रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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ये तीन प्रकार के हैं—अंगज, स्वाभाविक और अयत्नज । अंगज ३,
स्वाभाविक १०, अयत्नज ७ । भाव, हाव और हेला ये तीन अंगज होते हैं ।
यहाँ ‘भाव’ का अर्थ है कामविकार । अल्पसंभोगेच्छाप्रकाशक भ्रू नेत्रादि विकार
को हाव कहते हैं । जब विकार बहुत स्फुट रूप में प्रकट हो तो उसे हेला कहते
हैं । ये अंगज कहलाते हैं, अंग या शरीर से प्रकट होने के कारण । स्वाभाविक
दस होते हैं—लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिंचित्, मोट्टायित,
कुट्टमित, बिब्बोक, ललित, विह्वत । ये स्वभावसिद्ध होते हुए भी कृतिसाध्य
होते हैं, यत्नज होते हैं । स्त्रियों में स्वाभाविक सात्त्विक अलंकार इनके
अतिरिक्त आठ और हो सकते हैं—मद, तपन, मौग्ध्य, विक्षेप, कुतूहल, हसित,
चकित तथा केलि ।* अयत्नज सात होते हैं-- शोभा, कांति, दीप्ति, माधुर्य,
प्रगल्भता, औदार्य और धैर्य । अंगज और अयत्नज ये दस पुरुषों में भी हो
सकते हैं । किंतु विशेष शोभाकारक होते हैं नायिकाओं में ही ।
केशव ने उपर्युक्त दस स्वाभाविक अलंकारों के अतिरिक्त 'हाव' शीर्षक
के अंतर्गत 'हेला', 'मद' और 'बोधक' को ग्रहण किया है । इस प्रकार
इन्होंने कुल १३ हाव माने हैं। 'हावों' की ऐसी कल्पना 'रसतरंगिणी'
से चली है । उसमें उक्त दस स्वभावज अलंकारों को 'हाव' नाम दिया गया है।
हिंदी में 'हेला' को भी उसी में मिला लिया गया है । पूर्वोक्त अतिरिक्त आठ
स्वभावज अलंकारों में से हिंदीवाले कुछ को या सभी को हाव के अंतर्गत कर
के कहते हैं । बोधक हाव का वर्णन सबसे प्रथम हिंदी में इन्होंने ही किया है—
गूढ़ भाव को बोध जहँ केसव ओरहि होइ ।
तासों बोधक हाव सब कहत सयाने लोइ ॥६।५४
कोई कोई इसे 'बोध' कहते हैं । भिखारीदास ने रससारांश में 'बोधक' को
'क्रियाचातुर्य' कहा है । पद्माकर जगद्विनोद में उसका लक्षण यों देते हैं—
ठानि क्रिया कछु तिय पुरुष बोधित करै जु भाव ।
रसग्रंथन में कहत हैं तासों बोधक हाव ॥ ४६६ ॥
'मौग्ध्य' के प्रतिपक्ष में 'चातुर्य'-सूचक 'बोधक' की कल्पना की गई है ।
'दास' ने शृंगारनिर्णय में भरतकथित दस स्वाभाविक अलंकारों में ही अन्य
अतिरिक्त स्वभावज अलंकारों को अंतर्भुक्त करने का प्रयास किया है ।
इस प्रसंग में दूसरी विचारणीय स्थिति यह है कि स्वभावज अलंकारों को
इन्होंने श्रीकृष्ण में भी माना है । इस संबंध में रसतरंगिणीकार ने स्थिति स्पष्ट
कर दी है । नारियों में ये स्वाभाविक होते हैं, परपुरुषों में औषधिक—
- देखिए साहित्यदर्पण ।