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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

चतुर्दश प्रभाव २५३
जानति हौं नलराज दमैंती की दूतकथा रस-रंग रँगी है ।
पूजैगी साध सबै सुख की बड़भाग की केसव ज्योति जगी है ।५।
शब्दार्थ—भेद की बात=रहस्य की बातें । मासक तें = एक मास से ।
हठिकै = बरबस । जिनकी० = जो तुमसे प्रेम करते हैं । नलराज = राजा
नल । दमैंती = दमयंती । दूतकथा० = नल और दमयंती की दूतकथा के
आनंद के रंग में रँग गई है, उनकी दूतकथा चाव से सुनती है । साध =
( सं० श्रद्धा ) उत्कट अभिलाष । बड़भाग० = परम सौभाग्य का उदय
हो गया है ।
विवरण—'भेद की बात' से मुसकाना मंदहास है ।
सूचना—यह सवैया 'कविप्रिया' के हास्य 'रसवत्' में भी उद्धृत है ।
अंतर यह है कि यहाँ पहली पंक्ति चौथी पंक्ति हो गई है । लीथोवाली प्रति में
यह छंद नहीं है ।
अपरंच—( सवैया )
(४६६) जानै को पान खवावत क्योंहूँ गई अँगुरी गड़ि ओठ नवीने ।
तैं चितयो तबहीं तिहिं रीति री लाल के लोचन लीलि से लीने ।
बात कही हरएँ हँसि केसव मैं समुझी वे महारस भीने ।
जानति हौं पिय के जिय के अभिलाष सबै परिपूरन कीने । ६ ।
शब्दार्थ—गड़ि गई=लग गई, छू गई । लीलि से० = खा सी गईं, ऐसा
आँखें फाड़ फाड़कर देखा कि नेत्रों को खा सी गई । हरएँ = धीरे से ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायिका प्रति ) न जाने किस प्रकार पान
खिलाते समय तेरे नए ( कोमल होंठ में उनकी उँगली गड़ गई, उस समय तूने
ऐसी कड़ी दृष्टि से देखा कि नायक के नेत्रों को खा सी गई ( आँखें फाड़ फाड़
कर रोषपूर्वक देखा ) और धीरे धीरे हँसकर फिर कुछ कहा भी । मैं
समझती हूँ कि वे अत्यंत रसिक हैं । मैं जानती हूँ कि तूने नायक के हृदय के
सभी अभिलाष ( इसी मुद्रा से ) पूर्ण कर दिए ।
विवरण—नायिका को नायक के विनोद का स्मरण कराकर हँसाना
चाहती है, उद्देश्य मिलाने का है ।
श्रीकृष्णजू को मंदहास, यथा—( कवित्त )
(४७०) दसन-बसन माँझ दमकै दसन-दुति,
बरषि मदन-सर करत अचेत है।
५—बड़-तन । ६—अँगुरी०-लगि अंगुली । तैं-तौ । रीति०-भाँति जु ।
केसव-कै सुनि ।

२५४ रसिकप्रिया
झाईं झलकति लोल लोचन कपोलनि में,
मोल लेत मन क्रम बचन समेत हौ।
भौंहैं कहैं देत भाउ सुनौ मेरी भावती के,
भावते छबीले लाल मौन कौन हेत हौ।
केसव प्रकास हास हँसि कहा लेहुगे जू,
ऐसें ही हँसे तें तौ हिये कौं हरे लेत हौ।७।
शब्दार्थ—दसन-बसन = दांतों का वस्त्र, होंठ। सर = बाण। क्रम =
कर्म। प्रकास = प्रत्यक्ष, खुलकर।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायक प्रति) आपके होठों के भीतर ही दांतों
की चमक दमदमाती है, इस प्रकार आप कामबाण की वृष्टि करके अचेत कर
देते हैं। चंचल नेत्रों और कपोलों में (हास की एक हलकी) छाया सी झल-
मला रही है। इसी के द्वारा मनसा, वाचा, कर्मणा आप मोल ले लेते हैं
(मनोहर छटा से देखनेवाला मुग्ध हो जाता है)। भौंहें भेद की बातें बतला
रही हैं। हे मेरी प्यारी सखी के प्रिय छबीले लाल, आप मौन किसलिए हैं?
जब आप इस प्रकार (मंदहास) से ही हंसकर हृदय को चुराए ले रहे हैं तो
खुलकर हँसने पर न जाने क्या करेंगे? (जब मंदहास में यह छटा है तो
खुले हास में न जाने कितनी अधिक मनोहरता होगी)।
कलहास-लक्षण—(दोहा)
(४७१) जहँ सुनिये कलध्वनि कछू, कोमल बिमल बिलास।
केसव तन मन मोहियै, बरनहु कबि कलहास।८।
भावार्थ—जहाँ कोमल चेष्टाओं के साथ मनोहारिणी मधुर ध्वनि भी
थोड़ी थोड़ी हो वहाँ कलहास होता है (मंदहास में ध्वनि कुछ भी नहीं होती
कलहास में ध्वनि भी होती है)।
श्रीराधिकाजू को कलहास यथा—(सवैया)
(४७२) काछैं सितासित काछनी केसव पातुर ज्यों पुतरीनि बिचारौ।
कोटि कटाक्ष नचै गतिभेद नचावत नायक नेह निनारौ।
बाजत है मृदुहास मृदंग सु दीपति दीपनि को उजियारौ।
देखत हौ हरि देखि तुम्हें यह होत है आँखिन ही में अखारौ।६।
शब्दार्थ—काछैं = पहने हुए। सितासित = (सित + असित) श्वेत और
काली। काछनी = यहाँ एक प्रकार का घाँघरा। पातुर ज्यों = वेश्या की
७—माँझ-माह, मंद। दमके-दरसे। सर-रस, द्युति। देत-भेद।
सुनौ-कहो। हँसे तें-तो हँसनि ही तें हियो अरि। ८—बरनहु-बरनत।
६—निनारो-निहारो, निन्यारो। है-जु। ही में-बीच।

चतुर्दश प्रभाव २५५
भाँति । पुतरीन = पुतलियाँ । बिचारौ = समझो । गतिभेद = नाच की अनेक
चालें । नायक = वेश्याओं को नाच सिखानेवाला उस्ताद । निनारौ = न्यारा,
विलक्षण, चतुर । दीपति = चमक ( आँखों की ) । उजियारौ = प्रकाश ।
अखारो = नाच का समाज, नाचरंग ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायक प्रति ) आपको देखकर तो नायिका
के नेत्रों में नाच का समाज जुड़ जाता है । पुतलियों को श्वेत और श्याम रंग
की काछनी पहने हुए नाचनेवाली समझिए । करोड़ों कटाक्ष ही नाच की
अनेक गतियाँ हैं । नचानेवाला उस्ताद चतुर प्रेम है । मृदुहास ही मृदंग की
भाँति बजता है । ( आँखों में ) जो ज्योति ( जगती ) है वही दीपकों का
प्रकाश है । आप देख रहे हैं न ?
अलंकार—उपमागर्भित सावयव रूपक ।
सूचना—'सरदार' ने अपनी टीका में कहा है कि 'यह छंद मंदहास में
उदाहरण देने योग्य है' । किंतु प्रतियों में यह 'कलहास' के उदाहरण में ही
मिलता है ।
अपरंच, यथा—( सवैया )
(४७३) प्रेम घने रस-बैन सने गति नैननि की सर-मैन भई ही ।
बाल-बहिक्रम-दीपति देह त्रिबिक्रम की गति लीलि लई ही ।
भौंहैं चढ़ाइ सखीनि दुराइ इतै मुसकाइ उतै चितई ही ।
केसव पाइहौ आजु भलें चित चोरि लै कालि गुवालि गई ही ।१०।
शब्दार्थ—रस-बैन=आनंद के वचन । सर-मैन=कामबाण । बहिक्रम=
वयःक्रम, वयःसंधि । त्रिबिक्रम=वह अवतार जिसने साढ़े-तीन डग में त्रिलोक
तथा बलि का शरीर नाप लिया था । त्रिबिक्रम की०=त्रिविक्रम की दीप्ति को
भी दबा दिया है ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायक से ) अत्यंत प्रेम और आनंद से युक्त
उसने वचन कहे थे । नेत्रों की चाल तो कामबाण की भाँति थी । उस बाला
के वयःक्रम (वयःसंधि) के कारण उसके शरीर में जो दीप्ति दिखाई पड़ रही
थी उसने तो त्रिविक्रम के तेज को भी दबा दिया था ( उस दीप्ति के कारण
आप भी उसके वश में हो गए थे ) । भौंहें चढ़ाकर सखियों को हटाकर
इधर की ओर मुख करते हुए देखकर उसने उधर की ओर देखा था । इस
प्रकार जो गोपिका कल आपका चित्त चुरा ले गई थी आज आप उसे निश्चित
पाएँगे ।
१०—सर-रस । मई-मई है । बहिक्रम-बयक्रम । पाइहौ-पाइहै । लै-
जु । गुवालि-जु आलि ।

