राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ राजतरंगिणी
पुंसां निगौरँवा भोज्य इव याः स्त्रीजने दृशः ।
प्रजानां मातरं तास्तामपश्यन्देवतामिव ॥ ७३ ॥
७३. मनुष्यों की जो दृष्टि स्त्री जनों को निगौरव एवं भोग्य पदार्थ समझती थी, वही उसे
प्रजा की माता १ तथा देवी स्वरूप समझने लगी !
काश्मीरायां तथा राजा त्वया ज्ञेयो हरांशजः ।
तस्यावज्ञा न कर्तव्या मततं भूतिमिच्छता ॥
—237 : ३१४
लोक प्रकाश में श्लोक का उद्धरण निम्नलिखित
रूप में दिया गया है ।
‘सती च पार्वती ज्ञेया राजा ज्ञेयो हरांशजः ।’
जोनराज ने अपनी राजतरंगिणी में कल्हण के इस
पद का उद्धरण दिया है ।
(२) हरांशज : यहाँ पर भगवान् ने 'देवाधि-
राज' अर्थात् ‘डिवाइन राइट’ के सिद्धान्तकी ओर
एक प्रकार से संकेत किया है । भारत में एक मत
राजा को देवांश मानता है । यूरोप के मध्ययुग
में तथा मुस्लिम खिलाफत काल में इस सिद्धान्त
को मान्यता दी गयी थी । वर्तमान लोकतंत्र इस
सिद्धान्त को मान्यता को समाप्त कर पश्चिम में
उदय हुए हैं । भगवान् श्रीकृष्ण ने कश्मीर मण्डल
को पार्वती का रूप माना है । समर्थन में एक प्राचीन
उद्धरण दिया है । राजा को हरांशज कहा है ।
कश्मीर मण्डल तथा राजा दोनों को इस प्रकार
मान्यता देकर पवित्र किया है । उसे दूसरे शब्दों में
कह सकते है । कश्मीर भूमि यदि मातृ भूमि है, तो
यहाँ का राजा पिता है । यह अनुपमेय उपमा भगवान्
ने अनोखे ढंग से दी है ।
भगवान् ने किस पुराण से उद्धरण दिया था ।
कल्हणने उसका उल्लेख नहीं किया है । किन्तु इस
सिद्धान्त, भाव तथा शब्दावली की पुष्टि नीलमत पुराण
के श्लोक से मिलती है । सम्भव है । नीलमत पुराण में
यह श्लोक किसी अन्य पुराण से उद्धृत किया गया
हो । अथवा उसका भाव ले लिया गया हो । कल्हण
केवल पुराण शब्द का उल्लेख करता है । उसे नील-
मत पुराण का ज्ञान था अतएव नीलमत शब्द का
न लिखना अर्थपूर्ण है । यह तर्क सम्मत मालूम होता
है । उसका अभिप्राय यहाँ नीलमत पुराण के अति-
रिक्त किसी अन्य पुराण से नहीं था ।
७३ (१) 'प्रजानां मातरम्': भगवान् ने यहाँ
एक आदर्श सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है ।
कल्हण के श्लोक से ध्वनि निकलती है । पूर्व काल
में स्त्री केवल भोग्य पदार्थ मानी जाती थी । उनका
राज काज में विशेष हाथ नहीं था । रानी
पर भी उनकी स्थिति में विशेष अन्तर नहीं
आता था ।
भगवान् ने इस मत का खण्डन कर नवीनमत
जगत् के सम्मुख रखा । राजा यदि देश का पिता है,
तो रानी देश की माता है । राजतन्त्र में नागरिक
होते हैं । उनकी लोकतन्त्रीय परम्परा के अनुसार
स्वतन्त्र नागरिक की स्थिति नहीं होती अतएव यहाँ
प्रजा की माता शब्द का प्रयोग किया गया है । यदि
काश्मीर गणराज्य होता तो भगवान् निस्सन्देह राज-
माता शब्द का प्रयोग न करते ।
भारत में राजमाता पद इसी समय से ऐति-
हासिक तथ्य के साथ चलता मालूम होता है । आज
भी भारत में रानी को राजमाता कहते हैं। यह उदात्त
भावना थी, राजा-प्रजा में, रानी-प्रजा में, वात्सल्य
भाव उत्पन्न करती है । संकेत करती है । राजा एवं
रानी का कर्तव्य है । अपनी सन्तान तुल्य प्रजा का
पालन करे ।
पृथ्वी को सर्वत्र स्त्री माना गया है । पृथ्वो
माता, भारत माता, आदि शब्दों का व्यवहार किया
गया है । पृथ्वी किंवा भूमि एक प्राचीन आख्यायिका
के अनुसार राजा की पत्नी मानी गयी है । अतएव