राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरङ्ग २७
मुगलों के आक्रमण के पूर्व काश्मीर को सतीसर
कहा जाता था । मैं समझता हूँ । सतीसर शब्द
काश्मीर उपत्यका के लिए प्रयुक्त होता रहा है।
इसमें वह भूखण्ड आता है जो कभी जल मग्न था ।
बारहमूला से वीर नाग तक का भूखण्ड वास्तव, में
सतीसर था । अतएव काश्मीर मण्डल, काश्मीर
राज्य तथा सतीसर शब्दों के अर्थ में भिन्नता है ।
काश्मीर मण्डल और काश्मीर राज्य के अन्दर
सतीसर देश किंवा भूखण्ड का समावेश हो
जाता है । सतीसर में काश्मीर मण्डल अथवा
काश्मीर राज्य का समावेश नही होता । सतीसर
काश्मीर मण्डल अथवा राज्य का एक भूखण्ड
था ।
क्षेमेन्द्र ने लोक प्रकाश में तीन स्थानों पर सती
सर का उल्लेख किया है । उससे मेरे मत की पुष्टि
होती है :
श्रीमत्सतीसरासा शारिकाशैलभूषितम् ।
श्रीजैननगरादस्मान्नानोपवनविभूषितम् ॥ २ ॥
अस्ति त्रिभुवनाख्या मुत्तमं भूषणं भुवः ।
श्रीकश्मीरपुरं रम्यं नानोपवनशोभितम् ॥३॥
( पृष्ठ ३४ )
सतीसर में शारिका शैल, जैन नगर, तथा
काश्मीर पुरं का उल्लेख किया गया है । शारिका
पर्वत सूखे सतीसर में है । जिस समय सतीसर में
जल भरा था उस समय द्वीप की तरह इसका शिखर
दिखाई पड़ता था । सतीसर के जल की गहराई
३०० से ४०० फीट तक थी । इस पर अकबर द्वारा
निर्मित दुर्ग आज वर्तमान है । जैन नगरो का उल्लेख
जोनराज श्रीवर तथा शुक की राजतरंगिणियों में है ।
( दत्त ४७, १३१, १३८, २०६, ३७१ )
कश्मीर पुर शब्द यहाँ श्रीनगर किंवा प्रवरसेनपुर
के लिये आया है । श्रीनगर शब्द लोग भूल गये थे ।
कश्मीर पुर शब्द श्रीनगर के लिए व्यवहृत होने लगा
था । प्रवरसेनपुर का भी उल्लेख लोक प्रकाश (पृष्ठ
३५) मे किया गया है । श्रीनगर शब्द का उल्लेख
जोनराज, श्रीवर और शुक की राज तरंगिणियों में
प्रायः, नही मिलता है । प्रवर पुर ( द० २८, २०१,
४२६ ) तथा प्रवरेश पुर का ( द० २३२ ) उल्लेख
मिलता है ।
लोक प्रकाश में पृष्ठ ६० पर पुनः सतीसर का
उल्लेख किया गया है :
त्रिविष्टपस्य सारं तत्पार्थिवं क्षेत्रमीश्वरम् ।
तत्रापि सारं हिमवांस्तत्र सारं सतीसरः ॥२॥
सतीसर और काश्मीर मण्डल में स्पष्ट भेद किया
गया है :
मनुवारजभित्यूचुः पूतनात्मकध्यते किल ।
सतीसरसि ग्रामाणां यत्प्रमाणमुदीरितम् ।
षष्टियामसहस्राणि षष्टिग्रामशतानि च ।
षष्टियामस्त्रयो ग्रामा ह्येतत्कश्मीरमण्डलम् ॥३॥
शुक की चौथी और अन्तिम राजतरंगिणी है ।
जिसे शुक काश्मीरी पंडित ने प्राचीन शैली पर
लिखा है । तत्पश्चात् काश्मीर में पुरानी शैली पर
संस्कृत में इतिहास लिखने की परम्परा लोप हो
गयी । मुगल शासन के साथ मुसलमान लेखको का
काल आता है । उन्होने परसियन अर्थात् फारसी मे
अधिकतर लिखा है । काश्मीरी पण्डित भी फारसी
में विद्वत्ता प्राप्त कर, प्रथम फारसी में लिखे
तत्पश्चात् उर्दू में और अब अग्रेजो में लिखने
लगे है ।
जनरल ए. कनिंघम भूगर्भीय चिन्हो के
अध्ययन से इसो परिणाम पर पहुँचे है कि काश्मीर
उपत्यका जल से भरी थी । वे लिखते हैं :
'एक पर्वतीय चट्टान ( बिलफ़ ) तन्तमूल तथा
बारहमूला के १६ मील अधोभाग में समकोण बनाती
झेलम नदी से ऊपर उठी है । उसको ऊँचाई करीब
३ या ४ सो फीट होगी । कुछ स्थानो पर मैने देखा
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प्रथम तरङ्ग २९
महासागर के धरातल तथा समुद्र के नीचे से
निकली हैं। मूल झील का नमकीन जल क्रमशः
अनेक मीठे चश्मों तथा स्रोतस्विनियों के आते जलों
की बाढ़ के कारण लोप हो गया। उसी समय
बारहमूला के समीप पर्वत जो कि जल के उस स्थान
पर रोक रखा था फट कर अलग होगया। दूसरे
जल के अवरोध अलोड़ मिट्टी (एल्लूवियन) के
जमा होने में सहायक हुए जोकि बाड़ों के कारण
पहाड़ी की मिट्टी लाने लगे। वे मिट्टी को बाहर जाने
से रोकने लगे और यही कारण है कि अपनी पड़ोसी
भूखण्डों किंवा प्रदेशों की अपेक्षा काश्मीर उपत्यका
में अधिक मिट्टी जम गयी। क्रमशः इस नवीन
बनी हुई झील में जल के कारण स्वतः गहरी प्रणाली
अपने लिए बना लिए और समय-समय पर वे
अचानक पानी के स्तर के घटाव के कारण कुछ
जल रोकने वाले बारहमूला के पास वाले व्यवधानों
को अपने साथ बहाता गया। इस बात का प्रमाण
कुछ भागों में मिलता है जहाँ कि चूने के पत्थरों पर
क्रमशः जल के घटाव के कारण किनारों के जल के
कारण घिसते हुए ढालू हो गये हैं। जैसे जैसे समय
बीतता गया और क्रमशः झील के जल का स्तर
