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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 286 में से

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पृष्ठ 25

( २५ )
साक्षाच्चित्रे स्वप्ने स्याद्दर्शनमेवमिन्द्रजाले-वा ।
देशे काले भंग्यां साधु तदाकर्णनं च स्यात् ।। १२।३१
उज्ज्वलनीलमणि में भी दर्शन और श्रवण पृथक् हैं—
साक्षात्कृष्णस्य चित्रे च स्यात्स्वप्नादौ च दर्शनम् ।
वन्दिदूतीसखीवस्त्राद् गीतादेश्च श्रुतिर्भवेत् ।
हिंदी में 'श्रवण-दर्शन' करके दर्शन के ही चार भेद कर दिए गए हैं।
यहाँ 'दर्शन' शब्द व्यापक कर दिया गया। श्रवण द्वारा प्रियगुणादि का कीर्तन
सुनने पर भी उसके 'रूप का आनयन होता है। इसी से 'श्रवण-दर्शन' का
ग्रहण किया गया है।
पंचम प्रभाव में दंपति-चेष्टा का वर्णन है। जैसा कहा जा चुका है
इन्होंने अपेक्षित लक्षणादि का नियोजन और साथ ही वांछित विस्तार करने का
पूरा प्रयास किया है। प्रेम की अभिव्यक्ति के उपाय का नाम चेष्टा है।
प्रिय के अन्यत्र देखने पर उसकी ओर देखना, उसके देखने पर अन्यत्र देखना
आदि में केशव ने विस्तार किया—
कबहुँ श्रुतिकंडू करै आरस सों ऐंडाइ ।
केसबदास बिलास लों बारबार जमुहाइ ॥ ५।६
यह उद्भावना केशव की नहीं है, पारंपरिक है। 'शृंगारतिलक' में नहीं
है। केशव ने अवधानतापूर्वक आकलन किया है। ठीक इसी प्रकार स्वयं
दूतत्व का प्रसंग वहाँ न होने पर भी नियोजित किया गया है (देखिए ५।१३)
इस प्रभाव में इन्होंने स्पष्ट घोषणा कर दी है कि वेश्या का वर्णन क्यों नहीं
किया गया—
और जु तरुनी तीसरी क्यों बरनौं यहि ठौर ।
रस में बिरस न बरनिये कहत रसिकसिरमौर ॥ ५।३६
शास्त्रीय दृष्टि से परकीया और सामान्या में रसाभास मानते हैं। पर जैसा
पहले कह आए हैं, परकीयाभाव भक्तिप्रवाह में साधना की दृष्टि से ग्राह्य हो
गया था। इसलिए उसका तो कुछ विवेचन इन्होंने कर दिया, पर सामान्या
को 'रसाभास' भी नहीं विरस (रसहीन) कहकर परित्यक्त कर दिया।
षष्ठ प्रभाव में 'भाव' का विचार है। 'शृंगारतिलक' में यह विषय नहीं
वर्णित है। भाव का लक्षण इन्होंने यों किया है—
आनन लोचन बचन मग प्रगटत मन की बात ।
ताही सों सब कहत हैं भाव कबिन के तात ॥६।१
इसमें मन की बात अर्थात् मनोविकार को भाव कहा गया है। पर इस भाव
के पाँच प्रकार यों कहे गए हैं—