सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

> तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥

द्वितीय अध्याय

साधनपाद

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥

सूत्रार्थ—तपस्या, अध्यात्मशास्त्रो के पठन-पाठन और ईश्वर में समस्त कर्मफलो के समर्पण को क्रियायोग कहते हैं।

व्याख्या—पिछले अध्याय मे जिन सब समाधियों की बात कही गई है, उन्हें प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। इसलिए हमे धीरे-धीरे—विभिन्न सोपानो मे से होते हुए उन सब समाधियों को प्राप्त करने का प्रयत्न करना होगा। इसके पहले सोपान को क्रियायोग कहते है। इसका शब्दार्थ है—कर्म के सहारे योग की ओर बढना। हमारी देह मानो एक रथ है, इन्द्रियाँ घोडे है, मन लगाम है, बुद्धि सारथि है और आत्मा रथी है। यह गृहस्वामी, यह राजा, यह मनुष्य की आत्मा रथ में सवार है। यदि घोड़े बड़े तेज हो और लगाम खिंची न रहे, यदि बुद्धिरूपी सारथी उन घोडो को सयत करना न जाने, तो रथ की दुर्दशा हो जायगी। पर यदि इन्द्रियरूपी घोडे अच्छी तरह से संयत रहे और मनरूपी लगाम बुद्धिरूपी सारथी के हाथो अच्छी तरह थमी रहे, तो वह रथ ठीक अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच जाता है। अब यह समझ में आ जायगा कि इस तपस्या शब्द का अर्थ क्या है। तपस्या शब्द का अर्थ है—इस शरीर और इन्द्रियो को चलाते समय लगाम अच्छी तरह थामे रहना, उन्हे अपनी इच्छानुसार काम न करने देकर अपने वश में किए रहना। उसके बाद है पठन-पाठन या स्वाध्याय। यहाँ पाठ का तात्पर्य क्या है ? नाटक, उपन्यास या कहानी की

१८२ राजयोग

पुस्तक का पाठ नही, वरन् उन ग्रन्थो का पाठ, जो यह शिक्षा देते है कि आत्मा की मुक्ति कैसे होती है। फिर स्वाध्याय से तर्क या विचारात्मक पुस्तक का पाठ नही समझना चाहिए। जो योगी है, वे तो विचार आदि करके तृप्त हो चुके रहते है, विचार मे उनकी और कोई रुचि नही रह जाती। वे पठन-पाठन करते है केवल अपनी धारणाओ को दृढ करने के लिए। शास्त्रीय ज्ञान दो प्रकार के है। एक है वाद (जो तर्क-युक्ति और विचारात्मक है), और दूसरा है सिद्धान्त (मीमासात्मक)। अज्ञानावस्था मे मनुष्य प्रथमोक्त प्रकार के शास्त्रीय ज्ञान के अनुशीलन में प्रवृत्त होता है, वह तर्क-युद्ध के समान है—प्रत्येक वस्तु के सब पहलू देखकर विचार करना, इस विचार का अन्त होने पर वह किसी एक मीमासा या सिद्धान्त पर पहुँचता है। किन्तु केवल सिद्धान्त पर पहुँचने से नही हो जाता। इस सिद्धान्त के बारे मे मन की धारणा को दृढ करना होगा। शास्त्र तो अनन्त है और समय अल्प है, अत ज्ञान-प्राप्ति का रहस्य है—सब वस्तुओ का सार भाग ग्रहण करना। उस सार भाग को ग्रहण करो और उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करो। भारतवर्ष में एक पुरानी किम्बदन्ती है कि यदि तुम किसी राजहस के सामने एक कटोरा भर पानी मिला हुआ दूध रख दो तो वह दूध-दूध पी लेगा और पानी छोड देगा। उसी प्रकार ज्ञान का जो अश आवश्यक है, उसे लेकर असार भाग को हमें फेंक देना चाहिए। पहले-पहल बुद्धि की कसरत आवश्यक होती है। अन्धे के समान कुछ भी ले लेने से नही बनता। पर जो योगी है, वे इस तर्क-युक्ति की अवस्था को पार कर एक ऐसे सिद्धान्त पर पहुँच चुके है, जो पर्वत के समान अचल-अटल

