहराइच ।
१२ (२६-४७४ जी) । खंडित । लिपि०-सं० १७६१ । प्राप्ति०-श्रीबलवंत
सिंह । सूरति मिश्र की 'रसगाहकचंद्रिका' टीका ।
१३ (२६-४७४ एफू) । प्राप्ति० श्रीहनुमानसिंह, ग्राम गोधनी, डा० जयतिपुर,
जिला उन्नाव ।
१४ (२६-१६२ ए) । खंडित । लिपि० सं० १८६६ । प्राप्ति०-श्रीमहाराजा प्रकाश-

( ४५ )
सिंह, मल्लापुर जिला सीतापुर । राजा जगतसिंह की 'जगतविलास' टीका ।
राजस्थान में हिंदी के हस्तलिखित ग्रंथों की खोज
१५ (प्रथम भाग, १०८) । लिपि०-सं० १७६६ । टीकाकार-कुशलधीर ।
टीका राजस्थानी भाषा में है । प्राप्ति०-सरस्वती-भंडार, उदयपुर ।
१६ (प्रथम भाग, १०९) । पूर्ण । लिपि०-महाराणा शंभुसिंहजी के राज्य-
काल में आरंभ तथा महाराजा सज्जनसिंहजी के राज्यकाल में समाप्त ।
सूरति मिश्र की 'जोरावरप्रकाश' टीका । सचित्र । प्राप्ति०-सज्जन-वाणी-
विलास, उदयपुर ।
१७ (द्वितीय भाग, पृष्ठ १३७) । संस्कृत टीका । टीकाकार-समर्थ । रचनाकाल-
सं० १७५५ । लिपि०-१७६६ । प्राप्ति०-दानसागर भंडार, बीकानेर ।
१८ (तृतीय भाग, ५४) । लिपि० सं० १८२६ । सूरति मिश्र की 'जोरावर-
प्रकाश' टीका । प्राप्ति०-राव मोहनसिंह, उदयपुर ।
सरस्वती-भवन, संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
१९ (२५६६) । अपूर्ण । लिपि०- × । सरदार कवि की टीका ।
'सभा'-संग्रह
२० (६२६-४४८) । खंडित । सूरति मिश्र और सरदार कवि की टीका से भिन्न ।
२१ (६२५-४४७) । खंडित । लिपि०-सं० १७९१ सूरति मिश्र की 'रसगाहक-
चंद्रिका' टीका ।