राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
२६ राजतरंगिणी
लौकिकेऽब्दे चतुर्विंशे शककालस्य सांप्रतम् ।
सप्तत्याऽभ्यधिकं यातं सहस्रं परिवत्सराः ॥ ५२ ॥
५२. लौकिक संवत् का चौबीसवां वर्ष है; इस प्रकार संवत् के एक हजार सत्तर वर्ष अब
तक व्यतीत हो चुके हैं।
श्रीवर ने तृतीय राजतरंगिणी लिखी। इसमें जैनुल
आवदीन से मुहम्मद शाह ( सन् १४८४ ई० ) तक
का वर्णन मिलेगा । उसने अपनी आंखो देखा वर्णन
किया है। श्रीवर के पश्चात् श्री प्रजाभट्ट ने राजा-
वली पिटक लिखा। उसने सन् १४८५ से सन्
१५१३ ई० अर्थात् लौकिक संवत् ६१ से ८६ तक
अर्थात् २८ वर्ष का मुहम्मद शाह ( सन् १४८४-
१४८६ ) तथा फतह शाह (सन् १४८६-१५१४ ई०)
का इतिहास दिया है। तत्कालीन अराजकता से
ऊबकर प्रजाभट्ट ने आगे नही लिखा। प्रजाभट्ट ने
जहाँ तक लिखा था उसके पश्चात् बुध्यात्मज के
पुत्र शुक ने मुगल शासन काल तक का इतिहास लिखा
है। इसी को चौथी राजतरंगिणी की संज्ञा दी गयी
है। उसने फतह शाह ( सन् १४८६-१५१४ ई० )
के समय से लेकर मोमरा खाँ (सन् १५७८-१५८६)
तक अर्थात् किस प्रकार जलालुद्दीन अकबर ने
कश्मीर को अपने राज्य मे मिलाया। लगभग १००
वर्षों की घटनाओ का वर्णन किया है।
शुक ने अपनी राजतरंगिणी में मंगलाचरण के
पश्चात् कल्हण के प्रायरुथन की शैली अपनाया है।
उसने अपने पूर्व के इतिहासकारों का वर्णन किया
है। भारतीय संस्कृत साहित्य तथा कश्मीर का यह
अन्तिम इतिहास ग्रन्थ है। चारो राजतरंगिणियो
की विशेषता यह है कि निष्पक्ष रूप से विचारो को
व्यक्त किया गया है। इसके पश्चात् मुमलिम
इतिहासकारो का उदय होता है। सबका आधार
राजतरंगिणी है। परन्तु उसे तोड़-मरोड़ कर रखने
का प्रयास किया गया है।
साधिकारिक कश्मीर के इतिहास का वर्णन पुनः
अकबर के राज्यकाल में मिलता है। अकबर के
नवरत्न तथा मन्त्री अबुल फजल ने आइने अकबरी
मे 'सूबा कश्मीर' पर एक अध्याय लिखा है। उसमें
कश्मीर के हिन्दू राजाओं और मुगलों तक हुए
मुस्लिम राजाओ की तालिका दी गयी है। उनका
संक्षिप्त वर्णन लिखा गया है। कश्मीर की तत्कालीन
सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाज, तौल, बाट, शासन
और दर्शनीय स्थानों का वर्णन निष्पक्ष भाव से
किया गया है। आज तक लिखे इतिहासों का मूल
साधिकारिक स्रोत, उक्त ग्रन्थ है। अतएव मैंने भी
उनका ही आश्रय लिया है। मध्यकालीन तथा कुछ
आधुनिक लेखको ने जिस तरह कश्मीर के इतिहास
को तोड़-मरोड कर उसे दूसरे रंग मे डालने का
प्रयास किया है। उसका मैने उदाहरण देकर
आलोचना की है। सर्व साधारण में उनके लेखों
के कारण भ्रम उत्पन्न हो गया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५२ में 'त्याभ्यधि' का पाठभेद
'त्याह्यधि' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५२ (१) लौकिक संवत् : कश्मीरी संवत् को
लौकिक किंवा सप्तर्षि संवत् कहते हैं। अल्बेरुनी
ने अपने पर्यटन वर्णन में काश्मीरी संवत् का उल्लेख
किया है। कश्मीर में शताब्दी छोड़कर लिखने की
प्रथा है। अतएव शताब्दी न देकर केवल चौबीस का
उल्लेख कल्हण ने किया है। सन् ईसवी लिखते समय
आज भी प्रथा है कि १९६८ न लिखकर केवल ६८
लिखा जाता है। अतएव लौकिक वर्ष २४ का अर्थ
है २४२४ लौकिक वर्ष। वह जिस समय राजतरं-
गिणी लिख रहा था उसका लौकिक संवत् देता
है। इस प्रकार उसका राजतरंगिणी का रचना
काल साधिकारिक रूप से प्रकट हो जाता है।
प्रथम तरंग ९७
प्रायस्तृतीयगोनन्दादारभ्य शरदां तदा ।
द्वे सहस्रे गते त्रिंशदधिकं च शतत्रयम् ॥ ५३॥
५३. प्रायः१ गोनन्द तृतीय के राज्याभिषेक से अबतक २३३० वर्ष व्यतीत हो चुके हैं।
वर्षाणां द्वादशशती षष्टिः षड्भिश्च संयुक्ता ।
भूभुजां कालसंख्यायां तद्द्वापञ्चाशतो मता ॥ ५४ ॥
५४. उन बावन लुप्त राजाओं का राज्य काल ऐसा मत है कि १२६६ वर्ष होता है।
ऋक्षादृक्षं शतेनाब्दैर्यात्सु चित्रशिखण्डिषु ।
तच्चारे संहिताकारैरेवं दत्तोऽत्र निर्णयः ॥ ५५ ॥
५५. सप्तर्षि एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र पर एक सौ वर्षों में जाते हैं। इस प्रकार की गति के कारण संहिताकार ने इस समस्या के निराकरण निमित्त हल निकाल दिया है।
कलि संवत् पच्चीस चैत्र सुदी एक को ईसापूर्व
३०७५-७६ होता है। शक संवत् सन् ईस्वी से
७८ वर्ष पश्चात् आरम्भ होता है। कल्हण ने राज-
तरंगिणी की रचना शक संवत् १०७० में प्रारम्भ
की थी । यह काल लौकिक संवत् का ४२२४ वाँ
वर्ष होता है। यह कश्मीरी संवत् अबतक कश्मीर
तथा उसके आस पास पर्वतीय क्षेत्र में चलता है।
लौकिक संवत् २५ कलि संवत् से आरम्भ होता
है। शक संवत् का प्रारम्भ ३१५४ वर्ष में होता है।
कल्हण के और शक संवत् के समय में १०७० वर्ष
का अन्तर होता है। इस प्रकार ३१५४ + १०७०
वर्ष मिलकर ४२२४ वर्ष हो जाते हैं।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५३ में 'गोनन्दादा' का पाठभेद,
'गोनर्दादा' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
५३ (१) प्राय — प्रायः शब्द का प्रयोग कल्हण
ने किया है। वह निश्चित रूप से समय निर्धारित
नही कर सका है। उसके समय जो कुछ सामग्री
प्राप्त थी उसी पर उसने मोटे तौर पर हिसाब
लगाया था ।
श्लोक संख्या ४८ में दिया गया वर्ष काल
२२६८ वर्ष है। कल्हण के दिये 'राजत्व के वर्ष
कालों का योग तरंग दो से आठ तक का १३२८
वर्ष मोटे तौर पर होता है। इस २२६८ वर्ष मे
तरंग एक के राजाओं का १२६६ वर्ष दिया काल
श्लोक सं० ५४ का घटा दें तो १००२ वर्ष आता
है। यह काल गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर प्रथम का
राजत्व काल होता है। यदि वर्ष काल १३२८ +
१००२ का योग कर दिया जाय तो २३३० वर्ष काल
आता है। यही काल गोनन्द तृतीय से कल्हण तक
का राज्य काल होगा ।
५४ (१) मत : कल्हण ने मत शब्द का यहाँ
प्रयोग किया है। उसने काल गणना स्वयं की थी ।
तत्कालीन प्राप्त सामग्रियों के आधार पर वह एक
निश्चित 'मत' पर पहुँचा होगा । अतएव इस श्लोक
में उसने अपना मत प्रकट किया है। किसी प्राचीन
काल गणना के आधार पर निश्चयात्मक बात नहीं
कहा है। मत में विभिन्नता हो सकती है। कोई
मत नही मान सकता । अथवा भविष्य में यह मत
गलत हो सकता है। किन्तु एक बात निश्चयात्मक
रूप से कह देने से वह प्रमाण मान लिया जाता है।
कल्हण स्पष्ट संकेत करता है कि यह काल गणना
स्वतः प्रमाण नहीं किन्तु मत मात्र है ।
पाठभेद :
श्लोक सख्या ५५ में 'तच्चारे' का पाठभेद
'उच्चारे' मिलता है ।
१३
९८ राजतरंगिणी
आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ ।
षड्द्विकपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्यस्य ॥ ५६ ॥
५६. जिस समय राजा युधिष्ठिर पृथ्वी पर शासन कर रहे थे उस समय मुनि१ मघा२ पर
थे । युधिष्ठिर३ का राज्य काल शक संवत् से २५२६ वर्ष पूर्व था ।
पादटिप्पणियाँ :
५५ (१) संहिता : यहाँ पर संहिताकार से
तात्पर्य बृहत्संहिताकार से है । कल्हण यहाँ बृहत्
संहिता का ( १२ : ३ ) उल्लेख करता है ।
कल्हण ने उक्त श्लोक संख्या ५१ मे जिस मत
का प्रतिपादन किया है। उसके प्रमाण में बृहत्
सहिता का उल्लेख करता है। इस प्रकार कुरु
पाण्डव और गोनन्द प्रथम का काल शक संवत् से
२५२६ वर्ष पूर्व है। यह समय कलि संवत् ६५३
होता है ।
५६ (१) मुनि का अर्थ यहाँ सप्तर्षि से है ।
(२) मघा से तात्पर्य मघा नक्षत्र से है ।
(३) युधिष्ठिर : युधिष्ठिर के राज्याभिषेक का
समय कल्हण प्रथम गोनन्द का प्रथम वर्ष राजत्व
काल देता है। यही समय उसने अपनी काल गणना
के लिये आधार माना है ।
राजतरंगिणी श्लोक १८४ मे कल्हण
गोनन्द प्रथम का पौत्र गोनन्द द्वितीय को कहता है ।
कल्हण गोनन्द द्वितीय को महाभारत काल का सम-
कालीन मानता है । इसमे कोई विरोध नही मालूम
होता। युधिष्ठिर के अभिषेक तथा महाभारत युद्ध
काल के आरम्भ मे वर्षों का अन्तर है। इस मध्य-
वर्ती काल मे एक राजा का घोर हो जाना कोई
असम्भव नही बात मालूम पडती ।
महाराज युधिष्ठिर के काल निर्णय के सम्बन्ध
में विभिन्न मत हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव से
श्रीमद्भागवत (एकादश स्कन्ध) मे कहा है कि
उनकी मृत्यु के पश्चात् कलियुग का प्रवेश होगा।
कल्हण कहता है कि मघा नक्षत्र पर जब सप्तर्षि
थे । उस समय युधिष्ठिर राज्य कर रहे थे । श्री-
मद्भागवत के बारहवें स्कन्ध के द्वितीय भाग में
उल्लेख है कि जब सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर होंगे तब
कलियुग का प्रवेश होगा। जिस दिन भगवान्
श्रीकृष्ण का स्वर्गारोहण होगा उसी दिन कलियुग
का आरम्भ होगा। कल्हण वराहमिहिर की तिथि
मानता है। युधिष्ठिर शक संवत् से २५२६ वर्ष
पूर्व हुए थे। अर्थात् कलि सवत् ६५३ था । दूसरे
वह मानते हैं कि गोनन्द कलियुग के आरम्भ मे हुआ
था। इस मत के मानने वाले कहते हैं कि महा-
भारत द्वापर के अन्त में हुआ था । कल्हण और
