रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
( १८ )
१।१६ १५।१ १।६१-७१ ×
१।२० × १।७२ ७।२
१।२१ १।१७* १।७३ ७।१
१।२२ १।१८ १।७४ ७।४
१।२३-२५ २।१-३ १।७५ ७।७
१।२६ २।७ १।७६ ७।१०
१।२७ २।११ १।७७ ७।१३
१।२८ २।१४ १।७८ ७।२२
१।२९-३२ × १।७९ ७।१६*
१।३३ ३।१४ १।८० ७।२५
१।३४-३५ ३।१६-१७ १।८१ ७।१६
१।३६ ३।२६ १।८२-८६ ×
१।३७ ३।३० १।८७-८८ ७।३३-३४*
१।३८ × १।८९ ७।३५
१।३९ ३।३२ १।९० ७।३७
१।४० × १।९१ ७।३६
१।४१ ३।४६ १।९२ ७।४१
१।४२ ३।५० १।९३-९४ ×
१।४३ × १।९५ ७।४२-४३
१।४४ ३।५६ २।१-२ ८।२-३
१।४५ ३।६३ २।३ ×
१।४६-४८ × २।४-७ ८।८-१०
१।४९ ३।१५ २।८ ८।१५
१।५०
१६ )
२२।१ × | ३।३ १४।८*
२।२२ १६।१३ | ३।४ १४।१२*
२।२३-२६ × | ३।५ १४।१८*
२।२७ ५।२४ | ३।६ ×
२।२८-३१ × | ३।७ १४।२१
२।३२ ६।१* | ३।८ ×
२।३३-३४ ६।२-३ | ३।९ १४।२४*
२।३५ ६।१५ | ३।१०-११ ×
२।३६ ६।६ | ३।१२ १४।२७
२।३७-४१ × | ३।१३ ×
२।४२ १०।२ | ३।१४ १४।३०*
२।४३ १०।१ | ३।१५ ×
२।४४ १०।३* | ३।१६ १४।३३*
२।४५ १०।६ | ३।१७ ×
२।४६ १०।११ | ३।१८ १४।३७*
२।४७ १०।२० | ३।१९-२० ×
२।४८ १०।१४ | ३।२१ १६।२
२।४९ १०।२३ | ३।२२-३८ ×
२।५० × | ३।३९ १५।२
२।५१ १०।२६-३० | ३।४० ×
२।५२ × | ३।४१ १५।६
२।५३ १०।३१' | ३।४२ ×
२।५४-५५ × | ३।४३ १५।८*
२।५६ १०।३२ | ३।४४ १५।४
२।५७ ११।७ | ३।४५ ×
२।५८-५९ × | ३।४६ १६।१
२।६० ११।१* | ३.४७ १६।६
२।६१-६४ × | ३।४८ १६।४*
२।६५ १२।१ | ३।४९ ×
२।६६ × | ३।५० १६।८
२।६७ १३।१ | ३।५१ १६।४
२।६८-७० × | ३।५२ १६।१०
३।१ १४।१* | ३।५३-५७ ×
३।२ १४।३ |
( २० )
ऊपर जहाँ गुणन का चिह्न ( × ) है वहाँ 'शृंगारतिलक' और 'रसिक-
प्रिया' में मेल नहीं है । 'शृंगारतिलक' की समस्त बातें 'रसिकप्रिया' में नहीं
गृहीत की गई हैं । जहाँ तारा-चिह्न ( * ) है वहाँ कहीं अधिक और कहीं कम
पार्थक्य है । 'शृंगारतिलक' में तीन परिच्छेद हैं । पहले परिच्छेद में ६५,
दूसरे में ७० तथा तीसरे में ५७ छंद हैं । इतने लक्षण के छंद हैं । उदाहरणों
की संख्या इनमें नहीं हैं । उदाहरण उसमें कम ही दिए गए हैं, केवल १४० ।
प्रकाश-प्रच्छन्न भेद सभी रसों में होता है । रसिकप्रिया में केवल शृंगार के
अंतर्गत इन दोनों भेदों के उदाहरण दिए गए हैं । शृंगारतिलक में इन भेदों
के उदाहरण दिए ही नहीं गए हैं । यहाँ प्रकाश-प्रच्छन्न का लक्षण भी नहीं
दिया गया है । मुग्धा-मध्या-प्रौढ़ा के जितने विशेषण दिए गए हैं उनका
विवेचन वहाँ नहीं है । वहाँ लक्षणों के अनंतर कुछ उदाहरण भी यथास्थान
संकलित कर दिए गए हैं तथापि विस्तार नहीं है । रसिकप्रिया में प्रत्येक
विषय का लक्षण और उदाहरण देकर पूरा विस्तार किया गया है ।
रसिकप्रिया में नायक श्रीकृष्ण माने गए हैं, साथ ही नायिका राधाजी या
प्रियाजू हैं । इसका परिणाम यह हुआ है कि सामान्या का विवेचन केशवदास
ने परित्यक्त कर दिया । भक्ति के विभिन्न संप्रदायों में से कुछ में राधिका का
परकीयाभाव भी मान्य है । इसलिए उसका विचार केशव ने नहीं छोड़ा, फिर
भी परकीया का विस्तृत विवेचन करने और उदाहरण देने से वे विरत हो
रहे हैं । शृंगार का वर्णन चाहे रसिकप्रिया में बहिरंग भी यथास्थान आया
हो, चाहे उसमें शास्त्रीय पद्धति की पूर्णता के लिए सुरतांत-वर्णन भी रखे
गए हों, पर सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखकर उसमें बहुत से अनभीप्सित
वर्णन परित्यक्त कर दिए गए हैं । 'जिन केशव की शृंगारी प्रवृत्ति की कुत्सा
की जाती हैं उन्होंने सामाजिक दृष्टि से शृंगार के अनपेक्षित प्रसंगों का
परित्याग किया है ।' इसकी साक्षी उनकी रसिकप्रिया भरती है । ऐसे प्रसंग
उन्होंने परंपरा में स्वीकृत होते हुए, आधार-ग्रंथ में वर्णित होते हुए छोड़े हैं ।
इसलिए त्याग प्रयत्नपूर्वक है ।
यह भी कहा जाता है कि केशव की प्रवृत्ति दरबारी थी । उन्होंने राज-
विलास का वर्णन करने का विशेष प्रयास किया है। पर रसविवेचन में उन्होंने
राजकीय प्रवृत्तियों का सर्वत्र अवलंबन नहीं किया है। शास्त्रविवेजन में जीवन
के सभी पक्षों का आकलन किया जाता रहा है । वहाँ संपन्न जीवन के अधिक
विवरण बलात्कृत नहीं हैं, विषयापेक्षा से संकलित हैं । केशव ने इस विषय में
राजा-रंक को एक ही माना-है—
( ३१ )
इन ठौरनि ही होत है प्रथम मिलन संसार ।
केसव राजा रंक को रुचि राखे करतार ॥
श्रृंगारतिलक में इस प्रकार का कथन नहीं है। तत्त्वतः प्रधान रूप से उस
ग्रंथ का सहारा लेते हुए भी केशव ने स्थान-स्थान पर विच्छेद दिखाया है ।
जैसे, खंडिता का लक्षण उन्होंने हिंदी की परंपरा में गृहीत रखा है। अभिसारिका
के भेद वहाँ न होते हुए भी यहाँ संनिविष्ट किए हैं। समस्त नायिकाभेद की
संख्या में अंतर किया है। श्रृंगारतिलक में समस्त संख्या यों मानी गई है—
त्रयोदशविधा स्वीया द्विविधा च परांगना ।
एका वेश्या पुनश्चाष्टावस्थाभेदतोऽत्र ताः ॥
पुनश्च तास्त्रिधा सर्वा उत्तमा मध्यमाधमा ।
इत्थं शतत्रयं तासामशीतिश्चतुरुत्तरा ।।१।८७।८८
स्वकीया के १३ भेद इस प्रकार होते हैं—मुग्धा १, मध्या धीराधीरादि
३, प्रौढ़ा धीराधीरादि ३ । मध्या और प्रौढ़ा के ज्येष्ठा और कनिष्ठा भेद होने
से तीन-तीन भेद के छह-छह हो जाते हैं। इस प्रकार सब मिलाकर तेरह भेद
हुए । मुग्धा-मध्या-प्रौढ़ा के जो नववधू, आरूढ़यौवना, लब्धायति आदि विशेषण
हैं वे भेद में नहीं माने जाते । इन तेरह में परकीया के कन्या-ऊढ़ा दो भेद और
