राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
अष्टम तरङ्ग: द्वितीय लोहर वंश, जयसिंह शासन व उपसंहार
परिशिष्ट ख
हिमालय
( तरंग १ : २५ पृष्ठ २४ )
वैदिक साहित्य में हिमालय का वर्णन मिलता है । ऋग्वेद—१०:१२१:४, अथर्ववेद—३:१५:३,
४.९.९, ५.५.२-८, ५:२५.७, ६:२४:१, १२.१.१, १६:३९:१, २४:३०, २५:१२, ऐतरेय ब्राह्मण
८ १४: । तैत्तिरीय संहिता ५.५ ११.१
प्रायः सभी पुराणों में हिमालय का वर्णन प्राप्य है । मुख्यतः निम्नलिखित स्थल द्रष्टव्य हैं : भागवत
पुराण १:१३:२९; १:१३.५०; मत्स्य पुराण १८० . कूर्म पुराण; पूर्वभाग अध्याय १२; कालिका पुराण १४
तथा ५१; वाल्मीकि रामायण : किष्किन्धा काण्ड · ५३ तथा ५६ श्लोक १ ।
नीलमत पुराण में हिमालय, हिमाचल, हिमवान, हिमवन्त तथा हिमकूट शब्दों का उल्लेख कभी कभी
समानार्थक और कभी भिन्न अर्थों में किया गया है । उनको यहाँ उद्धृत कर देना उचित होगा ।
हिमालय :
कुरुष्व लांगलेन त्वं विदार्याय हिमालयम् ।
इदं सरोवरं दिव्य निष्तोयं शीघ्रमेव तु ।। 165-166 = २१८ ।
× × ×
इति तथ्यं सती ज्ञात्वा हलमार्गात्तु सिन्धुगा ।
हिमालयान्न प्रययौ पतितात्मा परं नदी ।। 299 = ३९८
समुद्ररूपस्य हरस्य भार्या हिमालयस्याद्रिपतेस्तनूजाम् ।
सुस्वादुतोयां ऋषिभैर्यजुष्टां तां त्वं पवित्रां प्रणमस्व राजन् ।। 1388 = १६०६ ।
× × ×
हिमाचल :
नीलाम्बरः कांचनबद्धमौलिः सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तैः ।
विदारयामास स लाङ्गलेन हिमाचलं शैलवरं पृथिव्याम् ।। 168 = २२०
× × ×
—कुटिलैस्तरंगैः । हिमाचलाग्रैर्गगने स्पृशद्भिः
हिमालये तु षण्मासान् स सदा वसते सुखी ।
अद्य प्रभृति षण्मासान्तस्येह वसतिर्मया ।। 210 = २८३
× × ×
परिशिष्ट ख १५
ततो वेगेन महता सीमन्तमिव कुर्वती ।
हिमाचलस्य प्रययौ तोयस्रैलोपमा नदी ॥ 138 = ४१९
हिमवान् तथा हेमकूट :
एकार्णवं जगत्सर्वं तदा भवति भूपते ।
हिमवाञ्छेमकूटश्च निषधो नीलपर्वतः ॥ 35 = ५५-५६
× × ×
हिमवत् :
तत्र मद्रेषु तीर्थानि सन्ति पुण्यानि मानद ।
तथा च पर्वतश्रेष्ठे हिमवत्यचलोत्तमे । 102 = १४५
× × ×
स्थावरत्वमनुप्राप्ता हिमवत्यचलोत्तमे ।
बहुधा सा विमन्तांगी निकुम्भे निर्गते बहिः ॥ 166 = ७९१
× × ×
एवमुक्त्वा स पितरं प्राप्तानुज्ञास्ततः स्वयम् ।
हरमुकुटमितिख्यातं शृङ्गं हिमवतः शुभम् ॥
जगाम सहसा नन्दी तपसे कृतनिश्चयः ॥ 1047 = १२३०-१२३१-१२३२
× × ×
रम्ये हिमवतः पृष्ठे एवमेतीति चाब्रवीत् ।
ऋषेर्नियोगं काञ्चाप देव्या राज्ञया प्रचोदिता ॥ वृहददेवता ४ : ७५,
हिमवान :
यस्मिंस्तु वासरे विप्र प्रचयं पतते हिमम् ।
तत्र पूज्यस्तु हिमवान् हेमन्तशिशिराशुभौ ॥ 461 = ५०९
हिमवान्-हेमकूट :
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नीलपर्वतः ।
श्वेतश्च शृंगवान् मेरुमलयिवान् गंधमादनः ॥ 516 = ७१७ ७१८
× × ×
महाभारत :
सभा पर्व ( २८ : ६) मे हिमालय, हिमवान, हेमकूट आदि शब्द हिमालय के लिए व्यवहृत किये
गये हैं। हिमवान शब्द का वर्णन हिमालय पर्वत के अधिष्ठातृ-देवता के रूप में किया गया है। हेमकूट
उत्तर दिशा का एक पर्वत कहा गया है। इसको पार कर अर्जुन ने हरिवर्ष में प्रवेश किया था ।
पाण्डवों के पिता पाण्डु कालकूट तथा हिमालय पर्वत का अतिक्रमण कर गन्धमादन पर्वत पर पहुँचे
थे । भगवान् परशुराम द्वारा क्षत्रियों के संहार से रक्षा निमित्त भृगुवंशीय स्त्रियों ने हिमालय पर्वत में
१६ राजतरंगिणी
आश्रय ग्रहण किया था। अर्जुन ने हिमवान को जीतकर धवला गिरि पर अपना शिविर स्थापित किया था।
(सभा पर्व २७:२९)।
कुलिन्द राज सुबाहु का राज्य हिमालय के समीप था। (७८: १४)।
कर्ण ने हिमालय पर्वत के समस्त राजाओं को पराजित किया था। (वन पर्व २५४:४-६)।
हिमालय छ वर्षपर्वतों में पूर्व से पश्चिम विस्तृत एक वर्ष पर्वत है। (भीष्म पर्व ६.३-५)। हिमालय
पर भगवान् श्रीकृष्ण ने उपमन्यु के दिव्य आश्रम को देखा था। (अनुशासन पर्व १४:४३-४५)। महा-
प्रस्थान काल में पाण्डवों को मार्ग में हिमालय मिला था। तत्पश्चात् आगे बढ़ने पर उन्हें बालुकार्णव मिला
था (महाप्रस्थानिक पर्व : १-२)।
बहिर्गिरि तथा अन्तर्गिरि का उल्लेख आता है। बहिर्गिरि 'लेसर' हिमालय अर्थात् जहाँ से चढ़ाई
आरम्भ होती है, उसे कहते हैं। इसमें मसूरी, नैनीताल, धर्मशाला, श्रीनगर के भूखण्ड हैं। इसे चूल हिमवन्त
भी कहा जाता है। बहिर्गिरि की संज्ञा एक पर्वतीय प्रदेश से भी दी गयी है। इस प्रदेश को उत्तर दिग्विजय
काल में अर्जुन ने जीता था। सभा पर्व २७ : ३ इन प्रदेशों की गणना भारतीय जनपदों में की गयी है।
भीष्म पर्व ९ : ५०
अन्तर्गिरि मध्यवर्ती हिमालय हैं। अंग्रेजी में इसे ग्रेट सेन्ट्रल हिमालय कहते हैं। इसके अन्तर्गत किचिन-
चंगा, धवलागिरी, गौरीशंकर, नन्दादेवी तथा नंगा पर्वतादि तथा उनके विभिन्न शिखर हैं। इनका सम्बोधन
महा हिमवन्त नाम से भी किया गया है।
उपगिरी हिमालय के तराई के क्षेत्र को कहते हैं। महाभारत तथा अष्टाध्यायी में हिमालय की पर्व-
तीय शाखा का नाम उपगिरि दिया गया है। वह शैवालिक पर्वतमाला है। (अष्टाध्यायी ४ : २ : ११२)
योगिनी तन्त्र (१: १, १: १२, १ : १६) में हिमालय का उल्लेख मिलता है। हिमालय तथा
कैलास को मेरु पर्वत के दक्षिण कहा गया है। हिमालय तथा पारियात्र पर्वतो के मध्य के देश को 'मध्यदेश'
की संज्ञा दी गयी है। वह मध्यदेश पूर्व में आसाम तथा मणिपुर तक चला गया है।
मार्कण्डेय पुराण हिमालय का वर्णन करता है। हिमालय धनुषाकार एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक
फैला है। पश्चिम में अरब सागर और सिन्धु तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैली भारतीय सीमा पर
स्थित अडिग पर्वतमाला को हिमालय कहना होगा। हिगुल, हिन्दुकुश, कराकोरम, शैवालिक आदि सभी
पर्वतमालाएँ हिमालय के अन्तर्गत आ जाती हैं। इस पुराण के अनुसार कैलास की स्थिति हिमालय के उत्तर
तथा उसके पूर्व-पश्चिमीय विस्तार के मध्य स्थान पर पड़ेगा। भारत के मानचित्र द्वारा यह सत्य मालूम
होता है। पुराणकारो को भारतीय भूगोल का कितना सच्चा ज्ञान था इसका पता चलता है।
मत्स्य पुराण (१२० : २) में कैलास को एक प्रकार से हिमालय में सम्मिलित किया गया है।
श्रीमद्भागवत के अनुसार हिमालय का विस्तार ७५० कोस कहा गया है। कालिदास ने हिमालय को पृथ्वी
का मानदण्ड बताया है-
अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवात्मा
हिमालयो नाम नगाधिराजः।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य
स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥
परिशिष्ट ख १७
कौटिल्य ने हिमालय को चक्रवर्ती क्षेत्र के अन्तर्गत माना है । हिमालय से समुद्र तक के देश पर
शासन करने वाले को चक्रवर्ती राजा तथा उसका क्षेत्र कहा गया है (१ ९ : १) राजशेखर ने काव्य मीमासा
में हिमवत से समुद्र तक के देश पर शासन करने वाले को सम्राट् कहा है । हिमालय का वर्णन प्राचीन
भारतीय सीमा का निर्धारण करता है ।
कुमार सम्भव में कालिदास ने हिमालय को भारत की उत्तरीय सीमा पर रखा है । पूर्व तथा