नीचा होता गया। पानी जो पहले झील में था वह
झेलम नदी के गति के स्तर में आ गया। और
झेलम नदी ने स्वयं एक नाली का रूप उपत्यका
के सब से निचले भाग में धारण कर लिया और
इस प्रकार वहाँ बारहमूला पास के बचे हुये पानी
रोकने वाले व्यवधानों को घिसने लगी और द्रुतगामी
गतिशील नदी का रूप धारण कर लिया जैसा कि
हम उसे आज उपत्यका को त्याग कर जाते हुए
देखते हैं। चारो तरफ के पर्वतों से आता हुआ
बढ़ता पानी झेलम के कारण बाहर निकलता जाता
है और उपत्यका को अपना पुराना झील का रूप
बनने नहीं देता।" ट्रॅवेल इन काश्मीर—७१-७३
कनिंघम द्वारा वर्णित स्थानों को मैंने स्वयं
सन् १९६४ में जाकर देखा। बामजू की गुफा के
अन्दर एक मन्दिर बना है। गुफा अँधेरी है। लगभग
२१० फीट लम्बी है। आगे चलते-चलते पतली हो
जाती है। इसके विषय में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। इस
गुफा में पानी टपकता रहता है। मक्खों के छाता की
तरह जल टपकने से छत बन गयी हैं। एण्डरू
विलगन वहाँ जिस समय आये थे। यहाँ पर मनुष्यों
की हड्डियाँ पड़ी थीं। मालूम होता है मन्दिर के
दर्शनार्थ कोई यात्री आया रहा होगा और मर गया
था। गुफा में मशाल की रोशनी से जाया जाता है।
यहा पर्वत सीधा उठता है। ढाल कम है। उस पर
भूगर्भीय चिन्ह आज भी वर्तमान हैं जिनसे कनिंघम
के तर्क की पुष्टि होती है।
पामपुर तथा समीपवर्ती करेवा पर यदि व्यक्ति
खड़ा हो जाय तो उसे चारो ओर ऊँचा पर्वत
मिलेगा। जमीन भूरी और कुछ बलुई है। यहाँ केसर
होती है। बनिहाल श्री नगर की सड़क कुछ करेवा
के समीप से जाती है। वहाँ पर करेवा की बनावट
स्पष्ट बताती है कि उसमें तीन तरह की मिट्टी का
स्तर है। कोई भी यात्री बस अथवा मोटर से यात्रा
करते समय इसे लक्ष्य कर सकता है।
गुहा निवासियों की जो खुदाई बर्जहोम काश्मीर
में हुई है वह भी एक टीले पर है। वहाँ पहुँचने के
लिए कच्ची सड़क बनाई गयी है। सड़क बनाने में
ढाल की कुछ जमीन काटी गयी है। मेरी दृष्टि में
यह बात थी। मैने वहाँ भी टीले अर्थात् करेवा की
बनावट में भूमि के स्तरों की मिट्टी में अन्तर पाया।
श्री खजाची केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग का, जो इस समय
वहाँ टेस्ट लगाकर खनन कार्य कर रहे थे, मैने ध्यान
आकर्षित कराया। मैने अपने शिपिंग बोर्ड के चेयर-
मैन के काल में भारत के पत्तनों का भ्रमण किया
है। जल की गति तथा उनके द्वारा भूमि पर पड़े
चिह्नों का अध्ययन किया है। यहाँ की खोदाई से
स्पष्ट प्रतीत होता है कि टीले के निचले भाग में
कभी जल था। उस जल का चिह्न खुले हुए स्थान
पर प्रकट होता है।
३८ राजतरङ्गिणी १
है कि पर्वतीय चट्टानें ८ सो फीट ऊँचाई से कम नहीं
हैं । तन्तमूल के समीप झेलम समुद्र की सतह से ५
हजार फीट ऊंचाई पर है । समस्त काश्मीर उपत्यका
जलमय रही होगी । जब तक वह चट्टान घिसकर
पतली नहीं हो गई होगी । काश्मीर की झील का
जल स्तर समुद्र की सतह से ५८०० फीट ऊँचा है ।
उपत्यका में इस समय तक के बचे करेवा और
बिखरी एलूवियल (कछारी) समतल भूमि से ५०
या १०० फीट ऊंचाई पर जल रहा होगा । भारतण्ड
की ऊँची भूमि जल के नीचे नहीं रही होगी । वामजू
की गुफा के चूने के पत्थरो के चट्टान के ऊपर समयर
तटवर्ती पानी की सतह का चिह्न स्पष्ट दिखाई देता
है । इसी प्रकार वामन के पवित्र जलस्रोत के ऊपर
इस प्रकार के चिह्न दिखाई देते हैं । शुपियान नदी
पर स्थित रामू के सराय के ऊपर करेवा एक
किनारा बनाता है । उसको ऊंचाई १०० फीट है ।
उसके क्षैतिज परतो में विभिन्नता है । सबसे ऊँचाई
पर २० फीट की जमीन एलूवियल है । उसके
पश्चात् २० फिट का परत गोले-गोले पत्थरो और
भुरभुरी मिट्टी का बना है । सबसे नीचे का परत
कड़ी नीली मिट्टी का है । यह परत निश्चय ही झील
के जल की निश्चल स्थिति के कारण बन गया
होगा । किन्तु मध्यवर्ती मिट्टी की परत उस समय
बनी होगी जब उपत्यका का जड़ बड़े वेग के साथ
तन्तमूल के नीचे वाली चट्टान के अवरोध के हट
जाने के कारण निकला होगा । यह जणावरोध
चट्टान के अकस्मात् टूट जाने के कारण हुआ होगा ।
सबसे ऊपर की मिट्टी उस समय जमी होगी जबकि
पानी घटता-घटता अपनी वर्तमान स्थिति पर आ
गया होगा । तत्पश्चात् चट्टान का अवरोध अथवा
पानी रोकने वाली पथरीली नदी का नदीगर्त क्रमशः
जल प्रवाह के कारण घिसता-घिसता क्षीण हो गया
होगा तो विभिन्न नदियों ने झील के पुराने गर्त में