नीलमत पुराण दोनों गोनन्द से काश्मीर का इतिहास
प्रारम्भ करते हैं।
कलि संवत् का आरम्भ ३१०१ वर्ष ई० पू०
से माना जाता है। यहोल के जैन शिलालेख से
प्रकट होता है कि यहोल मन्दिर का निर्माण राजा
पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंशीय ने महाभारत के
३७३५ वर्ष पश्चात् अर्थात् वर्तमान प्रचलित शक
संवत् ५५६ में कराया था । इस प्रकार स्पष्ट
होता है कि इस समय के प्रचलित शक सवत् के
३१९७ वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था ।
आइने अकबरी मे अबुलफजल लिखता है कि
विक्रमादित्य से ३०४४ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर राजा
हुए थे ।
राजतरंगिणी के प्रथम तरंग के श्लोक ४४
तथा ४९ से प्रकट होता है कि महाभारत द्वापर
के अन्त में हुआ था । मिताक्षरा की भूमिका में
श्री बापूदेव शास्त्री लिखते हैं कि कलियुग की प्रथम
शताब्दी में परीक्षित् का जन्म हुआ था। राजा
प्रथम तरंग ९९
कश्मीरेन्द्रः स गोनन्दो वेल्लद्गङ्गादुकूलया ।
दिशा कैलासहासिन्या प्रतापी पर्युपास्यत ॥ ५७ ॥
५७. वह दिशा १ जिसका तुषार मण्डित जाज्वल्यमान कैलास हास था, जिसका दुकूल
कल्लोलिनी गंगा थी २, प्रतापी काश्मीरेन्द्र गोनन्द ३ की उपासना करती थी ।
जनमेजय के समय कलियुग के १२५ वर्ष व्यतीत
हो चुके थे । श्री तारानाथ तर्कवाचस्पति का मत
है कि कलियुग के ८० वर्ष बीतने पर राजा परीक्षित
का जन्म हुआ था ।
ज्योतिष ग्रंथ खंड-खाद्य के रचनाकार ब्रह्मगुप्त
थे । ( शक ५२० संवत् ) उसने प्राचीन ज्योतिष
आर्यभट के आधार पर गणना की है कि विक्रमा-
दित्य के समय कलि के ३०४४ वर्ष व्यतीत हो
चुके थे ।
निर्णय सिन्धु से मालूम होता है कि शक संवत्
में यदि ३१७९ वर्ष और जोड़ दिया जाय तो कलि-
युग का आरम्भ तथा युधिष्ठिर के राज्यकाल का
ज्ञान हो जायगा ।
नीलमत पुराण में गोनन्द का उल्लेख आता है ।
कल्हण ने गोनन्द सम्बन्धी सामग्री नीलमत से ली
होगी । वहाँ नीलमत का कुछ श्लोक उद्धृत करना
ऐतिहासिक दृष्टि से उचित होगा ।
इममर्थं पुरा जातु गोनन्दाख्यो नृपोत्तमः ।
तीर्थयात्राप्रसंगेन बृहदश्वमुपागतम् ॥
२८ : ४८
गोनन्द उवाच :
मन्वन्तरेषु पूर्वेषु नासीद्देशमिमं किल ।
काश्मीराख्यं बभूवास्मिन्कथं वैवस्वतेऽन्तरे ॥
२९ : ५०
एवमुक्त्वा स गोनन्दो बृहदश्वेन भूभुजा ।
३७२ : १५८
एवमुक्तोऽपि गोनन्दो बृहदश्वेन भूमिप ।
प्रावर्तयत् समुच्छिन्नानाचारान् कालदोषतः ॥
८७५ : १०४६
काश्मीरकस्तु गोनन्दो बृहदश्वेन भाषितम् ।
श्रुत्वा स्वकीयम् आचारम् किमपृच्छदतः परम् ॥
७७८ : १०४९
वैशम्पायन :
काश्मीरकस्तु गोनन्दो बृहदश्वेन भाषितम् ।
श्रुत्वोवाच मुनिश्रेष्ठं बृहदश्वं नराधिपः ॥
८७९ : १०४९
वैशम्पायन उवाच :
एवमुक्त्वा स गोनन्दं बृहदश्वो नराधिपम् ।
धर्मात्मा तीर्थयात्रार्थं जगामाभीप्सितां गतिम् ॥
१३६६ : १५८२
बहु मेने तथात्मानम् गोनन्दः समरप्रियः ।
स प्रशास वसुधां राजा धर्मानुसारतः ॥
१३७९ : १५८३
गोनर्द और गोनन्द दो भिन्न नाम है । गोनर्द
एक प्रदेश का नाम है । हेमचन्द्र ने गोनर्द को योग-
सूत्र तथा महाभाष्य के रचयिता पतञ्जलि मुनि
का निवास स्थान माना है । गोनर्द उत्तर प्रदेश के
गोण्डा जिला का प्राचीन नाम है । गोनर्द व्यक्ति
विशेष का नाम भी हो सकता है ।
पाठभेद :
'कश्मारेन्द्रा' का 'काश्मीरेन्द्रः'; 'नन्दा' का
नदों' तथा 'दुकूलया' का 'दुगूलया' पाठभेद मिलता
है ।
टिप्पणियाँ :
५७ (१) दिशा : यहाँ दिशा का अर्थ उत्तर दिशा
होगा । कैलास तथा गंगा दोनो उत्तर दिशा मे हैं ।
कश्मीर स्वतः उत्तर दिशा में हैं । कश्मीर की सीमा
का भी वर्णन परोक्ष रूप से कल्हण ने किया है।
तृतीय तरङ्ग: मेघवाहन, मातृगुप्त व प्रवरसेन का शासन
१०० राजतरंगिणी
विहाय देहं शेषाहेर्र्विषाश्लेषभयादिव ।
भूर्गारुत्मतरत्नाङ्के भेजे तस्य भुजे स्थितिम् ॥ ५८ ॥
५८. पृथ्वी शेषनाग के विष के भयभीत होकर शेष नाग के शरीर का त्याग कर गरुड़ के
पवित्र रत्नों द्वारा आभूषित राजा की भुजाओं का आश्रय थी।
काश्मीर के उत्तर पूर्व निस्सन्देह कैलास है। गंगा काश्मीरो सिन्धु नदी को गंगा तथा वितस्ता का
पूर्व में पडती है। वह कश्मीर की कभी सीमा यमुना कहा गया है। नीलमत पुराण का उल्लेख
नहीं हो सकती। किन्तु कश्मीर में गंगा से अभि- यहाँ संगत होगा।
प्राय सिन्धु नदी से भी लिया जाता रहा है। नील- गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा।'
मत पुराण के पद- 'गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता —294 : २९७-२१८
यमुना तथा' से प्रतीत होता है कि यहाँ उस सिन्धु ५७ (३) गोनन्द : गोनन्द काल से सीमा का
से तात्पर्य है जो दरस उपत्यका से प्रवाहित होती अनुमान किया जा सकता है। नीलमत पुराण में इस
काश्मीरी प्रयाग के समीप वितस्ता में आकर मिलती काल का उल्लेख है :
है। जोनराज भी सिन्धु से मनसबल सरोवर कुरुपाण्डववेलायां भूमिर्भगवता स्वयम् ।
में नहर लाने की बात का उल्लेख करता है। प्राचीन पाचित्वाभूरितिसुतानवतीर्णान् जघान यत् ॥
लेखकों ने सिन्धु का उद्गम गंगा झील अर्थात् गंगबल 10 : १०
के उत्तर पूर्व हरमुख शिखर के हिमानी को माना तस्मिन् कालेऽथ सम्भूतू राजा विशदकीर्तिमान् ।
है। कश्मीर में अनेक जल स्रोतों को गंगा नाम काश्मीरान् पालयन् सौम्य गोनन्द इति संज्ञया ॥
दिया गया है। यहाँ दुकूल अर्थात् सूक्ष्म वस्त्र से 11 : ११
अर्थ इसी नदी से लगाना चाहिए। मैं जोजिला युधिष्ठिर तथा अर्जुन के नामो का उल्लेख मुझे
पास से श्रीनगर लौट रहा था। मार्ग में सडक नीलमत में नहीं मिला। कश्मीर के प्रसिद्ध नागों
सिन्धु के तट से जाती है। मुझे कल्हण का यह में युधिष्ठिर तथा अर्जुन का नाम आता है। महा-
श्लोक याद था। सिन्धु का जल पाषाण शिलाओं से भारत के राजा तथा उसके पात्र के रूप में वर्णन
टकराता उछलता इस प्रकार चलता है कि मालूम नही मिलता।
पडता है उज्ज्वल महीन दुकूल हवा में भर कर उड़ने हवोत्सवः शठः शाक्यः शत्रुघ्नो रामलक्ष्मणौ ।
की कोशिश कर रहा है। यह मत मान्य नहीं किया महादेवः कामपालो गोशिराः सयुधिष्ठिरः ॥
जा सकता कि इस श्लोक द्वारा कश्मीर मण्डल की 913 : १०७९ : १०८०
सीमा गोनन्द के समय कैलास तथा वर्तमान गंगा पानीयइचाप्यनीकश्च कनकाख्यः कलिककः ।
नदी अर्थात् उत्तर प्रदेश तक थी। अर्जुनः पौण्डरीकश्च धनदो नदकूबरः ॥
886 : १०५६
(२) गंगा- काश्मीरी साहित्य में सिन्धु को पाठभेद :
गंगा अर्थात् उत्तर गंगा नाम से सम्बोधित किया श्लोक स० ५८ में 'देहम्' का 'दिशम्'; 'विषाश्ले'
गया है। यह हरमुख शिखर के ईशान कोणीय को 'दोर्विषाश्ले' तथा 'रत्नाङ्के' का 'रत्नाङ्के'
हिमानी अर्थात् ग्लेशियर के अधोभाग में है। सिन्धु पाठभेद मिलता है।
नदी द्रस उपत्यका तथा हरमुख पर्वत के उत्तरी पर्व-
तीय क्षेत्रों के जल को ग्रहण करती है। वितस्ता की
सिन्धु सबसे बड़ी शाखा नदी है।
[Page Header]
प्रथम तरंग १०१
[Verse 59]
साहायकार्थमाहूतो जरासन्धेन बन्धुना ।
स संरुरोध कंसारेर्मथुरां पृथुभिर्बलैः ॥ ५९ ॥
[Hindi Translation]
५९. अपने बन्धु जरासन्ध १ के सहायतार्थ आवाहन पर राजा गोनन्द ने २ कंस के शत्रुओं
को मथुरा नगर में अपनी सेना से घेर लिया ।
[Left Column]
पादटिप्पणियाँ :
५८ गरुडप्रियरत्न : गरुड का प्रिय रत्न
मरकत किंवा हरिमणि । यहाँ कल्हण अत्यन्त सुन्दर
रूपक खींचा है । इससे ज्ञात होता है । कल्हण ने
शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन किया था ।
रत्नका गुण उसकी चमक किंवा ज्योति है ।
रत्न गरुड़ का आभूषण है । नाग तम हैं । उनका
अति भयंकर विषैला रूप काला है । तम का रंग
काला होता है । ज्योति एवं तम का संघर्ष विश्व
का मूल है । गरुड़ तथा सर्पों किंवा नागों के परम्परा
गत संघर्ष का यही आधार है । इसकी लाक्षणिक
मूर्तियाँ कुषाण काल की मथुरा संग्रहालय में
संग्रहीत है ।
गरुड का रूप विग्रह है । पुरुष एवं पत्नी
का मिश्रित आकार नरसिंह के समान है । विष्णु के
वाहन है । पक्षियों के राजा है । गरुड़ का मुख्य
लक्षण गति है । यह गति छंद युक्त कही गयी है ।
भागवत में छंदोमय गरुड़ कहा गया है । बिना दो
पंखों के गति नहीं होती । इसी प्रकार बिना दो
पदों के छंद नहीं होता । गति एक छंद किंवा ताल
युक्त क्रिया मानी गयी है । पंखों के सिकुड़ने
और फैलनेसे पक्षी गतिशील होता है । वैदिक
पुरुष इसी को संकुचन और प्रसारण कहते हैं ।
ऋग्वेद में गरुड़ को, अग्नि, इन्द्र, मित्र, वरुण आदि
के समकक्ष रखा गया है ।
शेष नाग अर्थात् अन्धकार से पृथ्वी भयभीत
होती है । अन्धकार ज्योति से दूर होता है । गरुड़
को देखते ही अन्धकार किंवा नाग भागते हैं ।
कल्हण गोनन्द की भुजाओं पर गरुड़प्रिय रत्नों
का उल्लेख कर बताना चाहता है कि राजा की
[Right Column]
भुजाओं में अमित बल था । वे पृथ्वी को भयहीन,
अन्धकार हीन करने की भुजबल से सामर्थ्य रखते थे !
