रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
( ३८ )
कही जाती है। केशव ने अपने साहित्यिक नवयौवन में अपभ्रंश या पुरानी
हिंदी में हाथ माँजा । फिर उन्होंने ब्रजी में रचना की । उसे काव्य के अनुरूप
परिष्कृत किया । अंत में संस्कृत की ओर मुड़े । यही मोड़ वे सँभाल नहीं सके ।
रसिकप्रिया की भाषा सबसे अधिक वाग्योगपूर्णा है । उसमें ब्रजी का पूर्ण
वैभव दिखाई देता है । यदि केशव इसी प्रकार की भाषा लिखते रहते तो
उनका इस क्षेत्र में विरोध न होता ।
टीकाएँ और टीकाकार
केशवदास के तीन ग्रंथों पर टीकाएँ लिखी गई हैं— रसिकप्रिया, कवि-
प्रिया और रामचंद्रचंद्रिका पर । कविप्रिया के अंतर्गत आनेवाले 'शिखनख'
के हस्तलेख पृथक् भी मिलते हैं और उसपर एक टीका भी सं० १७६२ के पूर्व
हुई है (देखिए राजस्थान में हिंदी के हस्तलिखित ग्रंथों की खोज, दूसरा भाग,
पृष्ठ १४०) । रसिकप्रिया की सबसे पुरानी टीका संस्कृत में है। टीका सं० १७१५
में की गई । टीकाकार श्रीरतनमणि के शिष्य समर्थ हैं। टीका का नाम प्रमोदिनी
है और यह सुगमार्थप्रबोधिनी है। हिंदी में रसिकप्रिया के सबसे'प्राचीन टीका-
कार सूरति मिश्र हैं। इनकी टीका का नाम रसगाहकचंद्रिका या जोरावर-
प्रकाश है। यह सं० १७६१ वि० में निर्मित हुई थी। जोधपुर के राजपुस्त-
कालय में संवत् १७६४ आश्विन बदी एकादशी रविवार का लिखा एक खंडित
हस्तलेख रसिकप्रिया सटीक नाम से संगृहीत है ( खोज— १६०२-२५६ ) ।
कहीं यह सूरति मिश्र की टीका की ही प्रतिलिपि न हो। यदि उससे भिन्न है
तो यह दूसरी टीका है। टीकाकार का नाम अज्ञात है।
इसके तीसरे टीकाकार श्रीकुशलधीर हैं जिन्होंने गुर्जर-राजस्थानी में इसकी
टीका गद्य में प्रस्तुत की । टीका का निर्माणकाल अज्ञात है, लिपिकाल
सं० १७६६ आसोज ( आश्विन ) सुदी ४ शुक्रवार है । इसके पूर्व वह कभी
अवश्य लिखी गई । पर कब ? कहना कठिन है । सूरति मिश्र की टीका के
पूर्व की भी हो सकती है। इसके चौथे टीकाकार हैं 'कासिम' ( खोज, ६-
१४७ ) । इस टीका का रचनाकाल अज्ञात है। मियाँ कासिम ने अपने को
वाजिदसुत लिखा है। ये वाजिद कौन थे ? कहा नहीं जा सकता । इसकी
पाँचवीं टीका श्रीजगतसिंह की की हुई है, जो भिनगाराज्य के राजपरिवार
के महाराजकुमार थे । इनका समय सं० १८७७ वि० के आसपास है।
दिग्विजयभूषण के रचनाकार श्रीदिग्विजयसिंह के ये पुत्र थे। इन्होंने टीका
का नाम 'जगतविलास' रखा है ( खोज, २३-१७६ एच ) । टीका गद्य में
लिखने का कारण यों लिखा है—
(9), 1!
Why does 1 look weird? Because it was a battered type or a small १ or द.
Let's look at the character after रद:
Wait, could it just be rendered as:
सिवदृग ३ गगनो ० ग्रह ६ सुपुनि रद द गनेस की साल । or superscript?
Unicode superscripts: ³, °, ⁶, द or १?
Wait, using normal characters or unicode superscripts?
Usually, transcription is best with either superscripts or normal characters matching the visual.
Let's look at:
सिवदृग³ गगनो° ग्रह⁶ सुपुनि रदद गनेस की साल ।
Wait, if a user reads it, सिवदृग ३ गगनो ० ग्रह ६ सुपुनि रद द vs सिवदृग³ गगनो° ग्रह⁶ सुपुनि रदद:
Wait, look at how it appears:
सिवदृग ३ गगनो° ग्रह ६ सुपुनि रद द गनेस की साल ।
Let's look at गगनो°: there is no space between गगनो and °.
Between सिवदृग and ३: it's slightly elevated, like सिवदृग³.
Between ग्रह and ६: it's elevated, like ग्रह⁶.
