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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 984 में से

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पृष्ठ 185

१०२ राजतरंगिणी
तेनोपकूलं कालिन्द्याः स्कन्धावारं न्यभ्रता ।
याद्वीहसितैः सार्धं योधानां मीलितं यशः ॥ ६० ॥
६०. कालिन्दी पुलिन १ में काश्मीरी सेना ने जिस समय अपना शिविर स्थापित किया उस
समय यादवीय सेना का गौरव यादवी-ललनाओं की स्मित रेखाओं के साथ लुप्त हो गया ।
एकदा सर्वतो भग्नाः स्वसेनास्त्रातुमुद्यतः ।
तं संसरोध योद्धारं संगरे लाङ्गलध्वजः ॥ ६१ ॥
६१. एक समय पलायनोन्मुख भग्न यादवी सेना की रक्षा निमित्त लांगलध्वज १ उस
योद्धा (गोनन्द) से युद्ध में रत हुए ।


[बायाँ स्तम्भ]
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६० में 'स्कन्धावारम्' का पाठभेद
'स्कन्डावारम्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
६० हरिवंश पुराण (२ : ३५) के अनुसार
कश्मीराधिपति गोनन्द मथुरा के पश्चिमी घेरे की
ओर अपनी सेना सहित युद्ध निमित्त तत्पर था ।
जरासंध के नेतृत्व में मथुरा चारो ओर से
महा विशाल सेना द्वारा घेर ली गयी थी । निम्न
रूप से चारो दिशाओं से घेरा डाला गया था ।
पूर्वीय मोर्चा और घेरे पर उलूक, कैतव,
अंशुमान राजा का पुत्र एकलव्य, बृहत्क्षत्र, बृहद्धर्मन्,
जयद्रथ, उत्तमो जस, शल्य, कौरव, कैकेय, वैदेशि,
वामदेव, तथा शिनि देश का राजा साकृति था ।
पश्चिमी मोर्चों पर—मद्रराज, कलिगपति,
चेकितान, वाह्निक, काश्मीर राज गोनन्द कस्पेश
द्रुमराज, किम्पुरुष, तथा पर्वतीय राज अनामय था ।
उत्तरीय मोर्चों पर—पुरुकुलोत्पन्न, वेणुदारि,
विदर्भाधिपति सांवरू राज, भोजेश्वर रुक्मिन्,
शूर्पाक्ष तथा मालवेश, अवन्ति देश के विद तथा
अनुविंद, दन्तवक्त्र, छागलि, पुरमित्र, विराट्,
शौरभ्य, मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा,
त्रिगर्त, बाण एवं पंचनद के राजा एवं योद्धा गण
एवं दक्षिणी मोर्चों पर-दरद, चेदिराज तथा स्वयं
जरासंध था ।

[दायाँ स्तम्भ]
राजाओ तथा योद्धाओं की यह तालिका अपूर्ण
है । उनके नामों में भी विभिन्नता है । किन्तु गोनन्द
कश्मोरराज का नाम सभी सूचियों में है । (हरिवंश
पुराण २ : ३४) अतएव यह प्रमाणित और निर्वि-
वाद हो जाता है कि नीलमत पुराण तथा कल्हण
वर्णित यह बात साधिकार प्रमाणित है कि गोनन्द
कश्मोरराज जरासंध का पक्ष लेकर मथुरा के
आक्रमण मे सम्मिलित था ।
श्री कृष्ण की ओर से युद्ध में भाग लेने वाले
राजाओं का नाम स्पष्ट नहीं मिलता । महाभारत
सभा पर्व (१४ : ३५) से इतना ही मालूम होता
है कि १८ कुलों ने मिलकर जरासंध के आक्रमण
का सामना करने की योजना बनायी थी ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६१ में 'भग्ना' का 'भग्नां' तथा
'स्वसेना' का पाठभेद'स्वमेवा' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
६१ लांगल ध्वज-इसका शब्दिक अर्थ हलध्वज
होता है । यहाँ बलराम किंवा बलभद्र के लिये आया
है । बलभद्र आयु में श्री कृष्ण से तीन मास ज्येष्ठ
थे । पिता वसुदेव तथा माता रोहिणी थी । इस
प्रकार श्री कृष्ण विमातृ भाई थे । ये अत्यन्त
सुन्दर थे । एतदर्थ इनको राम कहा जाता था ।
अत्यन्त बली थे । इसलिए 'बलराम' नाम पड़
गया । इनका नाम 'हली' 'हलायुध' 'सीरपाणि'
'मूसली' 'मुसलायुध' 'हलधर' आदि है ।