रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 261, कुल 286 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश प्रभाव २६५
दसहूँ दिसि केसव दामिनि देखि लगी प्रिय कामिनि कंठतटी ।
जनु पंथहि पाइ पुरंदर के बन पावक की लपटैं झपटी ।२८।
शब्दार्थ - भुअमंडल मंडित कै = संपूर्णा पृथ्वी पर छाकर । दिवि =
आकाश । गटी = समूह की समूह । बात = वायु । संघट = टक्कर । घोष =
गर्जन । न घटीहूँ घटी = घड़ी पर घड़ी बीत जाने पर भी । कंठतटी = कंठतट
से, गले से । पंथहि ० = मार्ग पाकर ।
भावार्थ - ( सखी की उक्ति सखी से ) भूमंडल को छाती हुई, बड़े बड़े
बादलों की जो घटा उठी वह आकाश-मंडल में समूह की समूह छा गई । घन
की घटा वायु की टक्कर से शब्द करती है। घड़ी पर घड़ी बीतती चली जा
रही है, पर बादलों का गर्जन घटता नहीं । दसो दिशाओं में बिजली की
चमक देखकर प्रिया प्रिय के गले से जा लगी । मानो मार्ग पाकर इंद्र के वन
( नंदन कानन ) में अग्नि की लपटें झपटकर जा लगी हों ।
श्रीकृष्णजू को भयानकरस यथा— (कवित्त)
(४६२) रोष में रस के बोल विष तें सरस होत,
जानै सो प्रबल पित्त दाखैं जिन चाखी हैं ।
केसौदास दुख दीबे लायक भए ब तुम,
आज लगि जाकी जी में आँखैं अभिलाषी हैं ।
सूधे हैं सुधारिबे कौं आए सिखवन मोहिं,
सूधेहूँ में सुधी बातैं मोसोंऊ न भाखी हैं ।
ऐसे मैं हौं कैसैं जाउँ दुरिहूँ धौं देखौ जाइ,
काम की कमान सी चढ़ाइ भौंहैं राखी हैं ।२६।
शब्दार्थ - रोष = क्रोध, मान । रस = प्रीति । सरस = बढ़कर । प्रबल
पित्त = पित्त की प्रबलता । दाख = द्राक्षा, मुनक्का ।
भावार्थ- ( दूती की उक्ति नायक से ) रोष में प्रेम की बातें तो विष से
भी बढ़कर होती हैं । इसे वही जान सकता है जिसने प्रबल पित्त में मुनक्का
खा लिया हो । आज तक आप जिसकी आँखों ( के इशारे ) का मन में अभि-
लाष करते थे उसी को अब दुःख देने योग्य तो हो गए । आज आप सीधे
बनकर मुझसे उसे सुधारने ( उसका मान छुड़ाने कीं ) की शिक्षा देने आए
हैं, पर आपको क्या पता नहीं कि वह सीधे में ( प्रसन्न रहने पर ) मुझसे
२८-घोष-शोष । गटी-घटी । घन-घट । घटै न०-घटेहुँ न घोष घटी ।
दसहूं-ताड़िता लड़पै निरखे उर पै सौ । जनु०-तनौ पारथ, जनु पारथ ।
२६-रोष में०-रिस में बिरस । पित्त-जुर । भए ब-भए हो । आज-अब ।
लगि-लहुँ । सुधारिबे ०-सुधार सकै क्यों ।