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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 984 में से

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पृष्ठ 189

१०६ राजतरङ्गिणी
अथोपसिन्धु गान्धारैः सञ्जे कन्यास्वयंवरे ।
निमन्त्र्य शुश्रावाऽऽनीतान् वृष्णीन् दर्पोष्णदोर्द्रुमः ॥ ६६ ॥
६६. जिसकी भुजाएँ वृक्ष तुल्य शक्तिशाली थी। जो दर्प की गर्मी से गर्वित था, उस राजा ने सुना-
सिन्धुतट पर गान्धारों १ ने कन्या स्वयंवर सज्जित कर वृष्णियों को विशेष रूप से आमन्त्रित किया था।

पुराण तथा महाभारत के आधार पर गाथा कहती
हैं। मधु का पुत्र लवण था। लवण को परा-
जित कर राम के कनिष्ठ भ्राता शत्रुघ्न ने मथुरा
नगरी की स्थापना की थी। दानवों के आक्रमण के
कारण वृष्णि तथा अन्धक लोगों ने मथुरा त्याग
दिया। द्वारिका में आबाद हो गये। (हरिवंश पुराण
विष्णु पर्व ३८.४०)
कृष्ण द्वारा कंस का वध हुआ था। उसने समा-
चार सुना कंस के पुत्र को शूरसेन का राजा घोषित
किया। जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण किया। इस
कार्य के लिए उसकी दोनों विधवा पुत्रियाँ उसे
प्रोत्साहित करती रहती थी। परन्तु जरासंध पराजित
हुआ। उसने १७ बार मथुरा पर आक्रमण किया
था। (हरिवंश पुराण ३७.४४)। उसकी सहायता
हिमालय के पर्वतीय चेकितान, बाह्लीक, कश्मीर,
करूष, किन्नर, दरद आदि राजाओं ने की थी।
पुराण इस बात का समर्थन करते हैं। जरासंध तथा
कृष्ण का युद्ध हुआ था। उसकी सहायता पर्वतीय
राजाओं ने की थी। गोनन्द का जरासंध की
सहायता निमित्त आना असम्भव नहीं प्रतीत होता।
पुराणों ने भी इसकी पुष्टि होती है।
श्रीकृष्ण, भीम तथा अर्जुन ने मिलकर काला-
न्तर में जरासंध को मारने के लिए योजना बनायी।
ब्राह्मण वेश धारण कर उसके नगर में गये थे।
भीम के साथ जरासंध का द्वन्द्व युद्ध हुआ। जरासंध
शक्तिशाली प्रतीत हुआ। पर कृष्ण ने संकेत
किया। भीम ने जरासंध का एक पैर अपने पैर के
नीचे दबाकर दूसरा पैर उठाकर चीर दिया। इस
प्रकार जरासंध का शरीर अपने पूर्व जन्मकालीन रूप
दो शकलों में हो गया। शरीर की सन्धि छिन्न हो
गयी। यह निर्विवाद है। जरासंध शक्तिशाली राजा
था। उसका खुला सामना कर उसे पराजित करना
सरल नहीं था। अतएव तत्कालीन युद्ध प्रचलित
परम्परा तथा नीति का अतिक्रमण कर उसकी छल
द्वारा हत्या की गयी। संभव है। कंस की हत्या के
प्रश्न को लेकर विवाद खड़ा हुआ होगा। उसमें
जरासंध का पक्ष न्यायोचित जानकर कश्मीर के राजा
गोनन्द तथा भारत के अन्य राजाओं ने लिया होगा।
कृष्ण के विरुद्ध उसकी सहायता किये होंगे।
सम्राट् जरासंध की मृत्यु के पश्चात् मगध का
साम्राज्य नष्ट हो गया। पाण्डवों का चक्रवर्ती राजा
होना निष्कंटक हो गया। जरासंध वध महाभारत
सभापर्व का एक अवान्तर पर्व है। अध्याय २०-२४
तक में वर्णन मिलेगा।
(पुराण विष्णु : ४:१९.९९; भागवत : ९:२२:७-
८, १०.५०, १०:७२, १५-४६, हरिवंश : ३२.९६-
९६, ३७, वायु : ९९:२२५-२२६)

पाठभेद :
श्लोक संख्या ६६ में 'शुश्रावा' का पाठभेद
'शुश्रुवा' तथा 'दर्पोष्ण' का 'दर्पोष्म' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ :
६६. (१) गान्धार : गान्धार प्रदेश के उल्लेखों
से भारतीय वाङ्मय भरा है। तक्षशिला से काबुल
तक की भूमि गान्धार नाम से प्रख्यात थी। इसी
प्रकार सिन्धु महानद से शतद्रु अर्थात् सतलज नदी के
मध्यवर्ती भाग किंवा अन्तर्द्रोणी को बाह्लीक कहते थे।
उसमें उशीनर, मद्र तथा त्रिगर्त के क्षेत्र सम्मिलित
थे। गान्धार तथा बाह्लीक प्रदेशों का सम्मिलित नाम
उदीच्य था। प्राच्य तथा उदीच्य की मध्यवर्ती सीमा
दृषद्वती नदी थी। गान्धार का उल्लेख नीलमत
पुराण में आता है :