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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पातंजल-योगसूत्र--२ [२२१]

पातंजल-योगसूत्र--२ [२२१]

अपवित्र मनुष्य कभी योगी नही हो सकता; इस बाह्यशौच के साथ-साथ अन्त:शौच भी आवश्यक है। समाधिपाद के ३३ वे सूत्र में जिन धर्मों (गुणो) की बात कही गई हैं, उनके पालन से यह अन्त शौच आता है। यह सत्य है कि बाह्यशौच से अन्त शौच अधिक उपकारी है, किन्तु दोनो की ही आवश्यकता है, और अन्त शौच के बिना केवल बाह्यशौच कोई फल उत्पन्न नही करता।

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥३३॥

सूत्रार्थ — वितर्क अर्थात् योग (यम और नियम) के विरोधी भाव उपस्थित होने पर उनके प्रतिपक्षी विचारो का बारम्बार चिन्तन करना चाहिए।

व्याख्या — ऊपर मे जिन सब धर्मों (गुणो) की बात कही गई है, उनके अभ्यास का यही उपाय है। उदाहरणार्थ, जब मन मे क्रोध की एक बडी तरंग आती है, तब उसे कैसे वश मे लाया जाय ? उसके विपरीत एक तरंग उठाकर। उस समय प्रेम की बात मन मे लाओ। कभी-कभी ऐसा होता है कि पत्नी अपने पति पर खूब गरम हो जाती है, उसी समय उसका बच्चा वहां आ जाता है और वह उसे गोद मे उठाकर चूम लेती है, इससे उसके मन में बच्चे के प्रति प्रेमरूप तरंग उठने लगती है और वह पहले की तरंग को दबा देती है। प्रेम, क्रोध के विपरीत है। इसी प्रकार जब मन मे चोरी का भाव उठे, तो चोरी के विपरीत भाव का चिन्तन करना चाहिए। जब दान ग्रहण करने की इच्छा पैदा हो, तो उसके विपरीत भाव का चिन्तन करना चाहिए—आदि-आदि।

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥३४॥

२२२राजयोग

सूत्रार्थ—वितर्क अर्थात् योग के विरोधी हैं हिंसा आदि भाव; (वे तीन प्रकार के होते हैं—) स्वयं किए हुए, दूसरों से करवाए हुए और अनुमोदन किए हुए, इनके कारण हैं—लोभ, क्रोध और मोह, इनमें भी कोई थोड़े परिमाण का, कोई मध्यम परिमाण का और कोई बहुत बड़े परिमाण का होता है, इनके अज्ञान और क्लेशरूप अनन्त फल हैं,—इस प्रकार (विचार करना ही) प्रतिपक्ष की भावना है।

व्याख्या—मैं स्वयं यदि कोई झूठ कहूँ, तो उससे जो पाप होता है, उतना ही पाप तब भी होता है, जब मैं दूसरे को झूठ बात कहने लगाता हूँ, अथवा दूसरे की किसी झूठ बात का अनुमोदन करता हूँ। वह झूठ भले ही जरासा हो, तो भी झूठ तो है ही। पर्वत की कन्दरा में भी बैठकर यदि तुम कोई पाप-चिन्तन करो, किसी के प्रति भीतर में घृणा का भाव पोषण करो, तो वह भी संचित रहेगा, और कालान्तर में फिर से वह तुम्हारे पास आकर तुम पर आघात करेगा, किसी-न-किसी दिन एक-न-एक प्रकार के दुःख के रूप में वह प्रबल वेग से तुम पर आक्रमण करेगा। यदि तुम अपने हृदय से ईर्ष्या और घृणा का भाव चारो ओर बाहर भेजो, तो वह चक्रवृद्धिब्याज सहित तुम पर आकर गिरेगा। दुनिया की कोई भी ताकत उसे रोक न सकेगी। यदि तुमने एक बार उस शक्ति को बाहर भेज दिया, तो फिर निश्चित जानो, तुम्हे उसका प्रतिघात सहन करना ही पड़ेगा। यह स्मरण रहने पर तुम कुकर्मों से बचे रह सकोगे।

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥

सूत्रार्थ—भीतर में अहिंसा के प्रतिष्ठित हो जाने पर, उसके निकट सब प्राणी अपना स्वाभाविक वैर-भाव त्याग देते हैं।

व्याख्या—यदि कोई व्यक्ति अहिंसा की चरम अवस्था को प्राप्त कर ले, तो उसके सामने, जो सब प्राणी स्वभावत ही