२५६ रसिकप्रिया
सूचना—यह सवैया लीथोवाली प्रति में नहीं है। हस्तलिखित और
'सरदार' वाली प्रति में है। पर सरदार ने लिखा है कि 'यह कवित्त प्राचीन
पुस्तकन में नाहीं मिलत यातें नारायण कवि याको अर्थ नाहीं लिखो।'
श्रीकृष्णजू को कलहात, यथा—( सवैया )
(४७४) आजु सखी हरि तोसों कछू बड़ी बार लौं बात कही रसभीनी ।
मेलि गरैं पटुका पुनि केसव हारि हियें मनुहारि सी कीनी ।
मोहिं अचंभो महा सु इहा कहि बाँह कहा बड़ो बार लौं लीनी ।
तैं सिर हाथ दियो उनिकैं उनि गाँठि कहा हँसि आँचर दीनी ।११।
शब्दार्थ—बार लौं=देर तक । रसभीनी=रसीली । पटुका=कमर में
बाँधा जानेवाला वस्त्र । मेलि गरैं पटुका=गले में कमर का पटका डालकर ।
हारि=हार मानकर । मनुहारि=प्रार्थना । बड़ी बार लौं=बहुत
देर तक ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, आज श्रीकृष्ण
तुमसे बड़ी देर तक कुछ रसीली बातें करते रहे, गले में पटका डालकर और
हृदय से हार मानकर तेरी मनुहार सी करते रहे। (यहाँ तक तो कोई अचरज
की बात नहीं, पर ) मुझे इस बात का बड़ा अचरज होता है कि उन्होंने
बड़ी देर तक तुम्हारी बाँह (बड़े प्यार से ) ली। तुम भला बतलाओ न
क्या बात है ? तुमने उनके मस्तक पर हाथ क्यों रखा और उन्होंने हँसकर
अंचल के छोर में गाँठ क्यों दी ? (नायिका ने सौत के यहाँ जाने की बात
पर मान किया था, नायक ने अपने गले में पटका डालकर अपनी दीनता
दिखाते हुए उसकी विनती की कि अब ऐसी भूल न होगी, क्षमा करो । उसने
देर तक नायिका की बाँह पकड़कर शपथ ली। नायिका ने सिर पर हाथ
रखकर क्षमा की और उन्होंने यह कहकर अंचल के छोर में गाँठ दी कि अब
गाँठ बाँधता हूँ, कभी ऐसा न करूँगा ) !
सूचना—'सरदार' ने सिर पर हाथ रखने का एक तात्पर्य 'संकेत में
मिलना' भी लिया है ।
अतिहास-लक्षण — ( दोहा )
(४७५) जहाँ हँसहिं निसंक ह्वै, प्रकटहिं सुख मुखबास ।
आधे आधे बरन पद, उपजि परत अतिहास ।१२।
११—बार-बेर । सी-सो । बांह-चाह । बड़ी-बहू । बार लौं-बारन ।
१२—हँसहिं-हँसे । ह्वै-कै । प्रगटहि-प्रकटैं । आधे०-अर्ध बरन पद होत है ।

१७ चतुर्दश प्रभाव २५७
शब्दार्थ—मुख . मुखवास = मुख की नैसर्गिक सुगंध । आधे० = आधे
अक्षरों के ही शब्द निकलें, अस्फुट शब्द निकलें।
भावार्थ—जहाँ निःशंक हँसने से मुख की नैसर्गिक सुगंध निकलने लगे
और अस्फुट शब्द भी हों वहाँ अतिहास होता है।
श्रीराधिकाजू को अतिहास, यथा-(कवित्त)
(४७६) तैसीयै जगत ज्योति सीस सीसफूलनि की,
चिलकत तरुनि तिलक तेरे भाल को।
तैसीये दसन द्युति दमकति केसौदास,
तैसोई लसत लाल लाल कंठमाल को।
तैसीयै चमक चारु चिबुक कपोलनि की,
चमकत देखौ नकमोती चल चाल को।
हरैं हरैं हँसि नेक चतुर चपलनैनि,
चित्त चकौंधै मेरे मदनगुपाल को ।१३।
शब्दार्थ-चिलकत = चमकता है। तरुनि = नायिका। लाल = लाल रंग-
वाला। लाल = माणिक। चिबुक = ठुड्डी। चल चाल को = चल चाल-
वाला, चंचल। हरैं हरैं = धीरे धीरे।
भावार्थ-(सखी-वचन नायिका प्रति) हे तरुणी, एक तो सिर पर के
शीशफूल वैसे ही (अत्यंत दीप्तिपूर्वक) चमक रहे हैं, दूसरे तेरे माथे पर
लगा तिलक भी वैसा ही चमचमा रहा है। तीसरे दांतों की द्युति भी वैसी ही
हों रही है, चौथे कंठहार में लगा लाल वर्णवाला माणिक भी दमक रहा है,
पांचवें सुंदर ठुड्डी और कपोलों की भी वैसी ही चमक है, छठे नाक (की
बेसर) का मोती भी वैसा ही दमक रहा है। (इतनी अधिक चमक है कि
कहा नहीं जाता)। अतः ऐ चतुर चंचल नेत्रवाली, तू थोड़ा धीरे धीरे हँस
क्योंकि (इतनी चमकों के कारण) मेरे मदनगोपाल का चित्त चकाचौंध में
पड़कर व्यग्र हो जाता है।
श्रीकृष्णजू को अतिहस, यथा-(कवित्त)
(४७७) गिरि गिरि उठि उठि रीझि रीझि लावैं कंठ,
बीच बीच न्यारे होत छबि न्यारी न्यारी सौं।
आपुस में अकुलाइ आधे आधे आखरनि,
आछी आछी बात कहैं आछी एक यारी सौं।
सुनत सुहाइ सब समुझि परै न कछू,
केसौदास की सौं दुरि देखे मैं हुस्यारी सौं।

१३-चिलकत-झलकत। तरुनि-तिलकु, सिलकु, तिलनि । तैसीये-
तैसेई। लाल लाल-लाल कंठ। चमकत-झलकत।