वेश्या का एक भेद मिलाने से १६ हुए । इनमें अष्टनायिका के आठ भेदों का
गुणन करने से १२८ और उत्तमादि तीन के गुणन से समस्त भेद ३८४ हुए ।
पर रसिकप्रिया में केवल ३६० ही भेद माने गए हैं—
केसवदास सु तीन बिधि बरनी स्वकिया नारि ।
परकीया द्वै भाँति पुनि, आठ आठ अनुहारि ॥
उत्तम मध्यम अधम अरु तीन तीन बिधि जान ।
प्रगट तीन सै साठ तिय, केसवदास बखान ।।७।३३-३४
३६० की एक संगति तो यों बैठ सकती है कि स्वकीया ३ × पद्मिनी आदि
४( = १२ + परकीया २ + सामान्या १ = १५) × स्वाधीनपतिकादि ८ =
१२० × उत्तमादि ३ = ३६० । दूसरी संगति श्रृंगारतिलक के अनुसार यह
होगी—मुग्धा १ + मध्या धीराधीरादि ३ + ज्येष्ठा-कनिष्ठा २ + प्रौढ़ा धीरा-
धीरादि ३ + ज्येष्ठा-कनिष्ठा २ + परकीया २=१५ × अष्टनायिका ८=१२० ×
उत्तमादि ३ = ३६० । दूसरी स्थिति इसलिए भी ग्राह्य हो सकती है कि केशव
ने सामान्या का परित्याग कर दिया है। केशव ने कहीं कहीं लिखा है कि मैं
यह विचार अपनी मति के अनुसार कर रहा हूँ । इससे स्पष्ट है कि उन्होंने
यथास्थान कुछ जोड़ने का और कहीं कुछ घटाने का भी प्रयत्न किया है । ऊपर
उन्होंने सामान्या को पृथक् करके विस्तार घटाया है। कहीं विस्तार किया भी
( २३ )
हैं। जैसे प्रथम मिलनस्थान शृंगारतिलक में जितने हैं उनसे रसिकप्रिया में
‘बनविहार’ अधिक है। बनमाली श्रीकृष्ण के चरित में बनविहार अत्यंत
अपेक्षित था। नूतन संगम ‘शृंगारतिलक’ में ये हैं—
धात्रीसखीवेश्मनि रात्रिचारे महोत्सवे तीव्रतमे भये च।
निमन्त्रणे व्याधिमिषेण शून्ये गेहे तयोर्नूतनसंगमः स्यात् ॥२।२७
रसिकप्रिया में प्रथम मिलनस्थान ये हैं—
जनी सहेली धाइ घर सूने घर निसिचार।
अति भय उत्सव ब्याधि मिस न्यौते सु बनबिहार ॥५।२४
एक ओर ‘जनी’ अधिक है दूसरी ओर ‘बनबिहार’। इससे स्पष्ट है कि
केशव ने अनुकथन करते हुए अपनी मनोदृष्टि भी खुली रखी है।
इसमें शृंगारतिलक के उदाहरणों से भी कुछ सहारा कहीं कहीं लिया
गया है, उल्था नहीं किया गया है। रामचंद्रचंद्रिका में कुछ स्थल अनूदित हैं,
पर रसिकप्रिया में केवल प्रेरणा भर ली गई है। उदाहरण इन्होंने स्वतः
निर्मित किए हैं। प्रथम प्रभाव में मंगलाचरण की चर्चा पहले की जा चुकी
है। द्वितीय प्रभाव में जिन छंदों में कुछ प्रेरणा दिखाई देती है उनमें से एक
यहाँ मिलान के लिए उद्धृत करते हैं। अनुकूल नायक का उदाहरण शृंगार-
तिलक में यह है—
अस्माकं सखि वाससो न रुचिरे ग्रैवेयकं नोज्ज्वलं
नो वक्रा गतिरुद्धतं न हसितं नैवास्ति कश्चिन्मदः ।
किन्त्वन्येऽपि जना वदन्ति सुभगोऽप्यस्याः प्रियो नान्यतो।
दृष्टि निक्षपतीति विश्वमियता मन्यामहे दुःस्थितम् ॥
‘रसिकप्रिया’ में ‘अन्यच्च’ उदाहरण है—
मेरे तो नाहिन चंचल लोचन नाहिन केसब बानी सुधाई।
जानौं न भूषनभेव के भावनि भूलिहू मैं नहि भौंह चढ़ाई।
भोरेहूं ना चितयो हरि ओर त्यों घेर करें इंहि भाँति लुगाई।
रंचक तौ चतुराई न चित्तहि कान्ह भए बस काहे तें माई ॥२।६॥
रसिकप्रिया का निर्माण करते समय केशव आचार्य और कवि दोनों थे ।
आगे चलकर उनका आचार्य-पक्ष प्रबल होता गया । ‘रसिकप्रिया’ और ‘राम-
चंद्रचंद्रिका’ को देखकर सहसा कोई विश्वास नहीं कर पाता कि एक ही की
दोनों रचनाएँ हैं। संस्कृत-प्रबंधकाव्यों की परंपरा पहले ही पुष्ट हो चुकी थी।
संस्कृत में अमरुकशतक ऐसे मुक्तककाव्य उतने नहीं हैं। हिंदी में केशवदास ने
रसिकप्रिया में अपने कविरूप का जैसा निखार दिखाया वह हिंदी की प्रभूत
( २३ )
परिमाण में अपनी ही काव्यसंपत्ति है। जहाँ कहीं संस्कृत के उदाहरणों का
सहारा भी लिया गया है वहाँ भी नूतन भंगिमा या ग्रथन-कौशल है। इसलिए
केशव के संबंध में यह सत्य न भूलना चाहिए कि उनमें कवित्व की सरसता
मुक्तक के क्षेत्र के लिए पूरी थी । यदि कुछ विशेष प्रकार के विनियोग की
प्रतिज्ञा उन्होंने न की होती तो रामचंद्रचंद्रिका में उनका कविरूप उतना
आवृत्त न होता जितना शास्त्रस्थितिसंपादन के कारण हो गया है ।
विषय-विमर्श
रसिकप्रिया में सोलह प्रभाव हैं। कदाचित् उसके षोडश श्रृंगार का
ध्यान रखकर इतने प्रभाव रखे गए हैं—प्रत्येक श्रृंगार का एक प्रभाव ।
श्रृंगार का प्रभाव ही पड़ता है। प्रत्येक प्रभाव के उपसंहार में आगे के
प्रभाव का वर्ण्यविषय सूचित कर दिया गया है ।
प्रथम प्रभाव में सबसे पहले गणेश की वंदना है। सामाजिक प्रवाह का
ध्यान जैसा मानस में तुलसीदास ने रखा वैसा केशवदास ने अपने साहित्यिक
ग्रंथों में। इसी से गणेश की वंदना सर्वप्रथम की। दूसरी वंदना श्रीकृष्ण की
है, इन्हें नवरसमय कहने में केशव ने अधिक पांडित्य का प्रदर्शन किया है।
हिंदी में श्रृंगार के आलंबन कृष्ण ही हो गए हैं, रसमात्र के आलंबन वे ही
हैं। हिंदी की प्रथा के अनुसार इसके अनंतर आश्रयदाता या राजवंश का
वर्णन है। निर्माणहेतु, स्थान और समय का उल्लेख है । फिर नवरस का
नामोल्लेख, उनमें श्रृंगार की श्रेष्ठता और श्रीकृष्ण के नायकत्व का कथन है ।
फिर श्रृंगार के संयोग-वियोग भेद और प्रकाश-प्रच्छन्न भेद हैं तथा श्रीकृष्ण
और राधिका दोनों के चरित में इनके उदाहरण दिखाए गए हैं ।
द्वितीय प्रभाव में नायक-लक्षण कथित है। इसमें अनुकूलादि और
उनके प्रकाश-प्रच्छन्न भेद के विस्तार से उदाहरण हैं। इस प्रभाव में 'आठ
गांठ' का वर्णन है। 'धृष्ट' के प्रसंग में वे लिखते हैं—
मनसा बाचा कर्मना बिहँसनि चितवनि लेखि ।
चलनि चातुरी आतुरी आठौ गांठ बिसेखि ॥२।१६
धृ