नवीन धाराओं में अपने को परिणत कर लिया
होगा । जब तक कि मोनार, पामपुर तथा खानपुर
के करवा घटते पानी के कारण द्वीप तुल्य लगते
होंगे । और कालान्तर में लम्बे चोपटे शिखरीय
पहाड़ियों के रूप में खुले मैदान में रह गये जैसे आज
दिखाई पड़ते है ।' (लद्दार)
डब्लू वेकफील्ड लिखते हैं : कोई प्रामाणिक
प्रमाण इस बात का नहीं मिलता कि काश्मीर
उपत्यका झील से अकस्मात् अपनी वर्तमान दशा में
किस समय परिवर्तित हो गयी है जैसा कि आज
दिखाई देती है । न तो हमे यह प्रमाण मिलता है
कि यह झील कब सूख गयी । अथवा यह प्रक्रिया
बारहमूला दर्रा के समीप हठात् एक मार्ग बन
जाने के कारण हो गया अथवा इसका पानी
कालान्तर में निकलता गया ।' (हैप्पी वैली
६९, ६०)
वाइन के इस सिद्धान्त पर कि वह कभी
समुद्री जल की झील थी और समुद्र का पानी
निकल जाने पर प्राकृतिक मीठे पानी के झरनों के
कारण नमकीन जल समाप्त होकर काश्मीर उपत्यका
ने वर्तमान रूप प्राप्त किया है, वेकफील्ड लिखता है-
इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता कि उपत्यका
का जल हठात् बाहर निकल गया और उसने वह
रूप प्राप्त कर लिया है जिसे हम आज देखते हैं ।
बातो की जाँच करने और जैसा कि एक योग्य
भूगर्भ-शास्त्रीय करता है । बात उल्टी साबित होती
है । वाइन ने उन्हें स्वय सम्मुख रखा है । वह योग्य
तथा निपुण पर्यवेक्षक था । वह यहाँ के
निवासियो की परम्परा में विश्वास करता है कि
उपत्यका अपने मूल रूप में ३०० या ४०० फीट
गहरी झील थी । किन्तु वह कहता है कि समय
प्रभाव के कारण पानी बहकर बाहर निकल गया ।
अपने पर्यवेक्षण में वह इस नतीजे पर आगया है कि
यहाँ गहरी हरी अथवा बादामी चट्टानो की पहाड़ियों
को जो काश्मीर के चारो तरफ है वे विशाल
प्रथम तरङ्ग २९
महासागर के धरातल तथा समुद्र के नीचे से
निकली है। मूल झील का नमकीन जल क्रमशः
अनेक मीठे चश्मों तथा स्रोतस्विनियों के आते जलों
की बाढ़ के कारण लोप हो गया। उसी समय
बारहकूला के समीप पर्वत जो कि जल के उस स्थान
पर रोक रखा था फट कर अलग होगया। दूसरे
जल के अवरोध अलोढ़ मिट्टी (एल्लूवियन) के
जमा होने में सहायक हुए जोकि बाढ़ों के कारण
पहाड़ी की मिट्टी लाने लगे। वे मिट्टी को बाहर जाने
से रोकने लगे और यही कारण है कि अपनी पड़ोसी
भूखण्डों किंवा प्रदेशों की अपेक्षा काश्मीर उपत्यका
में अधिक मिट्टी जम गयी। क्रमशः इस नवीन
बनी हुई झील में जल के कारण स्वतः गहरी प्रणाली
अपने लिए बना लिए और समय-समय पर वे
अचानक पानी के स्तर के घटाव के कारण कुछ
जल रोकने वाले बारहकूला के पास वाले व्यवधानों
को अपने साथ बहाता गया। इस बात का प्रमाण
कुछ भागों में मिलता है जहां कि चूने के पत्थरों पर
क्रमशः जल के घटाव के कारण किनारों के जल के
कारण घिसते हुए ढालू हो गये हैं। जैसे जैसे समय
बीतता गया और क्रमशः झील के जल का स्तर
नीचा होता गया। पानी जो पहले झील में था वह
झेलम नदी के गति के स्तर में आ गया। और
झेलम नदी ने स्वयं एक नाली का रूप उपत्यका
के सब से निचले भाग में धारण कर लिया और
इस प्रकार वहाँ बारहकूला पास के बचे हुये पानी
रोकने वाले व्यवधानों को घिसने लगी और द्रुतगामी
गतिशील नदी का रूप धारण कर लिया जैसा कि
हम उसे आज उपत्यका को त्याग कर जाते हुए
देखते हैं। चारों तरफ के पर्वतों से आता हुआ
बढ़ता पानी झेलम के कारण बाहर निकलता जाता
है और उपत्यका को अपना पुराना झील का रूप
बनने नहीं देता।” ट्रेवेल इन काश्मीर—७१-७३
कनिंघम द्वारा वर्णित स्थानों को मैंने स्वयं
सन् १९६४ में जाकर देखा। पामपूर की गुफा के
अन्दर एक मन्दिर बना है। गुफा अँधेरी है। लगभग
२१० फीट लम्बी है। आगे चलते-चलते पतली हो
जाती है। इसके विषय में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। इस
गुफा में पानी टपकता रहता है। मक्खी के छाता की
तरह जल टपकने से छत बन गयी है। एण्डरू
विलसन वहाँ जिस समय आये थे। यहाँ पर मनुष्यों
की हड्डियाँ पड़ी थी। मालूम होता है मन्दिर के
दर्शनार्थ कोई यात्री आया रहा होगा और मर गया
था। गुफा में मशाल की रोशनी से जाया जाता है।
यहाँ पर्वत सीधा उठता है। ढाल कम है। उस पर
भूगर्भीय चिन्ह आज भी वर्तमान हैं जिनसे कनिंघम
के तर्क की पुष्टि होती है।
पामपूर तथा समीपवर्ती करेवा पर यदि व्यक्ति
खड़ा हो जाय तो उसे चारों ओर ऊँचा पर्वत
मिलेगा। जमीन भूरी और कुछ बलुई है। यही वेसर