२५८ रसिकप्रिया
तरनि-तनूजा-तीर तरबर-तर ठाढ़े,
तारी दै दै हँसत कुँवर कान्ह प्यारी सों ।१४।
शब्दार्थ—आधे आधे आखरनि = अस्फुट वचनों से । आछी = मनो-
हारिणी । यारी = मित्रता । सुहाइ = अच्छा लगता है । दुरि = छिपकर ।
हुस्यारी=चतुराई । तरनि = सूर्य । तनूजा = पुत्री । तरनि-तनूजा = यमुना ।
तर = तले, नीचे ।
भावार्थ—( सखी का वचन सखी से ) वे हँसते हँसते गिर गिर पड़ते हैं,
फिर उठते हैं और रीझ रीझकर एक दूसरे के गले लगते हैं । बीच बीच में
( कभी कभी ) वे विलक्षण शोभा ( मुद्रा ) के साथ दूसरे से पृथक् भी हो
जाते हैं । वे उतावले होकर परस्पर अस्फुट अक्षरों से अच्छी अच्छी बातें भी
मनोहारिणी मित्रता के साथ करते हैं । उनकी बातें सुनने में तो अच्छी
लगती हैं, पर समझ में कुछ नहीं आतीं । तेरी शपथ मैंने छिपकर चतुराई से
देखा है ( देख आई हूँ, तू भी चल ), यमुना के तट पर तरुवर ( कदंब ) के
नीचे खड़े होकर कुँवर कन्हैया प्यारी राधिका से ताल बजा बजाकर हँस रहे हैं।
अलंकार—समुच्चय ।
अथ परिहास-लक्षण-( दोहा )
( ४७५) जहाँ परिजन सब हँसि उठैं, तजि दंपति की कानि ।
केसव कौनहुँ बुद्धिबल सो परिहास बखानि ।१५।
शब्दार्थ—परिजन = सखा, सखी आदि निकट रहनेवाले लोग । कानि
= मर्यादा ।
श्रीराधिकाजू को परिहास, यथा-( सवैया )
(४७६) आई है एक महाबन तें तिय गावति मानो गिरा पगु धारी ।
सुंदरता जनु काम की कामिनि बोलि कह्यो वृषभानुदुलारी ।
गोपिकै ल्याइ गुपालहि वै अकुलाइ मिलीं उठि आदर भारी ।
केसव भेंटत ही भरि अंक हँसीं सब कीक दै गोपकुमारी ।१६।
शब्दार्थ—गिरा=सरस्वती । पगु धारी = आई, पधारी । बोलि =
बुलाकर । कीक दै = खिलखिलाकर ।
भावार्थ—( सखियों ने राधा का मान छुड़ाने के लिए अथवा विनोद के
लिए श्रीकृष्ण को गोपी के वेश में गीत गाते हुए आने को कहा इधर) राधिका
को बुलाकर उनसे कहा कि 'महावन में रहनेवाली एक गायिका गाती हुई
१४—यारी-हारी । कछू-अब । केसोदास-कैसोराइ । १५—तनूजा-
तनैया । कुँवर-कुमार । कान्ह-काहू । १६—मानों-गीत । बोलि-टेरि ।
गुपालहि वै-गुपाल हिये । उठि-करि । आदर-सादर । कीक-कूक । कीक
दै-की कहै ।

आ रही है, ऐसा गाती है मानो स्वयम् सरस्वती ही अवतरित होकर आ गई
हो । सुन्दरता भी ऐसी हैं मानो कामदेव की पत्नी रति हो । इस प्रकार उस
गोपिका को लाकर राधिका के पास कर दिया । वे अत्यंत आदर के साथ
उतावली से उठकर उस गोपिका ( गोपाल ) से भेंटने लगीं तब सखियाँ
खिलखिलाकर हँस पड़ीं ।
श्रीकृष्णजू को परिहास, यथा-(सवैया)
(४८०) सखि बात सुनौ इक मोहन की निकसी मटुको सिर री हलकै ।
पुनि बाँधि लई सुनियै नतनारु कहूँ कहूँ बुंद करी छलकै ।
निकसीं उहि गैल हुते जहँ मोहन, लीनी उतारि जबै चलकै ।
पतुकी धरी स्याम खिसाइ रहे उत ग्वारि हँसी मुख आँचल कै।१७।
शब्दार्थ—हलकै = रीती, खाली । नतनारु = मटकी का मुँह बाँधने का
कपड़ा । छलकै = छलकने के । हुते = थे । चलकै = आकर । पतुकी = मटकी ।
भावार्थ— ( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, मोहन की एक बात
सुनो । वह ग्वालिनी दूध की खाली मटकी सिर पर लेकर चली । उसने उसका
मुँह कपड़े से ढँककर बाँध दिया था और ( दूध ) छलकने की सी बूँदें भी
मटकी में कहीं कहीं डाल दी थीं । फिर वह उस मार्ग से होकर निकली जहाँ
मोहन रहते थे । मोहन ने दूध की मटकी समझकर उसके पास आकर (दान
लेने के लिए वह मटकी उतरवा ली ) । उसने मटकी रख दी, खोलने पर
जब कुछ न निकला तब कृष्ण लज्जित हो गए । उधर वह ग्वालिनी भी
मुँह में अंचल लगाकर हँसने लगी ।
सूचना—( १ ) यह सवया केवल सरदारवाली प्रति में मिलता है ।
( २ ) रसग्राहकचंद्रिका में यह दोहा अधिक है—
कह्यो हासरस बरनि यों अरु रस सुगम कबित्त ।
करुनादिक सिंगारमय बरने समझहु चित्त ।
अथ करुणरस-लक्षण-( दोहा )
(४८१) प्रिय के बिप्रिय करन तें, आनि करुनरस होत ।
ऐसो बरन बखानियै, जैसे तरुन कपोत ।१८।
शब्दार्थ—बिप्रिय = अप्रिय, कष्टदायिनी बात । प्रिय के० = प्रिय के
लिए अप्रिय कार्य करने से करुणरस होता है । बरन = वर्ण, रंग । तरुन
कपोत = युवा कबूतर । ऐसो बरन० = करुणरस का रंग युवा कबूतर की
भाँति होता है ।
१७—सखि०--जुवती सुनि औगुन मोहन के । री हलकै-रीतिम लैके ।
सुनियै--सुनिए । नतनारु--नतनासु । पतुकी--पिनुकी । १८-तें-को । आनि-
अति । करुन०-करुनारस तहँ होत, करना रस होत ।

२६० रसिकप्रिया
श्रीराधिकाजू को करुणरस, यथा-(कवित्त)
(४८२) तेज सूर से अपार, चंद्रमा से सुकुमार,
संभु से उदार उर उर धरियत है ।
इंद्रजू से प्रभु पूरे, रामजू से रनसूरे,
कामजू से रूप रूरे हिय हरियत है ।
सागर से धीर गनपति से चतुर अति,
ऐसे अबिबेक कैसैं दिन भरियत है ।
नंद अतिमंद भला जसुदा सौं कहौं कहा,
ऐसे पूत पाइ पसुपाल करियत है ।१६।
शब्दार्थ—तेज = प्रताप । सूर = सूर्य । उदार = विशाल । उर=वक्षः-
स्थल । उर धरियत है=हृदय में समझे जाते हैं । प्रभु = स्वामित्ववाले ।
रन-सूरे = रणशूर, वीर । रूरे = सुंदर । अबिबेक = मूर्खता । कैसैं दिन
भरियत है = दिन कैसे व्यतीत होते हैं । मतिमंद = मंदबुद्धि । पसुपाल =
पशुपाल, गोचारण आदि ।
भावार्थ—सूर्य की भाँति अपार तेजवाले, चंद्रमा की भाँति सुकुमार,
शिव की भाँति उदार वक्ष, इंद्र की भाँति प्रभुत्ववाले, राम की भाँति वीर,
काम की भाँति सुंदर छवि से हृदय हरनेवाले, समुद्र की भाँति धीर, गणेश
की भाँति अत्यंत चतुर पुत्र को पाकर उससे पशु चराने का काम कराना
कैसी मूर्खता है। नंद तो अत्यंत मंदबुद्धि जान पड़ते हैं, यशोदा को क्या
कहूँ ? ( भला ऐसी मूर्खता से ) उनके दिन कैसे कटते हैं ।
सूचना—'प्रिय का दुःख' आलंबन होने से यहाँ करुणरस है ।
श्रीकृष्णजू को करुणरस, यथा— ( कवित्त )
(४८३) चंपे की सी कली भली केसव सुबास भरी,
रूप की सी मंजरी मधुर मन भाइयै ।
बेद की सी बानी, अति बानी तें सयानी, देव-
राय की सी रानी जानी जग सुखदाइयै ।
काम की कला सी, चपला सी, कामकला सी,
कमला सी देह धरें पूरे पून्य पाइयै ।
कौनैं कीनी निपट कुचालि जाति ग्वालि ऐसी,
राधिका कुँबरि पर गोरस बिछाइयै ।२०।