( २४ )
तृतीय प्रभाव में सबसे पहले नायिका-जाति का वर्णन कामसूत्र के आधार
पर किया गया है। तत्त्वतः कामसूत्र और साहित्यसूत्र में अंतर है। साहित्य काम
के उसी अंश को ग्रहण करता है जिसका संबंध मनोवृत्ति से होता है। इसलिए
उसमें काम के उन विवरणों का उल्लेख जो शरीर से संबंध रखनेवाले हैं ग्राह्य
नहीं हुए। साहित्य अपेक्षाकृत सूक्ष्म तत्त्व से संबंध रखता है। साहित्य में
मन काम का पिता माना जाता है। इसलिए यों कह सकते हैं कि साहित्य
बड़ों से अपना संबंध जोड़ता है, बाल-बच्चों से संलाप अपनी गंभीरता के
विरुद्ध समझता है। केशव ने इतना अच्छा किया कि नायिकाओं के इन भेदों
के साथ पुरुषों के भी भेद नहीं कहे। कदाचित् उनका लक्ष्य यह था कि
पद्मिनी स्त्रियों का उल्लेख साहित्य में हुआ करता है इसलिए केवल स्वरूप-
बोध के लिए उनका संक्षिप्त विवरण दे देना चाहिए।
जाति-वर्णन के अनंतर मुग्धा का विचार है। नायिकाओं के प्रकारभेद कई
दृष्टियों से किए जाते हैं। पद्मिनी आदि जातिभेद हैं। मुग्धा आदि अवस्थाभेद
हैं। स्वकीया-परकीया आदि धर्मानुसार प्रकार हैं। मुग्धा के जो विशेषण
नववधू आदि कहे गए हैं वे उसके प्रकार या भेद नहीं हैं। नायक के दक्ष
आदि विशेषणों की भाँति ये विशेषण हैं। इसमें मुग्धा के सुख का वर्णन भी
इन्होंने किया है। वह किसी की शिक्षा से वांछित सुखात्मक व्यवहार नहीं
करती। उसके साथ छल-बल अनुचित है। उससे सुख-शोभा को क्षति पहुँचती
है (देखिए ३।२८)। इसमें मध्या और प्रौढ़ा के विशेषण या गुण मुग्धा की ही
भाँति विस्तार से कथित हैं। पर बहिर्रति और अंतररति के उल्लेख काम-
शास्त्र के ग्रंथों से ही उठाकर रखे गए हैं। मध्या में सुरतांत-वर्णन साहित्य में
परंपरामुक्त होने के कारण कदाचित् रति के स्वरूपबोध के लिए आचार्यवर ने
रख दिया है, जो साहित्य के सूक्ष्म स्वरूप के विरुद्ध है। इसी के अंतर्गत षोडश
शृंगार भी कथित है, जो पारंपरिक हैं।
चतुर्थ प्रभाव में 'दर्शन' का विचार है। इस संबंध में ध्यान देने योग्य
यह है कि हिंदी में श्रवणदर्शन भी चल पड़ा, जब कि वह दर्शन से संबद्ध
नहीं है। शृंगारतिलक में दोनों को पृथक् ही कहा गया है—
दर्शनाच्छ्रवणाद्वापि कामार्ते भवतो यथा ।
साक्षाच्चित्रे तथा स्वप्ने तस्य स्याद्दर्शनं त्रिधा ।
देशे काले च संग्यां च श्रवणं चास्य तद्यथा ।। १।५०-५१
रुद्रट ने 'इंद्रजाल' * को भी 'वा' के साथ जोड़ा है—
- साहित्यदर्पण में यह गृहीत हुआ है ।
( २५ )
साक्षाच्चित्रे स्वप्ने स्याद्दर्शनमेवमिन्द्रजाले-वा ।
देशे काले भंग्यां साधु तदाकर्णनं च स्यात् ।। १२।३१
उज्ज्वलनीलमणि में भी दर्शन और श्रवण पृथक् हैं—
साक्षात्कृष्णस्य चित्रे च स्यात्स्वप्नादौ च दर्शनम् ।
वन्दिदूतीसखीवस्त्राद् गीतादेश्च श्रुतिर्भवेत् ।
हिंदी में 'श्रवण-दर्शन' करके दर्शन के ही चार भेद कर दिए गए हैं।
यहाँ 'दर्शन' शब्द व्यापक कर दिया गया। श्रवण द्वारा प्रियगुणादि का कीर्तन
सुनने पर भी उसके 'रूप का आनयन होता है। इसी से 'श्रवण-दर्शन' का
ग्रहण किया गया है।
पंचम प्रभाव में दंपति-चेष्टा का वर्णन है। जैसा कहा जा चुका है
इन्होंने अपेक्षित लक्षणादि का नियोजन और साथ ही वांछित विस्तार करने का
पूरा प्रयास किया है। प्रेम की अभिव्यक्ति के उपाय का नाम चेष्टा है।
प्रिय के अन्यत्र देखने पर उसकी ओर देखना, उसके देखने पर अन्यत्र देखना
आदि में केशव ने विस्तार किया—
कबहुँ श्रुतिकंडू करै आरस सों ऐंडाइ ।
केसबदास बिलास लों बारबार जमुहाइ ॥ ५।६
यह उद्भावना केशव की नहीं है, पारंपरिक है। 'शृंगारतिलक' में नहीं
है। केशव ने अवधानतापूर्वक आकलन किया है। ठीक इसी प्रकार स्वयं
दूतत्व का प्रसंग वहाँ न होने पर भी नियोजित किया गया है (देखिए ५।१३)
इस प्रभाव में इन्होंने स्पष्ट घोषणा कर दी है कि वेश्या का वर्णन क्यों नहीं
किया गया—
और जु तरुनी तीसरी क्यों बरनौं यहि ठौर ।
रस में बिरस न बरनिये कहत रसिकसिरमौर ॥ ५।३६
शास्त्रीय दृष्टि से परकीया और सामान्या में रसाभास मानते हैं। पर जैसा
पहले कह आए हैं, परकीयाभाव भक्तिप्रवाह में साधना की दृष्टि से ग्राह्य हो
गया था। इसलिए उसका तो कुछ विवेचन इन्होंने कर दिया, पर सामान्या
को 'रसाभास' भी नहीं विरस (रसहीन) कहकर परित्यक्त कर दिया।
षष्ठ प्रभाव में 'भाव' का विचार है। 'शृंगारतिलक' में यह विषय नहीं
वर्णित है। भाव का लक्षण इन्होंने यों किया है—
आनन लोचन बचन मग प्रगटत मन की बात ।
ताही सों सब कहत हैं भाव कबिन के तात ॥६।१
इसमें मन की बात अर्थात् मनोविकार को भाव कहा गया है। पर इस भाव
के पाँच प्रकार यों कहे गए हैं—
( २६ )
भाव सु पंच प्रकार के सुनि बिभाव अनुभाव ।
थाइ सात्विक कहत हैं व्यभिचारी कबिराव ॥६।२
विभाव और अनुभाव को भी भाव कहना शास्त्रीय नहीं है। स्थायी भाव,
व्यभिचारी और सात्त्विक भाव को तो रसतरंगिणीकार 'भाव' कहते हैं—
रसानुकूलो विकारो भावो विकारोऽन्यथाभावः । विकारश्च द्विविध आन्तर
श्शारीरश्चान्तरोऽपि द्विविधः स्थायी भावो व्यभिचारी भावश्च । शारीरास्तु
सात्त्विकभावादयः ।
रस के अनुकूल विकार को भाव कहते हैं। विकार का अर्थ है परिवर्तन
( अन्यथाभाव ) । यह परिवर्तन दो प्रकार का होता है — अंतःकरण का और
शरीर का । आंतरिक परिवर्तन दो प्रकार का होता है— स्थायी भाव और
व्यभिचारी भाव ( अस्थायी भाव ) । शारीरिक परिवर्तन सात्त्विकभावादि