पातजल-योगसूत्र—२ १८३

है। इसके बाद उनका सारा प्रयत्न उस सिद्धान्त के दृढ़ करने में होता है। ये कहते हैं, तर्क मत करो, यदि कोई तुम्हे तर्क करने को वाध्य करे, तो चुप रहो। किसी तर्क का जवाब न देकर शान्त-भाव से वहाँ से चले जाओ, क्योकि तर्क द्वारा मन केवल चंचल ही होता है। तर्क की आवश्यकता थी केवल बुद्धि को तेज करने के लिए, जब वह सम्पन्न हो चुका, तब और उसे बेकार चंचल करने की क्या जरूरत? बुद्धि तो एक दुर्बल यन्त्र मात्र है, वह हमें केवल इन्द्रियो के घेरे मे रहनेवाला ज्ञान दे सकता है। पर योगी का उद्देश्य है इन्द्रियातीत प्रदेश में चले जाना, अतएव उनके लिए बुद्धि चलाने की और कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। उन्हे इस विषय मे पक्का विश्वास हो चुका है, अतएव वे और अधिक तर्क नहीं करते, चुपचाप रहते हैं; क्योकि तर्क करने से मन समता से च्युत हो जाता है, चित्त में एक हलचल मच जाती है, और चित्त की ऐसी हलचल उनके लिए एक विघ्न ही है। यह सब तर्क, युक्ति या विचारपूर्वक तत्त्व का अन्वेषण केवल प्रारम्भिक अवस्था के लिए है। इस तर्क-युक्ति के अतीत और भी उच्चतर तत्त्वसमूह हैं। सारे जीवन भर केवल विद्यालय के बच्चो के समान विवाद या विचार-समिति लेकर ही रहना पर्याप्त नहीं है। ईश्वर मे कर्मफल अर्पण करने का तात्पर्य है—कर्म के लिए स्वयं कोई प्रशंसा या निन्दा न लेकर इन दोनों को ही ईश्वर को समर्पण कर देना और शान्ति से रहना।

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥

**सूत्रार्थ—**समाधि की सिद्धि के लिए और क्लेशजनक विघ्नों को क्षीण करने के लिए (इस क्रियायोग की आवश्यकता है)।

१८४ राजयोग

व्याख्या—हममे से अनेको ने मन को लाड-प्यार के लडके के समान कर डाला है। वह जो कुछ चाहता है, उसे वही दे दिया करते है। इसीलिए क्रियायोग का सतत अभ्यास आवश्यक है, जिससे मन को सयत करके अपने वश मे लाया जा सके। इस सयम के अभाव मे ही योग के सारे विघ्न उपस्थित होते है और उनसे फिर क्लेश की उत्पत्ति होती है। उन्हे दूर करने का उपाय है—क्रियायोग द्वारा मन को वशीभूत कर लेना, उसे अपना कार्य न करने देना।

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥

सूत्रार्थ—अविद्या, अस्मिता (अहकार), राग, द्वेष और अभिनिवेश (जीवन के प्रति ममता)—(ये पाँचों) क्लेश हैं।

व्याख्या—ये ही पचकलेश है, ये पाँच बन्धनो के समान हमे इस ससार मे बाँध रखते हैं। अविद्या ही शेष चार क्लेशों की जननीस्वरूप है। यह अविद्या ही हमारे दुख का एकमात्र कारण है। भला और किसकी शक्ति है, जो हमें इस प्रकार दुख में रख सके ? आत्मा तो नित्य आनन्दस्वरूप है। उसे अज्ञान—भ्रम—माया के सिवाय और कौन दुखी कर सकता है ? आत्मा के ये समस्त दुख केवल भ्रम मात्र है।

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥

सूत्रार्थ—अविद्या ही उन शेष चार का उत्पादक क्षेत्रस्वरूप है। वे कभी लीनभाव से, कभी सूक्ष्मभाव से, कभी अन्य वृत्ति के द्वारा विच्छिन्न अर्थात् अभिभूत होकर और कभी प्रकाशित होकर रहते हैं।

व्याख्या—अविद्या ही अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश का कारण है। ये सस्कारसमूह विभिन्न मनुष्यो के मन में विभिन्न अवस्थाओ में रहते हैं। कभी-कभी वे प्रसुप्त रूप से

पातंजल-योगसूत्र—२ १८५

रहते हैं। तुम लोग अनेक समय 'शिशु के समान भोला'—यह वाक्य सुनते हो; परन्तु सम्भव है, इस शिशु के भीतर ही देवता या असुर का भाव विद्यमान हो, जो धीरे-धीरे समय पाकर प्रकाशित होगा। योगी में पूर्व कर्मों के फलस्वरूप ये संस्कार सूक्ष्म भाव से रहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वे अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में रहते हैं और योगीगण उन्हें दबाकर रख सकते हैं। उनमें उन सस्कारो को प्रकाशित न होने देने की शक्ति रहती है। कभी-कभी कुछ प्रबल सस्कार अन्य कुछ संस्कारो को कुछ समय तक के लिए दबाकर रखते हैं, किन्तु ज्योही वह दबा रखनेवाला कारण चला जाता है, त्योही वे पहले के सस्कार फिर से उठ जाते हैं। इस अवस्था को विच्छिन्न कहते हैं। अन्तिम अवस्था का नाम है उदार। इस अवस्था मे संस्कार-समूह अनुकूल परिस्थितियो का सहारा पाकर बडे प्रबल भाव से शुभ या अशुभ रूप से कार्य करते रहते हैं।

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥५॥

सूत्रार्थ—अनित्य, अपवित्र, दुःखकर और आत्मा से भिन्न पदार्थ में (क्रमशः) नित्य, पवित्र, सुखकर और आत्मा की प्रतीति 'अविद्या' है।