१६—उर--प्रति । अति-चर । २०—भली-अलौ । भरी-मली । बेद-
देव । जानी०-केसोदास जग जाइए । काम की०-कामअबला सो कमला
सी देखी देह धरे पूरन प्रताप तेज ।

२६२ रसिकप्रिया
को मानसरोवर त्याग देना पड़ा, बेल कठोर हो गया, केसर पीली पड़ गई,
अनार का हृदय फट गया । कनक = सोना (वर्ण) । तन = शरीर । तनक० =
थोड़ा थोड़ा करके अर्थात् (अत्यंत कष्ट सहकर) । ससि = चंद्रमा (मुख) ।
घटत बढ़त = भय से घटता है, कृपा करेंगी इस आशा से बढ़ता है । बंधुजीव =
फूल दुपहरिया, गुल्लाला (तलवों की ललाई) । गंधहीनो = गंधरहित ।
कोबिद = पंडित, चतुर ।
वचन-सखी की उक्ति सखी से । राधिका के निकट ही वह दूसरी
सखी से ये बातें करती है जिससे कोप छूट जाय ।
सूचना-राधिका ने सौत पर कोप किया है ।
श्रीकृष्ण जू को रौद्ररस, यथा-(कवित्त)
(४८६) मीडि मार्यो कलह, बियोग मार्यो बोरिकै,
मरोरि मार्यो अभिमान भार्यो भय भान्यो है।
सबको सुहाग अनुराग लटि लीनो दीनों,
राधिका कुँवरि कहँ सब सुख सान्यो है।
कपट कपटि डार्यो निपट कै औरनि सों,
मेटी पहिचानि मन में हू पहिचान्यो है।
जीत्यो रतिरन मथ्यो मनमथहू को मन,
केसोदास कौन कहुँ रोष उर आन्यो है। २३।
शब्दार्थ-मींडि मारयो कलह = कलह को मींजकर मार डाला ।
बोरिकै = डुबोकर । भारयो भय भान्यो है = भारी भय को भी भंग कर डाला
है । कपट = छल । कपटि डारयो = नोच लिया । निपट कै = एकदम । मन
में हू = मन से भी । मेटी पहिचानि मन में हू पहिचान्यो हैं = मन से भी
जानने की पहचान मिटा दी है ।
भावार्थ- (सखी की उक्ति नायक से) आपने कलह को मींजकर मार
डाला, वियोग को डुबोकर मारा, अभिमान को मरोड़ फेंका, भारी भय का
भी अंगभंग कर दिया, सबका सौभाग्य और अनुराग लूटकर राधिका कुमारी
को देकर उन्हें सब प्रकार के सुख से युक्त कर दिया है । कष्ट को तो एकदम
नोच कर फेंक दिया, औरों को मन द्वारा पहचानने की पहचान भी मिटा
दी है और रति के युद्ध में कामदेव का भी मन मथ डाला है (क्रोध करके
जैसी वीरता दिखाई जाती है वैसी तो आप दिखा चुके) अब किसके लिए
रोष हृदय में ले आए हैं (अब किसे नष्ट करना या जीतना है)। (युद्ध के
पक्ष में 'मींडि डार्यो' आदि का शब्दार्थ लिया गया है, प्रकृत अर्थ इस प्रकार
२३-मारयो-मारौ । मैं हूँ-केहूँ । केसोदास-केसौराइ । कहुँ-हूँ पै ।

चतुर्दश प्रभाव २६३
होगा—आपने कलह करना त्याग दिया, वियोग को भी दूर कर दिया,
अभिमान नहीं करते, भय भी नहीं रहा, औरों को जो सौभाग्य और अनुराग
पहले प्राप्त होता था वह राधिका को मिला है। कपट है नहीं दूसरों से मन
में भी जान-पहचान नहीं करते, रति में आप कामदेव से भी बढ़कर हैं, अब
आपके रोष करने का क्या कारण है ? रोष छोड़िए ) ।
अथ वीररस-लक्षण-(दोहा)
(४८७) होहि बीर उत्साहमय, गौर बरन द्युति अंग।
अति उदार गंभीर कहि, केसव पाइ प्रसंग ॥२४॥
शब्दार्थ—उत्साहमय = उत्साह से युक्त । गौर० = शरीर की चमक,
गौर वर्ण । उदार = उच्च भावमय । पाइ प्रसंग = अवसर आने पर ।
श्रीराधिकांजू को वीररस, यथा-(कबित्त)
(४८८) गति गजराज साजि देह की दिपति बाजि,
हाव रथ भाव पत्ति राजि चली चाल सों।
केसौदास मंदहास असि कुच भट भिरे,
भेट भए प्रतिभट भले नखजाल सों।
लाज-साज कुलकानि सोच पोच भय भानि,
भौंहैं धनु तानि बान लोचन बिसाल सों।
प्रेम को कवच कसि साहस सहायक लै,
जीत्यो रति-रन आज मदनगुपाल सों ॥२५॥
शब्दार्थ—गति = चाल । गजराज = हाथी । बाजि = घोड़ा । हाव =
शृंगारिक चेष्टाएँ। भाव = उमंगें । पत्ति = पैदल सिपाही । राजि = समूह ।
चली चाल सों = चाल से चली, अपनी गति से चली । लाज-साज = लज्जा-
शीलता । कुलकानि = कुल की मर्यादा । सोच पोच=बुरा संकोच । भानि =
तोड़कर । असि = तलवार । भिरे = लड़े । जाल = समूह । प्रतिभट =
प्रतिद्वंद्वी, योद्धा ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायिका प्रति ) चाल रूपी हाथी, अंगदीप्ति
रूपी घोड़ा, हाव रूपी रथ, उमंग रूपी ठीक चाल से चलनेवाली पैदल सेना
सजाकर, भौंह रूपी धनुष पर विशाल नेत्र रूपी बाण चढ़ाकर, लज्जाशीलता,
कुल की मर्यादा, बुरा संकोच और भय रूपी बाधक प्रतिपक्षियों को मारकर,
मंदहास रूपी तलवार, कुच रूपी भटों को प्रतिद्वंद्वी के नखाघात रूपी भालों
२४-प्रति०-अति उर धरि गंभीर । २५-हाव-हास । राजि-राजै ।
चाल-बाल । भय-भव । पत्ति०-पैदरित । जाल-जान । कसि-साजि । जीति-
जीत्यो । रति-रागु ।