होते हैं। यह नहीं समझना चाहिए कि देहविकार के लिए 'भाव' पद का
व्यवहार गौण है। भेदकता है अन्य भावों को अपने शासन में रखने की शक्ति
की ! मनोविकार अन्य भावों को अपने शासन में रख सकता है, देहविकार
नहीं। स्थायी भाव और व्यभिचारी भाव में इतना ही अंतर है कि स्थायी
भाव चरम समय पर्यंत स्थिर रहता है इसी से स्थायी कहलाता है। दूसरा
अस्थिर होता है। इस प्रकार स्थायी भाव मनोविकार में प्रधान होता है।
प्रधान भाव होने के कारण यह सामाजिक के हृदय में उद्बुद्ध होकर रस-
चर्वणा करता है व्यभिचारी या संचारी ऐसा नहीं कर पाता ।
पर 'विभाव' भाव नहीं हैं। जो भाव को विशेषतया उत्पादित करते हैं
वे विभाव कहलाते हैं। जो रसों को अनुभावित करते हैं, अनुभव में लाते हैं,
वे अनुभाव कहलाते हैं। विभाव भाव के कारण होते हैं और अनुभाव उसके
कार्य। कदाचित् किसी के कारण और कार्य में भी उसका अंश होता है ऐसा
मानकर उन्हें भी भाव ही कह दिया गया है। विभाव का लक्षण करते हुए
केशव उन्हें रस-भाव का कारण कहते ही हैं—
जिनतें जगत अनेक रस प्रगट होत अनयास ।
तिनसों ²बिमति विभाव कहि, बरनत केसवदास ॥६।३
विभाव के दो भेद यथाशास्त्र ही हैं—आलंबन और उद्दीपन । इनमें
आलंबन का लक्षण यह है—
जिन्हें अतन अवलंबई ते आबलंन जानि ।
जिनतें दीपति होति है ते उद्दीप बखानि ॥६।५
यहाँ 'अतन' शब्द विचारणीय है। यदि आलंबन का लक्षण सभी रसों
( २७ )
के अनुकूल माना जाए तो इसका अर्थ 'काम' करने में बाधा है । तब इसका
अर्थ 'अशरीरी रस-भाव' करना चाहिए । पर केशव ने इसके अनंतर आलंबन-
स्थान और उद्दीपन का जो वर्णन किया है वहाँ केवल श्रृंगाररस के ही आलं-
बन-उद्दीपन कथित हैं । इसलिए जान पड़ता है कि इन्होंने 'काम' अर्थ में ही
इसका व्यवहार किया है । आलंबनस्थान-वर्णन भी ध्यान देने योग्य है—
दंपति जोबन रूप जाति लच्छनजुत सखिजन ।
कोकिल कलित बसंत फूल फल दल अति उपबन ।
जलचर जलजुत अमल कमल कमला कमलाकर ।
चातक मोर सुसब्द तड़ित धनु अंबुद अंबर ।
सुभ सेज दीप सौगंध गृह पान गान परिधान मनि ।
नव नृत्यमेव बीनादि रव आलंबन केसव बरनि ।।
इसमें 'दंपति' तो अवश्य शृंगाररस के आलंबन हैं, पर सखीजन, कोकि-
लादि की गणना उद्दीपन में ही की जाती है । उद्दीपन दो प्रकार के होते हैं-
संबद्ध और तटस्थ । आलंबन से संबद्ध उद्दीपन के अंतर्गत कुछ तो शारीरिक
चेष्टाएँ होती हैं, कुछ शरीर की साजसज्जा, कुछ शय्यादि उपकरण, कुछ
सहायक सखी आदि । तटस्थ के अंतर्गत प्राकृतिक स्थिति होती है । इनमें से
केशव ने शारीरिक चेष्टा को ही उद्दीपन कहा है—
अवलोकन आलाप परिरंभन नख-रद-दान ।
चुंबनादि उद्दीप हैं मर्दन परस प्रवान ।।६।७
पर अन्य सभी उद्दीपनों को इन्होंने आलंबन ही कहा है । इसका कारण
कदाचित् यह है कि प्रकृत आलंबन के अतिरिक्त स्थितिभेद से ये भी आलंबन
हो सकते हैं । इन्हें उद्दीपन कह देने से इनकी गणना फिर आलंबन के अंतर्गत
न हो सकती । पर ऐसा कर देने से इनका उद्दीपन होना स्पष्ट लक्षित नहीं
होता । हिंदी में प्राकृतिक दृश्य आलंबन होते हैं यह केशवदास ने ही कहा
है । यह कथन कम महत्त्व का नहीं है ।
अनुभाव का लक्षण यह है—
आलंबन उद्दीप के जो अनुकरन बखान ।
ते कहिये अनुभाव सब दंपति प्रीति-विधान ।।६।८
इसमें 'अनुकरण' शब्द 'अनुकृति' नहीं 'अनुगमन' अर्थ में प्रयुक्त जान
पड़ता है । अनुभाव शब्द के दो अर्थ किए जाते हैं— जो भावादि का अनुभव
कराते हों अथवा जो भाव के पीछे प्रकट होते हों । यहाँ दूसरा अर्थ लिया
गया है ।
व्यभिचारी भाव के नामकथन में केशव ने परंपरागृहीत तैंतीस संचारियों
के प्रसंग में दो शब्द ऐसे रखे हैं जिनसे भ्रांति हो सकती है । एक शब्द
'बिबाद' है और दूसरा 'आधि' ।—
१—गर्व हर्ष आवेग पुनि निंदा नींद-बिबाद ।
२—उन्माद मरन अवहित्य है व्यभिचारी जुतआधि ॥
यदि 'बिबाद' को कोई नया संचारी माना जाए तो 'तर्क' और उसमें कोई
भेद नहीं होगा । इसलिए 'नींद-बिबाद' समस्तपद जान पड़ता है । 'नींद-
बिबाद' का 'निद्रा का बखेड़ा, निद्रा की बात' अर्थ है । ध्यान देने योग्य
है कि दोनों शब्द 'तुकांत' में आए हैं । ये तुकांत के अनुरोध से प्रयुक्त हैं,
इनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है । जैसे 'बिबाद' को 'निद्रा के साथ जोड़
लेने से स्थिति ठीक हो जाती है वैसे ही 'जुत आधि' को चाहें तो 'अवहित्य'
के साथ जोड़ दे सकते हैं । अन्यथा उस दोहे के प्रथम दल में 'व्याधि' है
उसी से इसे जोड़ लें—'आधि व्याधि' को एक मानें। यह 'जुत' शब्द 'आधि'
को किसी से जोड़ने के लिए ही प्रयुक्त है । उसकी स्वतंत्र सत्ता के द्योतन के
लिए प्रयुक्त नहीं जान पड़ता । शारीरिक क्लेश को व्याधि और मानसिक
क्लेश को आधि कहते हैं । बाह्य और आभ्यंतर भेद से एक ही क्लेश की
द्विधा स्थिति हो जाती है ।
हाव का लक्षण इन्होंने यह किया है —
प्रेम राधिका कृष्ण को है तातें सिंगार ।
ताके भावप्रभाव तैं उपजत हावबिचार ॥६।१५
यहाँ 'भावप्रभाव' शब्द विचारणीय है । राधाकृष्ण के प्रेम से शृंगार
होता है, उसके भाव के प्रभाव से हाव होता है । 'भाव' का अर्थ या तो
'स्थिति' मानें अथवा 'मनोविकार' मानें । नाट्य शास्त्र में 'हाव' दूसरे ढंग से
माना गया है । हिंदी में आलंबनगत 'अलंकार' को हाव कहते हैं । नाटघशास्त्र
में कहा गया है कि सामान्याभिनय तीन प्रकार से होता है—वाणी से, अंग
से और सत्त्व से । सत्त्व देहात्मक होता है । सत्त्व से भाव और भाव से हाव,