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५९ में 'स संरु' का पाठभेद
'समं रु' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
५९ (१) जरासंध : जरासंध का पिता वायु
पुराण के अनुसार नभग था । भागवत, विष्णु तथा
मत्स्य पुराणों के मतानुसार वह बृहद्रथ का पुत्र था ।
अतएव जरासंध को बार्हद्रथि भी कहते हैं । हरिवंश
पुराण के अनुसार उसके पिता का नाम संभव था ।
काशीराज की दो युगल कन्याएँ थी । उन दोनों
से बृहद्रथ ने विवाह किया था । उन्हें बहुत दिनों
तक सन्तान नहीं हुई । काक्षोवत पुत्र चन्द्रकौशिक
ने राजा को पुत्रप्राप्ति निमित्त एक आम का फल
दिया । राजा ने दोनो पत्नियों को आधा आधा फल
खिला दिया । कालान्तर में दोनों रानियों के गर्भ से
आधा आधा शरीर के बालक उत्पन्न हुए । उन्होंने
नवजात शिशु के चौराहा पर रखवा दिया ।
जरा नामक राक्षसी ने उन्हें जोड़ दिया अर्थात्
दोनो टुकड़ों को सन्धि में मिला दिया । शिशु जी
उठा । राक्षसी उसे ले जाना चाहती है । बालक रोने
लगा । रुदन सुनकर राजा बाहर आया । राक्षसी
ने बालक राजा को दे दिया । बालक का नाम
जरासंध पड़ा । ( महाभारत सभापर्व १६-१७ तथा
मत्स्य पुराण )
भागवत के अनुसार बृहद्रथ के एक ही पत्नी
के बालक के दो अलग अलग भाग पैदा हुए । जरा
राक्षसी ने मन्त्र बल से उन्हें जोड़ दिया । अतएव
उसका नाम जरासंध पड़ा । ( भागवत ९:२१-२२)
१०० राजतरंगिणी
विहाय देहं शेपाहेर्विपक्षश्लेषभयादिव ।
भूर्गारुत्मतरत्नाङ्के भेजे तस्य भुजे स्थितिम् ॥ ५८ ॥
५८. पृथ्वी शेषनाग के विष के भयभीत होकर शेष नाग के शरीर का त्याग कर गरुड़ के
पवित्र रत्नों¹ द्वारा आभूषित राजा की भुजाओं का आश्रय थी ।
काश्मीर के उत्तर पूर्व निस्संदेह कैलास है । गंगा
पूर्व में पडती है। वह कश्मीर की कभी सीमा
नहीं हो सकती । किन्तु कश्मीर में गंगा से अभि-
प्राय सिन्धु नदी से भी लिया जाता रहा है । नील-
मत पुराण के पद-'गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता
यमुना तथा' से प्रतीत होता है कि यहाँ उस सिन्धु
से तात्पर्य है जो दरस उपत्यका से प्रवाहित होती
काश्मीरी प्रयाग के समीप वितस्ता में आकर मिलती
है। जोनराज भी सिन्धु से मनसाबल सरोवर
में नहर लाने की बात का उल्लेख करता है। प्राचीन
लेखकों ने सिन्धु का उद्गम गंगा झील अर्थात् गंगबल
के उत्तर पूर्व हरमुख शिखर के हिमानी को माना
है। कश्मीर में अनेक जल स्रोतो को गंगा नाम
दिया गया है। यहाँ दुकूल अर्थात् सूक्ष्म वस्त्र से
अर्थ इसी नदी से लगाना चाहिए । मैं जोजिला
पास से श्रीनगर लौट रहा था । मार्ग में सड़क
सिन्धु के तट से जाती है। मुझे कल्हण का यह
श्लोक याद था। सिन्धुका जल पाषाण शिलाओ से
टकराता उछलता इस प्रकार चलता है कि मालूम
पडता है उज्ज्वल महीन दुकूल हवा में भर कर उड़ने
की कोशिश कर रहा है। यह मत मान्य नहीं किया
जा सकता कि इस श्लोक द्वारा कश्मीर मण्डल की
सीमा गोनन्द के समय कैलास तथा वर्तमान गंगा
नदी अर्थात् उत्तर प्रदेश तक थी ।
(२) गंगा - काश्मीरी साहित्य में सिन्धु को
गंगा अर्थात् उत्तर गंगा नाम से सम्बोधित किया
गया है। यह हरमुख शिखर के ईशान कोणीय
हिमानी अर्थात् ग्लेशियर के अधोभाग में है। सिन्धु
नदी इस उपत्यका तथा हरमुख पर्वत के उत्तरी पर्व-
तीय क्षेत्रों के जल को ग्रहण करती है। वितस्ता की
सिन्धु सबसे बडी शाखा नदी है।
काश्मीरी सिन्धु नदी को गंगा तथा वितस्ता को
यमुना कहा गया है। नीलमत पुराण का उल्लेख
यहाँ संगत होगा ।
गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा ।'
—294 : २४७-२४८
५७ (३) गोनन्द : गोनन्द काल से सीमा का
अनुमान किया जा सकता है। नीलमत पुराण में इस
काल का उल्लेख है :
कुरुपाण्डववेलायां भूमिर्भगवता स्वयम् ।
पाविताभूरितिसुतानवतीर्णान् जघान यत् ॥
10 : १०
तस्मिन् कालेऽत्र समभूत् राजा विशदकीर्तिमान् ।
काश्मीरान् पालयन् सौम्य गोनन्द इति संशया ॥
11 : ११
युधिष्ठिर तथा अर्जुन के नामो का उल्लेख मुझे
नीलमत में नही मिला । कश्मीर के प्रसिद्ध नागों
मे युधिष्ठिर तथा अर्जुन का नाम आता है। महा-
भारत के राजा तथा उसके पात्र के रूप मे वर्णन
नहीं मिलता ।
हवोत्प्लवः शठः शाण्यः शत्रुघ्नो रामलक्ष्मणौ ।
महादेवः कामपालो गोशिराः सयुधिष्ठिरः ॥
913 : १०७९ : १०८०
पानीयश्चाप्यर्नाकश्च कनकाख्यः कलिंककः ।
अर्जुनः पौण्डरीकश्च धनदो नदकूबरः ॥
886 : १०५६
पाठभेद :
श्लोक सं० ५८ में 'देहम्' का 'दिशम्'; 'विपक्षश्ले'
की 'ह्यैवंपक्ष्ले' तथा 'रत्नाङ्के' का 'रत्नाङ्गे'
पाठभेद मिलता है ।
प्रथम तरंग १०१
साहायकार्थमाहूतो जरासन्धेन बन्धुना ।
स संरुरोध कंसारेर्मथुरां पृथुभिर्बलैः ॥ ५९ ॥
५९. अपने बन्धु जरासन्ध १ के सहायतार्थ आवाहन पर राजा गोनन्द ने २ कंस के शत्रुओं
को मथुरा नगर में अपनी सेना से घेर लिया ।
पादटिप्पणियाँ :
५८ गरुड़प्रियरत्न : गरुड़ का प्रिय रत्न
मरकत किंवा हरित्मणि । यहाँ कल्हण अत्यन्त सुन्दर
रूपक बाँधा है । इससे ज्ञात होता है । कल्हण ने
शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन किया था ।
रत्नका गुण उसकी चमक किंवा ज्योति है ।
रत्न गरुड़ का आभूषण है । नाग तम है । उनका
अति भयंकर विषैला रूप काला है । तम का रंग
काला होता है । ज्योति एवं तम का संघर्ष विश्व
का मूल है । गरुड़ तथा सर्पों किंवा नागों के परम्परा
गत संघर्ष का यही आधार है । इसकी लाक्षणिक
मूर्तियाँ कुषाण काल की मथुरा संग्रहालय में
संग्रहीत हैं ।
गरुड़ का रूप विग्रह है । पुरुष एवं पत्नी
का मिश्रित आकार नरसिंह के समान है । विष्णु के
वाहन हैं । पक्षियों के राजा हैं । गरुड़ का मुख्य
लक्षण गति है । यह गति छंद युक्त कही गयी है ।
भागवत में छंदोमय गरुड़ कहा गया है । बिना दो
पंखों के गति नहीं होती । इसी प्रकार बिना दो
पदों के छंद नहीं होता । गति एक छंद किंवा ताल
युक्त क्रिया मानी गयी है । पंखों के सिकुड़ने
और फैलनेसे पक्षी गतिशील होता है । वैदिक
पुरुष इसी को संकुचन और प्रसारण कहते हैं ।
ऋग्वेद में गरुड़ को, अग्नि, इन्द्र, मित्र, वरुण आदि
के समकक्ष रखा गया है ।
शेष नाग अर्थात् अन्धकार से पृथ्वी भयभीत
होती है । अन्धकार ज्योति से दूर होता है । गरुड़
को देखते ही अन्धकार किंवा नाग भागते हैं ।
कल्हण गोनन्द की भुजाओं पर गरुड़प्रिय रत्नों
का उल्लेख कर बताना चाहता है कि राजा की
भुजाओ में अमित बल था । वे पृथ्वी को भयहीन,
अन्धकार हीन करने की भुजबल से सामर्थ्य रखते थे ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५९ में 'स संरु' का पाठभेद
'समं रु' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
५९ (१) जरासंध : जरासंध का पिता वायु
पुराण के अनुसार नभस् था । भागवत, विष्णु तथा
मत्स्य पुराणों के मतानुसार वह बृहद्रथ का पुत्र था ।
अतएव जरासंध को बार्हद्रथि भी कहते हैं । हरिवंश
पुराण के अनुसार उसके पिता का नाम संभव था ।
काशीराज की दो युगल कन्याएँ थीं । उन दोनों
से बृहद्रथ ने विवाह किया था । उन्हें बहुत दिनों
तक सन्तान नहीं हुई । काक्षीवत पुत्र चन्द्रकौशिक
ने राजा को पुत्रप्राप्ति निमित्त एक आम का फल
दिया । राजा ने दोनों पत्नियों को आधा आधा फल
खिला दिया । कालान्तर में दोनों रानियों के गर्भ से
आधा आधा शरीर के बालक उत्पन्न हुए । उन्होंने
नवजात शिशु के चौराहा पर रखवा दिया ।
जरा नामक राक्षसी ने उन्हें जोड़ दिया अर्थात्
दोनों टुकड़ों को सन्धि में मिला दिया । शिशु जी
उठा । राक्षसी उसे ले जाना चाहती है । बालक रोने
लगा । रुदन सुनकर राजा बाहर आया । राक्षसी
ने बालक राजा को दे दिया । बालक का नाम
जरासंध पड़ा । (महाभारत सभापर्व १६-१७ तथा
मत्स्य पुराण)
भागवत के अनुसार बृहद्रथ के एक ही पत्नी
के बालक के दो अलग अलग भाग पैदा हुए । जरा
राक्षसी ने मन्त्र बल से उन्हें जोड़ दिया । अतएव
उसका नाम जरासंध पड़ा । (भागवत ९.२२.२८)
१०२ राजतरंगिणी
तेनोपकूलं कालिन्द्याः स्कन्धावारं न्यभ्रता ।
याद्वीहसितैः सार्धं योधानां मीलितं यशः ॥ ६० ॥
६०. कालिन्दी पुलिन १ में काश्मीरी सेना ने जिस समय अपना शिविर स्थापित किया उस