२६४ रसिकप्रिया
से भिड़कर, प्रेम का कवच कसकर, साहस रूपी सहायक लेकर आज तूने
मदनगोपाल रूपी प्रतिद्वंद्वी से रति रूपी युद्ध जीत लिया ।
अलंकार—सावयव रूपक ।
श्रीकृष्णजू को वीररस, यथा-( कवित्त )
(४८९) अघ ज्यों उदारिहौ कि बक ज्यों बिदारिहौ कि,
केस गहि केसोदास केसी ज्यों पछारिहौ ।
हरिहौ कि प्राननाथ पूतना के प्राननि ज्यों,
बन तें कि जलजाल कालि ज्यों निकारिहौ ।
करिहौ बिमद घनबाहन ज्यों घनस्याम,
काहू सों न हारे हरि याही सों क्यों हारिहौ ।
बेही काम काम बर ब्रज की कुमारिकानि,
मारत हैं नंद के कुमार कब मारिहौ ।२६।
शब्दार्थ-अघ = अघासुर । उदारिहौ = फाड़ डालोगे । बक=बकासुर ।
बिदारिहौ = नष्ट कर दोगे । केस = बाल । केसी = केशी । पछारिहौ=
पराजित करोगे । बन तें = जल से । कालि = कालिय नाग । निकारिहौ=
निकालोगे । बिमद = गर्वरहित । घनवाहन = इंद्र । बेही काम = बिना किसी
प्रयोजन के । काम = कामदेव ।
वक्तव्य-गोपियों का दूत मथुरा में श्रीकृष्ण को पुरानी बातों का स्मरण
दिलाकर कामविरह दूर करने की प्रार्थना कर रहा है ।
अलंकार - उपमा ।
अथ भयानक-रस-लक्षण- (दोहा)
(४९०) होइ भयानक रस सदा, केसव स्याम सरीर ।
जाको देखत सुनतहीं, उपजि परति भयभीर ।२७।
शब्दार्थ—भीर = त्रासि ।
श्रीराधिकाजू को भयानक-रस, यथा-( सवैया )
(४९१) सुरमंडल मंडित कै घनघोर उठे दिगमंडल मंडि गटी ।
घहराति घटा घन बात के संघट घोप घटै न घटीहूँ घटी ।

२६-पछारिहौ-उधारिहौ । बिदारिहौ कि-बिदारिहौ जू । केस गहि-
कंस ज्यों कि, केस ज्यों कि । केसोदास-केसौराइ । हरिहौ-दुरिहौ । काम-
काज । २७-होइ-होहि । होइ०-होइ भयंकर कृत सदा विग्रह काम सरीर ।
परति-परत. पैर :

चतुर्दश प्रभाव २६५
दसहूँ दिसि केसव दामिनि देखि लगी प्रिय कामिनि कंठतटी ।
जनु पंथहि पाइ पुरंदर के बन पावक की लपटैं झपटी ।२८।
शब्दार्थ - भुअमंडल मंडित कै = संपूर्णा पृथ्वी पर छाकर । दिवि =
आकाश । गटी = समूह की समूह । बात = वायु । संघट = टक्कर । घोष =
गर्जन । न घटीहूँ घटी = घड़ी पर घड़ी बीत जाने पर भी । कंठतटी = कंठतट
से, गले से । पंथहि ० = मार्ग पाकर ।
भावार्थ - ( सखी की उक्ति सखी से ) भूमंडल को छाती हुई, बड़े बड़े
बादलों की जो घटा उठी वह आकाश-मंडल में समूह की समूह छा गई । घन
की घटा वायु की टक्कर से शब्द करती है। घड़ी पर घड़ी बीतती चली जा
रही है, पर बादलों का गर्जन घटता नहीं । दसो दिशाओं में बिजली की
चमक देखकर प्रिया प्रिय के गले से जा लगी । मानो मार्ग पाकर इंद्र के वन
( नंदन कानन ) में अग्नि की लपटें झपटकर जा लगी हों ।
श्रीकृष्णजू को भयानकरस यथा— (कवित्त)
(४६२) रोष में रस के बोल विष तें सरस होत,
जानै सो प्रबल पित्त दाखैं जिन चाखी हैं ।
केसौदास दुख दीबे लायक भए ब तुम,
आज लगि जाकी जी में आँखैं अभिलाषी हैं ।
सूधे हैं सुधारिबे कौं आए सिखवन मोहिं,
सूधेहूँ में सुधी बातैं मोसोंऊ न भाखी हैं ।
ऐसे मैं हौं कैसैं जाउँ दुरिहूँ धौं देखौ जाइ,
काम की कमान सी चढ़ाइ भौंहैं राखी हैं ।२६।
शब्दार्थ - रोष = क्रोध, मान । रस = प्रीति । सरस = बढ़कर । प्रबल
पित्त = पित्त की प्रबलता । दाख = द्राक्षा, मुनक्का ।
भावार्थ- ( दूती की उक्ति नायक से ) रोष में प्रेम की बातें तो विष से
भी बढ़कर होती हैं । इसे वही जान सकता है जिसने प्रबल पित्त में मुनक्का
खा लिया हो । आज तक आप जिसकी आँखों ( के इशारे ) का मन में अभि-
लाष करते थे उसी को अब दुःख देने योग्य तो हो गए । आज आप सीधे
बनकर मुझसे उसे सुधारने ( उसका मान छुड़ाने कीं ) की शिक्षा देने आए
हैं, पर आपको क्या पता नहीं कि वह सीधे में ( प्रसन्न रहने पर ) मुझसे
२८-घोष-शोष । गटी-घटी । घन-घट । घटै न०-घटेहुँ न घोष घटी ।
दसहूं-ताड़िता लड़पै निरखे उर पै सौ । जनु०-तनौ पारथ, जनु पारथ ।
२६-रोष में०-रिस में बिरस । पित्त-जुर । भए ब-भए हो । आज-अब ।
लगि-लहुँ । सुधारिबे ०-सुधार सकै क्यों ।

२६६ रसिकप्रिया
भी सीधी बातें नहीं किया करती थी ( टेढ़े में न जाने क्या करेगी ) अतः ऐसे
अवसर पर मैं उसके निकट कैसे जाऊँ, यदि आप देखना ही चाहते हों तो छिप-
कर क्यों नहीं देख लेते, उसने तो काम के धनुष की तरह भौंहें तान रखी हैं।
सूचना—पित्त की प्रबलता में मुनक्का खा लेने से पित्त की अति वृद्धि
होती है।
अथ बीभत्सरस-लक्षण—(दोहा)
(४६३) निंदामय बीभत्सरस, नील बरन बपु तास।
केसव देखत सुनतहीं, तन मन होइ उदास।३०।
शब्दार्थ—बपु = शरीर। तास = उसका।
श्रीराधिकाज को बीभत्सरस, यथा—(कवित्त)
(४६४) माता ही को माँस तोहिं लागत है मीठो मुख,
पियत पिता को लोहू नेक ना घिनाति है।
भैयनि के कंठनि को काटत न कसकति,
तेरो हियो कैसो है जु कहति सिहाति है।
जब जब होति भेंट तब तब मेरी भटू,
ऐसी सौंहैं दिन उठि खाति न अघाति है।
प्रेतिनी पिसाचिनी निसाचरी की जाई है तूँ,
केसोदास की सौं कहि तेरी कौन जाति है ? ।३१।
शब्दार्थ—कहति सिहाति है = कहना भला लगता है। जाई =
उत्पन्न, पुत्री।
भावार्थ—(सखी के पूछने पर नायिका बारंबार शपथें करती है, वे
शपथें बड़ी बीभत्स हैं, इसी पर सखी कहती है) तुझे माता का मांस मुँह
में मीठा लगता है, पिता का रक्त पीने में तुझे कुछ भी घृणा नहीं लगती।
भैयों का गला काटने की शपथ खाने में तुझे पीड़ा नहीं होती। तेरा कैसा
कठोर हृदय है कि तुझे ऐसा कहना अच्छा लगता है। तुझसे जब जब भेंट
होती है तब तब ऐ सखी, तू प्रेतिनी, पिशाचिनी या निशाचरी किसकी पुत्री
है, जो ऐसी शपथें खाकर भी प्रिय से मिलने नहीं जाती। तू कौन है, किस
जाति की है, कुछ बतला भी।
श्रीकृष्णजू को वीभत्सरस, यथा- (कवित्त)
(४६५) टूटे ठाट घुनघुने धूम धूरि सों जु सने,
झींगुर छगोड़ी साँप बीछिन की घात जू।
कंटककलित त्रिनकलित बिगंध जल,
तिनके तलपत्तल ताकों ललचात जू।
३०—मय-भय। नेक-क्यों हू। घिनाति-अघाति। केसोदास-केसौराइ ।