Between रद and the small mark: it's elevated, like रदद or
( ४० )
कि उस पर तिलक लिखा जाए । इस तिलक के लिखने में श्रीमोहनवल्लभजी
पंत ने आरंभ में हाथ बँटाया । पर तीन प्रभाव तक कार्य होने के अनंतर
वे अन्य कार्यगौरव से सहयोग नहीं दे सके । अपने बलबूते पर ही इसकी
परिपूति का मैंने संकल्प किया । इसकी पूति में मेरे प्रिय शिष्य श्रीबदरीप्रसाद
त्रिपाठी ने भी कुछ कार्य किया । उस समय श्री राजेंद्रप्रसाद ने इसकी प्रतिलिपि
करने में सोत्साह योग दिया ।
टीका की पद्धति लालाजी की ही रखी गई है । पर इसमें पाठांतर भी दे
दिए गए हैं । पाठांतरों के देने में किसी प्रति के नाम का उल्लेख नहीं किया
गया है । इसका प्रयोजन अनुसंधान नहीं है, आलोचना या टीका-टिप्पणी
है । इसी से केवल स्वीकृत पाठ के अतिरिक्त अन्य जितने पाठ मिले उनमें से
प्रमुख दे दिए गए हैं ।
टीका में कठिन शब्दों का अर्थ ‘शब्दार्थ’ शीर्षक से और तदनंतर सुसंगत
अर्थ ‘भावार्थ’ शीर्षक से दिया गया है । यथास्थान प्रमुख अलंकारों का निर्देश
है । ‘सूचना’ के अंतर्गत अन्य ज्ञातव्य चर्चा की गई है । जहाँ सरलता है वहाँ
केवल ‘शब्दार्थ’ दे दिया गया है
( ४१ )
निर्णय किया गया है। रसिकप्रिया के अनेक हस्तलेखों को छानकर मिलावट
को पृथक् करने का प्रामाणिक कार्य पृथक् है। इस प्रकार का कुछ प्रयास मैंने
'केशवग्रंथावली' के संपादन में किया है। यहाँ शुद्ध अनुसंधान की ही दृष्टि न
रखकर साहित्यपरंपरा, शास्त्रपरंपरा का भी कुछ विचार रखा गया है। इससे
दोनों स्थानों पर पाठ का भी भेद है और मूल में स्वीकृत छंदों का भी । पर
ऐसा क्वाचित्क है । किसी ग्रंथ का मूल पाठ टीका-टिप्पणी करते समय कहीं
अधिक स्पष्ट होता है। प्राचीन ग्रंथों के संपादन में, कोरी वैज्ञानिक पद्धति
सर्वतोभावेन ठीक नहीं जँचती । वैज्ञानिक पद्धति जड़ यंत्र का सा कार्य है ।
साहित्यिक विवेचन चेतनतत्त्व है । दोनों के योग से ही मूल सत्ता की पूर्ण
अभिव्यक्ति हो सकती है । कोई एक प्रणाली पूर्ण नहीं है ।
अधिक या अतिरिक्त छंदों के भी पाठांतर रहे हैं तो दे दिए गए हैं।
अलंकार-निर्देश में केशव के मत से जो अलंकार बनता है उसका भी यथा-
संभव उल्लेख किया गया है। रसिकप्रिया के कुछ छंद कविप्रिया में भी रखे
गए हैं। इनकी यथास्थान सूचना दी गई है। कहीं कहीं अनावश्यक विस्तार
बचाने के लिए अन्य टीकाकारों के शंका-समाधान का विवरण नहीं दिया गया ।
इतना ही बता दिया गया है कि यहाँ अनेक शंका-समाधान किए गए हैं ।
कहीं पाठांतरों के अनुसार यदि कोई प्रकृष्ट अर्थ संभावित हुआ है तो सूचना
के अंतर्गत उसका भी उल्लेख किया गया है।
कहने का तात्पर्य यह कि अपनी विद्याबुद्धि के अनुसार जो भी अपेक्षित
समझा गया सबका संकलन है। संख्या प्रत्येक प्रभाव की पृथक् भी है और
आदि से अंत तक क्रमबद्ध भी। अंत में प्रतीकानुक्रम है, प्रारंभ में विषयक्रम ।
भूमिका में अनेक ज्ञातव्य तथ्य हैं ।
विभिन्न हस्तलेख
'रसिकप्रिया' और उसकी टीका के जितने हस्तलेखों का उल्लेख हस्तलिखित
हिंदी-ग्रंथों के विवरणों में आया है तथा विभिन्न पुस्तकालयों में इनके जितने
हस्तलेख सुरक्षित हैं उनका निर्देश नीचे किया जाता है। प्रस्तुत संस्करण के
पाठ के लिए मुख्य रूप से दो हस्तलेखों का तथा दो प्रमुख टीकाओं का आधार
रखा गया है। दोनों हस्तलेख स्वर्गीय बाबू राधाकृष्णदासजी के सुपुत्र
श्रीबालकृष्णदासजी उपनाम बल्लीबाबू से प्राप्त हुए । एक हस्तलेख खंडित है,
उसमें लिपिकाल का उल्लेख नहीं है। दूसरा पूर्ण है और उसका लिपिकाल
सं० १७२२ है । इससे प्राचीन किसी हस्तलेख का पता नहीं चलता । खंडित
प्रति कुछ समय बाद का हस्तलेख जान पड़ती है, उसकी शाखा पूर्ण प्रति से
( ४२ )
भिन्न है । टीकाओं में से सूरति मिश्र की टीका अप्रकाशित है । उनकी
इस रसगाहकचंद्रिका टीका का हस्तलेख मेरे प्रिय शिष्य श्रीलक्ष्मीशंकरजी
व्यास से प्राप्त हुआ है । पहली टीका पद्य में है दूसरी पुराने गद्य में । यद्यपि
पाठनिर्णय करने में बहुत सावधानी रखी गई है तथापि यत्रयत्र कुछ मतभेद
की संभावना है । अनेकविध कार्यों में लगे रहने से तथा दृष्टि में मांद्य आ
जाने से कुछ त्रुटियाँ संभावित हैं । उनके लिए क्षमार्थी हूँ ।
रसिकप्रिया—
१ पूर्ण । लिपिकाल—सं० १७२२ प्राप्तिस्थान—श्रीबालकृष्णदासजी भार-
तेंदुभवन, चौखंभा, वाराणसी ।
२ खंडित । लिपि०— × । प्राप्ति०—श्रीबालकृष्णदासजी, भारतेंदु-भवन,
चौखंभा, वाराणसी ।
३ पूर्ण । प्राप्ति०—काशिराज का पुस्तकालय ।
हस्तलिखित हिंदी-ग्रंथों का विवरण (काशी नागरीप्रचारिणी सभा)
४ (०३-८६) । पूर्ण । लिपि- × । प्राप्ति०-काशिराज का पुस्तकालय ।
५ (०४-१२८) । पूर्ण । लिपि०-सं० १८१४ । प्राप्ति०-उल्लिखित नहीं है ।
६ (१७-६६ ए) । पूर्ण । लिपि०- × प्राप्ति०-सेठ चंद्रशेखर, अनूपशहर,
जिला बुलंदशहर ।