समय यादवीय सेना का गौरव यादवी-ललनाओं की स्मित रेखाओं के साथ लुप्त हो गया ।
एकदा सर्वतो भग्नाः स्वसेनास्त्रातुमुद्यतः ।
तं संसरोध योद्धारं संगरे लाङ्गलध्वजः ॥ ६१ ॥
६१. एक समय पलायनोन्मुख भग्न यादवी सेना की रक्षा निमित्त लांगलध्वज १ उस
योद्धा (गोनन्द) से युद्ध में रत हुए ।
[बायाँ स्तम्भ]
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६० में 'स्कन्धावारम्' का पाठभेद
'स्कन्डावारम्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
६० हरिवंश पुराण (२ : ३५) के अनुसार
कश्मीराधिपति गोनन्द मथुरा के पश्चिमी घेरे की
ओर अपनी सेना सहित युद्ध निमित्त तत्पर था ।
जरासंध के नेतृत्व में मथुरा चारो ओर से
महा विशाल सेना द्वारा घेर ली गयी थी । निम्न
रूप से चारो दिशाओं से घेरा डाला गया था ।
पूर्वीय मोर्चा और घेरे पर उलूक, कैतव,
अंशुमान राजा का पुत्र एकलव्य, बृहत्क्षत्र, बृहद्धर्मन्,
जयद्रथ, उत्तमो जस, शल्य, कौरव, कैकेय, वैदेशि,
वामदेव, तथा शिनि देश का राजा साकृति था ।
पश्चिमी मोर्चों पर—मद्रराज, कलिगपति,
चेकितान, वाह्निक, काश्मीर राज गोनन्द कस्पेश
द्रुमराज, किम्पुरुष, तथा पर्वतीय राज अनामय था ।
उत्तरीय मोर्चों पर—पुरुकुलोत्पन्न, वेणुदारि,
विदर्भाधिपति सांवरू राज, भोजेश्वर रुक्मिन्,
शूर्पाक्ष तथा मालवेश, अवन्ति देश के विद तथा
अनुविंद, दन्तवक्त्र, छागलि, पुरमित्र, विराट्,
शौरभ्य, मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा,
त्रिगर्त, बाण एवं पंचनद के राजा एवं योद्धा गण
एवं दक्षिणी मोर्चों पर-दरद, चेदिराज तथा स्वयं
जरासंध था ।
[दायाँ स्तम्भ]
राजाओ तथा योद्धाओं की यह तालिका अपूर्ण
है । उनके नामों में भी विभिन्नता है । किन्तु गोनन्द
कश्मोरराज का नाम सभी सूचियों में है । (हरिवंश
पुराण २ : ३४) अतएव यह प्रमाणित और निर्वि-
वाद हो जाता है कि नीलमत पुराण तथा कल्हण
वर्णित यह बात साधिकार प्रमाणित है कि गोनन्द
कश्मोरराज जरासंध का पक्ष लेकर मथुरा के
आक्रमण मे सम्मिलित था ।
श्री कृष्ण की ओर से युद्ध में भाग लेने वाले
राजाओं का नाम स्पष्ट नहीं मिलता । महाभारत
सभा पर्व (१४ : ३५) से इतना ही मालूम होता
है कि १८ कुलों ने मिलकर जरासंध के आक्रमण
का सामना करने की योजना बनायी थी ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६१ में 'भग्ना' का 'भग्नां' तथा
'स्वसेना' का पाठभेद'स्वमेवा' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
६१ लांगल ध्वज-इसका शब्दिक अर्थ हलध्वज
होता है । यहाँ बलराम किंवा बलभद्र के लिये आया
है । बलभद्र आयु में श्री कृष्ण से तीन मास ज्येष्ठ
थे । पिता वसुदेव तथा माता रोहिणी थी । इस
प्रकार श्री कृष्ण विमातृ भाई थे । ये अत्यन्त
सुन्दर थे । एतदर्थ इनको राम कहा जाता था ।
अत्यन्त बली थे । इसलिए 'बलराम' नाम पड़
गया । इनका नाम 'हली' 'हलायुध' 'सीरपाणि'
'मूसली' 'मुसलायुध' 'हलधर' आदि है ।
तयोस्तुल्यौजसोर्युद्धे चिराय करवर्तिनी ।
मम्लौ विजयसंदेहे वरणस्रग्जयश्रियः ॥ ६२ ॥
६२. दोनों तुल्य बलशाली योद्धाओं के संघर्ष से विजय सन्देहात्मक हो गया और विजय
देवी के करपल्लवों की वैजयन्ती अधिक समय तक हाथ में रहने के कारण म्लान हो गयी ।
बलराम सर्वदा नील वस्त्र धारण करते थे ।
कमल की माला पहनते थे । गदा युद्ध में अत्यन्त
प्रवीण थे । जरासंध वध निमित्त तपस्या द्वारा
'संयर्तक' नामक हल तथा 'सौनन्द' नामक मूसल
प्राप्त किया था । महाभारत के युद्ध में यह किसी
पक्ष से भाग नहीं लिये थे ।
पाञ्चरात्र शास्त्रों के अनुसार बलभद्र भगवान्
वासुदेव के व्यूह किंवा रूप हैं । शुंग कालीन बलराम
की मूर्तियाँ मिली हैं । बलराम शेष के अवतार माने
गये हैं । अतएव उनकी मूर्तियों के पृष्ठ भाग में शेष
की मूर्तियाँ किंवा आभोग बना दिखाया रहता है ।
मूर्तियाँ हल, मूसल, युक्त कहीं द्विभुज और कहीं
चतुर्भुज मिलती हैं । उनके कर्णों में एक ही कुण्डल
कहीं कहीं दिखाया गया है । एक कुण्डलवारी
होना 'बृहत्संहिता' द्वारा समर्थित है । कुषाण तथा
गुप्त कालीन बलराम की मूर्तियाँ सिंह कुण्डल
युक्त दिखायी गयी हैं । बलराम का विवाह रेवत
की कन्या रेवती से हुआ था ।
बूमरँग तथा हल - आस्ट्रेलिया के भ्रमण काल
में (स० १९५०) मैने बूमरेंग का चलाना देखा
था । बूमरेंग का रूप हलसदृश हो जाता है यदि उसके
हरीस का लम्बा भाग छोटा कर दिया जाय ।
बलराम ने तपस्या द्वारा यह शस्त्र पाया था ।
अतएव यह अस्त्र वास्तव में हलाकार रहा होगा ।
आस्ट्रेलिया के संग्रहालय में मैने एक प्राचीन गणेश
की मूर्ति भी देखी थी । उसी समय मैने सोचा था कि
कभी आस्ट्रेलिया और भारत से निकट का सम्बन्ध
था जो भारतीय पराधीनता के कारण टूट गया ।
यह एक कल्पना मात्र है । यदि यह शस्त्र था तो
तो वह बूमरेंग की तरह ही रहा होगा कि आजकल
के बड़े हल के समान जिसका उठाना और चलाना
कठिन है ।। (विशेष द्रष्टव्य 'आस्ट्रेलिया' काशी)
लांगलध्वज, वृषभध्वज, हनुमानध्वज, गरुड-
ध्वज आदि झण्डो पर लगे चिह्न को भी कहते हैं ।
बलराम के ध्वज पर लांगल अर्थात् हल का चिह्न
अंकित रहा होगा अतएव उन्हें लांगलध्वज कहा
गया है ।
पुराण से प्रकट होता है । यादव सेना अल्प
संख्या में थी । तथापि बलराम तथा श्री कृष्ण के
रण चातुरी एवं वीरता के कारण रण में विजय
प्राप्त की थी । (हरिवंश पु० २ : ३६)
श्री रणजोत सीताराम पण्डित इस श्लोक की
टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि बलराम सर्व साधारण
जनता में से उठे थे । उन्होंने हल को जो परिश्रम-
शील जनता का प्रतीक था अपना प्रतीक बनाया ।
बलराम श्री कृष्ण के भाई थे । राजवंशी थे ।
राजपुत्र थे । कुलीन थे । मथुरा राज्य का अधिकार
प्राप्त किया था । तत्कालीन कुलीनों ने तुल्य राज्य में
भाग लिया था । हल कृषक वर्ग का निश्चय प्रतीक
हो सकता है परन्तु समस्त जनता का नहीं हो
सकता । सन् १९४८ में कृषक मजदूर प्रजा दल का
संघटन हुआ था तो हल और दानेदार चक्र उसका
प्रतीक था ।
निस्सन्देह कल्हण ने लांगलध्वज शब्द का यहाँ
प्रयोग किया है । उसका अर्थ जैसा ऊपर
लिखा गया है ध्वजा पर अंकित किंवा बना हल
प्रतीक है । वृषभध्वज शिव के समान उनका भी
नाम हल प्रतीक के कारण लांगलध्वज पड़ गया ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६२ में 'वरणस्रग्' का पाठभेद 'किं
जयस्रग्, मिलता है ।
१०४ राजतरंगिणी
अथ शस्त्रक्षतैरङ्गैरालिङ्ग्य रणाङ्कणे ।
भुवं काश्मीरको राजा यादवस्तु जयश्रियम् ॥ ६३ ॥
६३. अन्ततः युद्धभूमि में दोनों योद्धाओं के अंग परस्पर प्रहार द्वारा आहत हो गये थे।
काश्मीरराज ने सभर भूमि का आलिंगन किया और यादवराज का आलिंगन किया विजय ने ।
पादटिप्पणियाँ :
६२. प्रतीत होता है । दोनों योद्धा बलराम तथा
गोनन्द समान बलशाली थे । यादव सेना पलायन-
शील थी । उसमें बलराम के युद्ध में जमने के कारण
नव शक्ति आ गयी थी । बलराम तथा गोनन्द का
द्वन्द्व युद्ध बहुत समय तक चलता रहा ।
इस युद्ध वर्णन से यह मालूम होता है कि प्रथम
बलभद्र ने जरासंध पर आक्रमण किया था । वह
दक्षिणी मोर्चा पर था । बलराम के द्वारा जरासंध
का वध सम्भव नही था। अतएव वह पश्चिमी मोर्चा
पर आक्रमण किया, जहाँ कश्मीरी वाहिनी राजा
गोनन्द के नेतृत्व में युद्ध निमित्त सन्नद्ध थी ।
विजयमाला को वैजयन्ती कहते है। हाथियों
के दांतो पर माला भारतीय स्थापत्यों में लगी
दिखायी पड़ती है । यह माला गाथानुसार हाथी
किसी व्यक्ति के गले में डाल देता था। वह व्यक्ति
राजा चुन लिया जाता था । राजा चुनने की यह
अत्यन्त प्राचीन प्रथा है । नई दिल्ली के राष्ट्रपति
भवन एवं केन्द्रीय मन्त्रालय के भवनो पर
हाथी के मस्तक के बिना ही दातों पर माला लिपटा
पत्थरों में खोदकर दिखाया गया है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६३ में 'काश्मीरको' का पाठभेद
कश्मीरको' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
६३. नीलमत पुराण गोनन्द के पराजय का कारण
देता है — 'राजा गोनन्द ने नील मुनि द्वारा निर्धा-
रित कुछ अनुशासनो का पालन नहीं किया था अत-
एव मथुरा में बलभद्र द्वारा पराजित हो गया था ।