चतुर्दश प्रभाव २६७
कुलटा कुचीलगात अंधतम अधरात,
कहि न सकत बात अति अकुलात जू।
छेंडी में घुसौ कि घर ईंधन के घनश्याम,
परघरनीनि पहँ जात न घिनात जू। ३२।
शब्दार्थ - ठाट = छाजन का ढाँचा । छगोड़ी = भौंरी । घात = स्थिति ।
कलित = युक्त । त्रिनवलित = तिनके से घिरा । बिगंध = दुर्गंध । तलप = तल्प,
शय्या । तलपतल = शय्या पर । कुचील = गंदे वस्त्र वाला । गात = गात्र,
शरीर । अंधतम = अंध कर देनेवाला, घोर अँधेरा । छेंडी = संकरी गली ।
भावार्थ - ( सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे घनश्याम, ( आपको
थोड़ी भी घिन नहीं है क्या ? ) जहाँ का ठाट टूटा है, घुनौं से घुना हुआ
है, जो स्थान धूएँ और धूल से सना हुआ है, जहाँ झींगुर, भौंरी, साँप और
विच्छुओं की स्थिति है, जो स्थान काँटों से भरा है, घासफूस से घिरा है, जहाँ
दुर्गंधयुक्त जल भरा है, ऐसे स्थान की शय्या पर शयन करने के लिए आप
लालायित होते हैं। जो कुलटा हैं, मैले-कुचैले वस्त्र शरीर में धारण करने-
वाली है, उसके यहाँ भी घोर अंधकार में आधी रात के समय आप जाते
हैं। मुझसे तो यह बात कही भी नहीं जा सकती हैं, अत्यंत अकुलाती हूँ।
कहीं किसी तंग गली में घुस गए, कहीं ईंधन के घर में पैठे। आपको ऐसे
स्थान में बसनेवाली और उस पर भी पराई स्त्रियों के यहाँ जाते घृणा
नहीं आती ?
अथ अद्भुतरस-लक्षण - ( दोहा )
(४६६) होइ अचंभो देखि सुनि, सो अद्भुतरस जानि ।
केसवदास बिलासनिधि, पीत बरन बपु भानि ।३३।
शब्दार्थ-- बिलामनिधि = विलास का भांडार । बरन = वर्ण, रंग ।
बपु = शरीर । भानि = भनो, कहो ।
श्रीराधिकाजू को अद्भुतरस, यथा-( कबित्त )
(४६७) केसौदास बाल बैस दीपति तरुन तेरी,
बानि लघु बरनत बुधि परमान की।
कोमल अमल उर उरज कठोर, अति,
अबला पै बलबीर-बंधन-बिधान की ।
३२- ठाट-टाटि । घुने-घने । धूरि-धूम । सो जु०-सनि सने, सेन सनें,
संनि सनें, सौं तो सने । बीछिन की-बिच्छिन की, बीछोजन । जल-जुत ।
घुसौ-घुसे । पहँ-यहाँ, पास । पर-घर । ३३ - होइ-होहि । जानि-जान ।
भानि-बानि, मान ।

२६८ रसिकप्रिया
चंचल चितौनि, चित्त अचल, सुभाव साधु,
सकल असाधु भाव काम की कथान की।
बेचति फिरति दधि, लेत, तिन्हें मोल लेति,
अद्भुतरस-भरी बेटी वृषभान की।३४।
शब्दार्थ-बैस = (वयस्) वय, उम्र। तरुन = (तरुण) तीव्र,
अत्यधिक। बानी लघु = बातें थोड़ी कहती है। परमान = परे का मान, बहुत
बड़ा। परमान की = अत्यंत कुशाग्र (बुद्धि)। उरज = स्तन। बलबीर = बल
में वीर (बली); बलराम के भाई (श्रीकृष्ण)। बलबीर-बंधन-विधान की =
बलबीर को बाँधने (वशीभूत करने) का विधान करनेवाली है। साधु =
भला, सीधा। असाधु = बुरा, टेढ़ा।
भावार्थ- (सखी की उक्ति नायिका प्रति) हे सखी, तेरी वय तो
बाल्य है, पर तेरी (अंग) दीप्ति तरुण (प्रखर) है। तेरी बातें थोड़ी होती
हैं, पर वे बुद्धि की पराकाष्ठा (वाली बातों) का वर्णन करती हैं। तेरा
निर्मल हृदय तो कोमल है पर स्तन कठोर (कड़े) हैं। तू जाति की तो
अबला (स्त्री, निर्बल) है पर बलबीर (श्रीकृष्ण, बली) के बाँधने का
भी विधान करनेवाली है। तेरी चितवन चंचल है, पर चित्त निश्चल (स्थिर)
है। तेरा स्वभाव तो सीधा है, पर काम की कथा के सभी टेढ़े भाव तुझमें
पाए जाते हैं। तू दही तो देती (बेचती) फिरती है, पर जो उसे मोल लेते
(खरीदते) हैं, तू उनको ही मोल लेती है (वे तुझ पर मुग्ध हो जाते हैं)।
तू वृषभानु की बेटी अद्भुतरस से भरी हुई है।
अलंकार - विरोधाभास।
अथ प्रच्छन्न, यथा- (कवित्त)
(४६८) ब्रज की कुमारिका द्वै लीने सुक-सारिका,
पढ़ावैं कोक-कारिकानि केशव सबै निवाहि।
गोरी गोरी भोरी भोरी थोरी थोरी बैस, फिरैं
देवता सी दौरी दौरी आई चोरा चोरी चाहि।
बिन गुन तेरी आनि भ्रुकुटी कमान तानि,
कुटिल-कटाक्ष-बान बड़ो अचरज आहि।
एते मान ढीठ ईठ नेश को अडीठ मनु,
पीठ दै दै मारतों पे चूकती न कोऊ ताहि ।३५।
शब्दार्थ - सुक = सुग्गा। सारिका = मैना। कोक-कारिका = कोक-
शास्त्र के सूत्र। सबै निवाहि = पूरा निर्वाह करके, भली भाँति। चाहि
३४-बानी-बानि। बरनत-बरतन। ३५-चोरा चोरी-चोरी चोरा।
कुटिल-नयन। मान-पर।