७ (१७-६६ बी) खंडित । लिपि०- × । प्राप्ति०-श्रीदेवकीनंदनाचार्य
पुस्तकालय, कामवन, भरतपुर ।
८ (२०-८२ सी) खंडित लिपि०-सं १७७४ । प्राप्ति०-पं० महावीरप्रसाद
दीक्षित, मुहल्ला चंदनियाँ, फतेहपुर ।
६ (२६-२.७ आई) । खंडित । लिपि०- × । प्राप्ति-पं० शंभूनाथ, गाँव
बबुरी, डा० अलीगंज बाजार (सुलतानपुर) ।
१० (२६-१३३ एफू) । पूर्ण । लिपि० सं० १७३७ । प्राप्ति-आनंदभवन
पुस्तकालय, डा० बिसर्वां, जिला सीतापुर ।
११ (२६-१६२ एफू) । पूर्ण । लिपि०-सं० १६०८ । प्राप्ति०-पं० उलफतरी
बसायक नवीस, फतहाबाद, जिला आगरा ।
'सभा'-संग्रह
१२ (६१-२६) । खंडित । प्रति से संलग्न उसी हस्तलिपि में लिखी 'बिहारी-
सतसई' की पुष्पिका में लिपिकाल सं० १७७४ अंकित है ।
१३ (६१-३०) । खंडित । लिपि०-सं० १८३६ ।
१४ (४३४-३८२) पूर्ण ? पत्र १-२०८ । लिपि०- × ।
( ४१ )
१५ (५५२-३६७) । खंडित । लिपि०-सं० १७८६ ।
१६ (१५६४-६१३) । खंडित । लिपि०-सं० १७८७ ।
१७ (१२०१-७८५) । पूर्ण ? । पत्र १-१२८ । लिपि०- × ।
१८-(२७०२-१६२०) । खंडित । लिपि०- × ।
याज्ञिक-संग्रह
१६ (७३-६) खंडित । लिपि०- × ।
२० (२०२-६) । खंडित । लिपि०- × ।
२१ (२०३-६) । खंडित । लिपि०- × ।
२२ (७१-६) । खंडित । लिपि०- × ।
२३ (१६-६) पूर्ण । लिपि०-१८६८ वि० ।
राजस्थान में हिंदी के हस्तलिखित ग्रंथों की खोज
२४ (प्रथम भाग, १०७) पूर्ण । लिपि०-सं० १७०४ । प्राप्ति०-सज्जन-वाणी-
विलास, उदयपुर ।
२५ (तृतीय भाग, ५३) पूर्ण ? । प्राप्ति०-सरस्वती-भंडार, भींडर ।
२६ (तृतीय भाग, ५३) । पूर्ण ? । प्राप्ति०-राव मोहनसिंह, उदयपुर ।
प्राचीन हस्तलिखित पोथियों का विवरण (बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्, पटना
२७ (दूसरा खंड, ५ ) । पूर्ण । लिपि०-सं० १८६७ । प्राप्ति०-श्रीमन्नूलाल
पुस्तकालय, गया ।
२८ (दूसरा खंड, ५७) । पूर्ण । लिपि०-सं० १६१६ । प्राप्ति०-श्री मन्नूलाल
पुस्तकालय, गया ।
सरस्वती-भवन, संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
२६ नवीन संग्रह संख्या २; वेष्ठन नं० ७५ । संपूर्ण । लिपि० सं० १७३६ ।
३० नवीन संग्रह संख्या ३; वे० नं० ६८ । संपूर्ण । लिपि०-सं० १८२१ ।
३१ नवीन संग्रह संख्या १०; क्रम सं० २५०७; वे० नं० १३७ । संपूर्ण लिपि०- × ।
३२ आधुनिक प्रथम संग्रह; क्रम सं० ६२८; वे० नं० ६७ । अपूर्ण । लिपि०- × ।
३३ द्विवेदी संग्रह; क्रम सं० ८०३६ । अपूर्ण । लिपि०- × ।
३४ १८७४ । अपूर्ण । लिपि०- × ।
दि सेंसस आव् इंडिक मैनस्क्रिप्टस्
३५ (५८२६) लिपि०-सं० १७७६ । प्राप्ति०-न्यूयार्क पब्लिक लाइब्रेरी,
न्यूयार्क सिटी ।
३६ (५८२७) प्राप्ति०-हारवर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी, कैंब्रिज (१६८५)
३७ (५८२८) खंडित । लिपि०-१७ वीं शताब्दी । प्राप्ति०-मेट्रोपोलिटन
म्यूजियम आव् आर्ट, न्यूयार्क सिटी ।
( ४४ )
३८ (५८२६) । प्राप्ति०-हारवर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी, कैंब्रिज (१६८६) ।
३६ (५८३०) लिपि०-सं० १७४३ । प्राप्ति० हारवर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी,
कैंब्रिज (१७०७) ।
४० (५८३१) लिपि०-सं० १८१६ । प्राप्ति०-हारवर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी,
कैंब्रिज (११६२) ।
रसिकप्रिया-टीका
१ पूर्ण । लिपि०- x । प्राप्ति०-श्रीलक्ष्मीशंकरजी व्यास, दंडपाणि की गली,
वाराणसी । 'रसग्राहकचंद्रिका' सूरति मिश्र की टीका ।
हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों का विवरण ( काशी नागरीप्रचारिणी सभा ) ।
२ (०२-२५६) । खंडित । लिपि० सं० १७६४ । प्राप्ति०-जोधपुरराज का
पुस्तकालय ।
३ (०२-२६०) प्राप्ति०-जोधपुरराज का पुस्तकालय ।
४ (०४-५७) । पूर्ण । प्राप्ति०-काशिराज का पुस्तकालय । सरदार कवि
की 'सुखविलासिका' टीका ।
५ (०६-२४३ ए) लिपि०-सं० १८६६ । प्राप्ति०- चरखारीराज का पुस्त-
कालय । सूरति मिश्र की 'रसगाहकचंद्रिका' टीका ।
६ (०६-२४२ डी) । लिपि०-सं० १८८७ । प्राप्ति०-लाला विद्याधर,
होरीपुरा, दतिया । सूरति मिश्र की 'जोरावरप्रकाश' टीका ।
७ (०६-१४७) पूर्ण । प्राप्ति०- उल्लिखित नहीं है । टीकाकार-कासिम,
वाजिद के पुत्र ।
८ (१७-१८६ ए) पूर्ण । लिपि०-सं० १६१८ । प्राप्ति०-रमणलाल हरीचंद
चौधरी, बाजार कोसी (मथुरा) । सूरति मिश्र की 'जोरावरप्रकाश' टीका ।
९ (२३-१७६ एच्) । प्राप्ति० महाराज राजेंद्रबहादुरसिंह, भिनगाराज,
बहराइच ।
१० (२३ १७६ आई) । प्राप्ति०-बा० पद्मबक्ससिंह, लवेदपुर, बहराइच ।
११ (२३-१७६ जे) । खंडित । प्राप्ति०-बा० पद्मबक्ससिंह, लवेदपुर,
बहराइच ।
१२ (२६-४७४ जी) । खंडित । लिपि०-सं० १७६१ । प्राप्ति०-श्रीबलवंत
सिंह । सूरति मिश्र की 'रसगाहकचंद्रिका' टीका ।
१३ (२६-४७४ एफू) । प्राप्ति० श्रीहनुमानसिंह, ग्राम गोधनी, डा० जयतिपुर,
जिला उन्नाव ।
१४ (२६-१६२ ए) । खंडित । लिपि० सं० १८६६ । प्राप्ति०-श्रीमहाराजा प्रकाश-
( ४५ )