यदि कश्मीर के राजा नील द्वारा निश्चित आदेशो का
पालन करेंगे तो उनकी अकाल मृत्यु नहीं होगी ।
कश्मीर मण्डल में कभी भय उत्पन्न नहीं होगा ।'
श्लोक संख्या ( ८७५,८७६ ) ।
वृष्णि अर्थात् यादव सेना ने निस्सन्देह विजय
पायी थी । कश्मीरराज ने वीर गति पायी । किन्तु
जरासंध जीवित रहा । अपनी शेष सेना के साथ
मगध लौट गया । इस युद्ध पर महापुराणों तथा
महाभारत के आधार पर और विशेष लिखना अप्रा-
संगिक होगा ।
इस युद्ध के बीस वर्ष पश्चात् महाभारत का
युद्ध हुआ था ।
गिरिव्रज में जरासंध तथा भीम का गदा युद्ध
प्रारम्भ में प्रारम्भ हुआ । यह युद्ध कातिक शुक्ल को
प्रारम्भ हुआ था । गदा टूट जाने पर मल्ल युद्ध
हुआ । यह युद्ध महाभारत सभा पर्व ( २१.१७,१८ )
के अनुसार १४ दिन, पद्मपुराण ( उ० २७९ ) के
अनुसार २५ दिन, भागवत ( १०:७२ ) के अनु-
सार ४० दिनों तक चलता रहा । जरासंध को भीम
ने बीच से चीर दिया था । संधि खुल गयी । जिस
रूप में वह जन्मा था उसी रूप में मर गया ।
आइने अकबरी में अबुल फजल शोगन्द का
नाम भोगनन्द देता है। वह कहता है—कृष्ण के
ज्येष्ठ भ्राता बलराम द्वारा गोनन्द मारा गया । वह
मेहतरा ( मथुरा ) तथा ( बिहार ) के राजा
जरासंध के बीच हुआ था ।
हसन गोनन्द को आदि गोनन्द कहता है ।
गोनन्द के वंश के विषय में वह लिखता है—इस
राजा ने अराकीने सल्तनत की मरजी से सन् कल जुग
की इब्तदा से बीस साल पेस्तर तख्त कश्मीर पर
जलवागिरी फरमाई । बाज मुवर्रखों के नजदीक
प्रथम तरंग १०५
गतिं प्रवीरसुलभां तस्मिन्सुक्षत्रिये गते ।
श्रीमान्दामोदरो नाम तत्सूनुरभृत क्षितिम् ॥ ६४ ॥
६४. जब उस सुक्षत्रिय ने प्रवीर सुलभ गति¹ प्राप्त कर ली तो उसका यशस्वी पुत्र श्रीमान्
दामोदर क्षिति की रक्षा में तत्पर हुआ ।
भोगयोगोर्जितं राज्यं प्राप्नवानपि भूपतिः ।
ध्यायन्पितृवधं मानी नोपलेमे स निर्वृतिम् ॥ ६५ ॥
६५. यद्यपि उस भूपति ने भोग सम्पत्ति सम्पन्न राज्य अर्जित किया था तथापि पितृ वध
का ध्यान उदय होते ही उस मानी को शान्ति दुर्लभ हो जाती थी ।
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
यह भी राजा जम्मू के खान्दान में था । मौर याज
ने इसे मथुरा का पोता ख्याल किया है । उसने
हकूमत का नज्म व नस्ल निहायत खूबी से सरंजाम
दिया । उन दिनों हिन्दुस्तान में जरासन्ध राजा की
हकूमत को उसने श्रीकृष्ण जी महाराज के साथ
विनाय मुखासवत डाली हुई थी । राजा आदि
गोनन्द अपनी करीबी रिस्तादारी के पेश नज़र
एक बड़ी भारी फौज कश्मीर से लेकर राजा जरा-
सन्ध की मदद को रवाना हुआ । अपना लाव
लश्कर लेकर उनके साथ मसरूफ पैकार था । दरया
जमुना के किनारे फरीकों की फौजों के माबैन
में बड़ा भारी रण पड़ा । आखिर में किसी वजह
से राजा आदि गोनन्द की फौज में भगदड़ पड़ गयी ।
खुद राजा मजकूर साबित कदम रहा । और दाद
सुजाअत देता हुआ बलभद्र जी बिरादर श्री कृष्ण जी
महाराज के हाथों मैदान कार ज़ार से काम आया ।
मुद्दत हकूमत सत्तरह साल ।'
हरिवंश पुराण विष्णु पर्व ४१:२८ में स्पष्ट
उल्लेख है कि अन्य राजाओं के साथ कश्मीर राजा
ने जरासन्ध का पक्ष लेकर मथुरा पर आक्रमण कर
कृष्ण से युद्ध किया था ।
मद्रः कलिंगाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्निकः ।
कश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा ॥
पादटिप्पणियाँ :
६४ (१) गति : कल्हण यहाँ पर भारतीय वीर
परम्परा की ओर संकेत करता है। क्षत्रियों को स्वर्ग
१४
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
प्राप्ति युद्ध स्थल में होती है । प्रासादों में बैठकर
जीवन व्यतीत करना और मर जाना यह क्षत्रियों
किंवा आयुधधारियों का कभी भारतवर्ष में आदर्श
नही रहा और न इस प्रकार के जीवन को भारतीय
कभी अच्छा मानते थे । विजय दशमी के दिन अर्थात्
चातुर्मास के पश्चात् विजय यात्रा का मुहूर्त माना
जाता था । इस दिन प्रतापी राजा विजय यात्रा
निमित्त निकलते थे । सन् १९४७ के पूर्व प्रायः
सभी भारतीय राजाओं के यहाँ सुसज्जित सेना
प्रयाण करती थी । अस्त्र-शस्त्र की पूजा होती थी ।
समरांगण में वीर गति प्राप्त करने से बढ़कर क्षत्रियों
के लिये और कोई श्लाघनीय मृत्यु नहीं मानी
जाती थी ।
६५. जरासंघ मगध का सम्राट् था । उसके पुत्र का
नाम सहदेव था । उसकी दो कन्याएँ अस्ति तथा
प्राप्ति का विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ
था । महाभारत में कहा गया है कि जरासंघ ने
सम्राट् का पद प्राप्त किया था । चेदि का राजा
शिशुपाल उसका सर्वप्रधान सेनाध्यक्ष था । जरासंघ
एक संघ का सम्राट् था । महाभारत में प्रमाण
मिलता है कि बहुत से राजा मिलकर एक सम्राट्
का निर्वाचन करते थे । उसे उस पद पर अभिषिक्त
करते थे । राजाओ ने एकता की दृष्टि से यह प्रथा
चलाई थी । जरासंघ ने मालूम होता है सम्राट्
होने पर इस सिद्धान्त की अवहेलना की थी ।
(सभापर्व अ० १८; आदिपर्व अ० १०० : ७)
मथुरा का बड़ा महत्त्वपूर्ण इतिहास है । रामायण,
१०६ राजतरङ्गिणी
अथोपसिन्धु गान्धारैः सञ्जे कन्यास्वयंवरे ।
निमन्त्र्य शुश्रावाऽऽनीतान् वृष्णीन् दर्पोष्णदोर्द्रुमः ॥ ६६ ॥
६६. जिसकी भुजाएँ वृक्ष तुल्य शक्तिशाली थी। जो दर्प की गर्मी से गर्वित था, उस राजा ने सुना-
सिन्धुतट पर गान्धारों १ ने कन्या स्वयंवर सज्जित कर वृष्णियों को विशेष रूप से आमन्त्रित किया था।
पुराण तथा महाभारत के आधार पर गाथा कहती
हैं। मधु का पुत्र लवण था। लवण को परा-
जित कर राम के कनिष्ठ भ्राता शत्रुघ्न ने मथुरा
नगरी की स्थापना की थी। दानवों के आक्रमण के
कारण वृष्णि तथा अन्धक लोगों ने मथुरा त्याग
दिया। द्वारिका में आबाद हो गये। (हरिवंश पुराण
विष्णु पर्व ३८.४०)
कृष्ण द्वारा कंस का वध हुआ था। उसने समा-
चार सुना कंस के पुत्र को शूरसेन का राजा घोषित
किया। जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण किया। इस
कार्य के लिए उसकी दोनों विधवा पुत्रियाँ उसे
प्रोत्साहित करती रहती थी। परन्तु जरासंध पराजित
हुआ। उसने १७ बार मथुरा पर आक्रमण किया
था। (हरिवंश पुराण ३७.४४)। उसकी सहायता
हिमालय के पर्वतीय चेकितान, बाह्लीक, कश्मीर,
करूष, किन्नर, दरद आदि राजाओं ने की थी।
पुराण इस बात का समर्थन करते हैं। जरासंध तथा
कृष्ण का युद्ध हुआ था। उसकी सहायता पर्वतीय
राजाओं ने की थी। गोनन्द का जरासंध की
सहायता निमित्त आना असम्भव नहीं प्रतीत होता।
पुराणों ने भी इसकी पुष्टि होती है।
श्रीकृष्ण, भीम तथा अर्जुन ने मिलकर काला-
न्तर में जरासंध को मारने के लिए योजना बनायी।
ब्राह्मण वेश धारण कर उसके नगर में गये थे।
भीम के साथ जरासंध का द्वन्द्व युद्ध हुआ। जरासंध
शक्तिशाली प्रतीत हुआ। पर कृष्ण ने संकेत
किया। भीम ने जरासंध का एक पैर अपने पैर के
नीचे दबाकर दूसरा पैर उठाकर चीर दिया। इस
प्रकार जरासंध का शरीर अपने पूर्व जन्मकालीन रूप
दो शकलों में हो गया। शरीर की सन्धि छिन्न हो
गयी। यह निर्विवाद है। जरासंध शक्तिशाली राजा
था। उसका खुला सामना कर उसे पराजित करना
सरल नहीं था। अतएव तत्कालीन युद्ध प्रचलित
परम्परा तथा नीति का अतिक्रमण कर उसकी छल
द्वारा हत्या की गयी। संभव है। कंस की हत्या के
प्रश्न को लेकर विवाद खड़ा हुआ होगा। उसमें
जरासंध का पक्ष न्यायोचित जानकर कश्मीर के राजा
गोनन्द तथा भारत के अन्य राजाओं ने लिया होगा।
कृष्ण के विरुद्ध उसकी सहायता किये होंगे।
सम्राट् जरासंध की मृत्यु के पश्चात् मगध का
साम्राज्य नष्ट हो गया। पाण्डवों का चक्रवर्ती राजा
होना निष्कंटक हो गया। जरासंध वध महाभारत
सभापर्व का एक अवान्तर पर्व है। अध्याय २०-२४
तक में वर्णन मिलेगा।
(पुराण विष्णु : ४:१९.९९; भागवत : ९:२२:७-
८, १०.५०, १०:७२, १५-४६, हरिवंश : ३२.९६-
९६, ३७, वायु : ९९:२२५-२२६)
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६६ में 'शुश्रावा' का पाठभेद
'शुश्रुवा' तथा 'दर्पोष्ण' का 'दर्पोष्म' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
६६. (१) गान्धार : गान्धार प्रदेश के उल्लेखों
से भारतीय वाङ्मय भरा है। तक्षशिला से काबुल
तक की भूमि गान्धार नाम से प्रख्यात थी। इसी
प्रकार सिन्धु महानद से शतद्रु अर्थात् सतलज नदी के
