राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० राजतरंगिणी
विहाय देहं शेपाहेर्विपक्षश्लेषभयादिव ।
भूर्गारुत्मतरत्नाङ्के भेजे तस्य भुजे स्थितिम् ॥ ५८ ॥
५८. पृथ्वी शेषनाग के विष के भयभीत होकर शेष नाग के शरीर का त्याग कर गरुड़ के
पवित्र रत्नों¹ द्वारा आभूषित राजा की भुजाओं का आश्रय थी ।
काश्मीर के उत्तर पूर्व निस्संदेह कैलास है । गंगा
पूर्व में पडती है। वह कश्मीर की कभी सीमा
नहीं हो सकती । किन्तु कश्मीर में गंगा से अभि-
प्राय सिन्धु नदी से भी लिया जाता रहा है । नील-
मत पुराण के पद-'गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता
यमुना तथा' से प्रतीत होता है कि यहाँ उस सिन्धु
से तात्पर्य है जो दरस उपत्यका से प्रवाहित होती
काश्मीरी प्रयाग के समीप वितस्ता में आकर मिलती
है। जोनराज भी सिन्धु से मनसाबल सरोवर
में नहर लाने की बात का उल्लेख करता है। प्राचीन
लेखकों ने सिन्धु का उद्गम गंगा झील अर्थात् गंगबल
के उत्तर पूर्व हरमुख शिखर के हिमानी को माना
है। कश्मीर में अनेक जल स्रोतो को गंगा नाम
दिया गया है। यहाँ दुकूल अर्थात् सूक्ष्म वस्त्र से
अर्थ इसी नदी से लगाना चाहिए । मैं जोजिला
पास से श्रीनगर लौट रहा था । मार्ग में सड़क
सिन्धु के तट से जाती है। मुझे कल्हण का यह
श्लोक याद था। सिन्धुका जल पाषाण शिलाओ से
टकराता उछलता इस प्रकार चलता है कि मालूम
पडता है उज्ज्वल महीन दुकूल हवा में भर कर उड़ने
की कोशिश कर रहा है। यह मत मान्य नहीं किया
जा सकता कि इस श्लोक द्वारा कश्मीर मण्डल की
सीमा गोनन्द के समय कैलास तथा वर्तमान गंगा
नदी अर्थात् उत्तर प्रदेश तक थी ।
(२) गंगा - काश्मीरी साहित्य में सिन्धु को
गंगा अर्थात् उत्तर गंगा नाम से सम्बोधित किया
गया है। यह हरमुख शिखर के ईशान कोणीय
हिमानी अर्थात् ग्लेशियर के अधोभाग में है। सिन्धु
नदी इस उपत्यका तथा हरमुख पर्वत के उत्तरी पर्व-
तीय क्षेत्रों के जल को ग्रहण करती है। वितस्ता की
सिन्धु सबसे बडी शाखा नदी है।
काश्मीरी सिन्धु नदी को गंगा तथा वितस्ता को
यमुना कहा गया है। नीलमत पुराण का उल्लेख
यहाँ संगत होगा ।
गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा ।'
—294 : २४७-२४८
५७ (३) गोनन्द : गोनन्द काल से सीमा का
अनुमान किया जा सकता है। नीलमत पुराण में इस
काल का उल्लेख है :
कुरुपाण्डववेलायां भूमिर्भगवता स्वयम् ।
पाविताभूरितिसुतानवतीर्णान् जघान यत् ॥
10 : १०
तस्मिन् कालेऽत्र समभूत् राजा विशदकीर्तिमान् ।
काश्मीरान् पालयन् सौम्य गोनन्द इति संशया ॥
11 : ११
युधिष्ठिर तथा अर्जुन के नामो का उल्लेख मुझे
नीलमत में नही मिला । कश्मीर के प्रसिद्ध नागों
मे युधिष्ठिर तथा अर्जुन का नाम आता है। महा-
भारत के राजा तथा उसके पात्र के रूप मे वर्णन
नहीं मिलता ।
हवोत्प्लवः शठः शाण्यः शत्रुघ्नो रामलक्ष्मणौ ।
महादेवः कामपालो गोशिराः सयुधिष्ठिरः ॥
913 : १०७९ : १०८०
पानीयश्चाप्यर्नाकश्च कनकाख्यः कलिंककः ।
अर्जुनः पौण्डरीकश्च धनदो नदकूबरः ॥
886 : १०५६
पाठभेद :
श्लोक सं० ५८ में 'देहम्' का 'दिशम्'; 'विपक्षश्ले'
की 'ह्यैवंपक्ष्ले' तथा 'रत्नाङ्के' का 'रत्नाङ्गे'
पाठभेद मिलता है ।