हाव से हेला होती है—
देहात्मकं भवेत् सत्त्वं सत्त्वात् भावः समुत्थितः ।
भावात् समुत्थितो हावो हावाद्धेला समुत्थिता ॥२४।७
वहीं नाटघर साश्रय अलंकारों का उल्लेख भी है । मुख और शरीर में यौवन
के समय होनेवाले स्त्रियों के शारीरिक विकार या चेष्टा का नाम अलंकार है—
अलंकारास्तु नाटघज्ञैर्ज्ञेया नाटघर साश्रयाः ।
यौवने ह्यधिकाः स्त्रीणां विकारा वक्त्रगात्रजाः ॥२४।४
( २६ )
ये तीन प्रकार के हैं—अंगज, स्वाभाविक और अयत्नज । अंगज ३,
स्वाभाविक १०, अयत्नज ७ । भाव, हाव और हेला ये तीन अंगज होते हैं ।
यहाँ ‘भाव’ का अर्थ है कामविकार । अल्पसंभोगेच्छाप्रकाशक भ्रू नेत्रादि विकार
को हाव कहते हैं । जब विकार बहुत स्फुट रूप में प्रकट हो तो उसे हेला कहते
हैं । ये अंगज कहलाते हैं, अंग या शरीर से प्रकट होने के कारण । स्वाभाविक
दस होते हैं—लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिंचित्, मोट्टायित,
कुट्टमित, बिब्बोक, ललित, विह्वत । ये स्वभावसिद्ध होते हुए भी कृतिसाध्य
होते हैं, यत्नज होते हैं । स्त्रियों में स्वाभाविक सात्त्विक अलंकार इनके
अतिरिक्त आठ और हो सकते हैं—मद, तपन, मौग्ध्य, विक्षेप, कुतूहल, हसित,
चकित तथा केलि ।* अयत्नज सात होते हैं-- शोभा, कांति, दीप्ति, माधुर्य,
प्रगल्भता, औदार्य और धैर्य । अंगज और अयत्नज ये दस पुरुषों में भी हो
सकते हैं । किंतु विशेष शोभाकारक होते हैं नायिकाओं में ही ।
केशव ने उपर्युक्त दस स्वाभाविक अलंकारों के अतिरिक्त 'हाव' शीर्षक
के अंतर्गत 'हेला', 'मद' और 'बोधक' को ग्रहण किया है । इस प्रकार
इन्होंने कुल १३ हाव माने हैं। 'हावों' की ऐसी कल्पना 'रसतरंगिणी'
से चली है । उसमें उक्त दस स्वभावज अलंकारों को 'हाव' नाम दिया गया है।
हिंदी में 'हेला' को भी उसी में मिला लिया गया है । पूर्वोक्त अतिरिक्त आठ
स्वभावज अलंकारों में से हिंदीवाले कुछ को या सभी को हाव के अंतर्गत कर
के कहते हैं । बोधक हाव का वर्णन सबसे प्रथम हिंदी में इन्होंने ही किया है—
गूढ़ भाव को बोध जहँ केसव ओरहि होइ ।
तासों बोधक हाव सब कहत सयाने लोइ ॥६।५४
कोई कोई इसे 'बोध' कहते हैं । भिखारीदास ने रससारांश में 'बोधक' को
'क्रियाचातुर्य' कहा है । पद्माकर जगद्विनोद में उसका लक्षण यों देते हैं—
ठानि क्रिया कछु तिय पुरुष बोधित करै जु भाव ।
रसग्रंथन में कहत हैं तासों बोधक हाव ॥ ४६६ ॥
'मौग्ध्य' के प्रतिपक्ष में 'चातुर्य'-सूचक 'बोधक' की कल्पना की गई है ।
'दास' ने शृंगारनिर्णय में भरतकथित दस स्वाभाविक अलंकारों में ही अन्य
अतिरिक्त स्वभावज अलंकारों को अंतर्भुक्त करने का प्रयास किया है ।
इस प्रसंग में दूसरी विचारणीय स्थिति यह है कि स्वभावज अलंकारों को
इन्होंने श्रीकृष्ण में भी माना है । इस संबंध में रसतरंगिणीकार ने स्थिति स्पष्ट
कर दी है । नारियों में ये स्वाभाविक होते हैं, परपुरुषों में औषधिक—
- देखिए साहित्यदर्पण ।
( ३० )
नारीणां शृंगारचेष्टा हावः । स च स्वभावजो नारीणां । ननु बिब्बोक-
विलासविच्छित्तिविभ्रमाः पुरुषाणामपि संभवन्तीति चेत्सत्यम् । तेषां त्वौपा-
धिकाः स्वभावजाः स्त्रीणामेव । नन्वेवं यदि तासां सदैव ते कथं न भवन्तीति
चेत्सत्यम् । उद्दीपकान्वयव्यतिरेकाभ्यां नायिकानां हावाविर्भावतिरोभावाविति ।
रसरंगिणी में लीला विलास बिच्छित्ति विभ्रम ललित को शारीरिक,
मोट्टायित कुट्टमित बिब्बोक विहृत को आंतरिक और किलकंचित को उभय-
संकीर्ण कहा है । साथ ही इन सबके विभाव और अनुभाव का भी उल्लेख
विस्तार से किया है । जैसे लीला के संबंध में वे लिखते हैं—
प्रियमूषणवचनाद्यनुकृतिर्लीला । तत्र विभावः सखीकौतुककलापः । अनु-
भावः प्रियपरिहासः ।
भोजराज के शृंगारप्रकाश में इसका अत्यधिक विस्तार है। उन्होंने
अनुभाव के अंतर्गत ही इन्हें रखा है । रूपगोस्वामी ने भी अनुभाव के भीतर
ही इन्हें रखा है । भोजराज ने अनुभाव का लक्षण ही यों किया है—
इदानीमनुभावं व्याख्यास्यामः । तत्र विभावैः प्रबुद्धसंस्कारस्य नायकादेः
ये स्मृतीच्छाद्वेषप्रयत्नजन्मानः मनो वाग्बुद्धिशरीरारम्भाःतेऽनुभूयमानत्वादरत्यादी-
नामनन्तरभवनाच्च अनुभावाः ।
इस प्रकार मन, वाणी, बुद्धि और शरीर के आरंभ अनुभाव हैं । 'मन
आरंभ' में भाव, हाव, हेला, शोभा, कांति, उदीप्ति, माधुर्य, धैर्य, प्रागल्भ्य,
औदार्य, स्थैर्य और गांभीर्य हैं । 'वागारंभ' में हैं आलाप, प्रलाप, विलाप, अनु-
लाप, संल्लाप, अपलाप, संदेश, अतिदेश, निर्देश, उपदेश, अपदेश और
व्यपदेश ।* 'बुद्धयारंभ' भी बारह हैं—पांचाली, गौड़ी, वैदर्भी, लाटीया
रीतियां, भारती, आरभटी, कैशिकी, सात्त्विकी वृत्तियां और पौरस्त्या, उड्र-
मागधी, दाक्षिणात्या और आवंत्या । 'शरीरारंभ' में लीला, विलास,
विच्छित्ति, विभ्रम, किलकंचित, मोट्टायित, कुट्टमित, विब्बोक, ललित, विहृत,
क्रीड़ित और केलि का ग्रहण है ।
उज्ज्वलनीलमणि में 'विहृत' के स्थान पर 'विकृत' नाम है—
ह्रीमानेर्ष्यादिभिर्यंत्र नोच्यते स्वविवक्षितम् ।
व्यज्यते चेष्टयैवेदं विकृतं तद्विदुर्बुधाः ॥
भरत के नाट्यशास्त्र में भी 'विकृत' नाम मिलता है। हिंदी के कुछ
शृंगारयुगीन रीतिग्रंथों में भी यही नाम रखा गया है ।
नवीन कल्पना के लिए केशवदास ने क्षमार्थना भी की है—
- मिलाइए नाट्यशास्त्र में अभिनयात्मक अलंकारों से । २४।५२-५७
( ३१ )
राधा राधारमन के कहे जथामति हाव ।
