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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

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उन्हे ज्ञानयुक्त क्रिया और जिनमे 'अहं' का लगाव नही, उन्हें ज्ञानरहित या अज्ञानपूर्वक क्रिया कहते है। निम्न जाति के प्राणियों मे यह ज्ञानरहित क्रिया सहज ज्ञान (instinct) कहलाती है। उनकी अपेक्षा उच्चतर जीवो मे और सबसे उच्च जीव मनुष्य में यह दूसरे प्रकार की क्रिया, जिसमें 'अहं'-भाव रहता है, अधिक दीख पडती है—इसी को ज्ञानयुक्त क्रिया कहते है।

परन्तु इतने से ही सारी भूमियो का उल्लेख नही हो गया। मन इन दोनो से भी ऊँची भूमि पर विचरण कर सकता है। मन ज्ञान की भी अतीत अवस्था में जा सकता है। जिस प्रकार अज्ञान-भूमि से जो कार्य होता है, वह ज्ञान की निम्न भूमि का कार्य है, वैसे ही ज्ञान की उच्च भूमि से भी—ज्ञानातीत भूमि से भी कार्य होता है। उसमें भी किसी प्रकार का 'अहं'-भाव नही रहता। यह 'अहं'-भाव केवल बीच की अवस्था मे रहता है। जब मन इस रेखा के ऊपर या नीचे विचरण करता है, तब किसी प्रकार का 'अहं'-ज्ञान नही रहता, किन्तु तब भी मन की क्रिया चलती रहती है। जब मन इस रेखा के ऊपर अर्थात् ज्ञान-भूमि के अतीत प्रदेश मे गमन करता है, तब उसे समाधि, पूर्णचेतन-भूमि या ज्ञानातीत भूमि कहते है। यह समाधि-अवस्था ज्ञान के भी उस पार अवस्थित है। अब हम यह किस तरह समझें कि जो मनुष्य समाधि-अवस्था मे जाता है, वह ज्ञान-भूमि के निम्न स्तर मे नही चला जाता, बिलकुल हीन दशापन्न नही हो जाता, वरन् ज्ञानातीत भूमि मे चला जाता है? इन दोनो ही अवस्थाओ में तो अहं-भाव नही रहता। (इसका उत्तर यह है कि कौन ज्ञान-भूमि के निम्न देश मे और कौन ऊर्ध्व देश मे गया, इसका निर्णय फल देखने पर ही हो सकता है। जब कोई गहरी

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नीद मे सोया रहता है, तब वह ज्ञान की निम्न भूमि मे चला जाता है। तब वह अज्ञातभाव से ही शरीर की सारी क्रियाएँ, श्वास-प्रश्वास, यहाँ तक कि शरीर-संचालन-क्रिया भी करता रहता है, उसके इन सब कामो मे 'अहं'-भाव का कोई लगाव नही रहता, तब वह अज्ञान से ढका रहता है। वह जब नीद से उठता है, तब वह सोने के पहले जैसा था, वैसा ही रहता है, उसमे कुछ भी परिवर्तन नही होता। उसके सोने से पहले उसकी जो ज्ञानसमष्टि थी, नीद टूटने के बाद भी ठीक वही रहती है, उसमे कुछ भी वृद्धि नही होती। उसके हृदय मे कोई नया तत्त्व प्रकाशित नही होता। किन्तु जब मनुष्य समाधिस्थ होता है, तो समाधि प्राप्त करने के पहले यदि वह महामूर्ख रहा हो, अज्ञानी रहा हो, तो समाधि से वह महाज्ञानी होकर नीचे आता है।

अब सोच कर देखो, इस विभिन्नता का कारण क्या है। एक अवस्था से, मनुष्य जैसा गया था वैसा ही लौट आया, और दूसरी अवस्था से लौटकर मनुष्य ने ज्ञानालोक प्राप्त किया—वह एक महान् साधु, एक सिद्ध पुरुष के रूप में परिणत हो गया, उसका स्वभाव बिलकुल बदल गया, उसके जीवन ने बिलकुल दूसरा रूप धारण कर लिया। दोनो अवस्थाओ के ये दो विभिन्न फल हैं। अब बात यह है कि फल अलग-अलग होने पर कारण भी अवश्य अलग-अलग होगा। और चूँकि समाधि-अवस्था से लब्ध यह ज्ञानालोक, अज्ञानावस्था से लौटने के बाद की अवस्था में जो ज्ञान प्राप्त होता है अथवा साधारण ज्ञानावस्था में युक्ति-विचार द्वारा जो ज्ञान उपलब्ध होता है, उन दोनो से अत्यन्त उच्चतर है, इसलिए अवश्य वह ज्ञानातीत भूमि से आता है। इसीलिए समाधि को मैने ज्ञानातीत भूमि के नाम से अभिहित किया है।