सिंह, मल्लापुर जिला सीतापुर । राजा जगतसिंह की 'जगतविलास' टीका ।
राजस्थान में हिंदी के हस्तलिखित ग्रंथों की खोज
१५ (प्रथम भाग, १०८) । लिपि०-सं० १७६६ । टीकाकार-कुशलधीर ।
टीका राजस्थानी भाषा में है । प्राप्ति०-सरस्वती-भंडार, उदयपुर ।
१६ (प्रथम भाग, १०९) । पूर्ण । लिपि०-महाराणा शंभुसिंहजी के राज्य-
काल में आरंभ तथा महाराजा सज्जनसिंहजी के राज्यकाल में समाप्त ।
सूरति मिश्र की 'जोरावरप्रकाश' टीका । सचित्र । प्राप्ति०-सज्जन-वाणी-
विलास, उदयपुर ।
१७ (द्वितीय भाग, पृष्ठ १३७) । संस्कृत टीका । टीकाकार-समर्थ । रचनाकाल-
सं० १७५५ । लिपि०-१७६६ । प्राप्ति०-दानसागर भंडार, बीकानेर ।
१८ (तृतीय भाग, ५४) । लिपि० सं० १८२६ । सूरति मिश्र की 'जोरावर-
प्रकाश' टीका । प्राप्ति०-राव मोहनसिंह, उदयपुर ।
सरस्वती-भवन, संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
१९ (२५६६) । अपूर्ण । लिपि०- × । सरदार कवि की टीका ।
'सभा'-संग्रह
२० (६२६-४४८) । खंडित । सूरति मिश्र और सरदार कवि की टीका से भिन्न ।
२१ (६२५-४४७) । खंडित । लिपि०-सं० १७९१ सूरति मिश्र की 'रसगाहक-
चंद्रिका' टीका ।
( ४६ )
कृतज्ञता-प्रकाश
‘रसिकप्रिया’ के इस ‘तिलक’ के सँजोने में कई हाथ लगे । बंधुवर
श्रीमोहनवल्लभ पंत, शिष्यवर श्रीबदरीप्रसाद त्रिपाठी और श्रीराजेंद्रप्रसाद का
नामोल्लेख हो चुका है । इधर मेरे प्रिय शिष्य श्रीरामबली पांडेय ने प्रतीकानु-
क्रमणी प्रस्तुत की । इसके संधान में कई अनुसंधानकों ने भी योग दिया—
प्रस्तावना के कुछ अंश के वाग्लेखन में श्रीगोवर्धनलाल उपाध्याय ने, अनुलेखन
में श्रीरामदास ने, ग्रंथों के संकलन में श्रीभाग्यनाथ दुबे ने और सामग्री-संग्रह
में चिरंजीवी श्रीचंद्रशेखर मिश्र ने । इसके प्रस्तुत करने में अनेक हस्तलेखों
और नानाविध संबद्ध वाङ्मय का आलोड़न करना पड़ा है । मुख्य सहायता
श्रीबालकृष्णदासजी ने की जिन्होंने इसके प्राचीनतम हस्तलेख देकर पाठ-
निर्णय का मार्ग अकंटकाकीर्ण किया । साथ ही श्रीलक्ष्मीशंकरजी व्यास ने
श्रीदीनदयाल गिरि के प्रशिष्य और श्रीदंपतिकिशोरजी के शिष्य श्रीचुन्नी-
लालजी के संग्रह से ‘रसगाहकचंद्रिका’ का हस्तलेख देकर अर्थनिर्णय में
अमूल्य सहायता पहुँचाई । विभिन्न पुस्तकालयों में मेरे शिष्यों को और मुझे
अनेक प्रकार की सुविधाएँ मिली हैं । सबसे अधिक सहृदयता श्रीकृष्णजी पंत
ने दिखाई, जिन्होंने वांछित पुस्तकें यथोप्सित अवधि के लिए देकर कार्य के
संपन्न में सहयोग किया । हस्तलेखों के लेखकों, स्वामियों तथा पुस्तकालय के
अध्यक्षों-निरीक्षकों सभी उपकारकों के प्रति मैं अपनी विनम्रतापूर्ण कृतज्ञता
प्रकाशित करता हूँ । अंत में अपने स्वर्गीय गुरुदेव लाला भगवानदीनजी
का प्रणतिपूर्वक स्मरण करता हूँ जिनकी आत्मा के परितोष के लिए ही
यह संभार किया गया है ।
वाणी-वितान भवन ⎫
ब्रह्मनाल, वाराणसी-१ ⎬ विश्वनाथप्रसाद मिश्र
रंगभरी, २०१५ ⎭
अनुक्रमणिका
विषय छंदसंख्या विषय छंदसंख्या
१ ३
मंगलाचरण १ नायिका-जाति-वर्णन १
गणेशवंदना १ पद्मिनी २-४
श्रीकृष्णवंदना २ चित्रिणी ५-७
कबिवर्णन ३-१० शंखिनी ८-१०
निर्माणकाल ११ हस्तिनी ११-१३
ग्रंथहेतु १२-१४ नायिका के अन्य भेद १४
नवरसवर्णन १५-१६ स्वकीया १५
श्रृंगाररस लक्षण १७ स्वकीया-भेद १६
श्रृंगार के भेद १८ मुग्धा-भेद १७
प्रच्छन्नसंयोग १६-२० नवलवधू १८-१६
प्रकाश संयोग और प्रकाश नवयौवनभूषिता २०-२१
वियोग लक्षण २१ नवलअनंगा २२-२३
प्रकाश-संयोग २२ लज्जाप्रायारति २४-२५
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न वियोग २३ मुग्धाशयन २६-२७
श्रीराधिकाजू को प्रकाश मुग्धा को सुख २८-२६
वियोग २४-२५ मुग्धा को मान ३०-३१
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न वियोग २६ मध्या के चतुर्भेद ३२
श्रीकृष्णजू को प्रकाश वियोग २७ आरूढ़यौवना ३३-३४
उपसंहार २८ प्रगल्भवचना ३५-३६
२ प्रादुर्भूतमनोभवा ३७-३८
साधारण नायक लक्षण १ सुरतविचित्रा ३६-४०
नायक के भेद २ सात बहिर्रति ४१
अनुकूल ३-६ सात अंतररति ४२
दक्षिण ७-१० षोडश श्रृंगार ४३
शठ ११-१३ सुरतांत ४४
धृष्ट १४-१७ मध्याधीरादि भेद ४५
उपसंहार १८ धीरादि-लक्षण ४६
( ४८ )
| विषय | छंदसंख्या | विषय | छंदसंख्या |
|---|---|---|---|
| धीरा | ४७ | श्रीकृष्णजू को प्रकाश चित्रदर्शन | ११ |
| अधीरा | ४८ | स्वप्नदर्शन-लक्षण | १२ |
| धीराधीरा | ४६ | श्रीराधिकाजूको प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन | १३ |
| प्रौढ़ा-भेद चतुर्विध | ५० | श्रीकृष्णजूको प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन | १४ |
| समस्तरसकोविदा | ५१-५२ | श्रीराधिकाजूको प्रच्छन्न श्रवण | १५ |
| विचित्रविभ्रमा | ५३-५४ | श्रीराधिकाजूको प्रकाश श्रवण | १६ |
| आक्रामितनायका | ५५-५६ | श्रीकृष्णजूको प्रच्छन्न श्रवण | १७ |
| लब्धायति | ५७-५८ | श्रीकृष्णजूको प्रकाश श्रवण | १८ |