ढिठई केसवदास की छमियो कवि कबिराव ॥ ६।५७
सप्तम प्रभाव में 'खंडिता' का लक्षण भिन्न है। 'शृंगारतिलक' का
लक्षण यह है—
कुतश्चिन्नागतो यस्या उचिते वासके प्रियः ।
तदनागमसंतप्ता खण्डिता सा मता यथा ॥२।७६
'खंडिता' का अर्थ होता है 'परिस्थितिवश प्रिय पर से जिसके अपनत्व
का अभिमान खंडित हो'। यहाँ प्रिय के न आने से जिसको संताप हो वह
खंडिता कही गई है। हिंदी में खंडिता का जो लक्षण चला वह रसमंजरी के
अनुगमन पर—
अन्योपभोगचिह्नित प्रातरागच्छति पतिर्यस्याः सा खंडिता ।
केशव का लक्षण यों है—
आवन कहि आवै नहीं आवै प्रीतम प्रात ।
जाके घर सो खंडिता कहै जु बहुविधि बात ॥ ७।१६
यहाँ केशव ने 'आने की कहकर न आए' लिखकर एक ओर स्थिति
स्पष्ट की तो दूसरी ओर 'अन्योपभोगचिह्नित' को छोड़ दिया। उसे 'कहै जु
बहुविधि बात' के भीतर रखा है। इसका कारण उनके द्वारा गृहीत प्रच्छन्न-
प्रकाश' भेद है। उन्होंने प्रच्छन्न में तो 'उपभोगचिह्नों' का उल्लेख नहीं
किया, पर 'प्रकाश' में उनका संकेत किया है। (देखिए ७।१८)।
अभिसारिका के इन्होंने तीन विशेषण दिए हैं—
हित तें कै मद मदन तें पिय पै मिले जु आइ ।
सो कहिये अभिसारिका बरनी त्रिबिध बनाइ ॥ ७।२५
प्रेम, मद ( गर्व ) और मदन ( काम ) से प्रेरित होकर जो प्रिय के
पास जाए । इसमें के दो विशेषण तो नाट्यशास्त्र में मिल जाते हैं—मद और
मदन । प्रेम नूतन कल्पना है—
हित्वा लज्जां समाकृष्टा मदेन मदनेन वा।
अभिसारयते कान्तं सा भवेदभिसारिका ॥ २४।२१२
अष्टम प्रभाव में जड़ता का लक्षण विचारणीय है। 'शृंगारतिलक' में
उसका लक्षण यह है—
प्रकाण्डे यत्र हुंकारो दृष्टः स्तब्धा गता स्मृतिः ।
श्वासाः समाधिकाः काश्यं जडतेयं मता यथा ॥ २।१५
पर केशव ने यह लक्षण दिया है—
( ३२ )
भूलि जाइ सुधिबुधि जहाँ सुखदुख होइ समान ।
तासों जड़ता कहत हैंकेसवदास सुजान ॥ ८ ४८
इसमें 'गता स्मृतिः' का 'भूलि जाइ सुधिबुधि' ठीक है। पर 'सुखदुख
होइ समान' यह कदाचित् 'इष्टानिष्टापरिज्ञान' से संबद्ध है। क्योंकि सुख
अनुकूल-वेदनीय होता है और दुःख प्रतिकूलवेदनीय। उज्ज्वलनीलमणि में
'जडिमा' का लक्षण यह है—
इष्टानिष्टापरिज्ञानं यत्र प्रश्नेष्वनुत्तरम् ।
दर्शनश्रवणाभावो जडिमा सोऽभिधीयते ।
अत्राकाण्डेऽपि हुंकारस्तम्भश्वासभ्रमादयः ॥
इस प्रभाव के अंत में केशव ने अनुभव की मार्मिक स्थिति का उल्लेख
किया है। इनके अनुसार आदर, लोभ तथा अतिसंग से साधुओं के चित्त भी
चंचल हो जाते हैं (देखिए ८।५६ ) ।
नवम प्रभाव में केशव ने मान के प्रसंग में नायक के मान का भी विवे-
चन किया है। यह अंश श्रृंगारतिलक में नहीं है। साहित्यदर्पण में स्थिति
स्पष्ट है—
मानः कोपः स तु द्वेधा प्रणयेर्ष्यासमुद्भवः ।
द्वयोः प्रणयमानः स्यात्प्रमोदे सुमहत्यपि ॥३।१६८
उज्ज्वलनीलमणि में कहा गया है कि
स्नेहं विना भयं न स्यान्नेर्ष्या च प्रणयं विना ।
तस्मान्मानप्रकारोऽयं द्वयोः प्रेमप्रकाशकः ॥
दशम प्रभाव में मानापनोदन के साधन 'बताए गए हैं। इनमें एक
दान भी है। केशव ने इसके प्रसंग में मार्मिक विच र की चर्चा की है। 'दान'
तो वेश्या को भी दिया जाता है। फिर अन्यों से भेद किस प्रकार किया
जायगा। उनका निर्णय है—
जहाँ लोभ तें दान लें छाँडे मानिनि मान ।
बारबधू के लच्छनँहि पावै सबहि प्रमान ॥ १०।७
इसका अर्थ यह है कि जहाँ लोभ न हो वहीं दान-उपाय ठीक होगा। इसी
प्रकार 'प्रणति' में अपराध या काम का हेतु होना आवश्यक है। बिना इसके
प्रणति रस के लिए हानिकारक होती है ( देखिए १०।१८ ) । मान छूटने
की कुछ सहज या सरल स्थितियाँ भी होती हैं। इनका उल्लेख निम्नलिखित
दोहे में है—
देस काल बुधि बचन तें कल धुनि कोमल गान ।
सोभा सुम सौगंध तें सुख हो छूटत मान ॥१०।२६
३ ( ३३ )
उज्ज्वलनीलमणि में भी देशकालादि का उल्लेख है—
देशकालबलेनैव मुरलीश्रवणेन च ।
विनाप्युपायं मानोऽसौ लीयते व्रजसुभ्रुवाम् ॥
एकादश प्रभाव में करुणविरह का निरूपण केशव ने शृंगारतिलक
से भिन्न किया है । शृंगारतिलक में वही लक्षण है जो शास्त्रीय ग्रंथों में अन्यत्र
मिलता है । इसका प्रसिद्ध उदाहरण कादंबरी में महाश्वेता का विरह है ।
शृंगारतिलक में लक्षण यों है—
यत्रैकस्मिन्विपन्नेऽन्यो मृतकल्पोऽपि तद्गतम् ।
नायकः प्रलपेत्प्रेम्णा करुणोऽसौ स्मृतो यथा ॥२।६०
पर केशव यों लिखते हैं—
छूटि जात केसव जहां सुख के सबै उपाय ।
करुनारस उपजत तहाँ आपुन तें अकुलाय ॥११।१
केशव इसके वर्णन के पक्ष में भी नहीं हैं । उनका कहना है—
सुख में दुख क्यों बरनिये यह बरनत ब्यवहार ।
तदपि प्रसंगहि पाइ कछु बरनत मति-अनुसार ॥११।२
इसका वर्णन रूप गोस्वामी ने इसलिए छोड़ दिया है कि वे इसे भी एक
प्रकार का प्रवासविरह ही मानते हैं—
विप्रलम्भपरं कैचित्करुणाभिधमूचिरे ।
स प्रवासविशेषत्वान्नैवात्र पृथगीरितः ॥
कालियदह में प्रवेश श्रादि को वे करुणविप्रलंभ के अंतर्गत मानते हैं ।
केशव ने ‘मति-अनुसार’ कुछ नया विचार किया है । यह अवश्य विचारणीय है
कि कालियदह-प्रवेश श्रादि में करुणरस माना जाए या करुणविप्रलंभ । शास्त्रीय
व्यवस्था इतनी ही है कि जब तक प्रियमिलन की आशा बनी है तब तक
विप्रलंभ है, जहाँ नैराश्य आया वह करुण हो जाएगा । केशव ने संदिग्ध स्थिति
का परित्याग कर करुणविरह का वर्णन इस आधार पर किया है कि यदि
नायिका को विरहावस्था में कोई बाधक स्थिति क्लेशकारिणी उत्पन्न हो जाए