पश्चिम दिशाओ में उसे समुद्र तक विस्तृत होना कहा गया है । भारतवर्ष तथा हरिवर्ष के मध्य हिमालय की
स्थिति मानी गयी है । हेमकूट को हिमालय के दक्षिण में भी कहा गया है । एकाध लेखको ने किंपुरुष
वर्ष को हेमकूट माना है ।
बौद्ध ग्रन्थों मे हिमालय का वर्णन मिलता है । अंगुत्तर निकाय, संयुक्त निकाय, हिमवंत सुत्त, मक्कट
सुत्त, पठम-पव्वतूपमा सुत्त में हिमालय को पर्वतराज कहा गया है । मैनाक पर्वत कैलास के समीप हिमालय
में स्थित था । दद्दर, धम्मक, चण्डगिरी, कुलिन्द, विस्म पर्वत हिमालय के अन्तर्गत थे । कदम्ब, कुक्कुट,
कौशिक, गोतम, पद्म, भारिक, लम्बक, वस्सभ, सयंग, शोभित, कैलास, केदार, हिमालय पर्वत के भाग
कहे गये हैं ।
अलवेरुनी मेरु तथा निषध पर्वतों को हिमालय के अन्तर्गत मानता है । बौद्ध ग्रन्थ अपदान म कदम्ब,
कुक्कुट अथवा कुकुट, भूतगण, कौशिक, गोतम, पदुम, भारक, लम्बक, वसभ, सयंग, शोभित को हिमालय में
रखा गया है ।
हिमालय को तीन हजार योजन वर्ग मीलों में विस्तृत तथा चौरासी हजार शिखरो से मण्डित कहा
गया है ।
हिमालय के अन्तर्गत महापद्म सर अर्थात् कश्मीर के उलर लेक का वर्णन बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय
करता है । क्षुद्र हिमालय में महापद्म हृद तथा महा हिमवन्त मे भी एक सर का होना मिलता है । उलर लेक
साडे बारह वर्ग मील विस्तृत है । उलर का संस्कृत मूल शब्द उल्लोल है । उल्लोल का अपभ्रंश उलर हो
गया है । उल्लोल का अर्थ लहर होता है । उलर में लहरो का आरोह तथा अवरोह वायु स्पर्श द्वारा सुन्दर
लगता है । विशेषतः प्रातः तथा सायंकाल जब गगन में किंचित् अरुणाई सहित नीलिमा रहती है । उस
समय किसी शैल धातु पर बैठकर प्रकृति की इस अनुपम शोभा के नैसर्गिक सौन्दर्य को निरखने में विचित्र
अनुभूति होती है ।
हिमालय का उल्लेख बौद्ध ग्रन्थो मे निम्नलिखित स्थलो पर विशेष रूप से मिलेगा । पाली साहित्य
मे हिमवा एवं हिमवन्त हिमालय का नाम दिया गया है ।
परमत्य जोतिका अध्याय १, २; समन्त पासादिका भाग १; विसुद्धि मग्ग ७; जातक भाग, ४, ६;
कुनाल जातक ५:५०१, ५०२ हि०; महा विस्सन्तर जातक ६.३३६, ५३८ हि०; चेतिय जातक, धम्मपदट्ठ कथा
भाग १, २, ३, ४; महावंश १:१८ तथा ५:२४ हि०; मिलिन्द प्रश्न पृष्ठ ३४७-६४८ हिन्दी, पव्वजा सुत्त
दीघा निकाय पृष्ठ ३६ हि०; अट्ठ सालिनी (देवनागरी) पृष्ठ १४; घेर गाथा २:१३८; जैन ग्रन्थों में उत्तरा-
ध्ययन सूत्र ११:२७ पृष्ठ ४९; मनोरथ पुराण २:७५९; द्रष्टव्य है ।
हिमालय की दस मुख्य नदियाँ है । वे है—गंगा, यमुना, अचिरवती, सरयू, मही, सिन्धु, सरस्वती,
वेत्रवती, यीवंसा (वितस्ता), चन्द्रभागा ।
३
१८ राजतरंगिणी
मिलिन्द प्रश्न के अनुसार ५०० नदियाँ हिमालय से और निकलती है। उनमे उक्त दस नदियाँ मुख्य है।
पुराणो में कुछ और प्रसिद्ध नदियों का वर्णन है जो हिमालय से निकलती है। यथा—शतद्रु, इरावती, कुहू,
गोमती, धूतपापा, बाहुदा, निशचीरा, गण्डकी, कौशकी (मार्कण्डेय पुराण ५७:१६।१८)।
बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार हिमालय में सात बडे सरोवरों का वर्णन मिलता है—अनतत्त दह (मान-
सरोवर ), कण्ण मुण्ड, रथकार छद्दन्त, कुणाल मन्दाकिनी, तथा सीहप्प पातक । कहा गया है कि उक्त सरो-
वरों का जल कभी ग्रीष्म ऋतु में भी तप्त नहीं होता ।
बौद्ध ग्रन्थो में मानसरोवर को कैलास तथा त्रिकूट पर्वतों से सम्बन्धित किया गया है। बौद्ध ग्रन्थों में
हिमालय की विभिन्न श्रेणियो का उल्लेख मिलता है—अस्सकण्ण गिरि, इसिधर, उदक, रजत, कंचन, कर-
वीक, कालगिरि, चित्तकूट, मणिदस्स, युगन्धर, सुरियपस्स, सुदस्सन । सेत अर्थात् श्वेत पर्वत को हिमालय
के शिखरो में श्रेष्ठ कहा गया है। अपदान में लम्बक, गोतम, वसभ, सीमित, कोसिक, कदम्ब, भरिक आदि
को हिमालय का पर्वत शृंग कहा गया है। चित्तकूट पर्वत को चित्रकूट नहीं समझना चाहिए। चित्तकूट पर्वत
हिमालय के अन्तर्गत है। चित्रकूट विन्ध्य पहाडी का एक क्रम है। महावंश मे हिमालय का उल्लेख
भगवान् के धातु भरे पात्र के सन्दर्भ मे आया है। हैमवत बौद्धो का एक सम्प्रदाय है। हिमालय की गोद में
कश्मीर शिशु की तरह स्थित है इस पर प्रकाश डाल चुका हूँ। आधुनिक अर्थात् बीसवी शती के कश्मीर
तथा कल्हण काल के कश्मीर की भौगोलिक सीमा तथा स्थिति में भिन्नता है। आधुनिक कश्मीर तथा
हिमालय के साथ क्या सम्बन्ध है इस पर कुछ लिखना आवश्यक है। कालक्रम के अनुसार देशों की भौगो-
लिक स्थिति उनके राजनीतिक स्थितियों के साथ परिवर्तित होती रही है। हिमालय के पर्वतों में कंचन पर्वत,
मणि पर्वत, हिगुल पर्वत, अंजन पर्वत, सानु पर्वत, फलिक पर्वतो का उल्लेख मिलता है। (कुणाल जातक
पृष्ठ ५०१ )। हिगुल पर्वत बलूचिस्तान में समुद्र तट से २० मील दूर अघोर अथवा हिगुल नदी से आरम्भ
होता है। इसे हिगुल तथा हिगुला कहते है।
शिखरों में मुख्य उल्लेख नगन पर्वत, तुमकुम, नन्ददेवी, त्रिशूल, नन्दकोट, दूणा गिरि, बद्रीनाथ,
केदार नाथ, नील कंठ, गंगोत्तरी, श्रीकण्ठ बन्दर पंच, गोरोशृंग, काचन विंगा, नमच पखा, मिलता है।
गोरोशृंग किचिन विंगा तथा धवलागिर सबसे ऊँचे शिखर नेपाल में है।
परिशिष्ट 'ग'
वितस्ता
( तरंग १:२८ पृष्ठ ५७ )
वितस्ता नदी को काश्मीरी भाषा में व्यथ कहते हैं। वितस्ता शब्द का अपभ्रंश व्यथ है। पुराकालीन
पाश्चात्त्य लेखकों ने वितस्ता का नाम 'वेदस्ता' भी दिया है। चीन के इतिवृत्त में 'वितस्ता' नाम आता है।
'कश्मीर का एक नाम वितस्ता के आधार पर 'वैतस्तिका' है।
कहा जा चुका है कि ऋग्वेद में वितस्ता का उल्लेख है। प्राचीन यूनानी लेखकों ने ईरानी लेखकों
के आधार पर वितस्ता का नाम 'हाइडसपेस' दिया है। पोलेमी ने 'बिदसपेस' नाम से वितस्ता का उल्लेख
किया है।
पंजाब में वितस्ता को झेलम कहते हैं। काश्मीरी पुरासाहित्य में यह नाम अज्ञात है। इसका मूल
स्रोत मुस्लिम लेखकों के लेखों में मिलता है। अल्वेरुनी ने वितस्ता का नाम 'जेलम' दिया है। श्रोवर ने
सुलतान शाह हैदर के पंजाब के अभियान का वर्णन करते हुए झेलम शब्द को संस्कृत रूप देते हुए 'ज्यलमी'
शब्द का प्रयोग किया है।
नीलमत पुराण में श्लोक ३३५-३८१ तक वितस्ता की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण वितस्ता का अपर नाम वैतस्तिका देता है। ( १:१६४ )
विष्णु धर्मोत्तर पुराण के सम्बन्ध में धारणा है कि वह कश्मीर में लिखा गया था।
महाभारत सभा पर्व में वितस्ता को कश्मीर तथा पंजाब की नदी कहा गया है। वितस्ता वरुण की
सभा में स्थित रहकर उनकी उपासना करती है। वरुण का स्थान उत्तर में है। वितस्ता उत्तर की नदी
है। ( ९:१९ )
महाभारत वन पर्व में उल्लेख आता है। कश्मीर मण्डल में नागराज तक्षक का वितस्ता नामक
प्रसिद्ध सुन्दर भवन है। इस नदी में स्नान एवं पित्रों के हेतु तर्पण द्वारा मानव को वाजपेय यज्ञ का लाभ
होता है। मनुष्य उत्तम गति प्राप्त करता है। ( : ८२ : ८९ )
वितस्ता का जल सेवन भारत निवासी करते हैं। यहाँ संकेत है कि वितस्ता हिमालय से निकलकर
