रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ रही है, ऐसा गाती है मानो स्वयम् सरस्वती ही अवतरित होकर आ गई
हो । सुन्दरता भी ऐसी हैं मानो कामदेव की पत्नी रति हो । इस प्रकार उस
गोपिका को लाकर राधिका के पास कर दिया । वे अत्यंत आदर के साथ
उतावली से उठकर उस गोपिका ( गोपाल ) से भेंटने लगीं तब सखियाँ
खिलखिलाकर हँस पड़ीं ।
श्रीकृष्णजू को परिहास, यथा-(सवैया)
(४८०) सखि बात सुनौ इक मोहन की निकसी मटुको सिर री हलकै ।
पुनि बाँधि लई सुनियै नतनारु कहूँ कहूँ बुंद करी छलकै ।
निकसीं उहि गैल हुते जहँ मोहन, लीनी उतारि जबै चलकै ।
पतुकी धरी स्याम खिसाइ रहे उत ग्वारि हँसी मुख आँचल कै।१७।
शब्दार्थ—हलकै = रीती, खाली । नतनारु = मटकी का मुँह बाँधने का
कपड़ा । छलकै = छलकने के । हुते = थे । चलकै = आकर । पतुकी = मटकी ।
भावार्थ— ( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, मोहन की एक बात
सुनो । वह ग्वालिनी दूध की खाली मटकी सिर पर लेकर चली । उसने उसका
मुँह कपड़े से ढँककर बाँध दिया था और ( दूध ) छलकने की सी बूँदें भी
मटकी में कहीं कहीं डाल दी थीं । फिर वह उस मार्ग से होकर निकली जहाँ
मोहन रहते थे । मोहन ने दूध की मटकी समझकर उसके पास आकर (दान
लेने के लिए वह मटकी उतरवा ली ) । उसने मटकी रख दी, खोलने पर
जब कुछ न निकला तब कृष्ण लज्जित हो गए । उधर वह ग्वालिनी भी
मुँह में अंचल लगाकर हँसने लगी ।
सूचना—( १ ) यह सवया केवल सरदारवाली प्रति में मिलता है ।
( २ ) रसग्राहकचंद्रिका में यह दोहा अधिक है—
कह्यो हासरस बरनि यों अरु रस सुगम कबित्त ।
करुनादिक सिंगारमय बरने समझहु चित्त ।
अथ करुणरस-लक्षण-( दोहा )
(४८१) प्रिय के बिप्रिय करन तें, आनि करुनरस होत ।
ऐसो बरन बखानियै, जैसे तरुन कपोत ।१८।
शब्दार्थ—बिप्रिय = अप्रिय, कष्टदायिनी बात । प्रिय के० = प्रिय के
लिए अप्रिय कार्य करने से करुणरस होता है । बरन = वर्ण, रंग । तरुन
कपोत = युवा कबूतर । ऐसो बरन० = करुणरस का रंग युवा कबूतर की
भाँति होता है ।
१७—सखि०--जुवती सुनि औगुन मोहन के । री हलकै-रीतिम लैके ।
सुनियै--सुनिए । नतनारु--नतनासु । पतुकी--पिनुकी । १८-तें-को । आनि-
अति । करुन०-करुनारस तहँ होत, करना रस होत ।