राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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लिए सर्वथा नवीन है, इसीलिए उसके चिन्तन से मस्तिष्क में नई प्रणालियाँ तैयार होती रहती हैं, जिससे सारा शरीर ही मानो उलट-पलट जाता है। यही कारण है कि साधन करते समय साधारण मनुष्य पहले-पहल अपने मार्ग से विच्युत हो जाता है। इन विघ्न-बाधाओ को यथासम्भव कम करने के लिए ही पतंजलि ने इन सब उपायो का आविष्कार किया है, ताकि हम उनमें से ऐसी किसी एक साधनप्रणाली को चुनकर अपना लें, जो हमारे लिए सर्वथा उपयोगी हो।
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी ॥३५॥
सूत्रार्थ—जिन सब समाधियो में अलौकिक इन्द्रिय-विषयों की अनुभूति होती है, वे मन की स्थिति का कारण होती हैं।
व्याख्या—यह बात धारणा अर्थात् एकाग्रता से अपने-आप आती रहती है, योगीगण कहते हैं कि यदि नासिका के अग्र भाग मे मन को एकाग्र किया जाय, तो कुछ दिनो में ही अद्भुत सुगन्धि का अनुभव होने लगता है। इसी प्रकार जिह्वामूल में मन को एकाग्र करने पर सुन्दर शब्द सुनाई देता है। जिह्वाग्र में ऐसा करने पर दिव्य रसास्वादन होता है। जिह्वा के बीच में संयम करने पर प्रतीत होता है कि मैने मानो किसी एक वस्तु का स्पर्श किया। तालु मे संयम करने पर दिव्य रूप दीख पडते हैं। यदि कोई अस्थिरचित्त व्यक्ति इस योग के कुछ साधनो का अवलम्बन करना चाहे और फिर भी उनकी सच्चाई में सन्दिग्ध-चित्त हो, तो कुछ दिन साधन करने के बाद, ये सब अनुभूतियाँ होने पर, फिर उसे सन्देह नही रहेगा। तब फिर वह अध्यवसाय के साथ साधन करता रहेगा।
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विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥
सूत्रार्थ— अथवा शोक से रहित ज्योतिष्मान् पदार्थ के (ध्यान) से भी (समाधि होती है)।
व्याख्या— यह और एक प्रकार की समाधि है। ऐसा ध्यान करो कि हृदय मे मानो एक कमल है; उसकी पँखुडियाँ अधोमुखी है और उसके भीतर से सुषुम्ना गई है। उसके बाद पूरक करो, फिर रेचक करते समय सोचो कि वह कमल पँखुडियों सहित ऊर्ध्वमुखी हो गया है और कमल के भीतर एक महाज्योति विद्यमान है। उस ज्योति का ध्यान करो।
वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥३७॥
सूत्रार्थ— अथवा जिस हृदय ने इन्द्रिय-विषयों के प्रति समस्त आसक्ति छोड़ दी है, (उसके ध्यान से भी चित्त स्थिर होता है)।
व्याख्या— किन्ही महापुरुष या साधु को लो, जो पूर्ण रूप से अनासक्त हो और जिन पर तुम्हारी अत्यन्त श्रद्धा हो। उनके हृदय के बारे मे चिन्तन करो। उनका अन्त करण सर्व विषयों में अनासक्त हो गया है, अत उनके अन्त करण के बारे मे चिन्तन करने पर तुम्हारा अन्त करण शान्त हो जायगा। यदि यह न कर सको, तो और एक उपाय है —
स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥
सूत्रार्थ— अथवा स्वप्नावस्था में कभी-कभी जो अपूर्व ज्ञान-लाभ होता है, उसका, तथा सुषुप्ति अवस्था में प्राप्त सात्त्विक सुख का ध्यान करने से भी (चित्त प्रशान्त होता है)।
व्याख्या— कभी-कभी मनुष्य ऐसा स्वप्न देखता है कि उसके पास देवता आकर बातचीत कर रहे हैं; वह मानो एक प्रकार से भावावेश में चूर हो गया है, वायु में एक अपूर्व संगीत
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की ध्वनि बहती हुई चली आ रही है और वह उसे सुन रहा है। उस स्वप्नावस्था मे वह आनन्द में मस्त रहता है। जब वह जागता है, तब स्वप्न की वे घटनाएँ उसके मन पर एक गहरी छाप छोड़ जाती हैं। उस स्वप्न को सत्य मानकर उसका ध्यान करो। यदि तुम इसमें भी समर्थ न होओ, तो जो कोई पवित्र वस्तु तुम्हे अच्छी लगे, उसी का ध्यान करो।
यथाभिमतध्यानाद्वा ॥३९॥
सूत्रार्थ— अथवा जिसे जो कोई चीज अच्छी लगे, उसी के ध्यान से (समाधि प्राप्त होती है)।
व्याख्या— इससे यह न समझ लेना चाहिए कि किसी असत् वस्तु का भी ध्यान करने से बनेगा। जो कोई सत् वस्तु तुम्हे अच्छी लगे, जो स्थान तुम्हे बहुत पसन्द हो, जो दृश्य या जो भाव तुम्हे बहुत अच्छा लगता हो, जिससे तुम्हारा चित्त एकाग्र हो जाता हो, उसी का चिन्तन करो।