भारत के प्रशस्त भूभाग में प्रवेश करती है। भारतीय उसके जल से लाभ उठाते हैं। (महा० : भीष्म पर्व :
९ : १६ )
कठिन उपवास, व्रत के पश्चात् तरंगमालिनी वितस्ता में सात दिन स्नान करने वाला मनुष्य मुनि
तुल्य निर्मल हो जाता है। (महा० : अनुशासन : २५ : ७ )
देवी पार्वती ने भगवान् शंकर के प्रति स्त्री धर्म स्वीकार कर, जिनके विमर्श पर कार्य किया था,
उनमें एक 'वितस्ता' भी थी। (महा० : अनुशासन : १४० : १८ )
२० राजतरंगिणी
हरचरित चिन्तामणि के लेखक ने नीलमत पुराण को शशधरमौ का प्रयोग किया है। वितस्ता को
भगवती देवी पार्वती का रूप माना है। कथा है। पिशाचों के सम्पर्क द्वारा काश्मीरियों में उत्पन्न पाप किंवा
दोष के मोचनार्थ, भगवती पार्वती ने काश्मीर में वितस्ता का रूप धारण किया है। भगवान् शिव ने नील नाग
के स्थान पर शूल द्वारा प्रहार किया। यह स्थान 'नील कुण्ड' है। उसे 'शूल घात' तथा 'वितस्तार' कहते
हैं। प्रहार एक 'वितस्ति' अर्थात् एक बालिश्त लगभग १२ अंगुल मिलाकर जितना नाप होता था उतने
परिमाण में था। अतएव 'वितस्ति' के आधार पर वितस्ता नामकरण किया गया। पाणिनि ने 'दिष्टि-
वितस्त्योश्च' (६:४:८६) शब्द का प्रयोग किया है। वितस्ति तथा दिष्टि शब्द पर्यायवाचक हैं।
वितस्ति भारत में तथा दिष्टि शब्द ईरान में प्रचलित था। मध्य एशिया में गगोश्रो देशों में दीस्ट शब्द
आया है वह दिष्टि का अपभ्रंश है। वितस्ति और दिष्टि दोनों का अर्थ एक बालिश्त होना है।
'वितस्ताख्य' कश्मीर में तक्षक नाग का निवास-स्थान माना है। 'वितस्ताद्रि' एक पहाड़ी है। यह
कहाँ है। कहना कठिन है। महाभारत (१११.८२.६०) में वितस्ता का मूल स्रोत तक्षक नाग का
स्थान माना गया है। इस स्थान का पता अभी नहीं लगा है।
देवी पार्वती किंवा उमा वितस्ता रूप से जिस स्थान पर प्रकट हुई थीं उसे नील कुण्ड तथा शूल-
घात कहते हैं। नीलनाग वर्तमान बेरी या वीर नाग है। गाथा कहती है। पापी लोगों के स्पर्श द्वारा देवी
अपवित्र हो जायेंगी अतएव वे लुप्त हो गयीं। काश्यप की प्रार्थना पर भगवती द्वितीय बार पुनः पंचहस्त
नाग स्वरूप प्रकट हुईं। यह स्थान दिवसर परगना में पाजय ग्राम है। यहाँ एक पवित्र जलस्रोत है। समी-
पस्थ निवासी इसे पवित्र मानते हैं। भगवती यहाँ भी लुप्त हो गयीं। पुनः तृतीय बार नरसिंहाश्रम में जाकर
देवी 'वितस्ता' रूप में प्रकट हुईं। काश्यप ऋषि देवी पार्वती स्वरूप वितस्ता के संग के लिए लक्ष्मी को
विशोका तथा सिन्धु को गंगा रूप कश्मीर में लाये। अतएव देवी उमा वितस्ता, लक्ष्मी विशोका; अदिति
त्रिकोटी, शची हर्षपथा; तथा दिति चन्द्रावती; नदियों का रूप धारण कर कश्मीर की पवित्र भूमि पर
निवास करने लगीं।
वितस्ता के द्वितीय बार प्रकट होने के सम्बन्ध में एक और गाथा है। कुछ कम प्राचीन है। इस
गाथा के अनुसार वितस्ता द्वितीय बार वर्तमान विश्ववितुर ग्राम में जलस्रोत स्वरूप प्रकट हुई। यह ग्राम
वीरनाग से उत्तर-पश्चिम एक मील दूर स्थित है। यह गाथा वितस्ता माहात्म्य में कही गयी है। इससे प्रकट
होता है। स्थान का नाम 'वितस्ता बातिका' था। कल्हण ने 'वितस्तारा' का वर्णन किया है। यहाँ अशोक
ने स्तूप निर्माण कराया था। कल्हण ने वितस्ता का मूलस्रोत 'नीलकुण्ड' बताया है। स्पष्ट है। कल्हण के
समय में वेरीनाग वितस्ता का उद्गम माना जाता था। (वितस्ता माहात्म्य २:३७ रा०तं०: १ १०२,१०३)
गाथा कहती है। उमा देवी हिमालय की कन्या हैं। वितस्ता का रूप लेकर कश्मीर में प्रकट हुई हैं।
प्रथम उनका वर्ण नील था। वितस्ता का एक नाम नीलजा भी है। उसने पर्वत शिखर पर तपस्या की।
उनका वर्ण गौर हो गया। इसलिये पर्वत का नाम गौरी शिखर पड़ गया। वितस्ता का जन्मदिन भाद्रपद
शुक्लपक्ष त्रयोदशी माना जाता है। वितस्ता उत्सव नीलमत पुराण के अनुसार त्रयोदशी के तीन दिन पूर्व
तथा तीन दिन पश्चात् तक मनाया जाता है। इस दिन वितस्ता में स्नान तथा विशेषतया सिन्धुवितस्ता संगम
पर पूजा का विधान किया गया है। धूप, गन्ध, माला, नैवेद्य, नाटक खेलने के लिये दान, तथा नाटक
पात्रों के पूजा का विधान किया गया है। वितस्ता उत्सव की द्वादशी को महाद्वादशी कहते हैं। यदि द्वादशी
बुध पर पड़े तो उस दिन भगवान् का जप, स्नान, दान, श्राद्ध किया जाय। उसका फल द्वादश गुना मिलता
है । यदि बुध श्रवण पर पड़ जाय तो उसे अत्यन्त महती द्वादशो कहते हैं । सन्निहिति स्नान का फल प्राप्त
होता है । यदि द्वादशी श्रवण को पड जाय तो उस दिन वितस्ता सिन्ध संगम प्राप्त मृत्तिका स्नान का फल
उनके संगम स्नान फल के समान होता है । ( नीलमत ७६७-७७५ )
मार्तण्ड अधित्यका के घुर पश्चिम इस्लामाबाद अर्थात् अनन्त नाग नगर है । इसका प्राचीन नाम
अनन्त नाग है । अनन्त नाग के कारण नगर का नाम अनन्त नाग पड़ा है । अनन्त नाग जलस्रोत नगर के
दक्षिण दिशा में है । हरचरित चिन्तामणि तथा कुछ माहात्म्यों में इसका उल्लेख मिलता है । अनन्त नाग का
सरोवर चौखूटा काफी बड़ा है । पृष्ट भाग से जल निकलता है । सरोवर सर्वदा पूर्ण रहता है । यहाँ लोग
स्नान करते हैं ! तैरते हैं । यहाँ का कोलाहल तथा बच्चो की जल क्रीडा मुझे आजन्म स्मरण रहेगी । नी०
'८८२, ११६०, ११८० हरचरित चिन्तामणि १०:२५१
नगर के उत्तर और बवन मार्तण्ड के मार्ग में गौतम नाग है । जिसका वर्णन मार्तण्ड माहात्म्य तथा
नीलमत में दिया गया है । नी० : १०५
अनन्त नाग के समीप वितस्ता को नदी का वास्तविक रूप प्राप्त होता है । यहाँ सान्द्रन, भ्रिग, आर-
पथ तथा लिदर स्रोतस्विनियों का संगम वितस्ता में होता है । खनवल के पश्चात् वितस्ता नदी नाव चलते
योग्य हो जाती है । समस्त कश्मीर उपत्यका में इस स्थान के पश्चात् नावो द्वारा परिवहन बारहमूला तक
होता है । मूलस्रोत अर्थात् नीलकुण्ड किंवा वेरी नाग से डल लेक के समीप तक नदी मे केवल २२० फीट का
ढाल है । नदी की धारा में विशेष परिवर्तन नही हुआ है । वह अपने मूल स्थान अथवा प्रवाह को पकडे प्रवा-
हित है । उसका प्रवाह कछारो अथवा जलोठ भूमि से होकर होता है । शीत ऋतु में नदी का जल स्तर नीचा
हो जाता है । जल घट जाता है । तट नदी के निम्न जलस्तर से १५ फीट ऊँचा उठ जाता है । वसंत ऋतु
में हिम के गलने पर नदी में बाढ आती है । कभी-कभी तट से उफनकर वितस्ता बहने लगती है । ग्रीष्म कालीन
मूसलाधार वृष्टि से भी नदी मे बाढ आ जाती है । कृषि को बाढ़ से अपार क्षति उठानी पड़ती है । कल्हण ने
इस प्रकार के बाढों का बहुत वर्णन किया है । रा० . ७:१११६, ७.१६१४, ८ २४४६, ८.२७८६,
.:१४१७, ८:१४२३, जोन : ४०३ ।
जलप्लावन से कश्मीर उपत्यका को बचाने के लिए सेतुओ जिसका अपभ्रंश 'सय' है प्राचीन समय
में निर्माण कराया गया था । उनमें जल प्रवेश तथा नि सृत्त करने के लिए द्वार बने रहते थे । इन द्वारो को
अब कुलावा कहते हैं । उनका विशद उल्लेख कल्हण, जोन तथा श्रीवर की राजतरंगिणियो में निम्नलिखित
स्थानों पर मिलेगा—रा० : १ : १५९, ३ : ४८३, ५: ९१, ५ : १०३, १२०, ८: २३८०, रा० : जोन ४०४,
८८७ रा० : श्रीवर ३ : १८९ ।
नीलमत के श्लोक १००-१०१ से प्रकट होता है कि कश्यप ने वितस्ता से निवेदन किया था। 'शुभगै !