मध्यवर्ती भाग किंवा अन्तर्द्रोणी को बाह्लीक कहते थे।
उसमें उशीनर, मद्र तथा त्रिगर्त के क्षेत्र सम्मिलित
थे। गान्धार तथा बाह्लीक प्रदेशों का सम्मिलित नाम
उदीच्य था। प्राच्य तथा उदीच्य की मध्यवर्ती सीमा
दृषद्वती नदी थी। गान्धार का उल्लेख नीलमत
पुराण में आता है :
प्रथम तरंग १०७
प्राचीन कपिशा नगरी अफगानिस्तान में थी।
उसका वर्तमान नाम बेग्राम है। यहाँ कपिशा
नामांकित शिलालेख प्राप्त हुए हैं। कपिशा के उत्तर
कंबोज है। यह पामीर की मध्येशिया स्थित अधित्यका
है। कम्बोज के पूर्व तारिम नदी है। उसी के समीप
कुचा प्रदेश है।
गान्धार से प्राच्य तक के क्षेत्र में पाणिनि काल
में संस्कृत भाषा प्रचलित थी। गान्धार, कपिशा,
बाह्लीक एवं कम्बोज महाजनपद पाणिनि काल में
भारत के उत्तर पश्चिम में थे। कम्बोज काशगर के
दक्षिण का प्रदेश था। हिन्दूकुश के दक्षिण पूर्व में
गांधार, दक्षिण-पश्चिम में कपिशा, उत्तर-पश्चिम
बाह्लीक तथा उत्तर-पूर्व में कंबोज जनपद थे।
गांधार को यूनानियों ने 'गन्दराई' नाम दिया
है। उस समय यह प्रदेश तक्षशिला से कुनड़ नदी
तक विस्तृत था। पश्चिमी गांधार की राजधानी
पुष्कलावती थी। उसका सम्बोधन यूनानियों ने
'पिउकलावती' से किया है। वह स्थान स्वात कायुल
नदी का संगम स्थान वर्तमान चारसदा है। मार-
कण्डेय पुराण (५७ : ३९) में 'पुष्कला' जनपद
का उल्लेख आया है।
दार्वाभिसार गन्धार जुहुण्डर शकान् रम्मान्।
तङ्गणान् मान्द्रवान् भद्रांश्चन्तर्गिरिर्बहिर्गीरीन् ॥
४० : १२१, १२२
यह श्लोक नीलमत में किंचित् पाठभेद से पुनः
मिलता है।
दार्वाभिसार गान्धार जुहुण्डर शकाः खसाः ।
तंगणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिबहिर्गिरिः ॥
१३९ : १८२, १८३
गान्धार का एक नाग रूप से वर्णन मिलता है।
उरुचः श्रोकणो वायुः शुको वैश्रवणो यमः ।
मण्डूकनासो गान्धारो नागः क्षूर्पारकिष्वनिः ॥
४९४ : १०६४
गांधार देश के राजा आरब्ध का नाम भागवत
पुराण मे, सेतुपुत्र का नाम विष्णु पुराण मे, शरद्वान
का नाम वायु पुराण मे आया है। शकुनी भी गांधार
के राजा थे। शकुनी दुर्योधन के मामा तथा महा-
भारत युद्ध में शल्य के पश्चात् कौरव सेना के
सेनापति हुए थे।
गान्धार राज : शकुनी : पर्वतीय : उद्योग पर्व
३० : २७ मे उल्लेख मिलता है। गान्धार का राजा
दुर्योधन का मामा शकुनी था। गान्धार के एक
नग्नजित् राजा का एतरेय ब्राह्मण (७ : ३४) में
उल्लेख आता है। उससे सोमविषयक ज्ञान प्राप्त
हुआ था।
सुबल राजा की कन्या गान्धारी थी। वह
धृतराष्ट्र की पत्नी तथा दुर्योधन की माँ थी।
गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा।
इति शुश्राव तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ॥
आदिपर्व : १०९ : ११
ततो गान्धारराजस्य प्रेषयामास भारत।
अच्छन्निरिति सम्प्राप्तीन् सुबलस्य विचारणा ॥
११० : १२
गान्धार-जातक तथा कुम्भकार जातक तथा
बौद्धधर्म-ग्रन्थों में गान्धार का विशेष उल्लेख
मिलता है।
ऋग्वेद १:२२६:७ तथा अथर्व वेद ५ २२.१४
में गांधार का उल्लेख आया है। इससे स्पष्ट है कि
वैदिक काल से गान्धार का ऐतिहासिक महत्त्व था।
इसकी प्रसिद्धि थी।
वाल्मीकि रामायण में बाह्लीक, कम्बोज, दरद,
चीन आदि हिमालय के पर्वतीय जनपद कह
गये हैं। गान्धार का स्पष्ट उल्लेख रामायण में नहीं
किया गया है। सम्भव है कि उस समय गाधार
कम्बोज, शक, बाह्लीक, आदि क्षेत्रों के अन्तर्गत
समझा जाता रहा होगा अन्यथा रामायण उसका
उल्लेख करने में न चुकता।
तत्र म्लेच्छान् पुलिंदांश्च, शूरसेनांस्तथैव च।
प्रस्थलान् भरताँश्चैव कुरूंश्च सह मद्रकैः ॥
काम्बोजानथयवनांश्चैव शकानारट्टकानपि।
बाह्लीकानुपिकांश्चैव पौरवानथ टंकणान् ॥
१०८ राजतरंगिणी
ततस्तस्यातिसंरम्भात् तानदूरस्थितान् प्रति ।
यात्राऽभूद् ध्वजिनीवाजिरेणुग्रस्तनभस्तला ॥ ६७ ॥
६७. वृष्णि जब बहुत दूर नहीं रह गये थे तो क्रोध जर्जरित राजा ने सवेग उनके विरुद्ध
इस प्रकार अभियान किया कि उसके अश्वारोही दल के टापों की उड़ी धूल से आकाश भर गया ।
चीनान्यपरचीनांश्च नीहारांश्च पुनः पुनः ।
अन्विष्य दरदांश्च हिमवन्तम् तथैव च ॥
—वाल्मीकि रामायण
अरण्य काण्ड ४३ : १०, १२
बौद्ध ग्रन्थों में गान्धार जनपद का उल्लेख अनेक
स्थलों पर आया है । मोग्गलिपुत्त स्थविर ने तृतीय
संगीति को समाप्त कर मध्यात्मिक स्थावर को
कश्मीर तथा गांधार राष्ट्र में धर्म प्रचारार्थ भेजा ।
गान्धार जनपद की राजधानी तक्षशिला थी । प्राचीन
काल में पुक्कुसाति वहाँ का राजा था । बुद्ध
भारत का प्रधान शिक्षा तथा व्यापारिक केन्द्र था ।
तक्षशिला में बौद्ध विद्वान् जीवक, बन्धुल मल्ल,
प्रसेनजित्, महालि आदि की शिक्षा हुई थी ।
पाठभेद :
श्लोक सङ्ख्या ६७ में 'संरम्भात्' का पाठभेद
'संभारात्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
६७ (१) ध्वजिनी का अर्थ होता है ध्वजाधारी
दल आज से डेढ़ शताब्दी पूर्व तक सेना में अश्वा-
रोही ध्वजाधारी होते थे । वे सेना के आगे चलते
थे । ध्वजा की रक्षा करना सैनिको का परम कर्तव्य
होता था । ध्वजा पकड़ जाने पर एक प्रकार से
हार मानी जाती थी । मानी सेनानायक पराजय के
समय या आत्मसमर्पण के समय ध्वजा स्वयं नष्ट
या भग्न कर देते थे ताकि वह शत्रु के हाथों
में पड़ कर अपमानित न की जा सके । सिख
ध्वजा को इतना महत्त्व देते हैं कि उसकी पूजा
करते हैं । प्रत्येक गुरु-द्वारा पर उसे ससम्मान स्थापित
किया जाता है ।
हनुमान जयन्ती कात्तिक कृष्ण चतुर्दशी को
हनुमान जी की पूजा होती है । उस दिन नवीन
ध्वजा तैयार की जाती है। उसकी विधिवत् पूजा
होती है । झण्डाभिवादन सैनिक समारोह का एक
विशेष महत्वपूर्ण संस्कार है । ध्वजा देश के गौरव
का प्रतीक माना जाता है ।
२. कृष्ण दामोदर युद्ध : नीलमत पुराण
(श्लोक स० ६) में मिलता है ।
कल्हण ने यह प्रसंग नीलमत पुराण से लिया
है । नीलमत पुराण इस प्रश्न से यह विषय आरम्भ
करता है । क्या कारण है। महाभारत के युद्ध में
भारत के सभी राजाओं ने भाग लिया था ।
काश्मीरराज राजाओं की तालिका में दिखायी
नहीं पड़ते । उसका उत्तर नीलमत देता है । कश्मीर
राजा शिशु थे । इसलिये कश्मीर राजा और कश्मीर
की सेना महाभारत युद्ध में भाग नहीं ले सकी ।
मथुरा युद्ध में गोनन्द प्रथम ने वीर गति प्राप्त
की । केवल शिशु गोनन्द उस समय देवी यशो-
वती के गर्भ में था । वह उत्पन्न हुआ । शिशु
था । महाभारत मथुरा युद्ध के केवल बीस वर्ष
पश्चात् हुआ था । इस काल में दामोदर राजा
था । उसके वीर गति प्राप्त करने पर शिशु
गोनन्द द्वितीय राजा हुआ ।
नीलमत पुराण (श्लोक सं० ६) में स्पष्ट उल्लेख
है कि माधव अर्थात् श्रीकृष्ण से युद्धार्थ दामोदर
चतुरंगिणी सेना के साथ अभियान किया था ।
यादव सेना श्रीकृष्ण सहित स्वयंवर निमित्त गान्धार
जा रही थी । नीलमत ( श्लोक संख्या ७ ) में
स्पष्ट प्रकट होता है कि दोनों राजाओं में युद्ध हुआ
और राजा दामोदर वीर गति प्राप्त किया ।
जनमेजय ने वैशम्पायन से पूछा :
महाभारतमंग्रामे नानादेश्या नराधिपाः ।
महाशूराः समायाताः शिन्तां मे महात्मनाम् ॥ ३:३
प्रथम तरंग १०९
तदाहवे विवाहोत्का विष्ण्यन्ते स्म पतिंवरा ।
आसोत्तद्युपुरन्ध्रीणां गान्धारेषु स्वयंवरः ॥ ६८ ॥
६८. समरांगण में जब विवाहोत्सुक गान्धारकन्याएँ पति वरण निमित्त उदास होने लगीं
तो उसी समय स्वर्ग रमणियों १ युद्ध स्थल में वीरों का स्वयं स्वयंवर करने लगीं ।
कथं कश्मीरको राजा नायातस्तत्र कीर्त्य । राजा कन्धार की लडकी की शादी का शोहरा दूर
पाण्डवैर्धार्तराष्ट्रैश्च न द्यूतः स कथं नृप ॥ दराज के मुल्कों में फैल गया । बडे शान व शौकत
4 : 4 वाले राजे महाराजे उसके स्वयंवर में कन्धार
काश्मीरमण्डलं चैव प्रधानं जगति स्थितम् ॥ हाजिर हो गये । श्रीकृष्ण जी ने भी किसी वजह से
5 : 5 इसमें शमूलियत जरूरी समझी । यह खबर सुनकर
अथोपसिन्धुगान्धारविषयेऽभूत्स्वयंवरः । दामोदर जो अपने बाप के खून का प्यासा था एक
यत्राहूताः समाजग्मु राजानो वीर्यशालिनः ॥ भारी फौज लेकर श्रीकृष्ण जी के मुकाबला के लिए
33 : २४ कन्धार रवाना हो गया । और साथ जंग व जदल