चतुर्दश प्रभाव २६६
आई = देख आई । गुन = रस्सी ( प्रत्यंचा ) अनि = शपथ । आहि =
( अस्ति ) है । ढीठ = ( धृष्ट ) प्रौढ़, जानकार, कुशल । ईठ = ( इष्ट )
मित्र, स्वामी । अढीठ = अदृष्ट, जो दिखाई न पड़े ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी प्रति ) वे व्रज की हैं तो कुमारिकाएँ
ही, पर शुक और सारिका को कोकशास्त्र की कारिकाएँ भली भाँति ( अर्थ
आदि समझाकर ) पढ़ाती हैं । वे गोरी गोरी भोली भाली हैं तो थोड़ी वय-
वाली, पर दौड़ दौड़ चोरीचोरी देवियों की भाँति श्रीकृष्ण को देख आती हैं
( उन्हें कोई देख नहीं पाता, जैसे देवी देवता अदृश्य रहते हुए सब कुछ देख
लेते हैं ) । तेरी शपथ ( मेरा विश्वास कर ) वे बिना प्रत्यंचावाली भौंह का
धनुप तानती हैं और उस पर कुटिल ( टेढ़े, सीधे भी नहीं ) कटाक्ष रूपी
बाण चलाती हैं । यही तो बड़े आश्चर्य की बात है । वे इतनी कुशल हैं कि
तेरे स्वामी ( श्रीकृष्ण ) के अदृश्य ( दिखाई पड़ता होता तो भी कोई बात
थी ) मन को पीठ दे देकर ( बिना सामने हुए ही ) मारती हैं और कोई भी
लक्ष्य को चूकती नहीं हैं ।
अलंकार—विरोधाभास, विभावना ।
सूचना—( १ ) एक तो कुमारी हैं, दूसरे सुग्गे को पढ़ा रही हैं ( अत्यंत
अभ्यस्त हैं तभी तो ) और तीसरी कभी भूल नहीं होती ( सबै निवाहि ) । हैं
तो भोली भाली और उस पर भी थोड़ी वय की, पर काम करती हैं देवियों के
(बिना स्वयम् लक्षित हुए देख आती हैं) । एक तो धनुष बिना प्रत्यंचा का है,
दूसरे बाण भी टेढ़े मेढ़े हैं, तीसरे लक्ष्य अदृश्य है और चौथे पीछे की ओर
आघात करना है, फिर भी लक्ष्य बिद्ध हो जाता है ।
(२) नारायण कवि ने दो शंकाएँ भी उठाई हैं और उनका समाधान
भी किया है—(क) कुमारियों ने कोकशास्त्र किससे पढ़ा ? —सुनकर उन्होंने
स्मरण कर रखा है । (ख) पीठ देकर डीठ कैसे मारती हैं ? —गर्दन मोड़कर
देखती हैं ।
(३) यह छंद 'कविप्रिया' के नवें प्रभाव में विशेषालंकार के उदाहरण
में दिया गया है ।
(४) ऐसा ही एक दोहा बिहारी का है—
लिय कित कमनैती पढ़ी, बिन जिह भौंह कमान ।
चलचित बेझो चुकति नहि, बंक बिलोकनिबान ॥—बिहारीसतसैया
(५) जिस 'आहि' को लोग पूर्वी का समझते हैं वह भी 'है' के अर्थ में
केशव ने इसमें प्रयुक्त किया है ।
श्रीकृष्णजू को अद्भुतरस, यथा—( कबित्त )
(४६६) माखन के चोर मधु-चोर दधि-दूध-चोर,
देखै नाहिं देखताहीं चित्त चोरि लेत हैं।

२७० रसिकप्रिया
पुरुष पुरान अरु पूरन पुरान इन्हें,
पुरुष पुरान सु कहत किहिं हेत हैं।
केसोदास देखि देखि सुरनि की सुंदरी वै,
करति बिचार सब सुमति-समेत हैं।
देखि गति गोपिका की भूलि जात निज गति,
अगतिन कैसैं धौं परम गति देत हैं ।३६'
शब्दार्थ--मधु = शहद । पुरुष पुरान = पुराने पुरुष, चिरंजीवी व्यक्ति
लोमश आदि ऋषि । पूरन = संपूर्ण, सभी । पुरुष पुरान = पुराण पुरुष,
आदिपुरुष (ब्रह्म), आप्त पुरुष । सुरन की सुंदरी = देवांगनाएँ । निज =
निश्चय ही । अगतिन = जिसकी गति न हो उसे, पापियों को । परम गति =
चरम गति, मोक्ष ।
भावार्थ- (देवांगनाओं की उक्ति) हे सखी, जो माखन का चोर है,
शहद का चोर है, दही का चोर है, दूध का चोर है (कहाँ तक कहूँ-वह तो
ऐसा भारी चोर है कि) देखती नहीं, देखते देखते वह हृदय को भी चुरा
लेता है। ऐसे को पुराने पुरुष और समस्त पुरुष भला पुराण पुरुष (ब्रह्म,
आप्त, विश्वासयोग्य) न जाने किस कारण कहते हैं। वे देवताओं की सभी
सुंदरियाँ श्रीकृष्ण को देख देखकर बुद्धिपूर्वक इस प्रकार का विचार कर रही
हैं। वे कहती हैं- 'जो गोपिका (राधिका) की गति (चाल) देखकर
निश्चय ही अपनी गति (सुध-बुध) भूल जाता है, वह भला अगति (गतिहीन,
पापी) लोगों को परम गति (उत्तम गति, मोक्ष) कैसे देता है।
अलंकार - विरोधाभास ।
अथ समरस-लक्षण - (दोहा)
(५००) सब तें होइ उदास मन, बसै एकही ठौर ।
ताही सों समरस कहैं, केसव कबि-सिरमौर ।३७।
शब्दार्थ - ताही सों = उसी को । समरस = शांतरस ।
सूचना - इसके अनंतर निम्नांकित एक छंद मुद्रित और हस्तलिखित
प्रतियों में और मिलता है, पर लीथोवाली प्रति में नहीं है। सरदार कवि ने
लिखा है- 'या कबित्त बहुत प्राचीन पुस्तकन में नाहीं मिलत' ।
पुनः, यथा- (सवैया)
बन मोहिं मिले हुते केसवराय कहा बरनौ गुन गूढ़ उघारे ।
जसुदा पै गई तब रोहिनी पै चुटियाहि गुहावत जाइ निहारे ।
३६-देखै० - देखत हौं । चित०-हियों हरि, चित चोरै । पुरुष-पूरन ।
पूरन-पुरुष । सु-धौं । सब-सच । ३७- ताही सों-तासों समरस कहत हैं,
ताहो सों सब सांत रस । केसत्र०-कहत सुकबि ।