| प्रौढ़ा-धीरा-लक्षण | ५६ | उपसंहार | १६ |
| प्रौढ़ा सादरा धीरा | ६० | ५ - | |
| आकृतिगुप्ता | ६१-६२ | दंपति-चेष्टा-वर्णन | १ |
| प्रौढ़ा अधीरा | ६३-६४ | श्रीराधिकाजू की सखी को वचन कृष्णप्रति | २ |
| प्रौढ़ा धीराधीरा | ६५-६६ | ||
| परकीया-लक्षण | ६७ | श्रीकृष्णजू को वचन राधिका की सखी प्रति | ३ |
| परकीया के भेद | ६८ | ||
| ऊढ़ा-अनूढ़ा-लक्षण | ६६ | चेष्टा-लक्षण | ४-८ |
| ऊढ़ा | ७० | श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न चेष्टा | ६ |
| अनूढ़ा | ७१ | श्रीराधिकाजू की प्रकाश चेष्टा | १० |
| अनूढ़ा-ऊढ़ा-वचन-लक्षण | ७२ | श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न चेष्टा | ११ |
| ऊढ़ा-वचन | ७३ | श्रीकृष्णजू की प्रकाश चेष्टा | १२ |
| उपसंहार | ७४ | स्वयंदूतत्व-लक्षण | १३ |
| ४ | श्रीराधिकाजूको प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व | १४ | |
| दर्शन-लक्षण | १ | श्रीराधिकाजू को प्रकाश स्वयंदूतत्व | १५ |
| दर्शन के भेद | २ | श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व | १६ |
| साक्षात् दर्शन | ३ | श्रीकृष्णजू को प्रकाश स्वयंदूतत्व | १७-१८ |
| श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न साक्षात् | ४ | ऊढ़ा को प्रियमिलन | १६-२१ |
| श्रीराधिकाजू को प्रकाश साक्षात् | ५ | अनूढ़ा की लज्जा | २२-२३ |
| श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न साक्षात् | ६ | प्रथम-मिलनस्थान | २४-२५ |
| श्रीकृष्णजू को प्रकाश साक्षात् | ७ | जनी के घर को मिलन | २६ |
| श्रीराधिकाजू कों प्रच्छन्न चित्रदर्शन | ८ | सहेली के घर को मिलन | २७ |
| श्रीराधिकाजू को प्रकाश चित्रदर्शन | ६ | धाइ के घर को मिलन | २८ |
| श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न चित्रदर्शन | १० |
४ ( ४६ )
विषय छंदसंख्या विषय छंदसंख्या
सूने घर को मिलन २६ मद हाव २७
निशि चार को मिलन ३० श्रीराधिकाजू को मद हाव २८
अति भय को मिलन ३१ श्रीकृष्णजू को मद हाव २६
उत्सव को मिलन ३२ विभ्रम हाव ३०
व्याधि मिस को मिलन ३३ श्रीराधिकाजू को विभ्रम हाव ३१
न्योते के मिस को मिलन ३५ श्रीकृष्णजू को विभ्रम हाव ३२
वन-विहार के मिस को मिलन ३५ विहृत हाव ३३
जलविहार को मिलन ३६-३७ श्रीराधिकाजू को विहृत हाव ३४
उपसंहार ३८-४१ श्रीकृष्णजू को विहृत हाव ३५
६ विलास हाव ३६
भाव-लक्षण १ श्रीराधिकाजू को विलास हाव ३७
भाव के भेद २ श्रीकृष्णजू को विलास हाव ३८
विभाव-वर्णन ३ किलकिंचित हाव ३६
विभाव के भेद ४-५ श्रीराधिकाजू को किलकिंचित हाव ४०
आलंबन-स्थान ६ श्रीकृष्णजू को किलकिंचित हाव ४१
उद्दीपन ७ बिब्बोक हाव ४२
अनुभाव ८ श्रीराधिकाजू को बिब्बोक हाव ४३
स्थायी भाव ९ श्रीकृष्णजू को बिब्बोक हाव ४४
सात्त्विक भाव १० विच्छित्ति हाव ४५
व्यभिचारी भाव ११ श्रीराधिकाजू को विच्छित्ति हाव ४६
व्यभिचारी नाम १२-१४ श्रीकृष्णजू को विच्छित्ति हाव ४७
हाव-लक्षण १५ मोट्टाइत हाव ४८
हाव के प्रकार १६-१७ श्रीराधिकाजू को मोट्टाइत हाव ४६
हेला हाव १८ श्रीकृष्णजू को मोट्टाइत हाव ५०
श्रीराधिकाजू को हेला हाव १६ कुट्टमित हाव ५१
श्रीकृष्ण को हेला हाव २० श्रीराधिकाजू को कुट्टमित हाव ५२
लीला हाव २१ श्रीकृष्णजू को कुट्टमित हाव ५३
श्रीराधिकाजू को लीला हाव २२ बोधक हाव ५४
श्रीकृष्णजू को लीला हाव २३ श्रीराधिकाजू को बोधक हाव ५५
ललित हाव २४ श्रीकृष्णजू को बोधक हाव ५६
श्रीराधिकाजू को ललित हाव २५ उपसंहार ५७
श्रीकृष्णजू को ललित हाव २६
( ५० )
विषय छंदसंख्या विषय छंदसंख्या
७ स्वकीया-परकीया के अन्य भेद ३३
अष्टनायिका-वर्णन १ नायिका के समस्त भेद ३४
अष्टनायिका-नाम २-३ उत्तमा ३५-३६
स्वाधीनपतिका ४ मध्यमा ३७-३८
प्रच्छन्न स्वाधीनपतिका ५ अधमा ३६-४०
प्रकाश स्वाधीनपतिका ६ नायक-नायिका-भेद के तत्त्व ४१
उत्का ७ अगम्या नायिका ४२-४३
प्रच्छन्न उत्का ८ उपसंहार ४४
प्रकाश उत्का ६ ८
वासकसज्जा १० विप्रलंभ शृंगार १
प्रच्छन्न वासकसज्जा ११ विप्रलंभ शृंगार के भेद २
प्रकाश वासकसज्जा १२ पूर्वानुराग ३
अभिसंधिता १३ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न पूर्वानुराग ४
प्रच्छन्न अभिसंधिता १४ श्रीराधिकाजू को प्रकाश पूर्वानुराग ५
प्रकाश अभिसंधिता १५ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न पूर्वानुराग ६
खंडिता १६ श्रीकृष्णजू को प्रकाश पूर्वानुराग ७
प्रच्छन्न खंडिता १७ दशदशा-वर्णन ८
प्रकाश खंडिता १८ दशदशा-नामकथन ६
प्रोषितपतिका १६ अभिलाष १०
प्रच्छन्न प्रोषितपतिका २० श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न अभिलाष ११
प्रकाश प्रोषितपतिका २१ श्रीराधिकाजू को प्रकाश अभिलाष १२
विप्रलब्धा २२ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न अभिलाष १३