होती है। वनिहाल श्री नगर की सड़क कुछ करेवा
के समीप से जाती है। वहाँ पर करेवा की बनावट
स्पष्ट बताती है कि उसमें तीन तरह की मिट्टी का
स्तर है। कोई भी यात्री बस अथवा मोटर से यात्रा
करते समय इसे लक्ष्य कर सकता है।
गुहा निवासियों की जो खुदाई बर्जहोम काश्मीर
में हुई है वह भी एक टीले पर है। वहाँ पहुँचने के
लिए कच्ची सड़क बनाई गयी है। सड़क बनाने में
ढाल की कुछ जमीन काटी गयी है। मेरी दृष्टि में
यह बात थी। मैंने वहाँ भी टीले अर्थात् करेवा की
बनावट में भूमि के स्तरों की मिट्टी में अन्तर पाया।
श्री खजांची केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग का, जो इस समय
वहाँ टेण्ट लगाकर खनन कार्य कर रहे थे, मैंने ध्यान
आकर्षित कराया। मैंने अपने शिपिंग बोर्ड के चेयर-
मैन के काल में भारत के पत्तनों का भ्रमण किया
है। जल की गति तथा उनके द्वारा भूमि पर पड़े
चिह्नों का अध्ययन किया है। यहाँ की खोदाई से
स्पष्ट प्रतीत होता है कि टीले के निचले भाग में
कभी जल था। उस जल का चिह्न खुले हुए स्थान
पर प्रकट होता है।
२० राजतरङ्गिणी
अथ वैवस्वतोऽस्मिन् प्राप्ते मन्वन्तरे सुरान्।
द्रुहिणोपेन्द्ररुद्रादीनवतार्य प्रजासृजा ॥ २६ ॥
२६ वैवस्वत मन्वन्तर¹ का प्रारम्भ था। सतीसर में जलोद्भव असुर निवास करता था
प्रजापात कश्यप ने द्रुहिण, उपेन्द्र, रुद्र से प्रार्थना की। देवताओं के साथ जलोद्भव
वध निमित्त उतरे।
वूलर लेक काश्मीर उपत्यका का सबसे निचला मत्स्य पुराण विष्णु पुराण नीलमत पुराण
स्थान और पूर्व सतीसर का अवशेष समुद्र की सतह १. स्वायंभुव " १. स्वायंभुव
से ५१८७ फीट ऊँचा है। श्रीनगर ५२३५ फीट २. स्वारोचिष " २. स्वारोचिष
समुद्र की सतह से ऊँचा है। बावन जिसके समीप ३. उत्तम, औत्तम " ३. औत्तम
वामजू गुफा है वह भूमि समुद्र की सतह से ५८१६ ४. तामस " ४. तामस
फीट ऊँचा है। अवन्तीपुर तथा बिज बेहरा अर्थात् ५. रैवत " ५. रैवत
विजयेश्वर ५४०० फीट समुद्र की सतह से ऊँचा ६. चाक्षुष " ६. चाक्षुष
है। श्रीनगर तथा अवन्तीपुर और बिज बेहरा के ७. वैवस्वत " ७. वैवस्वत
बीच अनेक करेवा तथा पामपुर हैं। इस प्रकार यह ८. सावर्णि " ८. अर्क सावर्णि
स्पष्ट है कि जिस समय काश्मीर उपत्यका में जल ९. दक्ष सावर्णि रुचि ९. ब्रह्म सावर्णि
भरा होगा उस समय वामजू पामपुर आदि जो वूलर १०. ब्रह्म सावर्णि भौम १०. भद्राश्व (रुद्रेन)
लेक की सतह से ऊँचाई पर हैं सर के तट होगी। दोनों पाठ हैं)
वहाँ पर पानी का चिह्न बन जाना स्वाभाविक है। ११. धर्म सावर्णि ११. दक्ष सावर्णि
१२. रुद्र पुत्र सावर्णि १२. रौच्य
काश्मीर में सन् १५५२, १६८०, जून २६ १३. देव सावर्णि १३. भौत्य
सन् १८२८ तथा सन् १८८५ में भयंकर भूकंप १४. इन्द्र सावर्णि
आया था। सन् १८८५ के भूकंप से १३०,००० नीलमत में भूतकालीन छः तथा वर्तमान सातव
वर्ग मील क्षेत्र प्रभावित हुआ था। लगभग ५०० मनु वैवस्वत का नाम मिलता है परन्तु भविष्य के
वर्ग मील में तो महाभयंकर विनाश हुआ था। मनुओ के नामो में भिन्नता है •
लगभग २०,००० मकान, १०,००० जानवर, कालकल्पावुभौ पूज्यौ मनवश्च चतुर्दश।
३००० मनुष्य, मर गये थे। बारहमूला में सबसे अतीताश्च भविष्याश्च तेषाम् नामानि मे शृणु ॥
भयानक असर हुआ था। वहाँ एक किला, यात्री —५६४/ ६०
निवास तथा शहर के लगभग तीन चौथाई मकान स्वायंभुवो मनुः पूर्वम् मनुः स्वारोचिषस्तथा।
नष्ट हो गये थे। द्यौत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥
—५६१/६९१
पादटिप्पणियाँ : वैवस्वतोऽर्कसावर्णिर्ब्रह्मसावर्ण्य एव च।
२६ (१) वैवस्वत मन्वन्तर—नीलमत पुराण भद्रेश दक्ष सावर्णी रौच्य भौतस्तथैव च ॥
तथा अन्य पुराणों में वर्णित मनुओ के नाम तथा —५70/६९२
तालिका में अंतर है— संपूजनीया देवेन्द्रस्तथा मन्वन्तरानुदश।
—571/६९३
प्रथम तरङ्ग ३१
भागवत पुराण : ३:१:५२-५६, ५:१.२२,
८:१:१९, ८:१:२३, २७, ८:५:२, १३:१०,
११, १८, २४, २७, ३०, ३३, ८.७:५
ब्रह्माण्ड पुराण : २:१४.४, वायु पुराण : ६२,
मनुस्मृति : १:६१-६३, विष्णु पुराण : ३:२-३
ऋग्वेद : १:८०:१६, २:३३:१३, ८:३०:३,
८:६३:१, ८:५१:१, १०:१००:५
तैत्तिरीय संहिता १:५:१:३ शतपथ ब्राह्मण
७:५.५:३, २:२:१०:२, २-··· ६०१, २:३:८:३
जैमिनो उपनिषद्
ब्राह्मण : ३:१५:१, ऐतरेय ब्राह्मण ५:१४:१:२
३:१:९:४, अथर्ववेद ८:१०:२४, ३:३:२:१
१४:२:४१
५:४:१०:५, पंचविश २३:१:६७।