चतुर्दश प्रभाव २७१
घर जाउँ तु सोवत हैं फिरि जाउँ तौ नंद पै खात बरा दधिवारे ।
सपनो यह सत्त किधौं सजनी हरि बाहिर होत खड़े घरबारे ।
पाठांतर - केसवराय-केसवदास । उधारे-उधारे । तब-तौ वै । बारे-
धारे, पारे । यह-अनु । हरि-घर । घर । खड़े-बड़े ।
श्रीराधिकाजू को समरस, यथा- ( सवैया )
(५०१) देखें नहीं अरबिंदनि त्यौं चित चंद की आनँदकंद निकाई ।
कामिनी कामकथा करै कान न ताकै त्रिधाम की सुंदरताई ।
देखि गई जब तें तुमकों तब तें कछु बाहि न देख्यो सुहाई ।
छोड़ेंगी देह जु देखें बिना अहो देहु न कान्ह कहूँ ह्वै दिखाई ।३८।
शब्दार्थ-त्यौं = ओर । चित्त = चित लगाकर । कंद = जड़, मूल ।
निकाई = सुंदरता । त्रिधाम = तीनों लोक ( स्वर्ग, मर्त्य, पाताल ) ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायक से ) हे कान्ह, जब से वह आपको
देख गई है, तब से उसे कुछ देखना अच्छा ही नहीं लगता । न तो कमलों की
ओर देखती है और न चित्त लगाकर चंद्र की आनंददात्री सुंदरता ही देखती
हैं । कामिनी होकर भी कामकथा सुनने में कान नहीं लगाती और कहाँ तक
कहें उसे तीनों लोक की सुंदरता भी नहीं भाती । यदि आप उसे दिखाई न
पड़ें तो वह अपना शरीर त्याग देगी, किसी ओर ( घूमते फिरते ) आकर उसे
दिखाई क्यों नहीं पड़ जाते ?
अलंकार-पर्यायोक्ति ।
सूचना-यहाँ नायिका का मन केवल श्रीकृष्ण को देखना छोड़कर और
सबसे उदास हो गया है ।
श्रीकृष्णजू को समरस, यथा- ( सवैया )
(५०२) खारिक खात न दारयौंइ दाख न माखनहूँ सहुँ मेटी इठाई ।
केसव ऊख महूखहु दूखत आई हौं तों पहँ छाँडि जिठाई ।
तो रदनच्छद को रस रंचक चाखि गए करि केहूँ ढिठाई ।
ता दिन तें उन राखी उठाइ समेत सुधा बसुधा की मिठाई ।३६।
शब्दार्थ-खारिक = छुहारा । दारयौंइ = अनार ही । सहुँ = से ।' इठाई =
दृष्टता, स्नेह, चाह । महूख = ( मधुक ) शहद । दूखत = निंदा करते हैं ।
जिठाई = बड़प्पन । रदनच्छद = ( रदन = दाँत + छंद = ढकनेवाला ) होंठ ।
रंचक = थोड़ा । केहूँ = किसी प्रकार ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायिका से ) जब से वे तेरे होठों का किसी
प्रकार धृष्टता करके थोड़ा सा रस ले गए हैं तब से छुहारा, अनार, अंगूर
नहीं खाते । मक्खन की चाह भी छोड़ दी है । वे ऊख और शहद की भी
३८-कान-काम । देह-प्रान । ३६-महूखहु मयूषहि, पियूषहि ।

२७२ रसिकप्रिया
-निंदा करते हैं। अतः अपने बड़प्पन का ध्यान छोड़कर (मैं तुझसे वय में
बड़ी हूँ फिर भी) तुझे समझाने आई हूँ, तू उनसे शीघ्र ही मिल। उन्होंने तो
उसी दिन से पृथ्वी के मीठे पदार्थों को छोड़ दिया है। सुधा को भी उन्होंने
मधुरों की श्रेणी से हटा दिया है।
सूचना-(१) यह छंद 'कविप्रिया' के छठे प्रभाव में मधुर वर्णन के
उदाहरण में रखा गया है।
(२) इस छंद में 'महूख' शब्द ध्यान देने योग्य है। कहीं कहीं
'महूख' के स्थान पर 'मयूख' रूप भी मिलता है। 'केशव' ने 'रसिकप्रिया' के
ही बारहवें प्रभाव के पाँचवें छंद में-'ऊख रस केतक महूख रस मीठो है
पियूखहू की पैली घा हैं जाकों न्यराइहै' लिखा है। बिहारी ने भी अपने एक
दोहे में इस शब्द का व्यवहार किया है। 'देव' ने भी इसका बहुत व्यवहार
किया है। देखने में तो यह शब्द संस्कृत 'मधूक' से बिगड़ा हुआ जान पड़ता
है। पर टीकाकारों ने इसका अर्थ 'शहद' किया है वहाँ 'महुआ' के साथ साथ
'महूख' पृथक् भी दिया है। इससे ऐसा स्पष्ट जान पड़ता है कि वे 'महूख' का
अर्थ 'महुआ' नहीं लेना चाहते-
मधुर प्रियाधर सोमकर माखन दाख समान।
बालक बातैं तोतरी कविकुल उक्ति प्रमान।
महुवा मिसरी दूध घृत, अति सिंगाररस मिष्ट।
ऊख महूख पियूष गनि केसव साँचो इष्ट।
ऐसी दशा में 'महूख' को 'मधुक' का बिगड़ा रूप ही मानना पड़ेगा और
'क स्वार्थे' (उसी अर्थ में) लगा माना जायगा।
अपरंच-(कवित्त)
(५०३) दनुज मनुज जीव जल थल जननि को,
पखोई रहत जहाँ काल सों समरु है।
अजर अनंत अज अमरी मरत परि,
केसव निकसि जानै सोई तौ अमरु है।
बाजत स्रवन सुनि समुझि सबद करि,
बेदन को बाद नाहिं सिव को डमरु है।
भागहु रे भाँगौ भैया भागनि ज्यों भाग्यो परै,
भव के भवन माँझ भय को भँवरु है।४०।
४०-जल०-जलज थलजनि। जननि०-केसोराइ। अजर०-अनंत अनंत,
अजर अमर, अनंत अजर। अमरी-अरोऊ। बाजत-जब तू। सबद०-सबै
भवत। परै-झाइ।

१८ चतुर्दश प्रभाव २७३
शब्दार्थ—दनुज = दानव । जननि=लोगों को, जीवों को। समरु = युद्ध ।
अजर = जिसे वृद्धावस्था न हो, जरारहित, सनकादि । अनंत= जिसका अंत न
हो, विष्णु । अज = जिसका जन्म न हुआ हो, अजन्मा, ब्रह्मा। अमर = जो
मरे न, देवता । बाजत = बजता है। सुनि = सुनो। करि बेदनि = वेदों के
वाद में लगो, ज्ञानचर्चा करो । भागनि = भाग्य से । भव = संसार, मर्त्य ।
भवन = लोक ।
भावार्थ—( किसी ज्ञानी की उक्ति संसारलिप्त व्यक्ति से ) दानव, मनुष्य,
जल के जीवों तथा स्थल के जीवों को इस संसार में काल से युद्ध करना पड़ता
है । अजर, अनंत, अज, देवता सभी इस संसार के चक्कर में पड़कर मरते
हैं। इससे जो निकलना जान ले वही अमर है । अनाहत ( अनहद ) नाद हो
रहा है, कानों से ( ध्यान लगाकर ) सुन, उस शब्द को समझ और वेदों की
वार्ता ( ज्ञानचर्चा ) कर, नहीं तो शिव का डमरू बजने ही वाला है ( मृत्यु
आने ही वाली है ) । हे भाई, भागो, भाग्य से जिस प्रकार भागते बने ( इस
संसार से बचते बने ) भागो । इस मर्त्यलोक के बीच भय का ही चारो ओर
भँवर दिखाई देता है, सचेत रहो ।
सूचना—'केशव' ने अन्य रसों को श्रृंगार के भीतर ही दिखाया है ।
केवल शांत का ही यह शुद्ध उदाहरण दिया है ।
( दोहा )
(५०४) इहिं बिधि बरन्यो बरन बहु, नवरस रसिक बिचारि ।
बाँधौं बृत्ति कबित्त की, कहि केसव बिधि चारि ।४१।
शब्दार्थ—वृत्ति = कैशिकी आदि चार वृत्तियों का वर्णन अगले प्रभाव
में करेंगे ।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां नवरसवर्णनं
नाम चतुर्दशः प्रभावः ।१४।
पंचदश प्रभाव
अथ वृत्ति-वर्णन—( दोहा )
(५०५) प्रथम कैसिकी भारती, आरभटी भूनि भाँति ।
कहि केसव सुभ सात्वती, चतुर चतुर बिधि जाति ।१।
शब्दार्थ—चार वृत्तियाँ होती हैं—कैशिकी, भारती, आरभटी, सात्वती ।
४१—बरन बहु०-नवरसन केसव । बांधौं-बांधहुँ । कहि केसव-कहियतु है ।
१—कैसिकी-कौसिकी । आरभटी०-भनि अरभटी सुभाँति । २—भाव-
अर्थ ।