वितस्ता ! तुम हल मार्ग से गमन करो अन्यथा यह देश जलसे सर स्वरूप हो जायगा ।' इसमे प्रकट होता है
कि वितस्ता का मार्ग कश्मीर उपत्यका का जल बहाने के लिये बनाया गया था । हल जोतते समय जिस
प्रकार भूमि में गहरी प्रणाली बन जाती है । उसी प्रकार गहरे पात्र को बनाने का संकेत वहाँ किया गया है।
प्राचीन काल में सड़कें बहुत कम थीं । लगभग १०० वर्ष पूर्व सड़कों का अस्तित्व नगण्य था ।
व्यापार, परिवहन आदि का कार्य नदो द्वारा होता था । सन् १८९१ ई० की जनगणना के अनुसार लगभग
२४०० हाजी अर्थात् नाविक जल परिवहन कार्य में लगे थे । नावें परिवहन की प्रधान साधन थीं । आज
इनकी संख्या बहुत कम रह गयी है । रा० ५ : ८४, ७ : १६२८ ।
२० राजतरंगिणी
हरचरित चिन्तामणि के लेखक ने नीलमत पुराण की शब्दावली का प्रयोग किया है। वितस्ता को
भगवती देवी पार्वती का रूप माना है। कथा है। पिशाचों के सम्पर्क द्वारा कश्मीरियों में उत्पन्न पाप किंवा
दोष के मोचनार्थ, भगवती पार्वती ने कश्मीर में वितस्ता का रूप धारण किया है। भगवान् शिव ने नील नाग
के स्थान पर शूल द्वारा प्रहार किया। यह स्थान 'नील कुण्ड' है। उसे 'शूल घात' तथा 'वितस्तात्र' कहते
हैं। प्रहार एक 'वितस्ति' अर्थात् एक बालिस्त लगभग १२ अंगुल मिलकर जितना माप होता था उतने
परिमाण में था। अतएव 'वितस्ति' के आधार पर वितस्ता नामकरण किया गया। पाणिनि ने 'दिष्टि-
वितस्त्योश्च' (६.४.८६) शब्द का प्रयोग किया है। वितस्ति तथा दिष्टि शब्द पर्यायवाची हैं।
वितस्ति भारत में तथा दिष्टि शब्द ईरान में प्रचलित था। मध्य एशिया के खरोष्ठी लेखों में दीठि शब्द
आया है वह दिष्टि का अपभ्रंश है। वितस्ति और दिष्टि दोनों का अर्थ एक बालिस्त होता है।
'वितस्ताख्य' कश्मीर में तक्षक नाग का निवास-स्थान माना है। 'वितस्ताद्रि' एक पहाड़ी है। यह
कहाँ है। कहना कठिन है। महाभारत (१११ : ८२ : ६०) में वितस्ता का मूल स्रोत तक्षक नाग का
स्थान माना गया है। इस स्थान का पता अभी नहीं लगा है।
देवी पार्वती किंवा उमा वितस्ता रूप से जिस स्थान पर प्रकट हुई थीं उसे नील कुण्ड तथा शूल-
घात कहते हैं। नीलनाग वर्तमान वैरी या वीर नाग है। गाथा कहती है। पापी लोगों के स्पर्श द्वारा देवी
अपवित्र हो जायेंगी अतएव वे लुप्त हो गयीं। काश्यप की प्रार्थना पर भगवती द्वितीय बार पुनः पंचहस्त
नाग स्वरूप प्रकट हुईं। यह स्थान दिवसर परगना में पाजय ग्राम है; यहाँ एक पवित्र जलस्रोत है। समी-
पस्थ निवासी इसे पवित्र मानते हैं। भगवती यहाँ भी लुप्त हो गयी। पुनः तृतीय बार नरसिंहाश्रम में जाकर
देवी 'वितस्ता' रूप में प्रकट हुईं। काश्यप ऋषि देवी पार्वती स्वरूप वितस्ता के संग के लिए लक्ष्मी को
विशोका तथा सिन्धु को गंगा रूप कश्मीर में लाये। अतएव देवी उमा वितस्ता; लक्ष्मी विशोका; अदिति
त्रिकोटी; शची हर्पपथा; तथा दिति चन्द्रावती, नदियों का रूप धारण कर कश्मीर को पवित्र भूमि पर
निवास करने लगीं।
वितस्ता के द्वितीय बार प्रकट होने के सम्बन्ध में एक और गाथा है। कुछ कम प्राचीन है। इस
गाथा के अनुसार वितस्ता द्वितीय बार वर्तमान विषयितुर ग्राम में जलस्रोत स्वरूप प्रकट हुईं। यह ग्राम
वीरनाग से उत्तर-पश्चिम एक मील दूर स्थित है। यह गाथा वितस्ता माहात्म्य में कही गयी है। इससे प्रकट
होता है। स्थान का नाम 'वितस्ता वार्तिका' था। कल्हण ने 'वितस्तारा' का वर्णन किया है। यहाँ अशोक
ने स्तूप निर्माण कराया था। कल्हण ने वितस्ता का मूलस्रोत 'नीलकुण्ड' बताया है। स्पष्ट है। कल्हण के
समय में वैरीनाग वितस्ता का उद्गम माना जाता था। (वितस्ता माहात्म्य २:३७ रा०त०:१:१०२,१०३)
गाथा कहती है। उमा देवी हिमालय की कन्या हैं। वितस्ता का रूप लेकर कश्मीर में प्रकट हुई हैं।
प्रथम उनका वर्ण नील था। वितस्ता का एक नाम नीलजा भी है। उसने पर्वत शिखर पर तपस्या की।
उनका वर्ण गौर हो गया। इसलिये पर्वत का नाम गौरी शिखर पड़ गया। वितस्ता का जन्मदिन भाद्रपद
शुक्लपक्ष त्रयोदशी माना जाता है। वितस्ता उत्सव नीलमत पुराण के अनुसार त्रयोदशी के तीन दिन पूर्व
तथा तीन दिन पश्चात् तक मनाया जाता है। इस दिन वितस्ता में स्नान तथा विशेषतया सिन्धुवितस्ता संगम
पर पूजा का विधान किया गया है। धूप, गन्ध, माला, नैवेद्य, नाटक खेलने के लिये दान, तथा नाटक
'पात्रों के पूजा का विधान किया गया है। वितस्ता उत्सव की द्वादशी को महाद्वादशी कहते हैं। यदि द्वादशी
बुध पर पड़े तो उस दिन भगवान् का जप, स्नान, दान, श्राद्ध किया जाय। उसका फल द्वादश गुना मिलता
परिशिष्ट ग २१
है। यदि बुध श्रवण पर पड़ जाय तो उसे अत्यन्त महती द्वादशी कहते हैं। संनिहिति स्नान का फल प्राप्त
होता है। यदि द्वादशी श्रवण को पड़ जाय तो उस दिन वितस्ता सिन्धु संगम प्राप्त मृतिका स्नान का फल
'उनके संगम स्नान फल के समान होता है। (नीलमत ७६७-७७५)
मार्तण्ड अधित्यका के धुर पश्चिम इस्लामाबाद अर्थात् अनन्त नाग नगर है। इसका प्राचीन नाम
अनन्त नाग है। अनन्त नाग के कारण नगर का नाम अनन्त नाग पड़ा है। अनन्त नाग जलस्रोत नगर के
दक्षिण दिशा में है। हरचरित चिन्तामणि तथा कुछ माहात्म्यों में इसका उल्लेख मिलता है। अनन्त नाग का
सरोवर चौखूटा काफी बड़ा है। पृष्ठ भाग से जल निकलता है। सरोवर सर्वदा पूर्ण रहता है। यहाँ लोग
स्नान करते हैं। तैरते हैं। यहाँ का कोलाहल तथा बच्चों की जल क्रीडा मुझे आजन्म स्मरण रहेगी। नी०
˙८८२, ११६०, ११८० हरचरित चिन्तामणि १०:२५१
नगर के उत्तर और भवन मार्तण्ड के मार्ग में गौतम नाग है। जिसका वर्णन मार्तण्ड माहात्म्य तथा
नीलमत में दिया गया है। नी० : १०५
अनन्त नाग के समीप वितस्ता को नदी का वास्तविक रूप प्राप्त होता है। यहाँ सान्द्रन, भृंग, आर-
पथ तथा लिद्दर स्रोतस्विनियों का संगम वितस्ता में होता है। रानबल के पश्चात् वितस्ता नदी नाव चलते
योग्य हो जाती है। समस्त कश्मीर उपत्यका में इस स्थान के पश्चात् नावों द्वारा परिवहन बारहमूला तक
होता है। मूलस्रोत अर्थात् नीलकुण्ड किंवा वैरी नाग से डल लेक के समीप तक नदी में केवल २२० फीट का
ढाल है। नदी की धारा में विशेष परिवर्तन नही हुआ है। वह अपने मूल स्थान अथवा प्रवाह को पकड़े प्रवा-
हित है। उसका प्रवाह कछारी अथवा जलोढ भूमि से होकर होता है। शीत ऋतु में नदी का जल स्तर नीचा
हो जाता है। जल घट जाता है। तट नदी के निम्न जलस्तर से १५ फीट ऊँचा उठ जाता है। वसंत ऋतु
में हिम के गलने पर नदी में बाढ़ आती है। कभी-कभी तट से उफनकर वितस्ता बहने लगती है। ग्रीष्म कालीन
मूसलाधार वृष्टि से भी नदी में बाढ आ जाती है। कृषि को बाढ़ से अपार क्षति उठानी पड़ती है। कल्हण ने
इस प्रकार के बाढों का बहुत वर्णन किया है। रा० . ७:१११६, ७:१६१४, ८:२४४६, ८:२७८६,
०:१४१७, ८:१४२३, जोन : ४०३ ।
जलप्लावन से कश्मीर उपत्यका को बचाने के लिए सेतुओ जिसका अपभ्रंश 'सम' है प्राचीन समय
में निर्माण कराया गया था। उनमें जल प्रवेश तथा नि स्रुत करने के लिए द्वार बने रहते थे। इन द्वारों को
अब कुलावा कहते हैं। उनका विशद उल्लेख कल्हण, जोन तथा श्रीवर की राजतरंगिणियों में निम्नलिखित
स्थानों पर मिलेगा—रा० : १ : १५९, ३ : ४८३, ५ : ९१, ५ : १०३, १२०, ८ : २३८०, रा० : जोन ४०४,
. ८८७ रा० : श्रीवर ३ : १८९ ।
नीलमत के श्लोक ३००-३०१ से प्रकट होता है कि कश्यप ने वितस्ता से निवेदन किया था। 'सुभगे !