तो करुणविप्रलंभ मानना चाहिए । यदि प्रिय के पास सखी जाए और उससे
मिलकर वहीं रह जाए और विरहिणी को उसकी ऐसी करतूत का पता चल
जाए तो वह करुणविरह है ( देखिए ११।३ ) । प्रच्छन्न करुणविरह का
उदाहरण तो ठीक बन गया है, पर प्रकाश करुणविरह में 'प्रवासविरह' ही
है । जब विरह में कोई बाधक स्थिति भी श्रालंबन हो जाती है तब करुण-
विरह होता है । कोई बाधक स्थिति उद्दीपन रहती है तो वहाँ ‘विषाद’
संचारी ही भर है । इसी से इनका ‘प्रकाश करुणविरह’ ठीक उदाहरण नहीं
जान पड़ता ( देखिए ११।४ ) ।
( ३४ )
विरह के अंतर्गत इन्होंने 'भयविभ्रम' का वर्णन भी किया है, जिसका
कोई लक्षण नहीं दिया है। स्वरूप से स्थिति यह जान पड़ती है कि जहाँ
वियोग में संयोग की सुखद वस्तुएँ दुःखदायिनी हो जाती हैं उसके वर्णन को
ये 'भयविभ्रम' कहना चाहते हैं। सरदार ने ऐसे दुःखों की खतियौनी सात
खातों में की है—
नींद सेज सुमनो सभा संगित सालि सुगंध ।
सात बियोगिन कों करत महा विरह तें अंध ॥
केशव ने केवल 'निद्रा' के उदाहरण दिए हैं। इसके अतिरिक्त 'पत्री' के
उदाहरण भी इसी के साथ दिए गए हैं।
द्वादश प्रभाव में सखी-वर्णन शृंगारतिलक के अनुसार ही है। इसमें
कुछ नाम केशव ने और बढ़ाए हैं। इन्हें सखी कहा जाए या दूती । 'दास'
दूती के अंतर्गत ही इनमें से बहुतों को रखते हैं। सखी और दूती में स्वरूपभेद
उनके स्वातंत्र्य और पारतंत्र्य के ही आधार पर हैं। सखी में फिर भी कुछ
स्वाधीनता होती है, उसकी प्रतिष्ठा विशेष होती है। हिंदी में परंपरया सखी
और दूती के कर्मों का कुछ विभाजन भी कर दिया गया है। विरहनिवेदन
दूती का कार्य हो गया है ।
त्रयोदश प्रभाव में सखी के जो कर्म बताए गए हैं उनमें वह क्रुद्ध भी
हो सकती हैं (देखिए १३।१) । पर दूती की क्या मजाल कि वह रोष कर
सके । ऐसे ही संदेश आदि भी दूती के कर्म हैं। सखी की स्थिति कुछ अधिक
परिष्कृत है। उसका सुसंस्कृत होना आवश्यक है। इसलिए जिनको सखी
कहा गया है वे सब सखी के योग्य नहीं जान पड़तीं ।
चतुर्दश प्रभाव में अन्य रसों का विवेचन है। हास्यरस के परिहास
भेद की चर्चा पहले की जा चुकी है। रसों के वर्णन का उल्लेख भी केशव ने
किया है जो शृंगारतिलक में नहीं है। देवता का उल्लेख फिर भी नहीं है।
हास्यरस में वर्ण का भी उल्लेख छूट गया है। करुणरस का लक्षण शृंगार
तिलक से भिन्न है। वहाँ लक्षण है—
'शोकात्मा करुणो ज्ञेयः प्रियमृत्युधनक्षयात्'
यहाँ है—
'प्रिय के बिप्रिय करन तें आनि करुनरस होत'
केशव ने अन्य रसों को भी राधाकृष्ण से ही संबद्ध रखना चाहा है।
इसी से इस प्रकार का लक्षण उन्हें करना पड़ा। ऐसा उदाहरणों से स्पष्ट
है । अन्य रसों की भी यही स्थिति है। इसका परिणाम यह हुआ है कि रसों
का स्वरूप पूरा स्पष्ट नहीं हो सका है। उनके स्थायी भाव. शृंगार के संचारी
( ३५ )
होकर आए हैं। समरस या शांतरस के उदाहरणों में केवल तीसरा
( १४।४० ) ठीक है।
पंचदश प्रभाव में वृत्तियों का वर्णन है। इसमें सात्वती या सात्त्वकी
वृत्ति का लक्षण शृंगारतिलक से कुछ भिन्न है। इसमें रौद्र के स्थान पर
शृंगार है। वैसा ही पाठ प्राचीन पोथियों में है। अन्यत्र 'अद्भुत बीर सिंगार
रस' के स्थान पर 'अद्भुत रुद्र रु बीर रस' पाठ भी मिलता है जो उससे
ठीक मिल जाता है।
अंतिम षोडश प्रभाव में 'अनरस-वर्णन' है। इसमें 'नीरस लक्षण' कुछ
भिन्न रखा गया है। शृंगारतिलक में 'नीरस' का लक्षण ( काव्यमाला में
मुद्रित संस्करण में) दो बार कथित है। पहले के संबंध में टिप्पणी है कि कुछ
पुस्तकों में यह नहीं मिलता। केशव ने दूसरे ( ३।५१ ) से कुछ मिलता-
जुलता लक्षण (१६।४) किया है। अंत में नित्य रसवरोध का विचार किया
है (१६।१२) और रसोत्पत्ति भी (१६।१३) नाट्यशास्त्र के अनुसार दे दी है।
भाषा
केशवदास की भाषा बुंदेली समझी जाती है, यह भ्रम है। उन्होंने
अपने ग्रंथ साहित्य को सामान्य काव्यभाषा ब्रजी में लिखे है। जो कवि जिस
प्रदेश का होता है उस प्रदेश के कुछ शब्द और प्रयोग आ ही जाते हैं।
टकसाली ब्रजभाषा लिखना उन्हीं के लिए संभव है जो व्रज प्रांत के हैं। ब्रजी
काव्यभाषा के रूप में संस्कृत की भांति स्वतंत्र रूप प्राप्त कर चुकी थी। इस-
लिए जो लोक व्रजप्रदेश के होते थे वे ही उसमें ब्रज के प्रांतीय शब्दों का
व्यवहार किया करते थे। इसलिए उनकी ब्रजभाषा कहीं कहीं और लोगों के
लिए दुरूह हो जाती थी। कल की बात है कि सत्यनारायण कविरत्न ने
जिस ब्रजी का व्यवहार किया उसमें ब्रजमंडल के बहुतेरे शब्दों का प्रयोग कर
दिया। घनानंद, ग्वाल ब्रजमंडल के कुछ ऐसे शब्दों का व्यवहार करते हैं
जो दूसरों के द्वारा प्रयुक्त नहीं होते। ठीक उसी प्रकार अवध के कवि अवधी
शब्दों और प्रयोगों का व्यवहार करते हैं, मिथिला के मैथिली के शब्दों का,
पंजाब के पंजाबी शब्दों का, राजस्थान के राजस्थानी शब्दों का, गुजरात के
गुजराती शब्दों का आदि आदि। यही स्थिति केशवदास की भी थी। उन्होंने
ब्रजी में बुंदेली शब्दों और प्रयोगों का व्यवहार आवश्यकता पड़ने पर निस्संकोच
और प्रकाम किया है। इसलिए उनकी भाषा बुंदेलीरंजित साहित्यिक ब्रजी
है। बुंदेली भाषाविज्ञान की दृष्टि से ब्रजी के ही अंतर्गत आती है। इसीलिए
बुंदेली के कुछ प्रयोग दूर तक फैल गए। भविष्यत्कालबोधक 'पालबी', 'करबी'
( ३६ )
आदि प्रयोग दूर तक फैले, यहाँ तक कि भिखारीदास की कृति में भी ये
प्रयोग पाए जाते हैं। केशवदास से पहले होनेवाले तुलसीदास ने भी ऐसे
