रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१ )
राधा राधारमन के कहे जथामति हाव ।
ढिठई केसवदास की छमियो कवि कबिराव ॥ ६।५७
सप्तम प्रभाव में 'खंडिता' का लक्षण भिन्न है। 'शृंगारतिलक' का
लक्षण यह है—
कुतश्चिन्नागतो यस्या उचिते वासके प्रियः ।
तदनागमसंतप्ता खण्डिता सा मता यथा ॥२।७६
'खंडिता' का अर्थ होता है 'परिस्थितिवश प्रिय पर से जिसके अपनत्व
का अभिमान खंडित हो'। यहाँ प्रिय के न आने से जिसको संताप हो वह
खंडिता कही गई है। हिंदी में खंडिता का जो लक्षण चला वह रसमंजरी के
अनुगमन पर—
अन्योपभोगचिह्नित प्रातरागच्छति पतिर्यस्याः सा खंडिता ।
केशव का लक्षण यों है—
आवन कहि आवै नहीं आवै प्रीतम प्रात ।
जाके घर सो खंडिता कहै जु बहुविधि बात ॥ ७।१६
यहाँ केशव ने 'आने की कहकर न आए' लिखकर एक ओर स्थिति
स्पष्ट की तो दूसरी ओर 'अन्योपभोगचिह्नित' को छोड़ दिया। उसे 'कहै जु
बहुविधि बात' के भीतर रखा है। इसका कारण उनके द्वारा गृहीत प्रच्छन्न-
प्रकाश' भेद है। उन्होंने प्रच्छन्न में तो 'उपभोगचिह्नों' का उल्लेख नहीं
किया, पर 'प्रकाश' में उनका संकेत किया है। (देखिए ७।१८)।
अभिसारिका के इन्होंने तीन विशेषण दिए हैं—
हित तें कै मद मदन तें पिय पै मिले जु आइ ।
सो कहिये अभिसारिका बरनी त्रिबिध बनाइ ॥ ७।२५
प्रेम, मद ( गर्व ) और मदन ( काम ) से प्रेरित होकर जो प्रिय के
पास जाए । इसमें के दो विशेषण तो नाट्यशास्त्र में मिल जाते हैं—मद और
मदन । प्रेम नूतन कल्पना है—
हित्वा लज्जां समाकृष्टा मदेन मदनेन वा।
अभिसारयते कान्तं सा भवेदभिसारिका ॥ २४।२१२
अष्टम प्रभाव में जड़ता का लक्षण विचारणीय है। 'शृंगारतिलक' में
उसका लक्षण यह है—
प्रकाण्डे यत्र हुंकारो दृष्टः स्तब्धा गता स्मृतिः ।
श्वासाः समाधिकाः काश्यं जडतेयं मता यथा ॥ २।१५
पर केशव ने यह लक्षण दिया है—