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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 286 में से

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पृष्ठ 32

( ३२ )
भूलि जाइ सुधिबुधि जहाँ सुखदुख होइ समान ।
तासों जड़ता कहत हैंकेसवदास सुजान ॥ ८ ४८
इसमें 'गता स्मृतिः' का 'भूलि जाइ सुधिबुधि' ठीक है। पर 'सुखदुख
होइ समान' यह कदाचित् 'इष्टानिष्टापरिज्ञान' से संबद्ध है। क्योंकि सुख
अनुकूल-वेदनीय होता है और दुःख प्रतिकूलवेदनीय। उज्ज्वलनीलमणि में
'जडिमा' का लक्षण यह है—
इष्टानिष्टापरिज्ञानं यत्र प्रश्नेष्वनुत्तरम् ।
दर्शनश्रवणाभावो जडिमा सोऽभिधीयते ।
अत्राकाण्डेऽपि हुंकारस्तम्भश्वासभ्रमादयः ॥
इस प्रभाव के अंत में केशव ने अनुभव की मार्मिक स्थिति का उल्लेख
किया है। इनके अनुसार आदर, लोभ तथा अतिसंग से साधुओं के चित्त भी
चंचल हो जाते हैं (देखिए ८।५६ ) ।
नवम प्रभाव में केशव ने मान के प्रसंग में नायक के मान का भी विवे-
चन किया है। यह अंश श्रृंगारतिलक में नहीं है। साहित्यदर्पण में स्थिति
स्पष्ट है—
मानः कोपः स तु द्वेधा प्रणयेर्ष्यासमुद्भवः ।
द्वयोः प्रणयमानः स्यात्प्रमोदे सुमहत्यपि ॥३।१६८
उज्ज्वलनीलमणि में कहा गया है कि
स्नेहं विना भयं न स्यान्नेर्ष्या च प्रणयं विना ।
तस्मान्मानप्रकारोऽयं द्वयोः प्रेमप्रकाशकः ॥
दशम प्रभाव में मानापनोदन के साधन 'बताए गए हैं। इनमें एक
दान भी है। केशव ने इसके प्रसंग में मार्मिक विच र की चर्चा की है। 'दान'
तो वेश्या को भी दिया जाता है। फिर अन्यों से भेद किस प्रकार किया
जायगा। उनका निर्णय है—
जहाँ लोभ तें दान लें छाँडे मानिनि मान ।
बारबधू के लच्छनँहि पावै सबहि प्रमान ॥ १०।७
इसका अर्थ यह है कि जहाँ लोभ न हो वहीं दान-उपाय ठीक होगा। इसी
प्रकार 'प्रणति' में अपराध या काम का हेतु होना आवश्यक है। बिना इसके
प्रणति रस के लिए हानिकारक होती है ( देखिए १०।१८ ) । मान छूटने
की कुछ सहज या सरल स्थितियाँ भी होती हैं। इनका उल्लेख निम्नलिखित
दोहे में है—
देस काल बुधि बचन तें कल धुनि कोमल गान ।
सोभा सुम सौगंध तें सुख हो छूटत मान ॥१०।२६