राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १०५
गतिं प्रवीरसुलभां तस्मिन्सुक्षत्रिये गते ।
श्रीमान्दामोदरो नाम तत्सूनुरभृत क्षितिम् ॥ ६४ ॥
६४. जब उस सुक्षत्रिय ने प्रवीर सुलभ गति¹ प्राप्त कर ली तो उसका यशस्वी पुत्र श्रीमान्
दामोदर क्षिति की रक्षा में तत्पर हुआ ।
भोगयोगोर्जितं राज्यं प्राप्नवानपि भूपतिः ।
ध्यायन्पितृवधं मानी नोपलेमे स निर्वृतिम् ॥ ६५ ॥
६५. यद्यपि उस भूपति ने भोग सम्पत्ति सम्पन्न राज्य अर्जित किया था तथापि पितृ वध
का ध्यान उदय होते ही उस मानी को शान्ति दुर्लभ हो जाती थी ।
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
यह भी राजा जम्मू के खान्दान में था । मौर याज
ने इसे मथुरा का पोता ख्याल किया है । उसने
हकूमत का नज्म व नस्ल निहायत खूबी से सरंजाम
दिया । उन दिनों हिन्दुस्तान में जरासन्ध राजा की
हकूमत को उसने श्रीकृष्ण जी महाराज के साथ
विनाय मुखासवत डाली हुई थी । राजा आदि
गोनन्द अपनी करीबी रिस्तादारी के पेश नज़र
एक बड़ी भारी फौज कश्मीर से लेकर राजा जरा-
सन्ध की मदद को रवाना हुआ । अपना लाव
लश्कर लेकर उनके साथ मसरूफ पैकार था । दरया
जमुना के किनारे फरीकों की फौजों के माबैन
में बड़ा भारी रण पड़ा । आखिर में किसी वजह
से राजा आदि गोनन्द की फौज में भगदड़ पड़ गयी ।
खुद राजा मजकूर साबित कदम रहा । और दाद
सुजाअत देता हुआ बलभद्र जी बिरादर श्री कृष्ण जी
महाराज के हाथों मैदान कार ज़ार से काम आया ।
मुद्दत हकूमत सत्तरह साल ।'
हरिवंश पुराण विष्णु पर्व ४१:२८ में स्पष्ट
उल्लेख है कि अन्य राजाओं के साथ कश्मीर राजा
ने जरासन्ध का पक्ष लेकर मथुरा पर आक्रमण कर
कृष्ण से युद्ध किया था ।
मद्रः कलिंगाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्निकः ।
कश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा ॥
पादटिप्पणियाँ :
६४ (१) गति : कल्हण यहाँ पर भारतीय वीर
परम्परा की ओर संकेत करता है। क्षत्रियों को स्वर्ग
१४
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
प्राप्ति युद्ध स्थल में होती है । प्रासादों में बैठकर
जीवन व्यतीत करना और मर जाना यह क्षत्रियों
किंवा आयुधधारियों का कभी भारतवर्ष में आदर्श
नही रहा और न इस प्रकार के जीवन को भारतीय
कभी अच्छा मानते थे । विजय दशमी के दिन अर्थात्
चातुर्मास के पश्चात् विजय यात्रा का मुहूर्त माना
जाता था । इस दिन प्रतापी राजा विजय यात्रा
निमित्त निकलते थे । सन् १९४७ के पूर्व प्रायः
सभी भारतीय राजाओं के यहाँ सुसज्जित सेना
प्रयाण करती थी । अस्त्र-शस्त्र की पूजा होती थी ।
समरांगण में वीर गति प्राप्त करने से बढ़कर क्षत्रियों
के लिये और कोई श्लाघनीय मृत्यु नहीं मानी
जाती थी ।
६५. जरासंघ मगध का सम्राट् था । उसके पुत्र का
नाम सहदेव था । उसकी दो कन्याएँ अस्ति तथा
प्राप्ति का विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ
था । महाभारत में कहा गया है कि जरासंघ ने
सम्राट् का पद प्राप्त किया था । चेदि का राजा
शिशुपाल उसका सर्वप्रधान सेनाध्यक्ष था । जरासंघ
एक संघ का सम्राट् था । महाभारत में प्रमाण
मिलता है कि बहुत से राजा मिलकर एक सम्राट्
का निर्वाचन करते थे । उसे उस पद पर अभिषिक्त
करते थे । राजाओ ने एकता की दृष्टि से यह प्रथा
चलाई थी । जरासंघ ने मालूम होता है सम्राट्
होने पर इस सिद्धान्त की अवहेलना की थी ।
(सभापर्व अ० १८; आदिपर्व अ० १०० : ७)
मथुरा का बड़ा महत्त्वपूर्ण इतिहास है । रामायण,