प्रयोग किए हैं। हो सकता है कि तुलसीदास बुंदेलखंड में भी कभी रहे हों,
जिसके कारण वैसे प्रयोग उनकी कृति में आ गए हों। उनके गुरुदेव नरहर्यानंद
नर्मदातट पर कुछ दिनों के लिए गए थे । उनसे भेंट करने तुलसीदास भी
उधर गए थे और यमुना तट पर उन्होंने यमुना से विवाह कर लिया था ।
नर्मदा तक पहुँचने में बुंदेलखंड बीच में पड़ता ही था । बुंदेली में कुछ क्रियाएँ
स्वरभेद से लिखी जाती हैं—जैसे ‘छूवो’ का ‘छीबो’, ‘भूमिबो’ का ‘भीमबो’।
केशवदास की रचनाओं में दो प्रकार की भाषा स्पष्ट है। रामचंद्रचंद्रिका
और विज्ञानगीता में जिस प्रकार की भाषा है उस प्रकार की भाषा अन्य ग्रंथों
में नहीं है। इन दोनों में संस्कृत की चाशनी कुछ कड़ी मिलाई गई है। इसके
कारण पर अभी भली भाँति विचार नहीं किया गया है। केशव रामचंद्र-
चंद्रिका लिखते हुए हिंदी में संस्कृत के महाकाव्य की परंपरा प्रवर्तित कर रहे
थे । उनकी लालसा थी कि उसमें संस्कृत के नाट्यतत्त्व का भी नियोजन कर
दिया जाए, जिससे लीला के उपयोग में वह आ सके। केशव ने उसमें संवाद
नाटकीय ढंग के रखे हैं। संस्कृत में रामकथा पर अनेक नाटक हैं। उनका
श्रनुवदन, उनकी छाया का ग्रहण भी केशव ने संस्कृत वर्णवृत्तों में ही किया ।
संस्कृत के वर्णवृत्त संस्कृत भाषा की लपेट अधिक रखते हैं। यह स्थिति केशव
की रचना में ही नहीं हिंदी के सभी प्राचीन कवियों की कृतियों में दिखाई
देती है। जहाँ जहाँ संस्कृत वर्णवृत्तों का प्रयोग है वहाँ वहाँ भाषा में संस्कृत
की झोंक अधिक है। आधुनिक युग में श्रीहरिऔध ने संस्कृत वर्णवृत्तों में
प्रबंध लिखा तो प्रियप्रवास में संस्कृत का रंग अधिक चढ़ गया । हिंदी में
स्तुति के प्रसंग में भी संस्कृत का सहारा लिया जाता रहा है। इसकी झलक
तुलसीदास की विनयपत्रिका में पूरी मिलती है ।
विज्ञानगीता एक तो संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक प्रबोधचंद्रोदय के आधार
पर लिखी गई, दूसरे उसमें अन्य धार्मिक ग्रंथों से भरपूर सहायता ली गई ।
इसमें उद्धरण संस्कृत में ही प्रमाण के लिए केशव ने स्थान स्थान पर रखे हैं।
छंद भी वहाँ वर्णवृत्त ही रखा गया है। फल यह हुआ कि भाषा संस्कृतमय
हो गई । यह सत्य है कि केशव की दुरूहता का कारण संस्कृत के प्रयोगों या
शब्दों का हिंदी में रखना है। पर यह कहना ठीक नहीं है कि उनकी शक्ति कम
थी। भाषा पर उनका अधिकार रसिकप्रिया, कविप्रिया आदि ग्रंथों की उक्तियों
में स्पष्ट दिखाई देता है। इसका कारण यही है कि इन ग्रंथों में संस्कृतग्रंथों से
लक्षण के संबंध में सहायता अवश्य ली गई, पर उदाहरण हिंदी के छंदों में
( ३७ )
प्रस्तुत किए गए। उसका परिणाम यह हुआ कि भाषा में वैसी कठिनाई नहीं है
जैसी रामचंद्रचंद्रिका और विज्ञानगीता में दिखाई देती है। इन दोनों में भी
जहाँ हिंदी के छंद प्रयुक्त हैं वहाँ वैसी दुरूहता नहीं है। अपवाद ही कहीं
मिल सकता है। वस्तुतः केशव संस्कृत वर्णवृत्तों का हिंदी में प्रयोग करते
समय हिंदी भाषा उसमें बैठा नहीं पाते थे। संस्कृत के वर्णवृत्तों का ढाँचा
हिंदी के अनुकूल नहीं पड़ता। उसमें भाषा को बैठाने में शब्दों को आगे पीछे
करना पड़ता है। हिंदी में शब्द आगे पीछे होने पर ठीक से अन्वित नहीं हो
पाते। इसी से अर्थ कुछ का कुछ करना पड़ता है। एक उदाहरण लीजिए।
रामचंद्रचंद्रिका में राम अपने भाइयों के साथ भोजन करने के अनंतर 'विशुद्ध
गृह' में जा बैठे। इस पर केशव ने लिखा—
बैठे बिसुद्ध गृह अग्रज अग्र जाई । देखी बसंत ऋतु सुंदर मोवदाई ।
यह संस्कृत का हरिलीला छंद है। वसंततिलका का अंतिम वर्ण लघु कर देने
से यह छंद बनता है। हिंदी के प्रसिद्ध कोश 'हिंदीशब्दसागर' में यह अंश 'अग्रज'
शब्द के अर्थ में उद्धृत किया गया है। एक तो वहाँ 'जाई' और 'दाई' कर
के इसे पूर्ण वसंततिलका ही बना दिया गया है, दूसरे 'अग्रज' शब्द का अर्थ
'श्रेष्ठ, उत्तम' किया गया है। केशव का अन्वय यह है—'अग्रज' अग्र जाइ
बिसुद्ध गृह बैठे' । बड़े भाई राम पहले या आगे जाकर विशुद्ध गृह में बैठे ।
पर 'शब्दसागर' ने 'अग्रज' और 'अग्र' को गृह से ही संबद्ध किया । 'गृह
अग्रज' = गृह का बड़ा भाई, श्रेष्ठ गृह, उत्तम गृह । उसका अर्थ यह जान पड़ता
है— (राम) उत्तम और विशुद्ध गृह के अग्रभाग में जा बैठे। यहाँ 'गृह'
शब्द के पहले 'विशुद्ध' विशेषण पड़ा है। आगे फिर अन्य विशेषण अपेक्षित
नहीं जान पड़ता । 'विशुद्ध अग्रज गृह' दो विशेषण व्यर्थ हैं। दो विशेषणों
की अगाड़ी-पिछाड़ी कैसी—एक 'गृह' के पूर्व, दूसरी उसके उत्तर । संस्कृत
वर्णवृत्त में शब्दों के ठीक से यथास्थान न बैठने के कारण ही ऐसी बाधा हुई
है। संस्कृत में कहीं 'अग्रज' शब्द श्रेष्ठ या उत्तम अर्थ में प्रयुक्त नहीं है।
तात्पर्य यह कि केशव की रचना को समझने में भी भ्रम होता आ रहा है।
रसिकप्रिया की भाषा की प्रशंसा वे महाशय भी करते हैं जो इनकी भाषा
के कटु आलोचक हैं। इसमें इन्होंने हिंदी काव्यप्रवाह के अनुरूप सशक्त,
समर्थ, प्रांजल भाषा रखी है। सहसा इस प्रकार की भाषा केशव की रचना में
और वह भी आरंभिक रचना में कैसे आ गई। इन्होंने सब प्रकार की भाषा में
रचना करने का पर्याप्त अभ्यास किया होगा । 'रतनबावनी' की भाषा
पुरानापन अधिक लिए हुए है। वह बतलाती है कि अपभ्रंशरूप हिंदी में
पारंपरिक प्रवाह के कारण चलते रहे हैं। यह इनकी सबसे पहली रचना