रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० रसिकप्रिया
पुरुष पुरान अरु पूरन पुरान इन्हें,
पुरुष पुरान सु कहत किहिं हेत हैं।
केसोदास देखि देखि सुरनि की सुंदरी वै,
करति बिचार सब सुमति-समेत हैं।
देखि गति गोपिका की भूलि जात निज गति,
अगतिन कैसैं धौं परम गति देत हैं ।३६'
शब्दार्थ--मधु = शहद । पुरुष पुरान = पुराने पुरुष, चिरंजीवी व्यक्ति
लोमश आदि ऋषि । पूरन = संपूर्ण, सभी । पुरुष पुरान = पुराण पुरुष,
आदिपुरुष (ब्रह्म), आप्त पुरुष । सुरन की सुंदरी = देवांगनाएँ । निज =
निश्चय ही । अगतिन = जिसकी गति न हो उसे, पापियों को । परम गति =
चरम गति, मोक्ष ।
भावार्थ- (देवांगनाओं की उक्ति) हे सखी, जो माखन का चोर है,
शहद का चोर है, दही का चोर है, दूध का चोर है (कहाँ तक कहूँ-वह तो
ऐसा भारी चोर है कि) देखती नहीं, देखते देखते वह हृदय को भी चुरा
लेता है। ऐसे को पुराने पुरुष और समस्त पुरुष भला पुराण पुरुष (ब्रह्म,
आप्त, विश्वासयोग्य) न जाने किस कारण कहते हैं। वे देवताओं की सभी
सुंदरियाँ श्रीकृष्ण को देख देखकर बुद्धिपूर्वक इस प्रकार का विचार कर रही
हैं। वे कहती हैं- 'जो गोपिका (राधिका) की गति (चाल) देखकर
निश्चय ही अपनी गति (सुध-बुध) भूल जाता है, वह भला अगति (गतिहीन,
पापी) लोगों को परम गति (उत्तम गति, मोक्ष) कैसे देता है।
अलंकार - विरोधाभास ।
अथ समरस-लक्षण - (दोहा)
(५००) सब तें होइ उदास मन, बसै एकही ठौर ।
ताही सों समरस कहैं, केसव कबि-सिरमौर ।३७।
शब्दार्थ - ताही सों = उसी को । समरस = शांतरस ।
सूचना - इसके अनंतर निम्नांकित एक छंद मुद्रित और हस्तलिखित
प्रतियों में और मिलता है, पर लीथोवाली प्रति में नहीं है। सरदार कवि ने
लिखा है- 'या कबित्त बहुत प्राचीन पुस्तकन में नाहीं मिलत' ।
पुनः, यथा- (सवैया)
बन मोहिं मिले हुते केसवराय कहा बरनौ गुन गूढ़ उघारे ।
जसुदा पै गई तब रोहिनी पै चुटियाहि गुहावत जाइ निहारे ।
३६-देखै० - देखत हौं । चित०-हियों हरि, चित चोरै । पुरुष-पूरन ।
पूरन-पुरुष । सु-धौं । सब-सच । ३७- ताही सों-तासों समरस कहत हैं,
ताहो सों सब सांत रस । केसत्र०-कहत सुकबि ।