व्याख्या—इन समस्त सस्कारो का एकमात्र कारण है अविद्या। हमें पहले यह जान लेना होगा कि यह अविद्या क्या है। हम सभी सोचते हैं, "मै शरीर हूँ—शुद्ध, ज्योतिर्मय, नित्य, आनन्दस्वरूप आत्मा नही।" यह अविद्या है। हम लोग मनुष्य को शरीर के रूप मे ही देखते और जानते हैं। यह महान् भ्रम है।

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतैवास्मिता ॥६॥

सूत्रार्थ—दृक्-शक्ति और दर्शन-शक्ति का एकीभाव ही अस्मिता है।

व्याख्या—आत्मा ही यथार्थ द्रष्टा है; वह शुद्ध, नित्य-

१८६ राजयोग

पवित्र, अनन्त और अमर है। और दर्शन-शक्ति अर्थात् उसके व्यवहार मे आनेवाले यन्त्र कौन-कौनसे है ? चित्त, बुद्धि अर्थात् निश्चयात्मिका वृत्ति, मन और इन्द्रियां—ये उसके यन्त्र है। ये सब बाह्य जगत् को देखने के लिए उसके यन्त्रस्वरूप है, और उसकी इन सब के साथ एकरूपता को अस्मितारूप अविद्या कहते है। हम कहा करते है, 'मै चित्तवृत्ति हूँ', 'मै क्रुद्ध हुआ हूँ', 'मै सुखी हूँ'। पर सोचो तो सही, हम कैसे क्रुद्ध हो सकते हैं, कैसे किसी के प्रति घृणा कर सकते हैं ? आत्मा के साथ हमे अपने को अभिन्न समझना चाहिए। आत्मा का तो कभी परिणाम नही होता। यदि आत्मा अपरिणामी हो, तो वह कैसे इस क्षण सुखी, और दूसरे ही क्षण दु खी हो सकती है ? वह निराकार, अनन्त और सर्वव्यापी है। उसे कौन परिणामी बना सकता है? आत्मा सर्व प्रकार के नियमो के अतीत है। उसे कौन विकृत कर सकता है? ससार में कोई भी, आत्मा पर किसी प्रकार का कार्य नही कर सकता ।' तो भी हम लोग अज्ञानवश अपने आप को मनोवृत्ति के साथ एक-रूप कर लेते हैं और सोचा करते है कि हम सुख या दुःख का अनुभव कर रहे है।

सुखानुशयी रागः ॥७॥

सूत्रार्थ—जो मनोवृत्ति केवल सुखकर पदार्थ के ऊपर रहना चाहती है, उसे राग कहते हैं।

व्याख्या—हम किसी-किसी विषय मे सुख पाते है। जिसमें हम सुख पाते है, मन एक प्रवाह के समान उसकी ओर दौडता रहता है। सुख-केन्द्र की ओर दौडनेवाले मन के इस प्रवाह को ही राग या आसक्ति कहते हैं। हम जिस विषय मे सुख नहीं पाते, उधर हमारा मन कभी भी आकृष्ट नही होता। हम लोग

पातंजल-योगसूत्र-२ १८७

कभी-कभी नाना प्रकार की विचित्र चीजों में सुख पाते हैं, तो भी राग की जो परिभाषा दी गई है, वह सर्वत्र ही लागू होती है। हम जहां सुख पाते है, वही आकृष्ट हो जाते हैं।

दुःखानुशयी द्वेषः ॥८॥

सूत्रार्थ—दुखकर वस्तु पर पुनः-पुनः स्थितिशील एक विशेष अन्तःकरण-वृत्ति को द्वेष कहते हैं।

व्याख्या—जिसमें हम दुख पाते है, उसे तत्क्षण त्याग देने का प्रयत्न करते हैं।

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९॥

सूत्रार्थ—जो (पहले के मृत्यु के अनुभवों से) स्वभावत चला आ रहा है एवं जो विवेकशील पुरुषों में भी विद्यमान देखा जाता है, वह अभिनिवेश अर्थात् जीवन के प्रति ममता है।

व्याख्या—जीवन के प्रति यह ममता जीवमात्र मे प्रकट रूप से देखी जाती है। इस पर उत्तर-काल सम्बन्धी बहुत से मतो को स्थापित करने का प्रयत्न किया गया है। मनुष्य ऐहिक जीवन से इतना प्यार करता है कि उसकी यह आकाक्षा रहती है कि वह भविष्य में भी जीवित रहे। यह कहने की आवश्यकता नही कि इस युक्ति का कोई विशेष मूल्य नही है—पर इसमें सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि पाश्चात्यो के मतानुसार इस जीवन के प्रति ममता से भविष्य-जीवन की जो सम्भावना सूचित होती है, वह केवल मनुष्य के बारे में सत्य है, दूसरे प्राणियो के बारे मे नही। भारत में, पूर्वसंस्कार और पूर्वजीवन को प्रमाणित करने के लिए यह अभिनिवेश एक युक्तिस्वरूप हुआ है। मान लो, यदि समस्त ज्ञान हमे प्रत्यक्ष अनुभूति से प्राप्त हुए हों, तो यह निश्चित है कि हमने जिसका कभी प्रत्यक्ष-अनुभव नही किया,-