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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 286 में से

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परिमाण में अपनी ही काव्यसंपत्ति है। जहाँ कहीं संस्कृत के उदाहरणों का
सहारा भी लिया गया है वहाँ भी नूतन भंगिमा या ग्रथन-कौशल है। इसलिए
केशव के संबंध में यह सत्य न भूलना चाहिए कि उनमें कवित्व की सरसता
मुक्तक के क्षेत्र के लिए पूरी थी । यदि कुछ विशेष प्रकार के विनियोग की
प्रतिज्ञा उन्होंने न की होती तो रामचंद्रचंद्रिका में उनका कविरूप उतना
आवृत्त न होता जितना शास्त्रस्थितिसंपादन के कारण हो गया है ।
विषय-विमर्श
रसिकप्रिया में सोलह प्रभाव हैं। कदाचित् उसके षोडश श्रृंगार का
ध्यान रखकर इतने प्रभाव रखे गए हैं—प्रत्येक श्रृंगार का एक प्रभाव ।
श्रृंगार का प्रभाव ही पड़ता है। प्रत्येक प्रभाव के उपसंहार में आगे के
प्रभाव का वर्ण्यविषय सूचित कर दिया गया है ।
प्रथम प्रभाव में सबसे पहले गणेश की वंदना है। सामाजिक प्रवाह का
ध्यान जैसा मानस में तुलसीदास ने रखा वैसा केशवदास ने अपने साहित्यिक
ग्रंथों में। इसी से गणेश की वंदना सर्वप्रथम की। दूसरी वंदना श्रीकृष्ण की
है, इन्हें नवरसमय कहने में केशव ने अधिक पांडित्य का प्रदर्शन किया है।
हिंदी में श्रृंगार के आलंबन कृष्ण ही हो गए हैं, रसमात्र के आलंबन वे ही
हैं। हिंदी की प्रथा के अनुसार इसके अनंतर आश्रयदाता या राजवंश का
वर्णन है। निर्माणहेतु, स्थान और समय का उल्लेख है । फिर नवरस का
नामोल्लेख, उनमें श्रृंगार की श्रेष्ठता और श्रीकृष्ण के नायकत्व का कथन है ।
फिर श्रृंगार के संयोग-वियोग भेद और प्रकाश-प्रच्छन्न भेद हैं तथा श्रीकृष्ण
और राधिका दोनों के चरित में इनके उदाहरण दिखाए गए हैं ।
द्वितीय प्रभाव में नायक-लक्षण कथित है। इसमें अनुकूलादि और
उनके प्रकाश-प्रच्छन्न भेद के विस्तार से उदाहरण हैं। इस प्रभाव में 'आठ
गांठ' का वर्णन है। 'धृष्ट' के प्रसंग में वे लिखते हैं—
मनसा बाचा कर्मना बिहँसनि चितवनि लेखि ।
चलनि चातुरी आतुरी आठौ गांठ बिसेखि ॥२।१६
धृ

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