रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश प्रभाव २५५
भाँति । पुतरीन = पुतलियाँ । बिचारौ = समझो । गतिभेद = नाच की अनेक
चालें । नायक = वेश्याओं को नाच सिखानेवाला उस्ताद । निनारौ = न्यारा,
विलक्षण, चतुर । दीपति = चमक ( आँखों की ) । उजियारौ = प्रकाश ।
अखारो = नाच का समाज, नाचरंग ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायक प्रति ) आपको देखकर तो नायिका
के नेत्रों में नाच का समाज जुड़ जाता है । पुतलियों को श्वेत और श्याम रंग
की काछनी पहने हुए नाचनेवाली समझिए । करोड़ों कटाक्ष ही नाच की
अनेक गतियाँ हैं । नचानेवाला उस्ताद चतुर प्रेम है । मृदुहास ही मृदंग की
भाँति बजता है । ( आँखों में ) जो ज्योति ( जगती ) है वही दीपकों का
प्रकाश है । आप देख रहे हैं न ?
अलंकार—उपमागर्भित सावयव रूपक ।
सूचना—'सरदार' ने अपनी टीका में कहा है कि 'यह छंद मंदहास में
उदाहरण देने योग्य है' । किंतु प्रतियों में यह 'कलहास' के उदाहरण में ही
मिलता है ।
अपरंच, यथा—( सवैया )
(४७३) प्रेम घने रस-बैन सने गति नैननि की सर-मैन भई ही ।
बाल-बहिक्रम-दीपति देह त्रिबिक्रम की गति लीलि लई ही ।
भौंहैं चढ़ाइ सखीनि दुराइ इतै मुसकाइ उतै चितई ही ।
केसव पाइहौ आजु भलें चित चोरि लै कालि गुवालि गई ही ।१०।
शब्दार्थ—रस-बैन=आनंद के वचन । सर-मैन=कामबाण । बहिक्रम=
वयःक्रम, वयःसंधि । त्रिबिक्रम=वह अवतार जिसने साढ़े-तीन डग में त्रिलोक
तथा बलि का शरीर नाप लिया था । त्रिबिक्रम की०=त्रिविक्रम की दीप्ति को
भी दबा दिया है ।
भावार्थ—( सखी का वचन नायक से ) अत्यंत प्रेम और आनंद से युक्त
उसने वचन कहे थे । नेत्रों की चाल तो कामबाण की भाँति थी । उस बाला
के वयःक्रम (वयःसंधि) के कारण उसके शरीर में जो दीप्ति दिखाई पड़ रही
थी उसने तो त्रिविक्रम के तेज को भी दबा दिया था ( उस दीप्ति के कारण
आप भी उसके वश में हो गए थे ) । भौंहें चढ़ाकर सखियों को हटाकर
इधर की ओर मुख करते हुए देखकर उसने उधर की ओर देखा था । इस
प्रकार जो गोपिका कल आपका चित्त चुरा ले गई थी आज आप उसे निश्चित
पाएँगे ।
१०—सर-रस । मई-मई है । बहिक्रम-बयक्रम । पाइहौ-पाइहै । लै-
जु । गुवालि-जु आलि ।