नीलमत पुराण के अनुसार १२ सौर मास का
एक वर्ष होता है। दो मास का एक ऋतु, ६
ऋतुओं का एक अयन, २ अयनों का एक वर्ष और
४३२००० वर्षों का एक कलियुग होता है। कलियुग
का दूना (८६४००० वर्ष) द्वापर, कलियुग का
तिगुना (१२९६०००) त्रेता काल और चौगुना
(१७२८००० वर्ष) सतयुग किंवा कृत युग काल
होता है। एक मन्वंतर ७१ चतुर्युगों का होता है।
मन्वंतर के अंत में सब कुछ नष्ट हो जाता है। सब
कुछ जलमय हो जाता है। युग का प्रमाण
४३२००० वर्ष तथा मन्वंतर का प्रमाण १७२८०००
वर्ष है। केवल हिमालय, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत,
शृङ्गवान्, गंधमादन, मेरु, माल्यवान्, महेन्द्र, मलय,
सह्य, शक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य, पारियात्र का नाश
नहीं होता। जम्बूद्वीप का सर्वथा विनाश हो जाता है।
प्रलय के पश्चात् स्वयं महादेव जल स्वरूप
स्थित रहते हैं। देवीसती एक नाव का रूप तत्काल
धारण कर लेती हैं।। मनु उस नाव पर सर्व प्रकार
के बीज रख देते हैं। मत्स्य रूप धारण कर विष्णु
उस नाव को एक शृङ्ग की ओर खींच लाते हैं।
उसे पर्वत के मस्तक पर लाकर बांध देते हैं। वह
पर्वत शिखर काश्मीर की पश्चिम दिशा में स्थित
नौबंधन शिखर है। शिखर पुण्यदायक है। पाप
तथा भय को हरता है। कृतयुग के इतना समय
बीत जाने पर मनु पुनः प्रजावर्ग की यथापूर्व रचना
आरम्भ करते हैं।
नावस्वरूप देह धारण की हुई सती देवी
स्वयं भूमि का रूप धारण करती है। छः योजन
लम्बा तथा ३ योजन चौड़ा रम्य विमलोदक
सर बन जाता है। यहाँ देवगण मनोहर
क्रीड़ा करते हैं। इस देश की ख्याति सती देश
(काश्मीर) हो जाती है। जलजो से विवर्जित शीतल
अमल जलपूर्ण देश की सब भूमि मनोहर हो जाती
है। वैवस्वत मन्वंतर के आरंभ में दक्ष अपनी १३
कन्याओं का विवाह मरीचि के पुत्र कश्यप ऋषि
से कर देते हैं। नीलमत पुराण ५०-६७ (ब्रीज)
३३-५५ .(जादू)। नौबंधन तीर्थ का शतपथ
ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है १:८:१:१।
बाइबिल में जलप्लावन किंवा जलप्रलय तथा
नाव और उस पर सब प्रकार के बीज तथा सब
प्रकार के प्राणियो का एक जोड़ा रखने का वर्णन
मिलता है। उस नाव को 'हज़रत नूह का आर्क'
कहते हैं। वह पर्वत शिखर पर जाकर रुक जाती है।
कुरान शरीफ और बाइबिल मे यह गाथा दी
गयी है।
हिमालय और हेमकूट :
प्रलय काल मे हिमालय तथा हेमकूट पर्वतो के
बच जाने की बात नीलमत पुराण मानता है।
हिमालय तथा हेमकूट दो भिन्न-भिन्न पर्वत माने गए
हैं। हेमकूट पर्वत हिमालय के दक्षिण में है। बाण ने
हर्षचरित के अध्याय ७ में कहा है कि अर्जुन ने
राजसूय यज्ञ के समय हेमकूट पर अधिकार किया
था। विक्रमोर्वशीय नाटक के प्रथम अध्याय में
हेमकूट, तथा हेमकूट शिखर का उल्लेख आया है।
३२ राजतरंगिणी
यहाँ पर हिमालय के लिये उसरा प्रयोग किया गया चारों युगों के महायुग का काल ४३२००००
है । हेमकूट क्षेत्र को पुरुष वर्ष तथा हिमवत् क्षेत्र को सौर वर्ष है । ब्रह्मा का एक दिन एक सहस्र महायुगों
किन्नर खंड कहा गया है । किन्नर खंड आधुनिक का होता है । इस एक दिन को १ कल्प कहते हैं ।
हिमालय प्रदेशका किन्नौर-मंडल है । किम्पुरुष एक सत्युग का समय मान १७,२८,००० सौर वर्ष है ।
वर्ष है । इसे हिमालय के दूसरी तरफ पुराणों के त्रेता का समय मान १२, ९६,००० सौर वर्ष है ।
अनुसार मानते हैं । द्वापर का मान वर्ष ८,६४,००० वर्ष है । कलियुग
का ४, ३२,००० मान वर्ष है । सृष्टि वर्ष का आदि-
( भागवत पुराण ५:१९; मत्स्य पुराण ११३:२९,
काल आज से ७, १४, ४०,४१,४६,२५६ वर्ष पूर्व
११४:५९;६३-६५, १२१:४९, वायु पुराण ३४.२८,
हुआ है ।
विष्णु पुराण २:२;१२ ।)
ब्रह्मा की एक सहस्र वर्ष आयु जितनी विष्णु की
किम्पुरुष प्रियव्रत का पौत्र और आग्नीध्र के नव
एक घड़ी होती है । बारह लाख विष्णुओ की आयु
पुत्रों में एक था । आग्नीध्र ने अपने पुत्रों के लिये
के जितनी, रुद्र की आधी कला होती है । रुद्र की
जम्बू द्वीप के वर्षों को विभाजित किया था । ( विष्णु
एक अर्बुद आयु के काल का समय अक्षर ब्रह्म का
पुराण २ १:१७ तथा १९ ) । किम्पुरुष वर्ष को उसने
समय होता है ।
अपने पुत्र हेमकूट को दिया था । किम्पुरुष-वर्ष का
राजा द्रुम्न था । कृष्ण तथा जरासंध के संघर्ष में मनुस्मृति के अनुसार कालपरिमाण में १८ निमेष
द्रुम्न ने जरासंध का पक्ष लेकर कृष्ण के विपक्ष में की एक काष्ठा; तीस काष्ठाओं की एक कला; तीस
