रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश प्रभाव २६७
कुलटा कुचीलगात अंधतम अधरात,
कहि न सकत बात अति अकुलात जू।
छेंडी में घुसौ कि घर ईंधन के घनश्याम,
परघरनीनि पहँ जात न घिनात जू। ३२।
शब्दार्थ - ठाट = छाजन का ढाँचा । छगोड़ी = भौंरी । घात = स्थिति ।
कलित = युक्त । त्रिनवलित = तिनके से घिरा । बिगंध = दुर्गंध । तलप = तल्प,
शय्या । तलपतल = शय्या पर । कुचील = गंदे वस्त्र वाला । गात = गात्र,
शरीर । अंधतम = अंध कर देनेवाला, घोर अँधेरा । छेंडी = संकरी गली ।
भावार्थ - ( सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे घनश्याम, ( आपको
थोड़ी भी घिन नहीं है क्या ? ) जहाँ का ठाट टूटा है, घुनौं से घुना हुआ
है, जो स्थान धूएँ और धूल से सना हुआ है, जहाँ झींगुर, भौंरी, साँप और
विच्छुओं की स्थिति है, जो स्थान काँटों से भरा है, घासफूस से घिरा है, जहाँ
दुर्गंधयुक्त जल भरा है, ऐसे स्थान की शय्या पर शयन करने के लिए आप
लालायित होते हैं। जो कुलटा हैं, मैले-कुचैले वस्त्र शरीर में धारण करने-
वाली है, उसके यहाँ भी घोर अंधकार में आधी रात के समय आप जाते
हैं। मुझसे तो यह बात कही भी नहीं जा सकती हैं, अत्यंत अकुलाती हूँ।
कहीं किसी तंग गली में घुस गए, कहीं ईंधन के घर में पैठे। आपको ऐसे
स्थान में बसनेवाली और उस पर भी पराई स्त्रियों के यहाँ जाते घृणा
नहीं आती ?
अथ अद्भुतरस-लक्षण - ( दोहा )
(४६६) होइ अचंभो देखि सुनि, सो अद्भुतरस जानि ।
केसवदास बिलासनिधि, पीत बरन बपु भानि ।३३।
शब्दार्थ-- बिलामनिधि = विलास का भांडार । बरन = वर्ण, रंग ।
बपु = शरीर । भानि = भनो, कहो ।
श्रीराधिकाजू को अद्भुतरस, यथा-( कबित्त )
(४६७) केसौदास बाल बैस दीपति तरुन तेरी,
बानि लघु बरनत बुधि परमान की।
कोमल अमल उर उरज कठोर, अति,
अबला पै बलबीर-बंधन-बिधान की ।
३२- ठाट-टाटि । घुने-घने । धूरि-धूम । सो जु०-सनि सने, सेन सनें,
संनि सनें, सौं तो सने । बीछिन की-बिच्छिन की, बीछोजन । जल-जुत ।
घुसौ-घुसे । पहँ-यहाँ, पास । पर-घर । ३३ - होइ-होहि । जानि-जान ।
भानि-बानि, मान ।