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संक्षेप मे समाधि का तात्पर्य यही है। हमारे जीवन मे इस समाधि की उपयोगिता कहाँ है? समाधि की विशेष उपयोगिता है। हम जान-बूझकर जो काम करते है, जिसे हम विचार का क्षेत्र कहते है, वह सकीर्ण और सीमित है। मनुष्य की युक्ति एक छोटेसे वृत्त मे ही भ्रमण कर सकती है, वह कभी उसके बाहर नही जा सकती। हम जितना ही उसके बाहर जाने का प्रयत्न करते है, उतना ही वह असम्भव-सा जान पड़ता है। ऐसा होते हुए भी, मनुष्य जिसे अत्यन्त कीमती और सबसे प्रिय समझता है, वह तो उस युक्तिराज्य के बाहर ही अवस्थित है। अविनाशी आत्मा है या नही, ईश्वर है या नही, इस जगत् के नियन्ता—परमज्ञान-स्वरूप कोई है या नही—इन सब तत्त्वो का निर्णय करने में युक्ति असमर्थ है। इन सब प्रश्नो का उत्तर युक्ति कभी नही दे सकती। युक्ति क्या कहती है? वह कहती है, "मै अज्ञेयवादी हूँ। मै किसी विषय मे 'हाँ' भी नही कह सकती और 'ना' भी नही।" फिर भी इन सब प्रश्नो की मीमांसा तो हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। इन प्रश्नो के ठीक-ठीक उत्तर बिना मानव-जीवन उद्देश्यविहीन हो जायगा। इस युक्तिरूप वृत्त के बाहर से प्राप्त हुए समाधान ही हमारे सारे नैतिक मत, सारे नैतिक भाव, यही नही, बल्कि मानव-स्वभाव मे जो कुछ सुन्दर तथा महान् है, उस सबकी नीव हैं। अतएव यह सबसे आवश्यक है कि हम इन प्रश्नो के यथार्थ उत्तर पा ले। यदि मनुष्य-जीवन केवल पाँच मिनट की चीज हो, और यदि जगत् कुछ परमाणुओ का आकस्मिक मिलन मात्र हो, तो फिर दूसरे का उपकार मै क्यो करूँ? दया, न्यायपरता या सहानुभूति दुनिया में फिर क्यो रहे? तब तो हम लोगो का यही

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एकमात्र कर्तव्य हो जाता है कि जिसकी जो इच्छा हो वही करे, सब अपना-अपना देखे। तब तो यही कहावत चरितार्थ होने लगती है—'यावन् जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्...।' यदि हम लोगों के भविष्य अस्तित्व की आशा ही न रहे, तो मै अपने भाई को क्यो प्यार करूँ, मै उसका गला क्यों न काटूँ? यदि जगत् के अतीत कोई सत्ता न रहे, यदि मुक्ति नामक कोई चीज न हो, यदि कुछ कठोर, अमेद्य, जड़ नियम ही सर्वस्व हो, तब तो हमे इहलोक मे ही सुखी होने की प्राणपण से चेष्टा करनी चाहिए। आजकल बहुत से लोगो के मतानुसार उपयोगितावाद (utility) ही नीति की नींव है, अर्थात् जिससे अधिक लोगो को अधिक परिमाण में सुख-स्वाच्छन्द्य मिले, वही नीति की नींव है। इन लोगो से मै पूछता हूँ, हम इस नींव पर खड़े होकर नीति का पालन क्यो करे? क्यो? यदि अधिक मनुष्यो का अधिक मात्रा में अनिष्ट करने से मेरा मतलब सधता हो, तो मैं वैसा क्यो न करूँ ? उपयोगितावादी इस प्रश्न का क्या जवाब देंगे? कौन अच्छा है और कौन बुरा, यह तुम कैसे जानो? मैं अपनी सुख की वासना से परिचालित होकर उसकी तृप्ति करता हूँ, ऐसा करना मेरा स्वभाव है, मै उससे अधिक कुछ नही जानता। मेरी ये वासनाएँ हैं, और मै उनकी तृप्ति करूँगा ही; तुम्हे उसमें आपत्ति करने का क्या अधिकार है? मानव-जीवन के ये सब महान् सत्य, जैसे—नीति, आत्मा का अमरत्व, ईश्वर, प्रेम, सहानुभूति, साधुत्व और सर्वोपरि, सबसे महान् सत्य निःस्वार्थपरता—ये सब भाव हमे कहाँ से मिले है?