प्रच्छन्न विप्रलब्धा २३ श्रीकृष्णजू को प्रकाश अभिलाष १४
प्रकाश विप्रलब्धा २४ चिंता १५
अभिसारिका २५ श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न चिंता १६
स्वकीया अभिसारिका २६ श्रीराधिकाजू की प्रकाश चिंता १७
प्रच्छन्न प्रेमाभिसारिका २७ श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न चिंता १८
प्रकाश प्रेमाभिसारिका २८ श्रीकृष्णजू की प्रकाश चिंता १६
प्रच्छन्न गर्वाभिसारिका २६ गुणकथन २०
प्रकाश गर्वाभिसारिका ३० श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न गुणकथन २१
प्रच्छन्न कामाभिसारिका ३१ श्रीराधिकाजू को प्रकाश गुणकथन २२
प्रकाश कामाभिसारिका ३२ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न गुणकथन २३
श्रीकृष्णजू को प्रकाश गुणकथन २
( ५१ )
विषय छंदसंख्या विषय छंद संख्या
स्मृति २५ मान के भेद २
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न स्मृति २६ गुरुमान ३
श्रीराधिकाजू की प्रकाश स्मृति २७ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न गुरुमान
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न स्मृति २८ चित्र-दर्शन तें ४
श्रीकृष्णजू की प्रकाश स्मृति २९ श्रीराधिकाजू को प्रकाश गुरुमान
उद्वेग ३० श्रवण तें ५
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न उद्वेग ३१ नायक को गुरुमान-लक्षण ६
श्रीराधिकाजू को प्रकाश उद्वेग ३२ श्रीकृष्ण को प्रच्छन्न गुरुमान ७
श्रीकृष्णजू कों प्रच्छन्न उद्वेग ३३ श्रीकृष्ण को प्रकाश गुरुमान ८
श्रीकृष्णजू को प्रकाश उद्वेग ३४ लघुमान ९
प्रलाप ३५ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न लघुमान १०
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न प्रलाप ३६ श्रीराधिकाजू को प्रकाश लघुमान ११
श्रीराधिकाजू को प्रकाश प्रलाप ३७ प्रिय को लघुमान-लक्षण १२
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न प्रलाप ३८ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न लघुमान १३
श्रीकृष्णजू को प्रकाश प्रलाप ३९ श्रीकृष्णजू को प्रकाश लघुमान १४
उन्माद ४० मध्यममान १५
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न उन्माद ४१ श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न मध्यममान १६
श्रीराधिकाजू को प्रकाश उन्माद ४२ श्रीराधिकाजू को प्रकाश मध्यममान १७
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न उन्माद ४३ प्रिय को मध्यममान-लक्षण १८
श्रीकृष्णजू को प्रकाश उन्माद ४४ श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न मध्यममान १९
व्याधि ४५ श्रीकृष्णजू को प्रकाश मध्यममान २०
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न व्याधि ४६ उपसंहार
श्रीकृष्णजू की प्रकाश व्याधि ४७ १०
जड़ता ४८ मानमोचन-लक्षण
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न जड़ता ४९ मानमोचन-उपाय
श्रीराधिकाजू की प्रकाश जड़ता ५० साम उपाय
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न जड़ता ५१ श्रीराधिकाजू को साम उपाय ४
श्रीकृष्णजू की प्रकाश जड़ता ५२ श्रीकृष्णजू को साम उपाय ५
मरण ५३ दान उपाय ६-७
उपसंहार ५४-५७ श्रीराधिकाजू को दान उपाय ८-९
९ श्रीकृष्णजू को दान उपाय १०
मान-लक्षण १ भेद उपाय ११
( ५२ )
विषय छंद संख्या विषय छंदसंख्या
श्रीराधिकाजू को भेद उपाय १२ श्रीराधिकाजू की निद्रा १४
श्रीकृष्णजू को भेद उपाय १३ श्रीकृष्णजू की निद्रा १५
प्रणति उपाय १४ श्रीराधिकाजू की सखीकी पत्री १६-१७
श्रीराधिकाजू की प्रेम तें प्रणति १५ श्रीकृष्णजू की सखी की पत्री १८
श्रीराधिकाजू की अति काम उपसंहार १९
तें प्रणति १६ १२
प्रणति में रसहानि १८ सखी-वर्णन १-२
श्रीकृष्णकी प्रणति अति हिततें १९ धाइ को वचन राधिका सों ३
उपेक्षा २० धाइ को वचन श्रीकृष्ण सों ४
श्रीराधिकाजू की उपेक्षा २१ जनी को वचन राधिका सों ५
श्रीकृष्णजू की उपेक्षा २२ जनी को वचन श्रीकृष्ण सो ६
प्रसंगविध्वंस २३ नाइनि को वचन राधिका सों ७
श्रीराधिकाजू को प्रसंगविध्वंस २४ नाइनि को वचन श्रीकृष्ण सों ८
श्रीकृष्णजू को प्रसंगविध्वंस २५ नटी को वचन राधिका सों ९
मानमोचन-हेतु २६-२७ नटी को वचन श्रीकृष्ण सों १०
उपसंहार २८-३३ परोसिन को वचन राधिका सों ११
११ परोसिन को वचन श्रीकृष्ण सों १२
करुणाविरह १-२ मालिन को वचन राधिका सों १३
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न मालिन को वचन श्रीकृष्ण सों १४
करुणाविरह ३ बरइनि को वचन राधिका सों १५
श्रीराधिकाजू को प्रकाश बरइनि को वचन श्रीकृष्ण सों १६
करुणाविरह ४ शिल्पिनी को वचन राधिका सो १७
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न करुणाविरह ५ शिल्पिनी को वचन श्रीकृष्ण सों १८
श्रीकृष्णजू को प्रकाश करुणाविरह ६ चुरिहेरिन को वचन राधिका सों १९
प्रवासविरह ७ चुरिहेरिन को वचन श्रीकृष्ण सों २०
