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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 286 में से

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पृष्ठ 269

१८ चतुर्दश प्रभाव २७३
शब्दार्थ—दनुज = दानव । जननि=लोगों को, जीवों को। समरु = युद्ध ।
अजर = जिसे वृद्धावस्था न हो, जरारहित, सनकादि । अनंत= जिसका अंत न
हो, विष्णु । अज = जिसका जन्म न हुआ हो, अजन्मा, ब्रह्मा। अमर = जो
मरे न, देवता । बाजत = बजता है। सुनि = सुनो। करि बेदनि = वेदों के
वाद में लगो, ज्ञानचर्चा करो । भागनि = भाग्य से । भव = संसार, मर्त्य ।
भवन = लोक ।
भावार्थ—( किसी ज्ञानी की उक्ति संसारलिप्त व्यक्ति से ) दानव, मनुष्य,
जल के जीवों तथा स्थल के जीवों को इस संसार में काल से युद्ध करना पड़ता
है । अजर, अनंत, अज, देवता सभी इस संसार के चक्कर में पड़कर मरते
हैं। इससे जो निकलना जान ले वही अमर है । अनाहत ( अनहद ) नाद हो
रहा है, कानों से ( ध्यान लगाकर ) सुन, उस शब्द को समझ और वेदों की
वार्ता ( ज्ञानचर्चा ) कर, नहीं तो शिव का डमरू बजने ही वाला है ( मृत्यु
आने ही वाली है ) । हे भाई, भागो, भाग्य से जिस प्रकार भागते बने ( इस
संसार से बचते बने ) भागो । इस मर्त्यलोक के बीच भय का ही चारो ओर
भँवर दिखाई देता है, सचेत रहो ।
सूचना—'केशव' ने अन्य रसों को श्रृंगार के भीतर ही दिखाया है ।
केवल शांत का ही यह शुद्ध उदाहरण दिया है ।
( दोहा )
(५०४) इहिं बिधि बरन्यो बरन बहु, नवरस रसिक बिचारि ।
बाँधौं बृत्ति कबित्त की, कहि केसव बिधि चारि ।४१।
शब्दार्थ—वृत्ति = कैशिकी आदि चार वृत्तियों का वर्णन अगले प्रभाव
में करेंगे ।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां नवरसवर्णनं
नाम चतुर्दशः प्रभावः ।१४।
पंचदश प्रभाव
अथ वृत्ति-वर्णन—( दोहा )
(५०५) प्रथम कैसिकी भारती, आरभटी भूनि भाँति ।
कहि केसव सुभ सात्वती, चतुर चतुर बिधि जाति ।१।
शब्दार्थ—चार वृत्तियाँ होती हैं—कैशिकी, भारती, आरभटी, सात्वती ।
४१—बरन बहु०-नवरसन केसव । बांधौं-बांधहुँ । कहि केसव-कहियतु है ।
१—कैसिकी-कौसिकी । आरभटी०-भनि अरभटी सुभाँति । २—भाव-
अर्थ ।