वितस्ता ! तुम हल मार्ग से गमन करो अन्यथा यह देश जलसे सर स्वरूप हो जायगा।' इससे प्रकट होता है
कि वितस्ता का मार्ग कश्मीर उपत्यका का जल बहाने के लिये बनाया गया था। हल जोतते समय जिस
प्रकार भूमि में गहरी प्रणाली बन जाती है। उसी प्रकार गहरे पात्र को बनाने का संकेत वहाँ किया गया है।
प्राचीन काल में सड़कें बहुत कम थी। लगभग १०० वर्ष पूर्व सड़कों का अस्तित्व नगण्य था।
व्यापार, परिवहन आदि का कार्य नदी द्वारा होता था। सन् १८९१ ई० की जनगणना के अनुसार लगभग
३४०० हाजी अर्थात् नाविक जल परिवहन कार्य में लगे थे। नावें परिवहन की प्रधान साधन थीं। आज
इनकी संख्या बहुत कम रह गयी है। रा० ५ : ८४, ७ : १६२८।
२२ राजतरंगिणी
वितस्ता के तट पर कश्मीर की राजधानियों को होने का गौरव प्राप्त है । श्रीनगर, हुष्कपुरस्थान,
परिहासपुर आदि इसके तट पर हैं । प्राय प्राचीन तीर्थ स्थान तथा नगर इसके तट पर बसे थे । गाँवों की
आबादी नदी के कछार में थी । और आज भी है । नावों द्वारा दालों तथा गल्ले का सामान और उद्योग-
धन्धो की वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जायी जाती हैं । कल्हण के माण्डूर के वर्णन द्वारा स्पष्ट
प्रतीत होता है कि काश्मीरी जनता में नौपरिवहन का कितना महत्त्व था । (रा० . १ : २०१)
गनवल स्थान अनन्तनाग नगर का बन्दरगाह या पत्तन था । नीलमत पुराण में गनवल को 'गण्ड
पुच्छ नाम' कहते हैं । ना० (नी० ११०, हरचरित चिन्तामणि १५१)
गनवल के पश्चात् वितस्ता विजयेश्वर तीर्थ अर्थात् विजय येहरा में प्रवेश करती है । यह वर्तमान
नगर बिजत्रोर है । नदी के लगभग एक मील अधोभाग में ऊँची कछार अनिग्नदरा अर्थात् करेवा पड़ता है ।
बाम तट पर कश्मीर उपत्यका का अत्यन्त प्राचीन स्थान पद्मपुर पड़ता है । उसे आजकल 'पाम्पर उर'
कहते हैं ।
चक्रधर से ३ मील और उतराय की ओर जाने के पश्चात् 'माधवाश्रम' अर्थात् 'मरहोम' पड़ता है ।
वितस्ता में यहाँ विशोका अर्थात् 'विशौ' तथा 'रमण्यावती' अर्थात् 'रामब्यार' नदियाँ मिलती हैं । माहात्म्य
में इस संगम का नाम गम्भीरा संगम दिया गया है । यहाँ की तीर्थ-यात्रा अभी तक लोग करते हैं । रामब्यार
अर्थात् रमण्यावती तथा वेशो नदी का जहाँ संगम है उसे 'गम्भीरा' कहते हैं । कल्हण ने गम्भीरा का वर्णन
अनेक स्थानो पर किया है । एक मत है कि विशोका की धारा जो ध्वनोपरा के समीप बहती थी पूर्व काल में
ध्वान धारिणी कही जाती थी कालान्तर में इसका नाम गम्भीरा पड़ गया । (नील० १२१४-१२१५ तथा
१३०५-१३०८)
गम्भीरा का ऐतिहासिक महत्त्व है । विजयेश्वर से श्रीनगर के मार्ग में पड़ने के कारण सैनिक महत्त्व
का स्थान है । राजा सुस्सल की सेना सन् ११२२ ई० में यहाँ पीछे हटती हुई पूर्णतया पराजित हो गयी थी ।
लगभग ६ वर्ष के पश्चात् उसके पुत्र के सेनापति ने विद्रोही सेना पर विजय प्राप्त किया था । (रा० : ८ : १०६३
८ . १४६७)
गम्भीरा संगम के पश्चात् वितस्ता में दक्षिण तट से प्राचीन 'होलदा' तथा वर्तमान 'उलर' जिला का
जल लेकर एक स्रोतस्विनी मिलती है । तत्पश्चात् नदी 'वैश्ववन' अर्थात् 'वस्तर' वन के शिराबाहु अवन्तिपुर
के प्राचीन नगर से होती हुई प्रवाहित होती है । यहाँ से श्रीनगर तक इसमें कोई नदी नहीं मिलती । एक
'रामुस' नदी मिलती है परन्तु वह नाममात्र की स्रोतस्वनी है ।
श्रीनगर के पूर्वीय भाग का जल डल (डल लेक) में गिरता है । यहाँ डल का पानी एक छोटी
कुल्या अर्थात् नहर से वितस्ता में गिरता है । इस कुल्या को 'सुग्य कुल' कहते हैं । प्राचीन काल में इसको
'महासरित्' कहते थे । इस सरित पर सेतु अर्थात् बाँध बँधा है । उसके कारण डल लेक तथा श्रीनगर दोनों
की रक्षा होती है । नदी का जल बाँध के कारण डल लेक में नहीं जा सकता । महासरित में 'दुर्गगलिका'
पर जल द्वार लगाया गया था ।
डल लेक का जल महासरित में जाता है । डल लेक अपनी अनुपमेय शोभा के लिए प्रसिद्ध है । यह
सर ४ मील लम्बा तथा ढाई मील चौड़ा है । इसका जल करीब ३० फिट से अधिक गहरा नहीं है । इसमें
उपह्रद तथा तैरते खेत हैं । जल स्वच्छ तथा ताजा रहता है ।
परिशिष्ट ग २३
डल अर्थात् ढल का वर्णन इस नाम से कल्हण ने कही नहीं किया है । श्रीवर ने इसे 'डल' नाम से
सम्बोधित किया है । वितस्ता माहात्म्य में डल का वर्णन मिलता है ( २१ : १९ )
श्रीवर ने डल के दो द्वीपो का वर्णन किया है । एक का नाम 'रूप लांक' ( चान्दी की लंका ) और
दूसरे का नाम 'सूनलांक' ( स्वर्ण लंका ) है । डल के तटवर्तीय तथा जल के अनेक स्थानों का नाम दिया
गया है । 'हस्तवालिक' अर्थात् हस्तबोल का पता चलता है । गोपाद्रि, ज्येष्ठेश्वर, थेदा, सूरेश्वरी आदि
स्थान अपने अनेक नामों के साथ डल के पूर्वीय तट पर स्थित हैं । शालीमार, निशात तथा नसीम बाग
मुगलों ने निर्माण कराया था । त्रिप्रस्था नदी धुर उत्तर में डल में मिलती है ।
वितस्ता श्रीनगर में तीन मिल बहती है । उसके तट पर मकान बने हैं । उनमे लगे शिलाखण्ड
प्राचीन काल के ध्वन्सावशेषों से प्राप्त किये गये हैं । वे पूर्व काल में अधिकतर मन्दिरो तथा अन्य देवस्थानों
में लगे थे । उनके देखने तथा उन पर हुए नक्काशी के कामो से पता चलता है कि प्राचीन काल में कितनी
सुन्दर भवनों की रचना वितस्ता तट पर रही होगी । वह काशी से कम सुन्दर काशी उसके लघुरूप में नही
रही होगी । नगर में प्रथमतः नदी उत्तर वाहिनी है । चौथे पुल के समीप मोड लेकर दक्षिण-पश्चिम की
तरफ घूमती है । यहाँ पर कुतकुल अर्थात् प्राचीन 'क्षितिका कुल्या' है । क्षितिका का वर्णन कल्हण ने किया
है । (रा० : ८ : ७३२)
कुछ आगे चलकर वितस्ता में 'दुग्ध गगा' अर्थात् वत्सकुल मिलती है । श्रीनगर के अधोभाग में
वितस्ता के दोनो तरफ कच्छ भूमि अर्थात् दलदलीय भूखण्ड मिलता है । वह कुछ दूर तक चला गया है ।
वाम तट पर सुखसर तथा पंचनोर नम्बल को पर्वतीय लघु स्रोतस्विनियां जल पूरित करती है । नदी के उत्तर
में दलदल अधिक फैला है । वितस्ता की सहायक नदी सिन्ध का डेल्टा है ।
दुदरहोम प्राचीन 'दुग्धाधम' के समीप नदी की शाखाएँ हो जाती हैं । उनका डेल्टा बन जाता है ।
वे उथले दलदल हो जाते हैं । उन्हें अंचार कहते है । इसका उत्तरीय भाग ऊँची भूमि के साथ सिन्ध उपत्यका
के साथ श्रीनगर को सम्बन्धित करता है । पश्चिमी दिशा का डेल्टा एक कछार अधित्यका है । यह सिन्ध
उपत्यका के पश्चिमीय अधोभाग को सम्बन्धित करता हुआ वितस्ता-सिन्धु संगम तक पहुँच जाता है । शादी-
पुर के ठीक दूसरी तरफ सिन्धु वितस्ता से मिलती है । वितस्ता सिन्धु संगम प्रयाग तुल्य कश्मीर का पवित्र
तीर्थ स्थान है । सुदूर पूर्व काल में वह संगम त्रिगाम के समीप था । कश्मीर के हिन्दू जीवन मे महत्वपूर्ण
स्थान रखता है । इसकी पवित्रता प्रयाग संगम समान मानी गयी है । माहात्म्य में इस तीर्थ की पवित्रता का
अत्यधिक गुणगान किया गया है । जहां दो नदियो का संगम है वहाँ ईंटों का निर्मित किया एक द्वीप है ।
उस पर एक चिनार का वृक्ष लगा है । यह चिनार का वृक्ष प्रयाग के वट वृक्ष तुल्य पवित्र माना जाता है ।
मैं यहाँ वितस्ता के बाढ़ के समय सितम्बर सन् १९६२ में आया था ।
वितस्ता-सिन्धु-संगम प्रयाग कहा गया है । त्रिकोटि संगम से रोपेश्वर हर, पावना के संगम और
राजो बिन्दु विनर्मला से क्षीर मोचन तक का क्षेत्र वाराणसी के समान पवित्र माना गया है । (नील० १३०१,
१३२७)
गाँव सम्बल में श्रीनगर से उलर लेक को उत्तर जाने वाला मार्ग आता है । नदी को पार करता
त्रागबल दर्रा तक जाता है । इस मार्ग के वाम दिशा में प्राचीन जयपुर है । मध्य आठवी शताब्दी में जया-
पीड ने यहाँ अपनी राजधानी स्थापित की थी । यह सम्बल के दलदल तथा नोर नाला के मध्य एक द्वीप
पर स्थित है । इसे अन्दर कोट कहते है । (रा० : ४ : ५०६-५११)
२४ राजतरंगिणी