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न सुनारिन को वचन राधिका सों २१
प्रवासविरह ८ सुनारिन को वचन श्रीकृष्ण सों २२
श्रीराधिकाजू को प्रकाश रामजनी को वचन राधिका सों २३
प्रवासविरह ९ रामजनी को वचन श्रीकृष्ण सों २४
श्रीराधिकाजू को विरहभयविभ्रम १० संन्यासिनि को वचन राधिका सों २५
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न प्रवास विरह ११ संन्यासिनि को वचन श्रीकृष्णसों २६
श्रीकृष्णजू को विरहभय-विभ्रम १३ पटइनि को वचन राधिका सों २७-२८
( ५३ )
विषय छंदसंख्या विषय छंदसंख्या
पटइनि को वचन श्रीकृष्ण सों २६ कृष्ण को अतिहास १४
उपसंहार ६० परिहास-लक्षण १५
१३ राधा को परिहास १६
सखीजन-कर्म १ कृष्ण को परिहास १७
राधिका सों शिक्षा २ करुणरस-लक्षण १८
कृष्ण की शिक्षा ३ श्रीराधिकाजू को करुणरस १६
राधा सों विनय ४ श्रीकृष्णजू को करुणरस २०
कृष्ण सों विनय ५ रौद्ररस-लक्षण २१
राधा को मनाइबो ६-७ श्रीराधिकाजू को रौद्ररस २२
कृष्ण को मनाइबो ८ श्रीकृष्णजू को रौद्ररस २३
राधा को मिलैबो ६-११ वीररस-लक्षण २४
कृष्ण को मिलैबो १२ श्रीराधिकाजू को वीररस २५
राधिका को श्रृंगार १३ श्रीकृष्णजू को वीररस २६
कृष्ण को शृंगार १४ भयानकरस-लक्षण २७
राधा को झुकिबो १५-१६ श्रीराधिकाजू को भयानकरस २८
कृष्ण को झुकिबो १७ श्रीकृष्णजू को भयानकरस २६
राधिका सों उराहनो १८ बीभत्सरस-लक्षण ३०
कृष्ण को उराहनो १६ श्रीराधिकाजू को वीभत्सरस ३१
राधावचन सखी सों २० श्रीकृष्णजू को वीभत्सरस ३२
उपसंहार २१-२२ अद्भुतरस-लक्षण ३३
१४ श्रीराधिकाजू को अद्भुतरस ३४-३५
हास्यरस-लक्षण १ श्रीकृष्णजू को अद्भुतरस ३६
हास्यरस के भेद २ शमरस-लक्षण ३७
मंदहास-लक्षण ३ श्रीराधिकाजू को शमरस ३८
ग्रंथविस्तार-भय ४ श्रीकृष्णजू को शमरस ३६-४०
राधिका को मंदहास ५-६ उपसंहार ४१
कृष्ण को मंदहास ७ १५
कलहास-लक्षण ८ वृत्ति-वर्णन १
राधिका को कलहास ६-१० कैशिकी २-३
कृष्ण को कलहास ११ भारती ४-५
अतिहास-लक्षण १२ आरभटी ६-७
राधिका को अतिहास १३ सात्वती ८-६
उपसंहार १०
( ५४ )
विषय छंदसंख्या विषय छंदसंख्या
१६
अनरस-वर्णन १ पात्रादुष्ट १०-११
प्रत्यनीक २-३ रस-बैर १२
नीरस ४-५ रसोत्पत्ति-क्रम १३
विरस ६-७ भूल-सुधार-प्रार्थना १४
दुःसंधान ८-६ फलश्रुति १५-१६
रसिकप्रिया
प्रथम प्रभाव
अथ मंगलाचरण
(१) गणेशवंदना ( छप्पय )
एकरदन गजबदन, सदनबुधि, मदनकदनसुत ।
गौरिनंद आनंदकंद जगबंद, चंदजुत ।
सुखदायक दायक सुकीर्ति जगनायक-नायक ।
खलघायक घायक दरिद्र सब लायक-लायक ।
गुरु गुनअनंत भगवंत भव भगतिवंत-भवभयहरन ।
जय केसवदास निवासनिधि लंबोदर असरनसरन ।१।
प्रियाप्रसाद तिलक
शब्दार्थ—एकरदन = एक दाँतवाले । वदन = मुख । सदनबुधि = बुद्धि
के घर । मदन = कामदेव । कदन = नाश करनेवाले । मदनकदन = महादेव ।
गौरिनंद = पार्वती को आनंद देनेवाले । कंद = जड़ । जगबंद = ( जगद्वंद्य )
संसार के पूज्य । जगनायक = त्रिदेव ( ब्रह्मा, विष्णु, महेश ) । नायक =
स्वामी । घायक = ( घातक ) मारनेवाले । लायक-लायक = योग्यों में भी
योग्य, सर्वश्रेष्ठ । गुरु = बड़े । भगवंत भव = संसार में समस्त ऐश्वर्यों से युक्त ।
( भग = षडैश्वर्य ) । भगतिवंत = भक्त । भव = आवागमन । निवासनिधि =
नव निधियों के घर ।
भावार्थ—एक दांतवाले, गजमुख, बुद्धि के घर, कामदेव का नाश करने-
वाले महादेव के पुत्र, अपनी माता पार्वती को आनंदित करनेवाले, आनंद
की जड़, संसार के वंदनीय, ललाट पर चंद्रमा धारण करनेवाले, सुखदायक,
कीर्ति देनेवाले, त्रिदेवों के भी स्वामी, दुष्टों को मारनेवाले, दरिद्रता को दूर
करनेवाले, सब योग्यों से भी योग्य, असंख्य बड़े गुणवाले, संसार में समस्त
समृद्धियों से संयुक्त, भक्तों का जन्ममरण का भय हरनेवाले, निधियों के निवास-
स्थान, असहाय को भी आश्रय देनेवाले लंबोदर श्रीगणेशजी की जय हो ।
अलंकार—आशिष ( केशव के मत से ), उल्लेख ।
पाठांतर १—सुकीर्ति-सुकृति । जग-गन । गुरु-गुन-गुन-गन । भगति-
भाग ।
तृतीय एवं चतुर्थ प्रभाव: नायक-भेद, सखा एवं दूत-लक्षण निरूपण
५६ रसिकप्रिया
सूचना—( १ ) 'जय' के प्रयोग से यह आशीर्वादात्मक मंगल है।
( २ ) सरदार कवि ने अपनी टीका में इसका अर्थ प्रणव और श्रीकृष्ण पर
भी घटाया है। (३) सूरति मिश्र ने 'रसग्राहकचंद्रिका' नाम्नी अपनी टीका में
'मदनकदन' को शृंगार में अप्रयुक्त प्रयोग मानकर इसका अर्थ 'धतूरा
खानेवाला' किया है। फिर यह शंका उठाकर कि धतूरे के अनेक पर्यायवाचक
शब्दों के होते हुए 'मदन' ही क्यों रखा गया, 'मदन' का अर्थ 'मद नहीं'
और 'कदन' का अर्थ सृष्टिसंहारकर्ता रुद्र ग्रहण किया है। इसी प्रकार के
अनेक प्रश्नोत्तर हैं। ( ४ ) 'जगनायक' का अर्थ 'त्रिदेव' करने में महादेव भी
आते हैं। महादेव गणेश के पिता हैं। ये उनके भी नायक कहे जाएँ तो
अनुचित है, ऐसा नहीं समझना चाहिए—'सुर अनादि जिय जानि।'
( २ ) श्रीकृष्णवंदना—( छप्पय ) .