युद्ध किया था । जरासंध ने गोमन्त आक्रमण के समय कलाओं का एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तों का एक अहोरात्र
पश्चिम पार्श्व में आक्रमणार्थ द्रुम्न को नियुक्त किया होता है । अहोरात्र का विभाग सूर्य के उदय अस्त के
था । भागवत पुराण ( १:६:१२ तथा १०:५२:११ ) कारण होता है । मानव के दो पक्ष पितरों का एक
के अनुसार परीक्षित ने उत्तर के देशों के विजय काल अहोरात्र होता है । कृष्ण पक्ष पित्रो के कर्म करने
में किम्पुरुष देश को जीता था । तथा शुक्लपक्ष शयन निमित्त है । इसी प्रकार भूतों
वैदिक साहित्य में किम्पुरुष के लिये घृणास्पद अर्थात् प्राणियों के लिये दिन चेष्टा तथा रात्रि शयन
शब्दों का प्रयोग किया गया है । कुछ विद्वानों ने निमित्त निश्चित किया गया है ।
इन्हें जंगली, कुत्सित तथा कहीं बंदरों जैसे मनुष्यों
मानव का एक वर्ष देवताओं का एक अहोरात्र
की नकल करने वाला कहा है । ( ऐतरेय ब्राह्मण
होता है । उत्तरायण देवताओं की चेष्टा तथा दक्षिणा-
२:८, शतपथ ब्राह्मण १:२:३:९ तथा ७:५:२:३२;
यन रात्रिकाल माना जाता है । चालीस हजार वर्ष
ऐतरेय ब्राह्मण ३:१:१२.१ ।)
का सत्युग होता है । चार सहस्र वर्षों की संध्या
जगत् सृजन कर्ता ब्रह्मा है । उनकी आयु १०० तथा संध्यांश होता है । त्रेतायुग तीन सहस्र वर्षों का
वर्षों की है । पूर्वार्द्ध काल ब्रह्मा का व्यतीत हो चुका होता है । तीन सौ वर्षों की संध्या तथा संध्यांश
है । अर्थात् अपने जीवन का ५० वर्ष वे व्यतीत कर होता है । द्वापर दो सहस्र वर्षों का होता है । दो
चुके हैं । ब्रह्मा के उत्तरार्द्ध काल के चारों महायुगों सौ वर्षों का संध्यांश होता है । कलियुग एक सहस्र
के प्रथम मास के प्रथम पक्ष के प्रथम दिन की ३ घड़ी वर्षों का होता है । एक सौ वर्षों की संध्या तथा
तथा ४२ पल अब तक बीत चुका है । संध्यांश होता है ।
४
प्रथम तरङ्ग ३३
―― चारों युग मिलकर देवताओं का एक युग होता
है। देवताओं के सहस्र युग मिलकर ब्रह्मा का एक
दिन होता है। सहस्र युगों की एक रात्रि होती है।
इस प्रकार देवताओं के एक सहस्र वर्ष दिन तथा
रात्रि मिलकर ब्रह्मा का अहोरात्र होता है। देवताओं
के इकहत्तर गुने वर्षों का एक मन्वंतर होता है
(मनुस्मृति १:६४-७६) ।
इस समय श्वेत वाराह कल्प के छः मन्वंतर
बीत चुके हैं। राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में
इसी ओर संकेत किया गया है। सातवाँ वैवस्वत
मन्वंतर चल रहा है। उसके २८वें महायुग के
कलियुग का प्रथम चरण संधि में है। कार्तिक शुक्ल
६ के प्रथम प्रहर में श्रवण नक्षत्र, वृद्धियोग में सत्युग
का जन्म हुआ था। सत्युग में, (१) मत्स्य (२)
कच्छप, (३) वाराह और (४) नृसिंह अवतार
हुए हैं।
वैशाख शुक्ल तृतीया सोमवार को रोहिणी नक्षत्र,
शोभन योग के द्वितीय प्रहर में त्रेता की उत्पत्ति हुई
है। त्रेता में (१) वामन, (२) परशुराम एवं (३)
रामचन्द्र के अवतार हुए हैं।
माघ कृष्ण अमावस्या, शुक्रवार को धनिष्ठा
नक्षत्र, परिघ योग; वृष लग्न में द्वापर की उत्पत्ति
हुई है। इसमें (१) कृष्ण तथा (२) बुद्ध दो अवतार
हुए हैं।
भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी, रविवार, अश्लेषा नक्षत्र,
व्यतीपात योग में अर्धरात्रि काल के मिथुन लग्न में
कलियुग का जन्म हुआ है। विष्णु पुराण (अंश ४
अध्याय २४, श्लोक ११०-११३) के अनुसार
भगवान् कृष्ण के स्वर्गारोहण के दिन से कलियुग
आरम्भ होता है। कृष्ण के स्वर्गारोहण के साथ ही
युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ राज्यत्याग किया
था। इस युग में केवल कल्कि नामक एक अवतार
होगा। कलिगताब्द संवत् इस समय ५०६८ तथा
काश्मीर का सप्तर्षि संवत् ५०४३ तथा विक्रम
संवत् २०२४ तथा शक संवत् १८८६ तथा सन्
१६६७ ई०; हिजरी सन् १३८६-८७ और फसली
सन् १३७४-७५ है।
इस सनातन तथा प्रचलित संवत्सर गणना के
अनुसार द्वापर में कृष्ण का अवतार ग्रहण करना ठीक
बैठ जाता है। भगवान बुद्ध का समय २५०० वर्ष
ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध होता है। यह अवतार
द्वापर काल में नहीं पड़कर कलियुग में पड़ता है।
नीलमत पुराण ने बुद्ध को एक अवतार माना
है। एक विचित्र पहेली है। ज्योतिषियों का इसका
समाधान करना आवश्यक है। नीलमत पुराण में
बुद्धपूजा का वर्णन है। बुद्ध को भगवान् का अवतार
माना गया है।
