सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

( २७ )
के अनुकूल माना जाए तो इसका अर्थ 'काम' करने में बाधा है । तब इसका
अर्थ 'अशरीरी रस-भाव' करना चाहिए । पर केशव ने इसके अनंतर आलंबन-
स्थान और उद्दीपन का जो वर्णन किया है वहाँ केवल श्रृंगाररस के ही आलं-
बन-उद्दीपन कथित हैं । इसलिए जान पड़ता है कि इन्होंने 'काम' अर्थ में ही
इसका व्यवहार किया है । आलंबनस्थान-वर्णन भी ध्यान देने योग्य है—
दंपति जोबन रूप जाति लच्छनजुत सखिजन ।
कोकिल कलित बसंत फूल फल दल अति उपबन ।
जलचर जलजुत अमल कमल कमला कमलाकर ।
चातक मोर सुसब्द तड़ित धनु अंबुद अंबर ।
सुभ सेज दीप सौगंध गृह पान गान परिधान मनि ।
नव नृत्यमेव बीनादि रव आलंबन केसव बरनि ।।
इसमें 'दंपति' तो अवश्य शृंगाररस के आलंबन हैं, पर सखीजन, कोकि-
लादि की गणना उद्दीपन में ही की जाती है । उद्दीपन दो प्रकार के होते हैं-
संबद्ध और तटस्थ । आलंबन से संबद्ध उद्दीपन के अंतर्गत कुछ तो शारीरिक
चेष्टाएँ होती हैं, कुछ शरीर की साजसज्जा, कुछ शय्यादि उपकरण, कुछ
सहायक सखी आदि । तटस्थ के अंतर्गत प्राकृतिक स्थिति होती है । इनमें से
केशव ने शारीरिक चेष्टा को ही उद्दीपन कहा है—
अवलोकन आलाप परिरंभन नख-रद-दान ।
चुंबनादि उद्दीप हैं मर्दन परस प्रवान ।।६।७
पर अन्य सभी उद्दीपनों को इन्होंने आलंबन ही कहा है । इसका कारण
कदाचित् यह है कि प्रकृत आलंबन के अतिरिक्त स्थितिभेद से ये भी आलंबन
हो सकते हैं । इन्हें उद्दीपन कह देने से इनकी गणना फिर आलंबन के अंतर्गत
न हो सकती । पर ऐसा कर देने से इनका उद्दीपन होना स्पष्ट लक्षित नहीं
होता । हिंदी में प्राकृतिक दृश्य आलंबन होते हैं यह केशवदास ने ही कहा
है । यह कथन कम महत्त्व का नहीं है ।
अनुभाव का लक्षण यह है—
आलंबन उद्दीप के जो अनुकरन बखान ।
ते कहिये अनुभाव सब दंपति प्रीति-विधान ।।६।८
इसमें 'अनुकरण' शब्द 'अनुकृति' नहीं 'अनुगमन' अर्थ में प्रयुक्त जान
पड़ता है । अनुभाव शब्द के दो अर्थ किए जाते हैं— जो भावादि का अनुभव
कराते हों अथवा जो भाव के पीछे प्रकट होते हों । यहाँ दूसरा अर्थ लिया
गया है ।