श्रीबृषभानुकुमारिहेत शृंगाररूप भय।
बास हासरस हरे मातुबंधन करुनामय।
केसी प्रति अति रौद्र बीर मारो बत्सासुर।
भय दावानलपान पियो बीभत्स बकी उर।
अति अद्भुत बंचि बिरंचिमति, सांत संततै सोच चित।
कहि केसब सेवहु रसिकजन, नवरसमय ब्रजराज नित। २।
शब्दार्थ—श्रीवृषभानुकुमारि = श्रीराधिका। हेत = ( हेतु ) लिए।
भय = ( भए ) हुए। बास हरे = गोपियों के वस्त्र हरण किए। मातुबंधन =
कंस के कारागार में माता देवकी का बंधन। केसी = केशी राक्षस। बत्सासुर =
एक राक्षस। दावानलपान = एकबार श्रीकृष्ण दवाग्नि पी गए थे। बकी =
पूतना ( बकासुर की बहन )। उर पियो = स्तनपान किया। बंचि = ठगकर।
विरंचिमति = ब्रह्मा की बुद्धि। संततै = निरंतर ही। ब्रजराज = श्रीकृष्ण।
भावार्थ—जो श्रीकृष्ण श्रीराधिका के लिए शृंगाररस-रूप हुए, गोपि-
काओं के चीरहरण में हास्यरस-रूप बने, माता देवकी का कारावास में कष्ट
देखकर करुणरस-रूप हुए, केशी के प्रति क्रोध करके रौद्ररस-रूप दिखाई पड़े,
वत्सासुर के मारने में वीररस-मय हुए, दावाग्नि का पान करके भयानकरस-
युक्त हुए, पूतना का स्तनपान करके बीभत्सरस-मय दिखाई दिए, ब्रह्मा की
बुद्धि को छलने में अद्भुतरस-युक्त प्रतीत हुए तथा अर्जुन का मोह देखकर
चिंतित चित्त हो जाने के कारण शांतरस-मय लक्षित हुए, उन नवरसमय
ब्रजराज की सेवा रसिकजन नित्य करें।
अलंकार—उल्लेख और तृतीय विशेष का संदेह-संकर तथा रत्नावली
( क्रम से रसों का नाम आने के कारण ) ।
*—संततै-सांत से।
प्रथम प्रभाव ५७
अथ कविवर्णन—( दोहा )
(३) नदी बेतवै-तीर जहाँ, तीरथ तुंगारन्य ।
नगर ओछड़ो बहु बसै, धरनीतल में धन्य । ३ ।
शब्दार्थ —तुंगारन्य = ( तुंगारण्य ) ओछड़े के चारों ओर का जंगल ।
बहु बसै = घना बसा हुआ ।
(४ आश्रम चारि बसै जहाँ, चारि बर्न सुभ कर्म ।
जप तप विद्या वेद-बिधि, सबै बढ़े धन धर्म । ४ ।
(५) दिनप्रति जहाँ दूनो लहै, जहाँ दया अरु दान ।
एक तहाँ केसव सुकबि, जानत सकल जहान । ५ ।
(६) अपने अपने धर्म तहँ, सबै सदा सुखकारि ।
जासों देस बिदेस के, रहे सबै नृप हारि । ६ ।
(७) रच्यो बिरंचि बिचारि तहँ, नृपमनि मधुकरसाहि ।
गहरवार कासीस-रबि, कुलमंडन जसु जाहि । ७ ।
(८) ताको पुत्र प्रसिद्ध महिमंडन दूलहराम ।
इंद्रजीत ताको अनुज, सकल धर्म को धाम । ८ ।
(६) दीन्ही ताहि नृसिंहजू, तन मंन रन जयसिद्धि ।
हित करि लच्छन-राम ज्यों, भई राज की वृद्धि । ६ ।
(१०) तिन कबि केसवदास सों, कीन्हों धर्मसनेहु ।
सब सुख दैकरि यों कह्यो, रसिकप्रिया करि देहु ।१०।
शब्दार्थ—धर्मसनेहु कीन्हों = धर्म का स्नेह किया अर्थात् गुरु बनाकर
दीक्षा ग्रहण की ।
(११) संबत सोरह सै बरष, बीते अठतालीस ।
कातिग सुदि तिथि सप्तमी, बार बरनि रजनीस ।११।
शब्दार्थ—बरनि = बरनो, कहो ।
भावार्थ- संवत् १६४८ कार्तिक शुक्ला सप्तमी सोमवार के दिन केशव
ने 'रसिकप्रिया' का आरंभ किया ।
(१२) अति रति-गति मति एक करि, विविध-बिबेक-विलास ।
रसिकन कों रसिकप्रिया, कीनी केशवदास ।१२।
शब्दार्थ —रति-गति एक करि = अपनी प्रीति को सब ओर से खींचकर ।
मति एक करि = बुद्धि को एकाग्र करके ।
भावार्थ—अन्य शास्त्रों से अपनी प्रीति को खींचकर और बुद्धि को
६—तहँ-तें । ६—राज की-राजसी । १०—कीन्हों०-कियो धर्म सों
नेहु । ११—गति०-मति गति ।