विश्रादैत्यो जगन्नाथ प्राप्ते ब्रह्मन् कलियुगे ।
अष्टाविंशतिमे भाविबुद्धोनाम जगद्गुरुः ॥८०६॥
शास्त्रीय धारणा के अनुसार इस मन्वंतर के
अवतार बुद्ध नहीं वामन हैं। सप्तर्षि : (१) अत्रि (२)
कश्यप (३) गौतम (४) जमदग्नि (५) भरद्वाज (६)
वशिष्ठ (७) विश्वामित्र है।
वैवस्वत मन्वंतर के देवगण-१० अंगिरस, २
अश्विनी, १२ आदित्य, १० भृगुदेव, ४६ मरुत, ११
रुद्र, ८ वसु, १० विश्वेदेव और १२ साध्य हैं।
इस मन्वंतर के इंद्र का नाम-उर्ध्वस्विन्,
किंवा महाबल है।
मनु के पुत्र; अरिष्ठ, इक्ष्वाकु, इल, करुष, कुश-
नाभ, घृष्ट, नभ, नृग, पृषध्र, प्राशु, वसुमति तथा
शर्याति हैं।
काश्मीर किंवा कश्मीर
काश्मीर किंवा कश्मीर शब्द की व्युत्पत्ति के
विषय में अनेक मत हैं। सनातन मत है। कश्यप
ऋषि ने सतीसर को सूख जाने पर आबाद किया
था। सतीसर का नाम कश्यपपुर पड़ गया। कश्यपपुर
का अपभ्रंश कश्मीर किंवा काश्मीर शब्द है।
५
३४ राजतरङ्गिणी
पुर, नगर, पत्तन तथा क्षेत्र शब्दो के अर्थों में
अन्तर है । नगर तथा पत्तन शहरी क्षेत्र का द्योतक
है । किसी संज्ञा के अन्त में जोड़ देने पर नगर
किंवा पत्तन स्थान विशेष का परिचायक होता है ।
पुर शब्द इससे भिन्न है । किसी व्यक्ति वाचक संज्ञा
के साथ पुर जोड़ा जाता है । किसी स्थान को बसाने
वाले व्यक्ति के साथ पुर शब्द जोड़ कर बसाने
वाले की स्मृति चिरस्थायी की जाती है । काश्मीर
में अवन्तीपुर, शूरपुर, जयपुर, प्रवरसेनपुर,
जोनपुर, प्रतापपुर, हिरण्यपुर, कनिष्कपुर, जुष्कपुर,
शिवपुरी, ब्रह्मपुरी, विष्णुपुरी, अभिमन्युपुर,
आदि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं । श्रीनगर
किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर नहीं बसाया गया
था । उसका नाम श्रीनगर पड़ा । परन्तु श्रीनगर
में ही प्रवरसेन ने नगर बसाया तो उसका नाम
प्रवरसेनपुर हो गया । नागरिक शब्द देशीय किंवा
राष्ट्रीयता का बोधक है । सम्पूर्ण देश के व्यक्तियों
के लिए नागरिक शब्द व्यवहृत होता है । पौरजन
किंवा पौर शब्द स्थानीय निवास स्थान का
परिचायक है । वह किसी एक नगर में रहने की ओर
संकेत करता है । नागरिक शब्द का समावेश अंग्रेजी
सिटिजन शब्द में हो जाता है । काश्मीर में पुर शब्द
व्यक्ति विशेष के नाम के साथ जोड़कर नगर वाचक
बना दिया जाता था । आजकल पुर के स्थान पर
व्यक्तियो के साथ नगर शब्द जोड़ने की प्रथा चल
निकली है जैसे—टाटानगर, मोदीनगर गंगानगर,
सरदारनगर आदि ।
पत्तन शब्द नगर तथा शहर के लिए प्रयुक्त
किया जाता है । यह शब्द नदी तथा समुद्रतटीय
नगर तथा बन्दरगाहो के लिये विशेष रूप से व्यवहृत
हुआ है । पत्तन व्यापार का केन्द्र होता है ।
विशाखा पत्तन, मछली पत्तन आदि इसके उदाहरण
है । समुद्र तटीय नगरों के अतिरिक्त अन्य स्थानों के
नगरों के लिए नगर अर्थ में पत्तन शब्द का बहुत
कम व्यवहार किया गया है ।
चाणक्य पत्तन शब्द की यही परिभाषा देता है—
वारिस्थल पथ पत्तनानि च निवेशयेत् । (अध्यक्षप्रचार
द्वितीय अधिकरण १ अध्याय १ प्रकरण १९)
क्षेत्र शब्द का अपभ्रंश खेत शब्द है । अन्नोत्पा-
दक भूमि, समतल भूमि, उत्पत्ति स्थान, प्रदेश तथा
तथा तीर्थ स्थान के लिए क्षेत्र शब्द का व्यवहार
किया गया है। क्षेत्र भूखण्ड विशेष की निर्धारित
सीमा के लिए आता है । क्षेत्र के अन्तर्गत नगर, पुर,
पत्तन, ग्राम आदि सब आ जाते हैं । काश्मीर में
क्षेत्र शब्द तीर्थ स्थानों की सीमा के लिए व्यवहृत
किया गया है। वाराह क्षेत्र, मडव क्षेत्र, उत्तर मानस
क्षेत्र, विजयेश्वर क्षेत्र, नन्दिक्षेत्र, आदि इसके
उदाहरण हैं ।
कुछ विदेशी विद्वानो ने एक और मत प्रकट
किया है । 'कशप' नाम कश्यप ऋषि का है । 'मर'
शब्द का अर्थ 'मठ' है । 'कशपमर' प्राचीन नाम
था । कशपमर बिगड़ कर कश्मीर हो गया है ।
शुद्ध शाब्दिक अर्थ भी लगाया गया है । 'क'
का अर्थ जल है । 'समीर' का अर्थ वायु किंवा हवा
है । 'क' + 'समीर' दोनों शब्द मिलकर कसमीर हो
गया है। कश्मीर का जल-वायु सर्वश्रेष्ठ है । अपनी
जल वायु की उत्तमता के कारण भूखण्ड का नाम
कश्मीर पड गया है ।
और अर्थ लगाया गया है । वायु के कारण
जल सतीसर के बाहर निकल गया । अतएव भूखण्ड
का नाम कश्मीर पड़ गया ।
डा० सूफी ने एक मत का प्रतिपादन किया है ।
उनका मत है । 'कस' का अर्थ होता है धोत
'मीर' का 'अर्थ' पर्वत है । कश्मीर चारों ओर पर्वत