सम्बल के समीप वितस्ता नदी अहतुंग पहाडी के मूल से गुजरती है। पहाड़ी एक हजार फिट ऊँची
होगी। इस पर्वत के छाया में मनसाबल अर्थात् मानस सर सुन्दर झील है। इसका वर्णन नीलमत तथा
जोनराज ने किया है। यह सरोवर मीलों लम्बा है। कश्मीर के सब झीलो से अधिक गहरा है। भूगोल के
वर्णन के समय इसका वर्णन किया गया है। वितस्ता का सम्बन्ध मनसाबल से एक छोटे नहर द्वारा होता है।
( रा० : जोन ८६४, नील० 890, 1244, 1247, 1334 )
वितस्ता के वाम तट पर 'उच्छकुण्डल' तथा 'मग्कुण्डल' दो ग्राम है। प्राचीन प्रमाणो से प्रतीत होता
है कि कभी उलर लेक इन ग्रामो के समीप तक फैला था। कल्हण से मालूम होता है कि उक्त ग्राम रिवलेम कर
बनाए गए थे। जोनराज उन्हें ऊलर लेक के तट पर रखता है। श्रीवर ने इन ग्रामो का उल्लेख करते हुए उन्हें
समुद्रकोट ( सुग्दर कोट ) से द्वारिका के समीप अन्दर कोट तक उलर के तट पर बताता है। इसी प्रकार 'शुय्य
कुण्डल' का उल्लेख मिलता है। ( रा० ५ : १२० रा० जोन १२१० )
सोपोर के पास वितस्ता की बड़ी अन्तिम सहायक नदी कश्मीर मे मिलती है। इसका नाम 'पोहुर'
है। वह सोपुर के अधोभाग में चार मील पर है। वितस्ता में मिलने के पूर्व उत्तर-पश्चिम कश्मीर उपत्यका
का जल लाती है। कल्हण ने काश्मीर के इस क्षेत्र का बहुत कम वर्णन किया है। राजतरंगिणी मे पोहुर अथवा
और किसी नदी के संगम का वर्णन नही मिलता। इस नदी का प्राचीन नाम क्या था निश्चयात्मक रूप से
नही कहा जाता। जोनराज ने इस नदी को 'पहर' कहा है। माहात्म्यो में प्रहर तथा प्रहार दोनों पाठ मिलते
है। ( रा० जोन ११५०, ११५३, वितस्ता माहात्म्य २७-२, नील० 1322 )
ह्मल स्रोतस्विनी ह्मल परगना में बहती आती है। ह्मल ही 'समाला' नदी ( रा० : ७ : १५९ )
महापद्मसर अर्थात् उलर से लगभग चौदह मील और आगे चलकर बारहमूला के गर्त मे वितस्ता
गिरती है। बारहमूला के पश्चात् वितस्ता में नावें नही चल सकती। उसका प्रवाह उत्तरोत्तर वेगमय हो
जाता है। जल धारा की भयकर जल वेग ध्वनि द्वारा घाटी निरन्तर गूँजती रहती है।
वितस्ता :
वायु का ब्रह्माण्ड, कूर्म और मत्स्य पुराणों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण वितस्ता का
स्थान गंगा, सिन्धु तथा सरस्वती के साथ रखता है।
मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, कूर्म तथा वाम पुराणों के अनुसार - 'हिमवत्पादामि सृता' रूप से
वितस्ता का उल्लेख किया गया है। अलवेरूनी ने हिमालय से निकलने वाली नदियों में 'वियत्त' अर्थात्
वितस्ता का उल्लेख किया है।
भागवत पुराण ( ५ : १० . १७ ) ने वितस्ता की गणना विश्व की महानदियो मे की है।
शतद्रु, चन्द्रभागा, मरुद्वृधा, वितस्ता, असिक्विनी, विश्वेति महानद्यः ।
निम्नलिखित मुख्य नदियों का वर्णन राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में मिलता है। उनका प्राचीन
तथा आधुनिक नाम दे देना ठीक होगा :
इरावती : रावो
वितस्ता : झेलम
विश्रामा : व्याम
परिशिष्ट ग २५
देविका : रावी की एक सहायक नदी है। उमा का रूप है। रावी और चेनाव के मध्य
बहती है
कुभु : कुभा अर्थात् काबुल नदी
गोमती : गोमेल ( ऋग्वेदीय गोमती ) नीलमत मे गौतमी है। कही कही गोमती
छप गया है।
शतद्रू : शत्तलज
चन्द्रभागा : चिनाव
सरस्वती : सरस्वती
सिन्धु : महानद तथा दूसरी इसी नाम की छोटी नदी कश्मीर मे है जो बान्दीपुर के पास
बितस्ता में मिलती है। दोनों नदियाँ कश्मीर मण्डल में बहती है। सिन्धु नदी
लद्दाख, लेह, गिलगिट, चिलास होती पाकिस्तान मे निकल जाती है। छोटी
सिन्धु सोनमर्ग के पर्वत के किनारे-किनारे बहती वितस्ता मे मिलती है।
कश्मीर मण्डल की जो नदियाँ सिन्धु में मिलती है उनमे तथा सिन्धु में स्नान
करने पर मनुष्य मरणोपरान्त स्वर्गगामी होता है। इसका स्पष्ट उल्लेख किया
गया है।
उत्तरकुरु को ऐतरेय ब्राह्मण ( ९ : १४ ) मे परेण हिमवन्तं कहा गया है। एक अन्य स्थान पर
( ८ : २३ ) में वसिष्ठ सातहव्य ने उत्तरकुरु को देवक्षेत्र कहा है।
सातवी शताब्दी में चीनी लेखकों के अनुसार कश्मीर सिन्धु नदी से चेनाव नदी और दक्षिण माल्दरेज
तक था। हुएनसांग के अनुसार उरसा कश्या । पश्शित तक्षशिला तथा सिंहपुर दक्षिण-पश्चिम पूंछ और
राजौरी दक्षिण था। उरसा भूखण्ड कश्मीर तथा तक्षशिला के मध्य में था, (कनिंघम) पूर्व तथा पूर्व-दक्षिण
की सीमा कहाँ तक विस्तृत थी पता नहीं चलता। परन्तु रावी नदी तक यह सीमा विस्तृत थी यह बात
मानी जाने लगी है। उत्तर में सिन्धु नदी की उपत्यका में हिमालय पर्वतमाला में स्थित भूखण्ड था। उस
समय जालन्धर हर्षवर्धन के राज्य में था। आठवी शताब्दी का नक्शा ठीक नहीं मिलता परन्तु शंकर वर्मा
ने कांगड़ा उपत्यका विजय किया था। इस प्रकार कश्मीर सिन्धु नदी से श्त तलज तक पर्वतीय प्रदेश
मे था। हुएनसांग के मत से ११६६ मील है।
२४ राजतरंगिणी
सम्बल के समीप वितस्ता नदी अहतुंग पहाडी के मूल से गुजरती है। पहाड़ी एक हज़ार फ़िट ऊँची
होगी। इस पर्वत के छाया में मनसावल अर्थात् मानस सर सुन्दर झील है। इसका वर्णन नीलमत तथा
जोनराज ने किया है। यह सरोवर मीलों लम्बा है। कश्मीर के सब झीलों से अधिक गहरा है। भूगोल के
वर्णन के समय इसका वर्णन किया गया है। वितस्ता का सम्बन्ध मनसावल से एक छोटे नहर द्वारा होता है।
(रा० : जोन ८१४, नील० ४90, 1244, 1247, 1334)
वितस्ता के बाम तट पर 'उच्छकुण्डल' तथा 'मग्कुण्डल' दो ग्राम हैं। प्राचीन प्रमाणों से प्रतीत होता
है कि कभी वूलर लेक इन ग्रामों के समीप तक फैला था। कल्हण से मालूम होता है कि उक्त ग्राम रिक्लेम कर
बनाए गए थे। जोनराज उन्हें वूलर लेक के तट पर रखता है। थीवर ने इन ग्रामों का उल्लेख करते हुए उन्हें
समुद्रकोट (सुन्दर कोट) से द्वारिका के समीप वग्दर कोट तक वूलर के तट पर बताता है। इसी प्रकार 'सुष्ट्य
कुण्डल' का उल्लेख मिलता है। (रा० ५ : १२० रा० जोन १२:०)
सोपोर के पास वितस्ता की बडी अन्तिम सहायक नदी कश्मीर में मिलती है। इसका नाम 'पोहूर'
है। वह सोपुर के अधोभाग में चार मील पर है। वितस्ता में मिलने के पूर्व उत्तर-पश्चिम कश्मीर उपत्यका
का जल लाती है। कल्हण ने काश्मीर के इस क्षेत्र का बहुत कम वर्णन किया है। राजतरंगिणी में पोहूर अथवा
और किसी नदी के संगम का वर्णन नही मिलता। इस नदी का प्राचीन नाम क्या था निश्चयात्मक रूप से
नही कहा जाता। जोनराज ने इस नदी को 'पहूर' कहा है। माहात्म्यो में प्रहर तथा प्रहार दोनो पाठ मिलते
हैं। (रा० जोन ११५०, ११५३, वितस्ता माहात्म्य २७-२, नील० 1322)
हमल स्रोतस्विनी हमल परगना में बहती आती है। हमल ही 'समाला' नदी (रा० : ७ : १५९)
महापद्मसर अर्थात् वूलर से लगभग चौदह मील और आगे चलकर बारहमूला के गर्त मे वितस्ता
गिरती है। बारहमूला के पश्चात् वितस्ता में नावें नही चल सकती। उसका प्रवाह उत्तरोत्तर वेगमय हो
जाता है। जल धारा की भयंकर जल वेग ध्वनि द्वारा घाटी निरन्तर गूँजती रहती है।
वितस्ता :
वायु या ब्रह्माण्ड, कूर्म और मत्स्य पुराणों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण वितस्ता का
स्थान गंगा, सिन्धु तथा सरस्वती के साथ रखता है।
मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, कूर्म तथा वाम पुराणो के अनुसार :- 'हिमवत्पादानिःसृता' रूप से
वितस्ता का उल्लेख किया गया है। अलवेरूनी ने हिमालय से निकलने वाली नदियों में 'वियत्त' अर्थात्
वितस्ता का उल्लेख किया है।
भागवत पुराण (५ : १० . १७) ने वितस्ता की गणना विश्व की महानदियो मे की है।
शतेद्रु, चन्द्रभागा, मरुद्वृधा, वितस्ता, असिक्किनी, विश्वेति महानद्यः।
निम्नलिखित मुख्य नदियो का वर्णन राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में मिलता है। उनका प्राचीन
तथा आधुनिक नाम दे देना ठीक होगा .
