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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 286 में से

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पृष्ठ 265

चतुर्दश प्रभाव २६६
आई = देख आई । गुन = रस्सी ( प्रत्यंचा ) अनि = शपथ । आहि =
( अस्ति ) है । ढीठ = ( धृष्ट ) प्रौढ़, जानकार, कुशल । ईठ = ( इष्ट )
मित्र, स्वामी । अढीठ = अदृष्ट, जो दिखाई न पड़े ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी प्रति ) वे व्रज की हैं तो कुमारिकाएँ
ही, पर शुक और सारिका को कोकशास्त्र की कारिकाएँ भली भाँति ( अर्थ
आदि समझाकर ) पढ़ाती हैं । वे गोरी गोरी भोली भाली हैं तो थोड़ी वय-
वाली, पर दौड़ दौड़ चोरीचोरी देवियों की भाँति श्रीकृष्ण को देख आती हैं
( उन्हें कोई देख नहीं पाता, जैसे देवी देवता अदृश्य रहते हुए सब कुछ देख
लेते हैं ) । तेरी शपथ ( मेरा विश्वास कर ) वे बिना प्रत्यंचावाली भौंह का
धनुप तानती हैं और उस पर कुटिल ( टेढ़े, सीधे भी नहीं ) कटाक्ष रूपी
बाण चलाती हैं । यही तो बड़े आश्चर्य की बात है । वे इतनी कुशल हैं कि
तेरे स्वामी ( श्रीकृष्ण ) के अदृश्य ( दिखाई पड़ता होता तो भी कोई बात
थी ) मन को पीठ दे देकर ( बिना सामने हुए ही ) मारती हैं और कोई भी
लक्ष्य को चूकती नहीं हैं ।
अलंकार—विरोधाभास, विभावना ।
सूचना—( १ ) एक तो कुमारी हैं, दूसरे सुग्गे को पढ़ा रही हैं ( अत्यंत
अभ्यस्त हैं तभी तो ) और तीसरी कभी भूल नहीं होती ( सबै निवाहि ) । हैं
तो भोली भाली और उस पर भी थोड़ी वय की, पर काम करती हैं देवियों के
(बिना स्वयम् लक्षित हुए देख आती हैं) । एक तो धनुष बिना प्रत्यंचा का है,
दूसरे बाण भी टेढ़े मेढ़े हैं, तीसरे लक्ष्य अदृश्य है और चौथे पीछे की ओर
आघात करना है, फिर भी लक्ष्य बिद्ध हो जाता है ।
(२) नारायण कवि ने दो शंकाएँ भी उठाई हैं और उनका समाधान
भी किया है—(क) कुमारियों ने कोकशास्त्र किससे पढ़ा ? —सुनकर उन्होंने
स्मरण कर रखा है । (ख) पीठ देकर डीठ कैसे मारती हैं ? —गर्दन मोड़कर
देखती हैं ।
(३) यह छंद 'कविप्रिया' के नवें प्रभाव में विशेषालंकार के उदाहरण
में दिया गया है ।
(४) ऐसा ही एक दोहा बिहारी का है—
लिय कित कमनैती पढ़ी, बिन जिह भौंह कमान ।
चलचित बेझो चुकति नहि, बंक बिलोकनिबान ॥—बिहारीसतसैया
(५) जिस 'आहि' को लोग पूर्वी का समझते हैं वह भी 'है' के अर्थ में
केशव ने इसमें प्रयुक्त किया है ।
श्रीकृष्णजू को अद्भुतरस, यथा—( कबित्त )
(४६६) माखन के चोर मधु-चोर दधि-दूध-चोर,
देखै नाहिं देखताहीं चित्त चोरि लेत हैं।