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥४०॥
सूत्रार्थ— इस प्रकार ध्यान करते-करते परमाणु से लेकर परम बृहत् पदार्थ तक सभी में उनके मन की गति अव्याहत हो जाती है।
व्याख्या— मन इस अभ्यास के द्वारा अत्यन्त सूक्ष्म से लेकर बृहत्तम वस्तु तक सभी पर सुगमता से ध्यान कर सकता है। ऐसा होने पर ये मनोवृत्ति-प्रवाह भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं।
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदंजनता समापत्तिः ॥४१॥
सूत्रार्थ— जिन योगी की चित्तवृत्तियां इस प्रकार क्षीण हो चुकी है (वश में आ चुकी है) उनका चित्त उस समय ग्रहीता (आत्मा) ग्रहण (अन्त करण और इन्द्रियाँ) और ग्राह्य (पञ्चभूत और विषयो) में उसी
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प्रकार एकाग्रता और एकीभाव को प्राप्त होता है, जिस प्रकार शुद्ध स्फटिक (भिन्न-भिन्न रंगवाली वस्तुओ के सामने भिन्न-भिन्न रग धारण करता है)।
व्याख्या—इस प्रकार लगातार ध्यान करते-करते कौनसा फल प्राप्त होता है ? हमे यह स्मरण होगा कि पूर्वोक्त एक सूत्र मे पतंजलि ने विभिन्न प्रकार की समाधियो का वर्णन किया है। पहली समाधि है स्थूल विषय को लेकर, और दूसरी है सूक्ष्म विषय को लेकर। आगे चलकर, क्रमश और भी सूक्ष्मतर वस्तुएँ हमारी समाधि का विषय होती जाती है, यह भी पहले कहा जा चुका है। इन सब समाधियो के अभ्यास का फल यह है कि हम जितनी सुगमता से स्थूल विषयो का ध्यान कर सकते है, उतनी ही सुगमता से सूक्ष्म विषयो का भी। इस अवस्था में योगी तीन वस्तुएँ देखते है—ग्रहीता, ग्राह्य और ग्रहण, अर्थात् आत्मा, विषय और मन। हमे ध्यान के लिए तीन प्रकार के विषय दिए गये है। पहला है स्थूल, जैसे—शरीर या भौतिक पदार्थ, दूसरा है सूक्ष्म, जैसे—मन या चित्त, और तीसरा है गुणविशिष्ट पुरुष अर्थात् अस्मिता या अहकार। यहाँ आत्मा का अर्थ उसके यथार्थ स्वरूप से नही है। अभ्यास के द्वारा योगी इन सब ध्यानो मे दृढप्रतिष्ठ होकर रहते हैं। तब उन्हें ऐसी एकाग्रता-शक्ति प्राप्त हो जाती है कि ज्योही वे ध्यान करने बैठते हैं, त्योही अन्य सभी वस्तुओं को मन से हटा दे सकते है। वे जिस विषय का ध्यान करते है, उस विषय के साथ एक हो जाते हैं, जब वे ध्यान करते हैं, तब वे मानो स्फटिक के एक टुकड़े के समान हो जाते हैं। यह स्फटिक यदि फूल के पास रहे, तो वह फूल के साथ मानो एकरूप हो जाता है। यदि वह फूल लाल हो, तो स्फटिक भी लाल दिखाई
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देता है, और यदि फूल नीले रग का हो, तो स्फटिक भी नीला दिखाई देता है।
तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२॥
सूत्रार्थ—शब्द, अर्थ और उससे उत्पन्न ज्ञान जब मिश्रित होकर रहते हैं, तब वह सवितर्क अर्थात् वितर्कयुक्त समाधि (कहलाती) है।
व्याख्या—यहाँ शब्द का अर्थ है कम्पन। अर्थ का मतलब है वह स्नायविक शक्ति-प्रवाह, जो उसे भीतर ले जाता है। और ज्ञान का अर्थ है प्रतिक्रिया। हमने अब तक जितने प्रकार की समाधि की बात सुनी है, पतंजलि इन सभी को सवितर्क कहते हैं। इसके बाद वे हमें क्रमश और भी उच्चतर समाधियो की शिक्षा देगे। इन सवितर्क समाधियो मे हम विषयी और विषय इन दोनो को सम्पूर्ण रूप से पृथक रखते हैं। यह पार्थक्य या भेद शब्द, उसके अर्थ और तत्प्रसूत ज्ञान के मिश्रण से उत्पन्न होता है। पहले तो है बाह्य कम्पन—शब्द; जब वह इन्द्रिय-प्रवाह द्वारा भीतर में प्रवाहित होता है, तब उसे अर्थ कहते हैं। उसके बाद चित्त मे एक प्रतिक्रिया-प्रवाह आता है, उसे ज्ञान कहा जाता है। जिसे हम बाह्य वस्तु की अनुभूति कहते हैं, वह वस्तुत इन तीनो की समष्टि (सकीर्ण) मात्र है। हमने अब तक जितने प्रकार की समाधियों की बात सुनी है, उन सब मे यह समष्टि ही हमारे ध्यान का विषय होती है। इसके बाद जिस समाधि के बारे मे कहा जायगा, वह अपेक्षाकृत श्रेष्ठ है।
स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥४३॥
सूत्रार्थ—जब स्मृति शुद्ध हो जाती है, अर्थात् स्मृति में जब और किसी प्रकार के गुण का सम्पर्क नहीं रह जाता, जब वह केवल ध्येय वस्तु