इरावती : रावी
वितस्ता : झेलम
विशोका : वेशव
परिशिष्ट ग २५
देविका : रावी की एक सहायक नदी है। उमा का रूप है। रावी और चेनाव के मध्य
बहती है
कुहू : कुभा अर्थात् काबुल नदी
गोमती : गोमेल (ऋग्वेदीय गोमती) नीलमत मे गौतमी है। कही कही गोमती
छप गया है।
शतद्रु : सतलज
चन्द्रभागा : चिनाव
सरस्वती : सरस्वती
सिन्धु : महानद तथा दूसरी इसी नाम की छोटी नदी कश्मीर मे है जो बान्दीपुर के पास
वितस्ता में मिलती है। दोनों नदियाँ कश्मीर मण्डल में बहती है। सिन्धु नदी
लद्दाख, लेह, गिलगिट, चिलास होती पाकिस्तान में निकल जाती है। छोटी
सिन्धु सोनमर्ग के पर्वत के किनारे-किनारे बहती वितस्ता में मिलती है।
कश्मीर मण्डल की जो नदियाँ सिन्धु में मिलती है उनमें तथा सिन्धु में स्नान
करने पर मनुष्य मरणोपरान्त स्वर्गगामी होता है। इसका स्पष्ट उल्लेख किया
गया है।
उत्तरकुरु को ऐतरेय ब्राह्मण (९:१४) में परेण हिमवन्तं कहा गया है। एक अन्य स्थान पर
(८:२३) में वसिष्ठ सातहव्य ने उत्तरकुरु को देवक्षेत्र कहा है।
सातवीं शताब्दी में चीनी लेखकों के अनुसार सिन्धु नदी से चेनाव नदी और दक्षिण माल्दरेज
तक था। हुएनसांग के अनुसार उरसा कश्या पश्चिम तक्षशिला तथा सिंहपुर दक्षिण-पश्चिम पूंछ और
राजौरी दक्षिण था। उरसा भूखण्ड कश्मीर तथा तक्षशिला के मध्य में था, (कनिंघम) पूर्व तथा पूर्व-दक्षिण
की सीमा कहाँ तक विस्तृत थी पता नहीं चलता। परन्तु रावी नदी तक यह सीमा विस्तृत थी यह बात
मानी जाने लगी है। उत्तर में सिन्धु नदी की उपत्यका में हिमालय पर्वतमाला में स्थित भूखण्ड था। उस
समय जालन्धर हर्षवर्द्धन के राज्य में था। आठवीं शताब्दी का नक्शा ठीक नहीं मिलता परन्तु शंकर वर्मा
ने कांगड़ा उपत्यका विजय किया था। इस प्रकार कश्मीर सिन्धु नदी से शतद्रु सतलज तक पर्वतीय प्रदेश
में था। हुएनसांग के मत से ११६६ मील है।
परिशिष्ट 'घ'
नाग
(तरंग : १ : २ : ९ पृष्ठ-६३)
नाग शब्द तथा नाग जाति पर विवेचन की आवश्यकता है। लगभग १३ जातियो का उल्लेख
नीलमत पुराण मे आया है। नाग जाति का नाम भी है, १ नाग, २. पिशाच, ३. दर्व, ४. अभिसार, ५.
गान्धार, ६ जुहुन्दर, ७ शक, ८. खश, ९ तगण, १०. मण्डव, ११. मद्र, १२. अन्तर्गिरि तथा १३. बहि-
र्गिरि। द्रविड भाषा में नाग को याम्पू अथवा याऊ कहते हैं।
नाग शब्द पवन अर्थात् वायु के लिए प्रयोग किया जाता है। अर्थ वायु किंवा पवन प्रिय के लिए
भी किया गया है। प्रजापति कश्यप की पत्नी कद्रू थी। कद्रू प्रजापति दक्ष की कन्या थी। देव, दैत्य, दानव,
रस, भद्र तथा गरुड प्रजापति कश्यप के पुत्र थे।
अमर कोष (१:८.४) मे नाग के दो नाम 'नागाः काद्रवेया.' 'नाग' और 'काद्रवेय' दिया गया है।
स्युरुत्तरपदे व्याघ्रपुङ्गवर्षभकुञ्जराः ।
सिंहशार्दूलनागाद्याः पुंसि श्रेष्ठार्थगोचराः ॥
—अमरकोष ३ : १ : ५९
नीलमत पुराण मे ६०३ नागो का उल्लेख किया गया है। (द्रष्टव्य श्लोक 965 = 967, 881—
946, 223, 226; )
वेदो में नाग जाति का उल्लेख नही मिलता। शतपथ ब्राह्मण (११ : २ : ७ : १२) में महानाग
का वर्णन किया गया है। इसका शाब्दिक अर्थ विशाल हाथी अथवा सर्प होता है। वृहदारण्यक उपनिषद्
(१.३.२४) तथा ऐतरेय ब्राह्मण (८.२२) के उद्धरणों में नाग शब्द का प्रयोग हाथी के लिए किया
गया है। आश्वलायन गृह्यसूत्र (२ : ४ : १) मे देव शास्त्रीय नाग का उल्लेख है।
पुराणों में नाग वंश का वर्णन मिलता है। उनके दो मुख्य राज्य मथुरा तथा चम्पावती में थे। नव
नागो ने चम्पावती में राज्य किया तथा सात नागो ने मथुरा में। वायु पुराण में नव नागों के स्थान पर
नव 'नागा.' का पाठ मिलता है। (वायु पुराण : ९८ : ४५३ तथा ६९: ३८२, ब्रह्माण्ड पुराण : ३ : ७४,
१९४-१९५, २६७)
वृत्र का वर्णन अवश्य वेद में मिलता है, शतपथ ब्राह्मण में उसे दानव कहा गया है। वह दानवों
का राजा कहा गया है। उसका नाम कालेय रखा गया है। सुरो के शत्रु रूप में चित्रित किया गया है।
इन्द्र तथा वृत्र का संघर्ष प्रख्यात है। इस प्रकार के आख्यान सुमेर बाइबोलोनिया में 'बेल मदरुक' का निय-
मन के साथ, मिश्र में 'होरी' का संघर्ष 'एपोप' के साथ, यूनान में, अपोलो' का 'फाइकोन' के साथ, और 'पोइ-
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रेस’ का ‘गोरगोन मेडूसा’ तथा ईरान में ‘फरदियम’ का ‘अजोदहक’ के साथ संघर्ष के दिखाये गये हैं ।
अथर्व वेद, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, छान्दोग्योपनिषद्, गृह्य सूत्र में नाग पूजा को उल्लेख
मिलता है । वे एक जाति रूप में चित्रित किये गये हैं ।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण अन्य जातियों के साथ नाग जाति का उल्लेख करता है । ( १ : ६ : ६ )
मत्स्य पुराण ‘बहुतरनागजातय.’ अर्थात् नागों की बहुत जातियाँ थी, वर्णन करता है ( १५४ . ४६२ ) पद्म
पुराण तथा हरिवंश पुराणों में उल्लेख आता है । पृथु के पूर्व नाग पृथ्वी का दोहन करते थे । ( पद्मपुराण
भूमिखण्ड २८ : ४५ तथा हरिवंश: १ : ७ : २६-२७ ) ।
वृत्र शब्द का प्रयोग वेदों में किया गया है । शाब्दिक अर्थ है—‘ध्यान्तारंदानवा वृश्रा ’—अर्थात्
वृत्रासुर, अन्धकार, शत्रु । वृत्रासुर इन्द्र संग्राम की कथा प्रसिद्ध है । इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया था ।
अपनी रक्षा के लिये वृत्र ने अहि का रूप धारण कर लिया था ।
शतपथ ब्राह्मण में वृत्र को सर्प तथा दानव कहा गया है । कश्यप के दनुनाम्नी पत्नी द्वारा उत्पन्न
पुत्रों का नाम दानव है । शतपथ ब्राह्मण में वृत्र का नाम सर्प दिया गया है ।
मुझे नेपाल यात्रा में सर्प जाति के लोगों से सम्पर्क हुआ था । पहले नाम सुना तो कुछ आश्चर्य
हुआ । सर्प जाति के लोग अच्छे, सुन्दर मनुष्य जैसे थे । उनकी जाति का सर्प क्यो पड़ गया, मैने पूछा वे
स्वयं नहीं बता सके । किन्तु उनके पास रहने से मैने अनुभव किया सर्प किंवा नाग का उनके मन में उच्च भाव
है । मैं समझता हूँ किसी समय सर्प की उपासना करने के कारण, उन्हें सर्प पूजक कहा गया था । किंवा
सर्प विद्या में वह जाति निपुण होगी । अतएव उनका नाम सर्प में दिया गया । सम्भव है वह नाम काला-
न्तर में कर्मवाचक से जातिवाचक हो गया । नाग शब्द, साप, सर्प, कीरा के सामान्य अर्थ में प्रयोग
किया जाता है । एक और सम्भावना हो सकती है । किसी पर्वतीय जाति का प्रतीक किंवा चिन्ह सर्प अथवा
नाग रहा था । उस प्रतीक किंवा चिन्ह के कारण नाग शब्द जातिवाचक हो गया । नाग प्राणी हैं । वे
मनुष्य हैं । और रेंगने वाले जीव भी हैं ?
