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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पातंजल-योगसूत्र—२ २३१

पातंजल-योगसूत्र—२ २३१

इन इन्द्रियों के सामने जो कुछ आता है, उसके साथ ये मिश्रित होकर, उसी का आकार धारण कर लेती है। यदि तुम चित्त को ये सब विभिन्न आकृतियाँ धारण करने से रोक सको, तभी तुम्हारा मन शान्त होगा और इन्द्रियाँ भी मन के अनुरूप हो जायँगी। इसी को प्रत्याहार कहते है।

तत परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥५५॥

**सूत्रार्थ—**उस (प्रत्याहार) से इन्द्रियों पर सम्पूर्ण रूप से जय प्राप्त हो जाती है।

**व्याख्या—**जब योगी इन्द्रियो को इस प्रकार बाहरी वस्तु का आकार धारण करने से रोक सकते हैं और चित्त के साथ उन्हे एक करके रखने में सफल होते हैं, तभी इन्द्रियो पर पूर्ण रूप से जय प्राप्त होता है। और जब इन्द्रियाँ पूरी तरह विजित हो जाती हैं, तब एक-एक स्नायु, एक-एक मांसपेशी तक हमारे वश में आ जाती है, क्योकि इन्द्रियाँ ही सब प्रकार की संवेदना (अनुभूति) और कार्य की केन्द्रस्वरूप हैं। ये इन्द्रियाँ ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय, इन दो भागो में विभक्त हैं। अत जब इन्द्रियाँ संयत होगी, तब योगी सब प्रकार के भावो और कार्यों पर जय-लाभ कर सकेगे। सारा शरीर ही उनके अधीन हो जायगा। ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर ही मनुष्य देह-धारण में आनन्द अनुभव करने लगता है। तभी वह सत्यतापूर्वक कह सकता है, “मै धन्य हूँ जो मेरा जन्म हुआ।” जब इन्द्रियो पर ऐसा अधिकार प्राप्त हो जाता है, तभी हम यह अनुभव कर सकते हैं कि यह शरीर भी कैसी अद्भुत चीज है!

तृतीय अध्याय

विभूतिपाद

अब हम विभूतिपाद मे आते है।

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥

सूत्रार्थ—चित्त को किसी विशेष वस्तु में आबद्ध करके रखने का नाम है धारणा।

व्याख्या—जब मन शरीर के भीतर या उसके बाहर किसी वस्तु के साथ सलग्न होता है और कुछ समय तक उसी तरह रहता है, तो उसे धारणा कहते हैं।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥

सूत्रार्थ—वह वस्तुविषयक ज्ञान निरन्तर एक रूप से प्रवाहित होते रहने पर उसे ध्यान कहते हैं।

व्याख्या—मान लो, मन किसी एक विषय को सोचने का प्रयत्न कर रहा है, किसी एक विशेष स्थान में—जैसे, मस्तक के ऊपर अथवा हृदय आदि मे—अपने को पकड रखने का प्रयत्न कर रहा है। यदि मन शरीर के केवल उस अंश के द्वारा संवेदनाओ (अनुभूतियो) को ग्रहण करने मे समर्थ होता है, शरीर के शेष सब भागो को यदि विषय-ग्रहण से विवृत रख सकता है, तो उसका नाम धारणा है, और जब वह अपने को कुछ समय तक उसी अवस्था में रखने मे समर्थ होता है, तो उसका नाम है ध्यान।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि ॥३॥

सूत्रार्थ—वही (ध्यान) जब समस्त बाहरी उपाधियों को छोड़कर अर्थ मात्र को ही प्रकाशित करता है, तब उसे समाधि कहते हैं।