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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 984 में से

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पृष्ठ 180

प्रथम तरंग ९९
कश्मीरेन्द्रः स गोनन्दो वेल्लद्गङ्गादुकूलया ।
दिशा कैलासहासिन्या प्रतापी पर्युपास्यत ॥ ५७ ॥
५७. वह दिशा १ जिसका तुषार मण्डित जाज्वल्यमान कैलास हास था, जिसका दुकूल
कल्लोलिनी गंगा थी २, प्रतापी काश्मीरेन्द्र गोनन्द ३ की उपासना करती थी ।
जनमेजय के समय कलियुग के १२५ वर्ष व्यतीत
हो चुके थे । श्री तारानाथ तर्कवाचस्पति का मत
है कि कलियुग के ८० वर्ष बीतने पर राजा परीक्षित
का जन्म हुआ था ।
ज्योतिष ग्रंथ खंड-खाद्य के रचनाकार ब्रह्मगुप्त
थे । ( शक ५२० संवत् ) उसने प्राचीन ज्योतिष
आर्यभट के आधार पर गणना की है कि विक्रमा-
दित्य के समय कलि के ३०४४ वर्ष व्यतीत हो
चुके थे ।
निर्णय सिन्धु से मालूम होता है कि शक संवत्
में यदि ३१७९ वर्ष और जोड़ दिया जाय तो कलि-
युग का आरम्भ तथा युधिष्ठिर के राज्यकाल का
ज्ञान हो जायगा ।
नीलमत पुराण में गोनन्द का उल्लेख आता है ।
कल्हण ने गोनन्द सम्बन्धी सामग्री नीलमत से ली
होगी । वहाँ नीलमत का कुछ श्लोक उद्धृत करना
ऐतिहासिक दृष्टि से उचित होगा ।
इममर्थं पुरा जातु गोनन्दाख्यो नृपोत्तमः ।
तीर्थयात्राप्रसंगेन बृहदश्वमुपागतम् ॥
२८ : ४८
गोनन्द उवाच :
मन्वन्तरेषु पूर्वेषु नासीद्देशमिमं किल ।
काश्मीराख्यं बभूवास्मिन्कथं वैवस्वतेऽन्तरे ॥
२९ : ५०
एवमुक्त्वा स गोनन्दो बृहदश्वेन भूभुजा ।
३७२ : १५८
एवमुक्तोऽपि गोनन्दो बृहदश्वेन भूमिप ।
प्रावर्तयत् समुच्छिन्नानाचारान् कालदोषतः ॥
८७५ : १०४६
काश्मीरकस्तु गोनन्दो बृहदश्वेन भाषितम् ।
श्रुत्वा स्वकीयम् आचारम् किमपृच्छदतः परम् ॥
७७८ : १०४९
वैशम्पायन :
काश्मीरकस्तु गोनन्दो बृहदश्वेन भाषितम् ।
श्रुत्वोवाच मुनिश्रेष्ठं बृहदश्वं नराधिपः ॥
८७९ : १०४९
वैशम्पायन उवाच :
एवमुक्त्वा स गोनन्दं बृहदश्वो नराधिपम् ।
धर्मात्मा तीर्थयात्रार्थं जगामाभीप्सितां गतिम् ॥
१३६६ : १५८२
बहु मेने तथात्मानम् गोनन्दः समरप्रियः ।
स प्रशास वसुधां राजा धर्मानुसारतः ॥
१३७९ : १५८३
गोनर्द और गोनन्द दो भिन्न नाम है । गोनर्द
एक प्रदेश का नाम है । हेमचन्द्र ने गोनर्द को योग-
सूत्र तथा महाभाष्य के रचयिता पतञ्जलि मुनि
का निवास स्थान माना है । गोनर्द उत्तर प्रदेश के
गोण्डा जिला का प्राचीन नाम है । गोनर्द व्यक्ति
विशेष का नाम भी हो सकता है ।
पाठभेद :
'कश्मारेन्द्रा' का 'काश्मीरेन्द्रः'; 'नन्दा' का
नदों' तथा 'दुकूलया' का 'दुगूलया' पाठभेद मिलता
है ।
टिप्पणियाँ :
५७ (१) दिशा : यहाँ दिशा का अर्थ उत्तर दिशा
होगा । कैलास तथा गंगा दोनो उत्तर दिशा मे हैं ।
कश्मीर स्वतः उत्तर दिशा में हैं । कश्मीर की सीमा
का भी वर्णन परोक्ष रूप से कल्हण ने किया है।