सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पातंजल-योगसूत्र-३ २५१

पातंजल-योगसूत्र-३ २५१

और अस्मिता की उत्पत्ति होती है। जब योगी उनमें तथा अन्य दोनों में भी क्रमशः संयम का प्रयोग करते हैं, तब वे इन्द्रियों पर जय प्राप्त कर लेते हैं। जो कोई वस्तु तुम देखते या अनुभव करते हो—जैसे एक पुस्तक—उसे लेकर उसमें संयम का प्रयोग करो। उसके बाद पुस्तक के रूप में जो ज्ञान है, उसमें, फिर जिस अहंभाव के द्वारा उस पुस्तक का दर्शन होता है, उसमें संयम करो। इस अभ्यास से समस्त इन्द्रियाँ विजित हो जाती हैं।

ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥४९॥

सूत्रार्थ—उस (इन्द्रियजय) से शरीर को मन के सदृश गति, शरीर के बिना भी विषयों का अनुभव करने की शक्ति और प्रकृति पर विजय—ये तीनो सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

व्याख्या—जैसे भूत-जय से कायसम्पत् की प्राप्ति होती है, वैसे ही इन्द्रिय-जय से उपर्युक्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥५०॥

सूत्रार्थ—पुरुष और बुद्धि के परस्पर पार्थक्य-ज्ञान में संयम करने से सब वस्तुओं पर अधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—जब हम प्रकृति पर जय प्राप्त कर लेते हैं तथा पुरुष और प्रकृति का भेद अनुभव कर लेते हैं अर्थात् जान लेते हैं कि पुरुष अविनाशी, पवित्र और पूर्णस्वरूप है, तब सर्व-शक्तिमत्ता और सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है।

तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥५१॥

सूत्रार्थ—इन सब (सिद्धियों) को भी त्याग देने से दोष का बीज नष्ट हो जाता है, और उससे कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है।

व्याख्या—तब वे कैवल्य की प्राप्ति कर लेते हैं, वे मुक्त

२५२ | राजयोग

हो जाते है। जब वे सर्वशक्तिमत्ता और सर्वज्ञता इन दोनो को भी त्याग देते हैं, तब वे सारे प्रलोभन, यहाँ तक कि, देवताओं द्वारा दिए गए प्रलोभनो का भी अतिक्रमण कर सकते है। जब योगी इन सब अद्भुत शक्तियो को प्राप्त करके भी उन्हे त्याग देते है, तब वे चरम लक्ष्य पर पहुँच जाते है। वास्तव मे ये शक्तियाँ हैं क्या?—केवल अभिव्यक्तियाँ। स्वप्न की अपेक्षा उनमे भला कौनसी श्रेष्ठता है? सर्वशक्तिमत्ता भी तो एक स्वप्न है। वह केवल मन पर निर्भर रहती है। जब तक मन का अस्तित्व है, तभी तक सर्वशक्तिमत्ता सम्भव हो सकती है, पर हमारा लक्ष्य तो मन के भी अतीत है।

स्थान्युपनिमन्त्रणे संगस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसंगात् ॥५२॥

सूत्रार्थ—देवताओ द्वारा प्रलोभित किए जाने पर भी उसमें आसक्त होना या आनन्द का अनुभव करना उचित नहीं है, क्योकि उससे पुनः अनिष्ट होना सम्भव है।

व्याख्या—और भी बहुत से विघ्न है। देवता आदि योगी को प्रलोभित करने आते हैं। वे नही चाहते कि कोई पूर्ण रूप से मुक्त हो। हम लोग जैसे ईर्ष्यापरायण है, वे भी वैसे ही हैं, वरन् कभी-कभी तो वे इस बात मे हम लोगो से भी आगे बढ जाते हैं। वे डरते हैं कि कही वे अपने पद को न खो बैठें। जो योगी पूर्ण सिद्ध नही होते, वे शरीर त्यागने के बाद देवता बन जाते हैं। वे सीधे रास्ते को छोडकर मानो बगल के एक रास्ते से चले जाते हैं और इन सब शक्तियो को प्राप्त करते है। उनको फिर से जन्म लेना पडता है। पर जो इतने शक्तिसम्पन्न है कि इन प्रलोभनो का उन पर कोई प्रभाव नही पडता, वे सीधे उस लक्ष्य-स्थल पर पहुँच जाते है और मुक्त हो जाते हैं।