राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ राजतरंगिणी
ततस्तस्यातिसंरम्भात् तानदूरस्थितान् प्रति ।
यात्राऽभूद् ध्वजिनीवाजिरेणुग्रस्तनभस्तला ॥ ६७ ॥
६७. वृष्णि जब बहुत दूर नहीं रह गये थे तो क्रोध जर्जरित राजा ने सवेग उनके विरुद्ध
इस प्रकार अभियान किया कि उसके अश्वारोही दल के टापों की उड़ी धूल से आकाश भर गया ।
चीनान्यपरचीनांश्च नीहारांश्च पुनः पुनः ।
अन्विष्य दरदांश्च हिमवन्तम् तथैव च ॥
—वाल्मीकि रामायण
अरण्य काण्ड ४३ : १०, १२
बौद्ध ग्रन्थों में गान्धार जनपद का उल्लेख अनेक
स्थलों पर आया है । मोग्गलिपुत्त स्थविर ने तृतीय
संगीति को समाप्त कर मध्यात्मिक स्थावर को
कश्मीर तथा गांधार राष्ट्र में धर्म प्रचारार्थ भेजा ।
गान्धार जनपद की राजधानी तक्षशिला थी । प्राचीन
काल में पुक्कुसाति वहाँ का राजा था । बुद्ध
भारत का प्रधान शिक्षा तथा व्यापारिक केन्द्र था ।
तक्षशिला में बौद्ध विद्वान् जीवक, बन्धुल मल्ल,
प्रसेनजित्, महालि आदि की शिक्षा हुई थी ।
पाठभेद :
श्लोक सङ्ख्या ६७ में 'संरम्भात्' का पाठभेद
'संभारात्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
६७ (१) ध्वजिनी का अर्थ होता है ध्वजाधारी
दल आज से डेढ़ शताब्दी पूर्व तक सेना में अश्वा-
रोही ध्वजाधारी होते थे । वे सेना के आगे चलते
थे । ध्वजा की रक्षा करना सैनिको का परम कर्तव्य
होता था । ध्वजा पकड़ जाने पर एक प्रकार से
हार मानी जाती थी । मानी सेनानायक पराजय के
समय या आत्मसमर्पण के समय ध्वजा स्वयं नष्ट
या भग्न कर देते थे ताकि वह शत्रु के हाथों
में पड़ कर अपमानित न की जा सके । सिख
ध्वजा को इतना महत्त्व देते हैं कि उसकी पूजा
करते हैं । प्रत्येक गुरु-द्वारा पर उसे ससम्मान स्थापित
किया जाता है ।
हनुमान जयन्ती कात्तिक कृष्ण चतुर्दशी को
हनुमान जी की पूजा होती है । उस दिन नवीन
ध्वजा तैयार की जाती है। उसकी विधिवत् पूजा
होती है । झण्डाभिवादन सैनिक समारोह का एक
विशेष महत्वपूर्ण संस्कार है । ध्वजा देश के गौरव
का प्रतीक माना जाता है ।
२. कृष्ण दामोदर युद्ध : नीलमत पुराण
(श्लोक स० ६) में मिलता है ।
कल्हण ने यह प्रसंग नीलमत पुराण से लिया
है । नीलमत पुराण इस प्रश्न से यह विषय आरम्भ
करता है । क्या कारण है। महाभारत के युद्ध में
भारत के सभी राजाओं ने भाग लिया था ।
काश्मीरराज राजाओं की तालिका में दिखायी
नहीं पड़ते । उसका उत्तर नीलमत देता है । कश्मीर
राजा शिशु थे । इसलिये कश्मीर राजा और कश्मीर
की सेना महाभारत युद्ध में भाग नहीं ले सकी ।
मथुरा युद्ध में गोनन्द प्रथम ने वीर गति प्राप्त
की । केवल शिशु गोनन्द उस समय देवी यशो-
वती के गर्भ में था । वह उत्पन्न हुआ । शिशु
था । महाभारत मथुरा युद्ध के केवल बीस वर्ष
पश्चात् हुआ था । इस काल में दामोदर राजा
था । उसके वीर गति प्राप्त करने पर शिशु
गोनन्द द्वितीय राजा हुआ ।
नीलमत पुराण (श्लोक सं० ६) में स्पष्ट उल्लेख
है कि माधव अर्थात् श्रीकृष्ण से युद्धार्थ दामोदर
चतुरंगिणी सेना के साथ अभियान किया था ।
यादव सेना श्रीकृष्ण सहित स्वयंवर निमित्त गान्धार
जा रही थी । नीलमत ( श्लोक संख्या ७ ) में
स्पष्ट प्रकट होता है कि दोनों राजाओं में युद्ध हुआ
और राजा दामोदर वीर गति प्राप्त किया ।
जनमेजय ने वैशम्पायन से पूछा :
महाभारतमंग्रामे नानादेश्या नराधिपाः ।
महाशूराः समायाताः शिन्तां मे महात्मनाम् ॥ ३:३