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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 286 में से

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पृष्ठ 254

१७ चतुर्दश प्रभाव २५७
शब्दार्थ—मुख . मुखवास = मुख की नैसर्गिक सुगंध । आधे० = आधे
अक्षरों के ही शब्द निकलें, अस्फुट शब्द निकलें।
भावार्थ—जहाँ निःशंक हँसने से मुख की नैसर्गिक सुगंध निकलने लगे
और अस्फुट शब्द भी हों वहाँ अतिहास होता है।
श्रीराधिकाजू को अतिहास, यथा-(कवित्त)
(४७६) तैसीयै जगत ज्योति सीस सीसफूलनि की,
चिलकत तरुनि तिलक तेरे भाल को।
तैसीये दसन द्युति दमकति केसौदास,
तैसोई लसत लाल लाल कंठमाल को।
तैसीयै चमक चारु चिबुक कपोलनि की,
चमकत देखौ नकमोती चल चाल को।
हरैं हरैं हँसि नेक चतुर चपलनैनि,
चित्त चकौंधै मेरे मदनगुपाल को ।१३।
शब्दार्थ-चिलकत = चमकता है। तरुनि = नायिका। लाल = लाल रंग-
वाला। लाल = माणिक। चिबुक = ठुड्डी। चल चाल को = चल चाल-
वाला, चंचल। हरैं हरैं = धीरे धीरे।
भावार्थ-(सखी-वचन नायिका प्रति) हे तरुणी, एक तो सिर पर के
शीशफूल वैसे ही (अत्यंत दीप्तिपूर्वक) चमक रहे हैं, दूसरे तेरे माथे पर
लगा तिलक भी वैसा ही चमचमा रहा है। तीसरे दांतों की द्युति भी वैसी ही
हों रही है, चौथे कंठहार में लगा लाल वर्णवाला माणिक भी दमक रहा है,
पांचवें सुंदर ठुड्डी और कपोलों की भी वैसी ही चमक है, छठे नाक (की
बेसर) का मोती भी वैसा ही दमक रहा है। (इतनी अधिक चमक है कि
कहा नहीं जाता)। अतः ऐ चतुर चंचल नेत्रवाली, तू थोड़ा धीरे धीरे हँस
क्योंकि (इतनी चमकों के कारण) मेरे मदनगोपाल का चित्त चकाचौंध में
पड़कर व्यग्र हो जाता है।
श्रीकृष्णजू को अतिहस, यथा-(कवित्त)
(४७७) गिरि गिरि उठि उठि रीझि रीझि लावैं कंठ,
बीच बीच न्यारे होत छबि न्यारी न्यारी सौं।
आपुस में अकुलाइ आधे आधे आखरनि,
आछी आछी बात कहैं आछी एक यारी सौं।
सुनत सुहाइ सब समुझि परै न कछू,
केसौदास की सौं दुरि देखे मैं हुस्यारी सौं।

१३-चिलकत-झलकत। तरुनि-तिलकु, सिलकु, तिलनि । तैसीये-
तैसेई। लाल लाल-लाल कंठ। चमकत-झलकत।