रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
DevanagariHindipublished286 पृष्ठ
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२६४ रसिकप्रिया
से भिड़कर, प्रेम का कवच कसकर, साहस रूपी सहायक लेकर आज तूने
मदनगोपाल रूपी प्रतिद्वंद्वी से रति रूपी युद्ध जीत लिया ।
अलंकार—सावयव रूपक ।
श्रीकृष्णजू को वीररस, यथा-( कवित्त )
(४८९) अघ ज्यों उदारिहौ कि बक ज्यों बिदारिहौ कि,
केस गहि केसोदास केसी ज्यों पछारिहौ ।
हरिहौ कि प्राननाथ पूतना के प्राननि ज्यों,
बन तें कि जलजाल कालि ज्यों निकारिहौ ।
करिहौ बिमद घनबाहन ज्यों घनस्याम,
काहू सों न हारे हरि याही सों क्यों हारिहौ ।
बेही काम काम बर ब्रज की कुमारिकानि,
मारत हैं नंद के कुमार कब मारिहौ ।२६।
शब्दार्थ-अघ = अघासुर । उदारिहौ = फाड़ डालोगे । बक=बकासुर ।
बिदारिहौ = नष्ट कर दोगे । केस = बाल । केसी = केशी । पछारिहौ=
पराजित करोगे । बन तें = जल से । कालि = कालिय नाग । निकारिहौ=
निकालोगे । बिमद = गर्वरहित । घनवाहन = इंद्र । बेही काम = बिना किसी
प्रयोजन के । काम = कामदेव ।
वक्तव्य-गोपियों का दूत मथुरा में श्रीकृष्ण को पुरानी बातों का स्मरण
दिलाकर कामविरह दूर करने की प्रार्थना कर रहा है ।
अलंकार - उपमा ।
अथ भयानक-रस-लक्षण- (दोहा)
(४९०) होइ भयानक रस सदा, केसव स्याम सरीर ।
जाको देखत सुनतहीं, उपजि परति भयभीर ।२७।
शब्दार्थ—भीर = त्रासि ।
श्रीराधिकाजू को भयानक-रस, यथा-( सवैया )
(४९१) सुरमंडल मंडित कै घनघोर उठे दिगमंडल मंडि गटी ।
घहराति घटा घन बात के संघट घोप घटै न घटीहूँ घटी ।
२६-पछारिहौ-उधारिहौ । बिदारिहौ कि-बिदारिहौ जू । केस गहि-
कंस ज्यों कि, केस ज्यों कि । केसोदास-केसौराइ । हरिहौ-दुरिहौ । काम-
काज । २७-होइ-होहि । होइ०-होइ भयंकर कृत सदा विग्रह काम सरीर ।
परति-परत. पैर :