तत्रागतं समाकर्ण्य वासुदेव स्वयंवरें । की बुनियाद डाली । राजा मजकूर श्रीकृष्ण के
जगाम माधवं योद्धं चतुरंगलवान्वितः ॥ हाथों कतल हुआ । उसकी रानी जसोमती जो उन
6 : २५ दिनो हामला थी मशविरह श्रीकृष्णजी महाराज
तत्र तस्याऽभवद्युद्धं वासुदेवेन धीमता । अपने खाविन्द की जानशीन हुई । मुद्दत हकूमत
यादृशं वासुदेवस्य नरकेन सहाऽभवत् ॥ १३ साल ।
7 : २६ पाठभेद :
श्लोक संख्या ६८ में 'विष्ण्यन्ते' का 'विघ्नन्ति'
ततः स वासुदेवेन सुयुद्दे विनिपातः ॥ तथा 'सोत्तु' का 'आसीत्त' पाठभेद मिलता है ।
8 : २७ पादटिप्पणियाँ :
अन्तर्वत्नीं तस्य पत्नीं वासुदेवोऽभ्यषेचयत् । ६८(१) यह एक प्राचीन गाथा है । आर्य जाति
भविष्यत्पुत्रराज्यार्थं तस्य देशस्य गौरवात् ॥ में प्राचीन काल से पायी जाती है । सुरवालाएँ रण-
9 : २७-२८ स्थल में वीर योद्धाओंका वीर गति प्राप्त करने
नीलमत पुराण में नाम बालगोनंद दिया पर वरण करती थीं । हिन्दू परम्परा के
गया है । अनुसार वीर गति प्राप्त योद्धा स्वर्ग जाता है ।
अतः सा सुषुवे पुत्रं बालगोनन्द संज्ञिनम् । अतएव उसे वरण करने के लिए स्वर्ग की बालाएं
वालभावात् पाण्डुसुतैर्नानीतः कौरवेनं वा ॥ उत्सुक रहती है । कल्हण इस ओर संकेत करता है ।
10 : २८-२९ यूरोप मे स्केण्डेनेवियन गाथा के अनुसार युद्ध
हसन लिखता है-'बाप के इन्तकाल के बाद व भूमि में वीर गति प्राप्त वीर को लेने के लिये रथों
मशविरह अशकोन सलतन सन कलयुग से तोन साल पर सुरवालाएँ आती थी । उन्हें साथ लेकर स्वर्ग
पहले यह शख्स तख्त हकूमत पर बैठा । रैयत को जाती थीं ।
अदल व अहसान के जरिए गुलाम बनाकर अक्सर उक्त पद का प्रथम आधा पद विरोधाभास
व बेशतर राजे अपने मुतईम बनाये । इन्हीं दिनों प्रकट करता है ।
११०
राजतरंगिणी
तदाऽऽक्रान्तासुहृच्चक्रः स चक्रायुधसङ्गरे ।
चक्रधाराऽध्वना घोरश्चक्रवर्ती दिवं ययौ ॥ ६९ ॥
६९. तब वह चक्रवर्ती राजा शत्रुओं की चक्र पंक्ति द्वारा परावृत चक्रधर के चक्रधारपथ
गति-द्वारा उस समरांगण में गमन किया ।
अन्तर्वत्नीं तस्य पत्नीं तदा यदुकुलोद्भवः ।
राज्ये यशोवतीं नाम द्विजैः कृष्णोऽभ्यषेचयत् ॥ ७० ॥
७०. यदु कुलोद्भव श्री कृष्ण ने दामोदर की गर्भवती पत्नी यशोवती देवी का द्विजों से
अभिषेक करा दिया ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६९ मे 'तदा' का 'तत्रा', 'सचक्रा'
का 'सश्चक्रा' तथा 'राघ्वना' का 'राघुना', राधना,
'राध्यना' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
६९ (१) चक्रधर से यहाँ अर्थ श्री कृष्ण से है।
वह यादव सेना सहित गान्धार में स्वयंवर मे भाग
लेने जा रहे थे। मार्ग में दामोदर ने कश्मीरी
सेना के साथ उनपर आक्रमण किया । युद्ध में
दामोदर का वध श्रीकृष्ण के चक्र द्वारा हुआ था।
पिता का ज्येष्ठ भ्राता बलराम ने तथा पुत्र का
कनिष्ठ भ्राता श्री कृष्ण ने वध किया था ।
'चक्रधाराध्वना' शब्द क्षेत्र प्रिय है। कश्मीर
के पंडितो को श्री स्टीन के शब्दो में यह वाक्य बहुत
प्रिय था । इसका सरल अर्थ होता है। 'चक्रधार पथ'
से दामोदर दिवंगत हुआ ओर स्वर्ग गया था। यह
वाक्य 'चक्रधर. कृष्णः एव पन्थास्तेन' भी स्टीन
के मत में हो सकता है । उस समय अर्थ हो
जायगा 'श्रीकृष्ण चक्रधर द्वारा मार्ग खोला गया'।
कल्हण की कल्पना यह भी हो सकती है कि भग-
वान् कृष्ण द्वारा आहत होने पर दामोदर निश्चय
ही स्वर्ग गया ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ७० में 'यशोवती' का 'यशोवन्ती'
तथा 'षेचयत्' का पाठभेद 'सूचयत्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
७०(१) यशोमती : नीलमत पुराण में रानी का
नाम यशोमती नहीं दिया गया है। उक्त श्लोक स०
२७ में 'तस्य पत्नी' अर्थात् 'उसकी पत्नी' शब्द ही
का उल्लेख है।
अन्तर्वत्नीं तस्य पत्नीं वासुदेवोऽभ्यषेचयत् ।
भविष्यत्पुत्रराज्यार्थं तस्य देशस्य गौरवात् ॥
९ : २७
कल्हण ने यशोमती का नाम किसी अन्य पूर्व
ऐतिहासिक ग्रन्थ से लिया है। कल्हण ने रा० त०
१ : ७३ तथा ८ : ३४०८ में यशोमती के नाम का
स्पष्ट उल्लेख किया है। यह राजा दामोदर की
पत्नी थी ।
ह्युगन के अनुसार-'राना सन् १० क० मे तख्त
सल्तनत पर बैठी। बादशाहों के काम मर्दों की तरह
इन्तहाई बहादुरी और खुश असलूबो से अंजाम दिये।
पहले मालूम हो चुका है कि यह अपने खाविन्द
राजा दामोदर से हामिला थी । इसलिए मुकर्रर
वक्त गुजरने पर बाल गोतन्द इससे पैदा हुआ।
मुद्दत हकूमत १५ साल ।'
(२) गर्भवती का अभिषेक : भगवान् के मंत्री
गर्भवती रानी यशोमती के अभिषेक से प्रसन्न नही
थे । भगवान् ने इसको शंकाओ का समाधान पौरा-
णिक प्रमाणों का उद्धरण देकर कर किया था ।
यह विषय हिन्दू उत्तराधिकार के मौलिक प्रश्न
को उठाता है। प्रचलित हिन्दू कानून के अनुसार
प्रथम तरंग १११
तस्मिन्काले स्वसचिवान् सासूयानिन्यवोवरत् ।
इमं पौराणिकं श्लोकमुदीर्य मधुसूदनः ॥ ७१ ॥
७१. मधुसूदन१ के सचिव गण स्पृहणीयता से भुनभुना रहे थे, उस समय भगवान् ने
निम्नलिखित पुराण२ पद का उल्लेख कर उन्हें शान्त किया।
“कश्मीराः पार्वती तत्र राजा ज्ञेयः शिवांशजः ।
नावज्ञेयः स दुष्टोऽपि विदुषा भूतिमिच्छता ॥” ७२ ॥
७२. काश्मीर१ की भूमि पार्वती है। वहाँ का राजा हर२ का अंश है। कल्याणેચ્છुक
विज्ञ जनो के लिये वह दुष्ट होने पर भी अवज्ञा का पात्र नहीं है।
गर्भधारण के समय से ही गर्भ स्थित सन्तान का
उसी माता-पिता अथवा जहाँ भी कही उसके उत्तरा-
धिकार का हक मिलता है अथवा उत्तराधिकार
मिलने वाला होता है—(नरवाडवरशिप ) विधि के
अनुसार उसे अधिकार प्राप्त हो जाता है। सम्भव है
कि विधवा का अभिषेक तत्कालीन प्रचलित विधि
तथा संहिताओं व आचारों के विरुद्ध रहा हो।
भगवान् श्रीकृष्ण का कार्य विधि तथा धर्म
सम्मत दोनों था। भगवान् ने माता के गर्भ में
स्थित पुत्र का अभिषेक किया था। ऐसी स्थिति में
प्रश्न नही उठता कि स्त्री विधवा है अथवा सधवा।
सम्भव है कि भगवान् ने उस अनुचित प्रचलित रूढि
पर अपने इस कार्य द्वारा आघात किया हो, जिसमें
विधवा को अशुभ मान लिया जाता है। भगवान् ने
पुराण का उल्लेख-'कश्मीर पार्वती तुल्य है। वहाँ
का राजा हरांशज किंवा शिव का अंश है' इस
प्राचीन स्मृति का प्रमाण देकर तथा स्त्री का सम्मान
कर पुरानी स्मृति पर अपनी मुहर लगायी है । उसे
राज्य कार्य के योग्य तथा सिंहासन को अधिकारिणी,
अपने अधिकार से नही सही पुत्र के संरक्षक के
अधिकार के कारण माना है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ७१ मे 'वोवरत्' का पाठभेद
'वारयत्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
७१ (१) मधुसूदन विष्णु का नाम है। यहाँ
पर श्रीकृष्ण के लिये आया है। मधु तथा कैटभ दो
राक्षस थे। उन्हें एक साथ "मधु-कैटभ" नाम
से पुकारा जाना है। मधु की त्वचा कोमल
थी। इसलिये उसका नाम मधु पडा था। गाथा है
कि भगवान् के नाभि कमल पर दो जल बिन्दु गिरे
थे। वे रजोगुण तथा तमोगुण के प्रतीक थे। भगवान्
ने उन बूँदो की तरफ देखा। एक मधु तथा दूसरा
कैटभ हो गया (मेरु शान्ति पर्व . ३५५-२२-२३ )
एक और गाथा है। उनकी उत्पत्ति भगवान् विष्णु
के कान के मैल से हुई थी। (दे० भा० १ ४)।
पद्म पुराण (मृ : ४०) के अनुसार ब्रह्मा के तमो-
गुण से इनकी उत्पत्ति हुई थी। कालान्तर में दोनो
आततायी राक्षस हो गये थे। ब्रह्मा के सुझाव पर
विष्णु ने उनका वध किया था। अतएव उनका नाम
'मधुसूदन' पड गया। (म० शा० २०० : १४-१६)
(२) पुराण : कल्हण ने पुराण का नाम नही
दिया है। नीलमत में यह श्लोक मिलता है परन्तु
शब्दावली मे किंचित् भेद है। कल्हण ने पुराण शब्द
का प्रयोग प्रायः नीलमत पुराण के लिये किया है।
उसने बहुत कुछ ऐतिहासिक सामग्री नील मत पुराण
से ली है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ७२ मे 'कश्मीरा;' का पाठभेद
'काश्मीरा:' मिलता है।
पादटिप्पणियां :
७२ (१) नीलमत पुराण मे यह श्लोक निम्न
लिखित रूप में मिलता है।
११२ राजतरंगिणी
पुंसां निगौरँवा भोज्य इव याः स्त्रीजने दृशः ।
प्रजानां मातरं तास्तामपश्यन्देवतामिव ॥ ७३ ॥
७३. मनुष्यों की जो दृष्टि स्त्री जनों को निगौरव एवं भोग्य पदार्थ समझती थी, वही उसे
प्रजा की माता १ तथा देवी स्वरूप समझने लगी !
