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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 286 में से

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पृष्ठ 28

व्यभिचारी भाव के नामकथन में केशव ने परंपरागृहीत तैंतीस संचारियों
के प्रसंग में दो शब्द ऐसे रखे हैं जिनसे भ्रांति हो सकती है । एक शब्द
'बिबाद' है और दूसरा 'आधि' ।—
१—गर्व हर्ष आवेग पुनि निंदा नींद-बिबाद ।
२—उन्माद मरन अवहित्य है व्यभिचारी जुतआधि ॥
यदि 'बिबाद' को कोई नया संचारी माना जाए तो 'तर्क' और उसमें कोई
भेद नहीं होगा । इसलिए 'नींद-बिबाद' समस्तपद जान पड़ता है । 'नींद-
बिबाद' का 'निद्रा का बखेड़ा, निद्रा की बात' अर्थ है । ध्यान देने योग्य
है कि दोनों शब्द 'तुकांत' में आए हैं । ये तुकांत के अनुरोध से प्रयुक्त हैं,
इनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है । जैसे 'बिबाद' को 'निद्रा के साथ जोड़
लेने से स्थिति ठीक हो जाती है वैसे ही 'जुत आधि' को चाहें तो 'अवहित्य'
के साथ जोड़ दे सकते हैं । अन्यथा उस दोहे के प्रथम दल में 'व्याधि' है
उसी से इसे जोड़ लें—'आधि व्याधि' को एक मानें। यह 'जुत' शब्द 'आधि'
को किसी से जोड़ने के लिए ही प्रयुक्त है । उसकी स्वतंत्र सत्ता के द्योतन के
लिए प्रयुक्त नहीं जान पड़ता । शारीरिक क्लेश को व्याधि और मानसिक
क्लेश को आधि कहते हैं । बाह्य और आभ्यंतर भेद से एक ही क्लेश की
द्विधा स्थिति हो जाती है ।
हाव का लक्षण इन्होंने यह किया है —
प्रेम राधिका कृष्ण को है तातें सिंगार ।
ताके भावप्रभाव तैं उपजत हावबिचार ॥६।१५
यहाँ 'भावप्रभाव' शब्द विचारणीय है । राधाकृष्ण के प्रेम से शृंगार
होता है, उसके भाव के प्रभाव से हाव होता है । 'भाव' का अर्थ या तो
'स्थिति' मानें अथवा 'मनोविकार' मानें । नाट्य शास्त्र में 'हाव' दूसरे ढंग से
माना गया है । हिंदी में आलंबनगत 'अलंकार' को हाव कहते हैं । नाटघशास्त्र
में कहा गया है कि सामान्याभिनय तीन प्रकार से होता है—वाणी से, अंग
से और सत्त्व से । सत्त्व देहात्मक होता है । सत्त्व से भाव और भाव से हाव,
हाव से हेला होती है—
देहात्मकं भवेत् सत्त्वं सत्त्वात् भावः समुत्थितः ।
भावात् समुत्थितो हावो हावाद्धेला समुत्थिता ॥२४।७
वहीं नाटघर साश्रय अलंकारों का उल्लेख भी है । मुख और शरीर में यौवन
के समय होनेवाले स्त्रियों के शारीरिक विकार या चेष्टा का नाम अलंकार है—
अलंकारास्तु नाटघज्ञैर्ज्ञेया नाटघर साश्रयाः ।
यौवने ह्यधिकाः स्त्रीणां विकारा वक्त्रगात्रजाः ॥२४।४