रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३० )
नारीणां शृंगारचेष्टा हावः । स च स्वभावजो नारीणां । ननु बिब्बोक-
विलासविच्छित्तिविभ्रमाः पुरुषाणामपि संभवन्तीति चेत्सत्यम् । तेषां त्वौपा-
धिकाः स्वभावजाः स्त्रीणामेव । नन्वेवं यदि तासां सदैव ते कथं न भवन्तीति
चेत्सत्यम् । उद्दीपकान्वयव्यतिरेकाभ्यां नायिकानां हावाविर्भावतिरोभावाविति ।
रसरंगिणी में लीला विलास बिच्छित्ति विभ्रम ललित को शारीरिक,
मोट्टायित कुट्टमित बिब्बोक विहृत को आंतरिक और किलकंचित को उभय-
संकीर्ण कहा है । साथ ही इन सबके विभाव और अनुभाव का भी उल्लेख
विस्तार से किया है । जैसे लीला के संबंध में वे लिखते हैं—
प्रियमूषणवचनाद्यनुकृतिर्लीला । तत्र विभावः सखीकौतुककलापः । अनु-
भावः प्रियपरिहासः ।
भोजराज के शृंगारप्रकाश में इसका अत्यधिक विस्तार है। उन्होंने
अनुभाव के अंतर्गत ही इन्हें रखा है । रूपगोस्वामी ने भी अनुभाव के भीतर
ही इन्हें रखा है । भोजराज ने अनुभाव का लक्षण ही यों किया है—
इदानीमनुभावं व्याख्यास्यामः । तत्र विभावैः प्रबुद्धसंस्कारस्य नायकादेः
ये स्मृतीच्छाद्वेषप्रयत्नजन्मानः मनो वाग्बुद्धिशरीरारम्भाःतेऽनुभूयमानत्वादरत्यादी-
नामनन्तरभवनाच्च अनुभावाः ।
इस प्रकार मन, वाणी, बुद्धि और शरीर के आरंभ अनुभाव हैं । 'मन
आरंभ' में भाव, हाव, हेला, शोभा, कांति, उदीप्ति, माधुर्य, धैर्य, प्रागल्भ्य,
औदार्य, स्थैर्य और गांभीर्य हैं । 'वागारंभ' में हैं आलाप, प्रलाप, विलाप, अनु-
लाप, संल्लाप, अपलाप, संदेश, अतिदेश, निर्देश, उपदेश, अपदेश और
व्यपदेश ।* 'बुद्धयारंभ' भी बारह हैं—पांचाली, गौड़ी, वैदर्भी, लाटीया
रीतियां, भारती, आरभटी, कैशिकी, सात्त्विकी वृत्तियां और पौरस्त्या, उड्र-
मागधी, दाक्षिणात्या और आवंत्या । 'शरीरारंभ' में लीला, विलास,
विच्छित्ति, विभ्रम, किलकंचित, मोट्टायित, कुट्टमित, विब्बोक, ललित, विहृत,
क्रीड़ित और केलि का ग्रहण है ।
उज्ज्वलनीलमणि में 'विहृत' के स्थान पर 'विकृत' नाम है—
ह्रीमानेर्ष्यादिभिर्यंत्र नोच्यते स्वविवक्षितम् ।
व्यज्यते चेष्टयैवेदं विकृतं तद्विदुर्बुधाः ॥
भरत के नाट्यशास्त्र में भी 'विकृत' नाम मिलता है। हिंदी के कुछ
शृंगारयुगीन रीतिग्रंथों में भी यही नाम रखा गया है ।
नवीन कल्पना के लिए केशवदास ने क्षमार्थना भी की है—
- मिलाइए नाट्यशास्त्र में अभिनयात्मक अलंकारों से । २४।५२-५७