काश्मीरायां तथा राजा त्वया ज्ञेयो हरांशजः ।
तस्यावज्ञा न कर्तव्या मततं भूतिमिच्छता ॥
—237 : ३१४
लोक प्रकाश में श्लोक का उद्धरण निम्नलिखित
रूप में दिया गया है ।
‘सती च पार्वती ज्ञेया राजा ज्ञेयो हरांशजः ।’
जोनराज ने अपनी राजतरंगिणी में कल्हण के इस
पद का उद्धरण दिया है ।
(२) हरांशज : यहाँ पर भगवान् ने 'देवाधि-
राज' अर्थात् ‘डिवाइन राइट’ के सिद्धान्तकी ओर
एक प्रकार से संकेत किया है । भारत में एक मत
राजा को देवांश मानता है । यूरोप के मध्ययुग
में तथा मुस्लिम खिलाफत काल में इस सिद्धान्त
को मान्यता दी गयी थी । वर्तमान लोकतंत्र इस
सिद्धान्त को मान्यता को समाप्त कर पश्चिम में
उदय हुए हैं । भगवान् श्रीकृष्ण ने कश्मीर मण्डल
को पार्वती का रूप माना है । समर्थन में एक प्राचीन
उद्धरण दिया है । राजा को हरांशज कहा है ।
कश्मीर मण्डल तथा राजा दोनों को इस प्रकार
मान्यता देकर पवित्र किया है । उसे दूसरे शब्दों में
कह सकते है । कश्मीर भूमि यदि मातृ भूमि है, तो
यहाँ का राजा पिता है । यह अनुपमेय उपमा भगवान्
ने अनोखे ढंग से दी है ।
भगवान् ने किस पुराण से उद्धरण दिया था ।
कल्हणने उसका उल्लेख नहीं किया है । किन्तु इस
सिद्धान्त, भाव तथा शब्दावली की पुष्टि नीलमत पुराण
के श्लोक से मिलती है । सम्भव है । नीलमत पुराण में
यह श्लोक किसी अन्य पुराण से उद्धृत किया गया
हो । अथवा उसका भाव ले लिया गया हो । कल्हण
केवल पुराण शब्द का उल्लेख करता है । उसे नील-
मत पुराण का ज्ञान था अतएव नीलमत शब्द का
न लिखना अर्थपूर्ण है । यह तर्क सम्मत मालूम होता
है । उसका अभिप्राय यहाँ नीलमत पुराण के अति-
रिक्त किसी अन्य पुराण से नहीं था ।
७३ (१) 'प्रजानां मातरम्': भगवान् ने यहाँ
एक आदर्श सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है ।
कल्हण के श्लोक से ध्वनि निकलती है । पूर्व काल
में स्त्री केवल भोग्य पदार्थ मानी जाती थी । उनका
राज काज में विशेष हाथ नहीं था । रानी
पर भी उनकी स्थिति में विशेष अन्तर नहीं
आता था ।
भगवान् ने इस मत का खण्डन कर नवीनमत
जगत् के सम्मुख रखा । राजा यदि देश का पिता है,
तो रानी देश की माता है । राजतन्त्र में नागरिक
होते हैं । उनकी लोकतन्त्रीय परम्परा के अनुसार
स्वतन्त्र नागरिक की स्थिति नहीं होती अतएव यहाँ
प्रजा की माता शब्द का प्रयोग किया गया है । यदि
काश्मीर गणराज्य होता तो भगवान् निस्सन्देह राज-
माता शब्द का प्रयोग न करते ।
भारत में राजमाता पद इसी समय से ऐति-
हासिक तथ्य के साथ चलता मालूम होता है । आज
भी भारत में रानी को राजमाता कहते हैं। यह उदात्त
भावना थी, राजा-प्रजा में, रानी-प्रजा में, वात्सल्य
भाव उत्पन्न करती है । संकेत करती है । राजा एवं
रानी का कर्तव्य है । अपनी सन्तान तुल्य प्रजा का
पालन करे ।
पृथ्वी को सर्वत्र स्त्री माना गया है । पृथ्वो
माता, भारत माता, आदि शब्दों का व्यवहार किया
गया है । पृथ्वी किंवा भूमि एक प्राचीन आख्यायिका
के अनुसार राजा की पत्नी मानी गयी है । अतएव
प्रथम तरंग ११३
अथ वैजनने मासि सा देवी दिव्यलक्षणम् ।
निर्दग्धस्यान्यतरोरङ्कुरं सुषुवे सुतम् ॥ ७४ ॥
गोनन्द
७४. दग्ध वंश वृक्ष में अंकुर तुल्य उस देवी ने समय पर दिव्य लक्षणों १ में युक्त पुत्र
प्रसव किया।
तस्य राज्याभिषेकादिविधिभिः सह संभृता ।
द्विजेन्द्रैर्निर्वर्त्यन्त जातकर्मादिकाः क्रियाः ॥ ७५ ॥
७५. द्विजेन्द्रों ने राज्याभिषेक १ के साथ जातकर्म तथा अन्य सम्बन्धित संस्कार विधिवत्
कराया।
पृथ्वी माता, भूमि माता आदि शब्दों का प्रयोग किया
जाता है।
मालूम होता है। भगवान् देवी यशोवती से
प्रभावित थे। गर्भवती होने पर भी रानी अपने पति
कश्मीरराज के साथ वृष्णियों के विरुद्ध गान्धार युद्ध
में गयी थी। भगवान् ने उसका अभिषेक
वहीं किया था। कोई प्रमाण नहीं मिलता। श्री
कृष्ण कश्मीर में आये थे। कश्मीर भूमि पर यशोवती
का अभिषेक किया था।
गीता जैसे उदात्त दार्शनिक सिद्धान्तों के
रचनाकार श्री कृष्ण से राजनीतिक सिद्धान्तों पर
भी इसी प्रकार के विचारों को प्रकट करने की अपेक्षा
की जा सकती है।
कश्मीरराज को पराजित करने पर भी श्री-
कृष्ण ने कश्मीर पर शासन नहीं किया। उसे लेने
तक की कल्पना नहीं की। राज्य जिसका था,
उसे लौटा दिया। दामोदर के पिता गोनन्द ने मथुरा
में उनसे युद्ध किया था। वे वैर भाव भी भूल
गये। उन्होंने उपनिवेश बनाने, साम्राज्य बनाने
की कल्पना नहीं की। इस प्रकार के राजनीतिक
उदात्त उदाहरण भारतवर्ष जैसे देश में ही सम्भव
हो सकते हैं।
७४ (१) लक्षण : महापुरुषों तथा राजाओं में
भारतीय ज्योतिष के अनुसार शरीर पर कुछ स्पष्ट
चिह्न होते हैं। उनकी महत्ता, विशेषता के कारण उन
लक्षणों में कमी किंवा अधिकता होती है।
भगवान् रामचन्द्र में, कृष्ण में इस प्रकार के
लक्षण थे। भगवान् बुद्ध में महापुरुषों के ३२ लक्षण
थे। उनके अनुयायकों में कुछ लक्षणों के होने का
उल्लेख मिलता है।
ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक लक्षण का प्रभाव
भिन्न-भिन्न होता है।
७५ (१) राज्याभिषेक : शिशु गर्भ से निकलते
ही पूर्ण सत्ता सम्पन्न राजा हो गया। इस सिद्धान्त की
ओर कल्हण संकेत करता है। भगवान् ने दिव्य दृष्टि
द्वारा गर्भ का रहस्य जान लिया था। गर्भ में पुत्ररत्न
स्थित है। अतएव यशोवती का अभिषेक गान्धार में
किया था।
पुत्र का जन्म होते ही यशोवती की सत्ता समाप्त
हो गयी। पुत्र पूर्ण राजा हो गया। उसका अभि-
षेक भगवान् ने गर्भ में ही कर दिया था। उत्तरा-
धिकार के विवाद का प्रश्न नहीं उठता था। भगवान्
ने एक विषम समस्या का अत्यन्त चतुराई के साथ
समाधान किया था। किसी भी सम्बन्धी तथा गोत्री
को किसी प्रकार के विवाद करने का अधिकार नहीं
था। विजेता ने राज्य पुनः गर्भ स्थित उत्तराधिकारी
को लौटा दिया था।
यदि पुत्र न होता तो कम से कम कुछ मासों
का समय यशोवती को इसलिये दिया कि देश में
१५