सारा नीतिशास्त्र, मनुष्य के सारे काम, मनुष्य के सारे विचार इस निःस्वार्थपरतारूप एकमात्र भाव (भित्ति) पर स्थापित

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हैं। मानव-जीवन के सारे भाव इस नि स्वार्थपरतारूप एकमात्र भाव के अन्दर ढाले जा सकते हैं। मैं क्यों स्वार्थशून्य होऊँ? नि स्वार्थ होने की आवश्यकता क्या? और किस शक्ति के बल से मैं नि स्वार्थ होऊँ? तुम कहते हो, "मैं युक्तिवादी हूँ, मैं उपयोगितावादी हूँ," लेकिन यदि तुम मुझे इसकी युक्ति न दिखला सको कि तुम जगत् का कल्याण-साधन क्यों करोगे, तो मैं तुम्हे अयुक्तिक कहूँगा। मैं क्यों नि स्वार्थ होऊँ, कारण बताओ, क्यों न मैं बुद्धिहीन पशु के समान आचरण करूँ? नि स्वार्थपरता कवित्व के हिसाब से अवश्य बहुत सुन्दर हो सकती है, किन्तु कवित्व तो युक्ति नहीं है। मुझे युक्ति दिखलाओ, मैं क्यों नि स्वार्थपर होऊँ? क्यों मैं भला बनूँ? यदि कहो, 'अमुक यह बात कहते हैं, इसलिए ऐसा करो'—तो यह कोई जवाब नहीं है, मैं ऐसे किसी व्यक्तिविशेष की बात नहीं मानता। मेरे नि स्वार्थ होने से मेरा कल्याण कहाँ? यदि 'कल्याण' से अधिक परिमाण में सुख समझा जाय, तब तो स्वार्थपर होने में ही मेरा कल्याण है। मैं तो दूसरो को धोखा देकर और दूसरे का सर्वस्व चुराकर सबसे अधिक सुख पा सकता हूँ। उपयोगितावादी इसका क्या उत्तर देंगे? वे इसका कुछ भी उत्तर नहीं दे सकते। इसका यथार्थ उत्तर यह है कि यह परिदृश्यमान जगत् अनन्त समुद्र में एक छोटासा बुलबुला है—अनन्त जंजीर की एक छोटीसी कड़ी है। जिन्होंने जगत् में नि स्वार्थपरता का प्रचार किया था और मानव-जाति को उसकी शिक्षा दी थी, उन्होंने यह तत्त्व कहाँ से पाया? हम जानते हैं कि यह सहज ज्ञान द्वारा नहीं प्राप्त हो सकता। सहज ज्ञान से युक्त पशु तो इसे नहीं जानते। विचार-बुद्धि से भी यह नहीं मिल सकता—

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उससे इन सब तत्त्वों का कुछ भी नही जाना जाता। तो फिर वे सब तत्त्व उन्होने कहाँ से पाए ?

इतिहास के अध्ययन से मालूम होता है, ससार के सभी धर्म-शिक्षक तथा धर्म-प्रचारक कह गए है कि हमने ये सब सत्य जगत् के अतीत प्रदेश से पाए है। उनमे से बहुतेरे इस सम्बन्ध में अनभिज्ञ थे कि उन्होने यह सत्य ठीक कहाँ से पाया। किसी ने कहा, "एक स्वर्गीय दूत ने पक्षयुक्त मनुष्य के रूप मे मेरे पास आकर मुझसे कहा, 'हे मानव, सुनो, मै स्वर्ग से यह शुभ समाचार लाया हूँ, ग्रहण करो'।" एक दूसरे ने कहा, "तेजपुंजकाय एक देवता ने मेरे सामने आविर्भूत होकर मुझे उपदेश दिया है।" एक तीसरे ने कहा, "मैने स्वप्न मे अपने एक पूर्वज को देखा, उन्होंने मुझे इन तत्त्वो का उपदेश दिया।" इसके आगे वे और कुछ न कह सके। इस तरह विभिन्न उपायो से तत्त्वलाभ की बात कहने पर भी उन सबो का इस विषय में यही मत है कि उन्होने यह ज्ञान युक्ति-तर्क से नही पाया, वरन् उसके अतीत प्रदेश से ही उसे पाया है। इसके बारे मे योगशास्त्र का मत क्या है? उसका मत यह है कि वे जो कहते है कि युक्ति-विचार के अतीत प्रदेश से उन्होने उस ज्ञान को पाया है, यह सही है; किन्तु उनके अपने अन्दर से ही वह ज्ञान उनके पास आया है।

योगीगण कहते है, इस मन की ही ऐसी एक उच्च अवस्था है, जो युक्ति-विचार के अधिकार के अतीत है, जो ज्ञानातीत भूमि है। उस उच्चावस्था में पहुँचने पर मनुष्य तर्क के अगम्य ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, और ऐसे मनुष्य को ही समस्त विषय-ज्ञान के अतीत परमार्थज्ञान या अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति होती है। साधारण मानवी स्वभाव के परे, समस्त तर्क-युक्ति के

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