राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 194, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १११
तस्मिन्काले स्वसचिवान् सासूयानिन्यवोवरत् ।
इमं पौराणिकं श्लोकमुदीर्य मधुसूदनः ॥ ७१ ॥
७१. मधुसूदन१ के सचिव गण स्पृहणीयता से भुनभुना रहे थे, उस समय भगवान् ने
निम्नलिखित पुराण२ पद का उल्लेख कर उन्हें शान्त किया।
“कश्मीराः पार्वती तत्र राजा ज्ञेयः शिवांशजः ।
नावज्ञेयः स दुष्टोऽपि विदुषा भूतिमिच्छता ॥” ७२ ॥
७२. काश्मीर१ की भूमि पार्वती है। वहाँ का राजा हर२ का अंश है। कल्याणેચ્છुक
विज्ञ जनो के लिये वह दुष्ट होने पर भी अवज्ञा का पात्र नहीं है।
गर्भधारण के समय से ही गर्भ स्थित सन्तान का
उसी माता-पिता अथवा जहाँ भी कही उसके उत्तरा-
धिकार का हक मिलता है अथवा उत्तराधिकार
मिलने वाला होता है—(नरवाडवरशिप ) विधि के
अनुसार उसे अधिकार प्राप्त हो जाता है। सम्भव है
कि विधवा का अभिषेक तत्कालीन प्रचलित विधि
तथा संहिताओं व आचारों के विरुद्ध रहा हो।
भगवान् श्रीकृष्ण का कार्य विधि तथा धर्म
सम्मत दोनों था। भगवान् ने माता के गर्भ में
स्थित पुत्र का अभिषेक किया था। ऐसी स्थिति में
प्रश्न नही उठता कि स्त्री विधवा है अथवा सधवा।
सम्भव है कि भगवान् ने उस अनुचित प्रचलित रूढि
पर अपने इस कार्य द्वारा आघात किया हो, जिसमें
विधवा को अशुभ मान लिया जाता है। भगवान् ने
पुराण का उल्लेख-'कश्मीर पार्वती तुल्य है। वहाँ
का राजा हरांशज किंवा शिव का अंश है' इस
प्राचीन स्मृति का प्रमाण देकर तथा स्त्री का सम्मान
कर पुरानी स्मृति पर अपनी मुहर लगायी है । उसे
राज्य कार्य के योग्य तथा सिंहासन को अधिकारिणी,
अपने अधिकार से नही सही पुत्र के संरक्षक के
अधिकार के कारण माना है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ७१ मे 'वोवरत्' का पाठभेद
'वारयत्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
७१ (१) मधुसूदन विष्णु का नाम है। यहाँ
पर श्रीकृष्ण के लिये आया है। मधु तथा कैटभ दो
राक्षस थे। उन्हें एक साथ "मधु-कैटभ" नाम
से पुकारा जाना है। मधु की त्वचा कोमल
थी। इसलिये उसका नाम मधु पडा था। गाथा है
कि भगवान् के नाभि कमल पर दो जल बिन्दु गिरे
थे। वे रजोगुण तथा तमोगुण के प्रतीक थे। भगवान्
ने उन बूँदो की तरफ देखा। एक मधु तथा दूसरा
कैटभ हो गया (मेरु शान्ति पर्व . ३५५-२२-२३ )
एक और गाथा है। उनकी उत्पत्ति भगवान् विष्णु
के कान के मैल से हुई थी। (दे० भा० १ ४)।
पद्म पुराण (मृ : ४०) के अनुसार ब्रह्मा के तमो-
गुण से इनकी उत्पत्ति हुई थी। कालान्तर में दोनो
आततायी राक्षस हो गये थे। ब्रह्मा के सुझाव पर
विष्णु ने उनका वध किया था। अतएव उनका नाम
'मधुसूदन' पड गया। (म० शा० २०० : १४-१६)
(२) पुराण : कल्हण ने पुराण का नाम नही
दिया है। नीलमत में यह श्लोक मिलता है परन्तु
शब्दावली मे किंचित् भेद है। कल्हण ने पुराण शब्द
का प्रयोग प्रायः नीलमत पुराण के लिये किया है।
उसने बहुत कुछ ऐतिहासिक सामग्री नील मत पुराण
से ली है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ७२ मे 'कश्मीरा;' का पाठभेद
'काश्मीरा:' मिलता है।
पादटिप्पणियां :
७२ (१) नीलमत पुराण मे यह श्लोक निम्न
लिखित रूप में मिलता है।