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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

तृतीय अध्याय

तृतीय अध्याय

प्राण

बहुतों का विचार है, प्राणायाम श्वास-प्रश्वास की कोई क्रिया है। पर असल में ऐसा नहीं है। वास्तव में तो श्वास-प्रश्वास की क्रिया के साथ इसका बहुत थोड़ा सम्बन्ध है। यथार्थ प्राणायाम की साधना में अधिकारी होने के लिए बहुत से अलग-अलग उपाय हैं। श्वास-प्रश्वास की क्रिया उनमें से एक उपाय मात्र है। प्राणायाम का अर्थ है प्राणों का संयम। भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार सारा जगत् दो पदार्थों में निर्मित है। उनमें से एक का नाम है आकाश। यह आकाश एक सर्वव्यापी, सर्वानुस्यूत सत्ता है। जिस किसी वस्तु का आकार है, जो कोई वस्तु कुछ वस्तुओं के मिश्रण से बनी है, वह इस आकाश से ही उत्पन्न हुई है। यह आकाश ही वायु में परिणत होता है, यही तरल पदार्थ का रूप धारण करता है, यही फिर ठोस आकार को प्राप्त होता है यह आकाश ही सूर्य, पृथ्वी, तारा, धूमकेतु

प्राण ३७

वाष्पीय पदार्थ पुन आकाश मे लय हो जाते है। बाद की सृष्टि फिर से इसी तरह आकाश से उत्पन्न होती है।

किस शक्ति के प्रभाव से आकाश का जगत् के रूप में परिणाम होता है? इस प्राण की शक्ति से। जिस तरह आकाश इस जगत का कारणस्वरूप, अनन्त, सर्वव्यापी मूल पदार्थ है, प्राण भी उसी तरह जगत् की उत्पत्ति की कारणस्वरूपा, अनन्त सर्वव्यापी विक्षेपकरी शक्ति है। कल्प के आदि मे और अन्त में सम्पूर्ण सृष्टि आकाशरूप मे परिणत होती है, और जगत् की सारी शक्तियाँ प्राण में लीन हो जाती है, दूसरे कल्प मे फिर इसी प्राण से समुदय शक्तियों का विकास होता है। यह प्राण ही गति-रूप मे प्रकाशित हुआ है—यही गुरुत्वाकर्षण या चुम्बक-शक्ति के रूप मे प्रकाशित हो रहा है। यह प्राण ही स्नायविक शक्तिप्रवाह (nerve current) के रूप मे, विचार-शक्ति के रूप में और समुदय दैहिक क्रिया के रूप मे प्रकाशित हुआ है। विचार-शक्ति से लेकर अति सामान्य दैहिक शक्ति तक सब कुछ प्राण का ही विकास है। वाह्य और अन्तर्जगत् की समस्त शक्तियाँ जब अपनी मूल अवस्था मे पहुँचती है, तब उसी को प्राण कहते हैं। "जब अस्ति और नास्ति कुछ भी न था, जब तम से तम आवृत था, तब था क्या? * यह आकाश ही गतिशून्य होकर अवस्थित था।" यह ठीक है कि प्राण का किसी प्रकार का प्रकाश न था, परन्तु तब भी प्राण का अस्तित्व था। हम आधुनिक विज्ञान द्वारा भी समझ सकते हैं कि संसार में जितने


* नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्—इत्यादि,
तम आसीत् तमसागूढमग्रेऽप्रकेतम्—इत्यादि।
—ऋग्वेद संहिता, दशम मण्डल।