राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
पातंजल-योगसूत्र-३ २४१
पातंजल-योगसूत्र-३ २४१
समय क्या चल रहा है, यह नही जाना जा सकता। उसको जानने के लिए तो दो बार संयम करने की आवश्यकता होगी, पहले, शरीर के लक्षणों में, और उसके बाद मन में। तब योगी उस व्यक्ति के मन के समस्त भाव जान लेंगे।
कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे
चक्षुःप्रकाशासंयोगेऽन्तर्धानम् ॥२१॥
सूत्रार्थ—शरीर के रूप में संयम कर लेने से जब उस रूप को अनुभव करने की शक्ति रोक ली जाती है, तब आंख की प्रकाश-शक्ति के साथ उसका संयोग न रहने के कारण योगी अन्तर्धान हो जाते हैं।
व्याख्या—मान लो, कोई योगी इस कमरे में खड़े हैं। वे आपातदृष्टि से सबके सामने से अन्तर्धान हो सकते हैं। वे वास्तव में अन्तर्धान हो जाते हों, सो बात नही, पर हाँ, कोई उन्हें देख न सकेगा, बस इतना ही। शरीर का रूप और शरीर—इन दोनों को मानो वे अलग-अलग कर डालते हैं। जब योगी ऐसी एकाग्रता-शक्ति प्राप्त कर लेते हैं कि वे वस्तु के रूप और उस वस्तु को एक-दूसरे से अलग कर डालते हैं, तभी इस प्रकार की अन्तर्धान-शक्ति उन्हें प्राप्त होती है। उसमें अर्थात् रूप और उस रूपवान् वस्तु के पार्थक्य में संयम का प्रयोग करने से उस रूप को अनुभव करने की शक्ति में मानो एक बाधा पड़ती है; क्योंकि रूप और उस रूपविशिष्ट वस्तु के परस्पर संयुक्त होने पर ही हमें उस वस्तु का ज्ञान होता है।
एतेन शब्दाद्यन्तर्धानमुक्तम् ॥२२॥
सूत्रार्थ—इसके द्वारा ही शब्द आदि के अन्तर्धान होने की अर्थात् शब्द आदि को दूसरों की इन्द्रियगोचर न होने देने की भी व्याख्या कर दी गई।
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सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त-
ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥२३॥
सूत्रार्थ—शीघ्र फल उत्पन्न करनेवाला और देर से फल देनेवाला—ऐसे दो प्रकार के कर्म होते हैं। इनमें संयम करने से, अथवा अरिष्ट-नामक मृत्युलक्षणों से भी, योगीगण देहत्याग का ठीक समय जान लेते हैं।
व्याख्या—जब योगी अपने कर्म मे—अर्थात् अपने मन के उन सस्कारो में, जिनका कार्य आरम्भ हो गया है तथा उनमें, जिनका कार्य अभी आरम्भ नही हुआ है—सयम का प्रयोग करते हैं, तब वे उन सस्कारो के द्वारा, जिनका कार्य अभी आरम्भ नही हुआ है, यह ठीक जान लेते हैं कि उनकी मृत्यु कब होगी। किस समय, किस दिन, कितने बजे, यहाँ तक कि कितने मिनट पर उनकी मृत्यु होगी—यह सब उन्हें ज्ञात हो जाता है। हिन्दू लोग मृत्यु की इस निकटता को जान लेना विशेष आवश्यक समझते हैं, क्योकि गीता मे यह उपदेश है कि मृत्यु-समय के विचार आनेवाले जीवन को नियमित करने के लिए विशेष प्रयोजनीय कारणस्वरूप है।
मैत्र्यादिषु बलानि ॥२४॥
सूत्रार्थ—मैत्री आदि गुणों (१।३३) में संयम करने से वे सब गुण अत्यन्त प्रबल भाव धारण करते हैं।
बलेषु हस्तिबलादीनि ॥२५॥
सूत्रार्थ—हाथी आदि के बल में सयम का प्रयोग करने से योगी के शरीर में उस-उस प्राणी के सदृश बल आ जाता है।
व्याख्या—जब योगी यह सयम-शक्ति प्राप्त कर लेते हैं, तब यदि वे बल की इच्छा करे, तो हाथी के बल मे सयम का प्रयोग करके वे हाथी के समान बल प्राप्त कर लेते हैं।