फर्गुसन ने नाग जाति को तुरानी अर्थात् तुरान देशीय किंवा तुरान वंशीय कहा है । तुरानी तथा
आर्यों की एक ही परम्परा थी । यहू तथा द्रविड जाति मूलतः नाग अर्थात् सर्प पूजक नही थे । वे उत्तरो
भारत निवासी थे । आर्यों ने उन्हें जीता था । ( ‘ट्री एण्ड सरपेण्ट वरशिप’ पृष्ठ ६०, ६१ ) ।
कनिंघम ने नाग जाति को ड्रेगन अर्थात् नाग पूजक माना है । उनकी गणना ‘शक’, ‘मीडिया’ तथा
‘जोहक’ की श्रेणी में की है । तीन अत्यन्त प्राचीन मुद्राओं पर सर्प टंकित मिलता है । उस पर पुरानी
ब्राह्मी लिपि में ‘काटस’ अंकित है । उन्हें पश्चिमी पंजाब मे पाया गया था । यह प्रारम्भिक ‘तख्खस’ थे ।
नाग जाति का तक्षक राजा माना जाता है । उन्हों के उत्तराधिकारी थे । उन्हें ‘काद्रवेय; किंवा ‘कुद्रव’
कहा जाता था । ( वे कद्रू की सन्तान थे । कनिंघम ए० एम० आर० भाग २ : पृष्ठ १० )
कर्नल टाड के अनुसार नाग जाति शेषनाग देश से आई थी । यह देश सम्भवतः स्काईथिक अर्थात्
स्टार्बो वर्णित तोखरी है । तोखरो शब्द-संज्ञा तुर्की के लिए व्यवहृत की गयी है । वे शकद्वीप में राज्य करते थे।
चीनी उन्हें ‘तक ई उक्म’ कहते थे । वर्तमान ताजिन के ताजिक थे । ( एनाल्स एण्ड एण्टी क्विटींज आफ
राजस्थान पृ० ४५ ) थीपाजिटर ने उन्हे मानव, सोयुम तथा एल ( चन्द्रवंश ) से भिन्न नहीं माना है । उन्हें
क्षत्रियो की परम्परा में विरोधी तथा पर जाति कहा है । दैत्य, दानव, नाग एवं राक्षस सर्वथा मानव से
विरुद्ध थे नही माना है । (पाजिटर ए० आई० एच० टी० पृ० २९०)
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२८ राजतरंगिणी]
कारलेले (CORLLEALE) का मत है कि असुर तथा नाग जातियों संस्कृति तथा सभ्यता
की दृष्टि से अत्यन्त प्राचीन जाति थी । ये आर्यवंशीय थे । (कारलेयल जे. एल. आर. भाग १ : पृष्ठ ४, ५)
नाग भारत में असुर जाति की रीढ़ तथा शक्ति थे। नागों के पतन के पश्चात् भारत में संगठित असुर जाति
का पतन हो गया । ( बैनर्जी-शास्त्री : असुर इण्डिया पृष्ठ ६९) सी. ए० बी० बैनर्जी ने असुरों की एक
शाखा को नाग जाति माना है। डाक्टर ग्रियर्सन का मत है कि नाग जाति अनार्य थी। हुंजा नगर में निवासी
थे । हुंजा गिलविट क्षेत्र पदमोर में है । यह एक रियासत थी। इस समय पाकिस्तान में है। उनकी मूल
भाषा का पता नहीं चल सका है। भारत में विभिन्न नामा किंवा नाग जाति कहे जाने वालों की भाषाएँ
एक नहीं है। उनमें भिन्नता है। उनकी भाषा बुरुशस्की थी। यह भाषा किस वर्ग में आती है। अभी
निश्चय नहीं किया जा सका है । (ग्रियर्सन . पैशाची, पिशाच एण्ड माडर्न पिशाच इन. जेर. डी. एम. जी.
भाग ६६. पृष्ठ ७२ )
श्री सी० एफ० ओल्हिम का मत है। नाग जाति सूर्य पूजक थी। उनकी भाषा संस्कृत थी। उनकी
जाति का चिन्ह किंवा प्रतीक नाग का फण था। इसी प्रतीक अथवा चिह्न के कारण इस जाति की संज्ञा
नाग जाति हो गयी थी। (ओल्हम • सरपेण्ट वरशिप इन इण्डिया इन तृण. आर. ए. एस० १८९१ पृष्ठ ३९१)
श्री सी० एस० वेक का मत है। नागा आदिम वासी नाग पूजक थे । ( श्री सी० एस० वेक : सर-
पेण्ट वरशिप एण्ड अदर एसेज : पृष्ठ ९१ )
प्रोफेसर हापकिन्स का मत है। गरुड और तार्क्ष्य पश्चिमी घाट के मानव सरदार थे।
(होपकिन्स . इपिक मैथोलोजी पृष्ठ २३)
श्री. एल. बी. केनी ने 'नागाज इन मगध' के लेख में मत प्रकट किया है। वे द्रविड़ वंशीय जाति के
मानव थे। अर्यट के भारत आगमन के पूर्व उत्तरीय भारत में रहते थे । (जे. बी. ओ. आर. एम: भाग
२८. पृष्ठ १६३)
श्री ए. सी. दास का मत है। नाग जाति आर्यों की ही एक शाखा है। (ए सी. दास. ऋग्वेदिक
कल्चर पृष्ठ १६७) श्री. एन. जे शिन्दे का विचार है। नाग आर्य जाति के नहीं थे। क्योंकि ये प्राय. आर्यों
के विरोधी प्रतीत होते हैं। अथर्ववेद में सर्पों का उल्लेख जिस प्रकार किया गया है उससे कोई बात
सन्तोषप्रद रूप से स्पष्ट नहीं होती। नागों का नाम अधिकतया अनार्य प्रतीत होता है (श्री एन. जे.
शिन्दे, पूना. दि फाउण्डेशन आफ अथर्ववैदिक रिलीजन पृष्ठ ९:२००)
पाश्चात्य विद्वानो के विवेचनात्मक ऐतिहासिक मतों के पश्चात् भारतीय पुरातन साहित्य में नाग
जाति का रूप क्या था इस विषय पर प्रकाश डालना उचित होगा। अनेक मतों के बीच नागा जाति स्वयं
एक समस्या बन गयी है। उल्लेख कर चुका हूँ। नाग जाति तथा शब्द का प्रयोग वेद में नहीं किया गया
है। नाग के स्थान पर दानव वृत्र का उल्लेख मिलता है :
त्वं ताँ इन्द्रो भयां अमित्रान्दासा वृत्राण्यार्या च शूर ।
वधीर्वनेव सुधितैरभिक्रैरा पृत्सु दर्पि नृणां नृतम ॥
शतपथ ब्राह्मण में दानव तथा सर्प की संज्ञा वृत्र से दी गयी है । (१६ : ३ : ९ ।)
'तस्माद् वृत्रोऽथ मद यास्य मभक्त स्यादाहिस्तं दनेक्षु दनायूश्च मातेव च परिजग्हुतुस्तस्माद्दा-
नव इत्याहुः ।'
परिशिष्ट घ २९
महाभारत में दानव राज कलिय का वर्णन मिलता है। कलिय की संज्ञा कालिय नाग से दी गयी
है। (महा० : वनपर्व : १०१:७)
कलियं इति विख्यातो गण : ।
तैश्च वृत्त' समादिश्य जगत्सर्वं ॥ मय · ३.१०१·७
अथर्व वेद ५:१३, ५:५, ४.५६ तथा १५.१३ में वृत्त काउल्लेख आता है। तैत्तिरीय संहिता काण्ड ४
प्रपाठक २ अनुवाक २ मे उल्लेख है। छान्दोग्योपनिषद् ८ ' ४ में असुर विरोचन का वर्णन आत्मा के प्रसंग
में आता है।
सुर एवं असुर के सिद्धान्तों में मूल भेद यह था कि असुर शरीर को आत्मा मानते थे। सुर अर्थात्
देवता लोग आत्मा को शरीर से भिन्न समझते थे। सुर-असुर एक ही आर्य जाति की सन्तान थे। सैद्धान्तिक
तथा दार्शनिक मतभेदों के कारण दो वर्ग कालान्तर में हो गये थे।
आश्वलायन गृह्यसूत्र ३ : कण्डिका १३ तथा पारस्कर गृह्य सूत्र काण्ड २ कण्डिका १४ मे इसका
उल्लेख मिलता है।
रामायण में नाग जाति का उल्लेख मिलता है। भोगवती नगरी नाग राजाओ की राजधानी थी।
उसपर रावण ने विजय प्राप्त किया था।
सर्वदिव्यास्त्रयांचा यज्ञविघ्नकर सदा।
पुरीं भोगवतीं गत्वा पराजिह्य च वासुकिम् ॥
—वा० रा० कि० सर्ग ३२ : १३
सुमहत्तो बलं कस्माद् विषादं मजते भवान् ।
त्वया भोगवती गत्वा निर्जिता पन्नगा युधि ॥
—वा० रा० युद्धकाण्ड सर्ग ७ : ८
स तु भोगवतीं गत्वा पुरीं वासुकिपालिताम् ।
कृत्वा नागान् वशे हृष्टो ययौ मणिमयीं पुरीम् ॥—वा० रा० उ० सर्ग २३ : ५
नागो के रहने का स्थान, पाताल, रसातल तथा समुद्र कहा गया है। समुद्र में रहने का अर्थ यह
नही है कि जल के भीतर रहते थे बल्कि समुद्र तटवर्ती किंवा समुद्र आवृत प्रदेश द्वीप अथवा भूखण्ड में
निवास करते थे।
तं कालमेघप्रतिमं महोरगनिषेवितम् ।
अभिगम्य महानादं तीर्थेनैव महोदधिम् ॥—वा० राः कि० सर्ग ४० : १८ ॥
रावण ने नाग जाति पर विजय किया था। वह जाति सुसभ्य तथा नगरों में भी रहने वाली थी।
यदि वे शक्तिशाली नही होते, उनका तत्कालीन राजनीतिक जीवन में प्रमुख स्थान न होता तो रावण उन
पर विजय पाकर गौरवान्वित किस प्रकार होता। निस्सन्देह नाग एक मानव जाति थी। (रामा० : सुन्दर :
१२ : २१-२२)
महाभारत में नाग यज्ञ; नाग द्वारा राजा परीक्षित की मृत्यु एवं खाण्डव वनदाह का विस्तृत
वर्णन मिलता है। महाभारत के अनुसार नाग एक मानव जाति थी। तक्षक नाग इस जाति का
राजा था। तक्षक के मित्र इन्द्र ने खाण्डव दाह रोकने का प्रयास किया था किन्तु सफल नहीं हुए। नाग राज