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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 286 में से

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पृष्ठ 251

२५४ रसिकप्रिया
झाईं झलकति लोल लोचन कपोलनि में,
मोल लेत मन क्रम बचन समेत हौ।
भौंहैं कहैं देत भाउ सुनौ मेरी भावती के,
भावते छबीले लाल मौन कौन हेत हौ।
केसव प्रकास हास हँसि कहा लेहुगे जू,
ऐसें ही हँसे तें तौ हिये कौं हरे लेत हौ।७।
शब्दार्थ—दसन-बसन = दांतों का वस्त्र, होंठ। सर = बाण। क्रम =
कर्म। प्रकास = प्रत्यक्ष, खुलकर।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायक प्रति) आपके होठों के भीतर ही दांतों
की चमक दमदमाती है, इस प्रकार आप कामबाण की वृष्टि करके अचेत कर
देते हैं। चंचल नेत्रों और कपोलों में (हास की एक हलकी) छाया सी झल-
मला रही है। इसी के द्वारा मनसा, वाचा, कर्मणा आप मोल ले लेते हैं
(मनोहर छटा से देखनेवाला मुग्ध हो जाता है)। भौंहें भेद की बातें बतला
रही हैं। हे मेरी प्यारी सखी के प्रिय छबीले लाल, आप मौन किसलिए हैं?
जब आप इस प्रकार (मंदहास) से ही हंसकर हृदय को चुराए ले रहे हैं तो
खुलकर हँसने पर न जाने क्या करेंगे? (जब मंदहास में यह छटा है तो
खुले हास में न जाने कितनी अधिक मनोहरता होगी)।
कलहास-लक्षण—(दोहा)
(४७१) जहँ सुनिये कलध्वनि कछू, कोमल बिमल बिलास।
केसव तन मन मोहियै, बरनहु कबि कलहास।८।
भावार्थ—जहाँ कोमल चेष्टाओं के साथ मनोहारिणी मधुर ध्वनि भी
थोड़ी थोड़ी हो वहाँ कलहास होता है (मंदहास में ध्वनि कुछ भी नहीं होती
कलहास में ध्वनि भी होती है)।
श्रीराधिकाजू को कलहास यथा—(सवैया)
(४७२) काछैं सितासित काछनी केसव पातुर ज्यों पुतरीनि बिचारौ।
कोटि कटाक्ष नचै गतिभेद नचावत नायक नेह निनारौ।
बाजत है मृदुहास मृदंग सु दीपति दीपनि को उजियारौ।
देखत हौ हरि देखि तुम्हें यह होत है आँखिन ही में अखारौ।६।
शब्दार्थ—काछैं = पहने हुए। सितासित = (सित + असित) श्वेत और
काली। काछनी = यहाँ एक प्रकार का घाँघरा। पातुर ज्यों = वेश्या की
७—माँझ-माह, मंद। दमके-दरसे। सर-रस, द्युति। देत-भेद।
सुनौ-कहो। हँसे तें-तो हँसनि ही तें हियो अरि। ८—बरनहु-बरनत।
६—निनारो-निहारो, निन्यारो। है-जु। ही में-बीच।