से घिरा है । कटोरा जैसा लगता है ।' इसलिए इस
भूखण्ड का नाम कश्मीर पड़ गया ।
कुछ विद्वानो ने कश्मीर शब्द की व्युत्पत्ति को
तोड़ मरोड़ कर एक विचित्र मत का प्रतिपादन
किया है । उनका मत है । 'कश' एक शामी अर्थात्
प्रथम तरङ्ग ३५
सेमेटिक जाति या ट्राइब थी। उस जाति ने 'कश'
नगर बसाया। यह नगर बुखारा में है। उसे अब
'शहर-ए-सब्ज' कहते हैं। वह दक्षिण, पश्चिम और
पूर्व दिशाओं में पर्वत से घिरा है। वह शहर सातवीं
शताब्दी में आबाद हुआ था। यहीं से काश्मीर में
सेमेटिक लोग आये। यहूदियों का काश्मीर में आबाद
होना सिद्ध होता है। हिन्दूराज काल में काश्मीर में
कोई बाहरी आबाद नहीं हो सकता था। यहूदी इसके
अपवाद थे। यहूदी सेमेटिक अर्थात् शामी जात है।
अतएव अनुमान लगाया गया है कि इसका नाम
'कश' के आधार पर कश्मीर पड़ गया।
उक्त वर्ग के लेखकों ने एक और अनुमान
लगाया है। 'काशान' या 'काशगर' शब्द का अपभ्रंश
कश्मीर हो गया। 'काशान' इराक में शहर है।
तेहरान से १५० मील तथा इस्फ़हान से ९० मील
ईशान दिशा में पड़ता है। देश भर में सबसे अधिक
यहाँ गरमी पड़ती है।
'काशगर' चीनी तुर्किस्तान में उसकी पश्चिमी
सीमान्त पर शहर है। काश्मीर के रहने वाले मुसल-
मान काश्मीर को 'कशीर' कहते हैं। स्थानीय मुस-
लिम जनता कश्मीर को 'कसीर' कहती है। इसलिए
कश्मीर शब्द को 'काशगर' 'काशान' तथा 'कश'
नगरों से जोड़ने का प्रयास किया गया है। श्रीनगर
के स्थान पर कश्मीर शब्द श्रीनगर के लिए मुस्लिम
काल में प्रयुक्त होता रहा है। सिखों के काश्मीर में
आधिपत्य स्थापित हो जाने पर श्रीनगर और कश्मीर
समानार्थक माने जाते थे। उक्त तीनों शहर हैं।
श्रीनगर को कश्मीर कहा जाता था। अतएव
'कशीर' शब्द ही कश्मीर शब्द का मूल है।
श्री स्तीन ने कश्मीर शब्द का अपभ्रंश 'कशीर'
शब्द को माना है। उर्दू तथा फारसी में 'ब्राह्मण'
शब्द को 'बरहमन' अबतक लिखते हैं। इसी प्रकार
'कश्मीर' को अगर उर्दू तथा फारसी के लेखक
'कशीर' लिखने लगे हों तो कोई आश्चर्य की बात
नहीं मानी जा सकती है
जिस प्रकार मुसलमान होने पर पुराना नाम बद-
लकर मुस्लिम नाम रख दिया जाता है। उसी प्रकार
काश्मीर मुस्लिम बहुल आबादी तथा मुस्लिम राज
होने के कारण 'कश्मीर' के स्थान पर उसे 'कशीर'
और काश्मीरी भाषा को 'कौशुर' कहा जाने लगा।
इसी प्रकार १४ वीं शताब्दी में शाह हमदान
ने जो काश्मीर उपत्यका के रक्षक सन्त मुसलमानों
द्वारा माने जाते हैं। काश्मीर का नाम 'बाग-ए-
सुलेमान' रख दिया था। शंकराचार्य पर्वत का नाम
भी बदलकर 'तख्त-ए-सुलेमान' रखा गया। 'अनन्त'
नाग शहर का नाम इस्लामाबाद पड़ा। यद्यपि आज
भी अनन्त नाग एक जिला है।
'कश्मीर' या 'काश्मीर' शब्द महाभारत,
पुराणादि सभी ग्रन्थों में मिलते हैं। उनका अस्तित्व
आज से ४ या ५ हजार वर्ष पूर्व था। उस समय
'बाइबिल' जिसमें 'हजरत सुलेमान' का नाम आता
है का अस्तित्व ही नहीं था। मुस्लिम काल का
इतिहास चौदह सदी से अधिक तथा बाइबिल काल
ईसा पूर्व २ हजार वर्ष से ऊपर नहीं जाता। कश्मीर
शब्द प्राचीन शब्द है। यही प्रचलित है। निश्चयात्मक
रूप से 'कश्यप' से इस शब्द को जोड़ना उचित
प्रतीत होता है।
· कम से कम २ हजार वर्षों से इतिहास इस बात
का साक्षी है कि 'काश्मीर' शब्द सर्वदा प्रयुक्त
होता रहा है। पतंजलि ने काश्मीर शब्द का उल्लेख
किया है। उसके पश्चात् पाणिनि ने काश्मीर शब्द
का उल्लेख किया है। प्लोतमी (सन् १५० ई०)
यूरोपियन लेखक ने काश्मीर का नाम 'कस्र्पीरा'
दिया है। वराहमिहिर (५वीं शताब्दी) के वृहद्
संहिता में काश्मीर का उल्लेख किया है। हुयेन सांग
(स० ५४१ ई०) चीनी पर्यटक ने काश्मीर को 'किया
शि मिलो' लिखा है। रत्नावली नाटक (७ वी सदी)
('काश्मीरदेशजे क्षेत्रे कुमकुमम् पद्मवेदितन्-)'
'काश्मीर' शब्द का स्पष्ट उल्लेख है।
३६ राजतरङ्गिणी
काश्मीरी लेखक क्षेमेन्द्र (सन् ९९० ई०)
ने समयमातृका में कंकाली से काश्मीर का वर्णन
कराया है। इसी समय प्रथम बार 'पंचाल धारा'
अर्थात् पीरपंजाल या पीरपेन्चाल का उल्लेख किया
गया है। बिल्हण (१०६३-१७) ने विक्रमाङ्क देव
चरित के अन्तिम अध्याय में काश्मीर का वर्णन
किया है।
देशी, विदेशी, काश्मीरी सभी लेखकों ने काश्मीर
किंवा कश्मीर शब्द का प्रयोग किया है। 'कश'
काशीर' 'काशगर' 'काशान' आदि नामों से कश्मीर
शब्द को सम्बन्धित करना मौलिक इतिहास को
दूसरे रंग में रंगना कहा जायगा।
राजतरंगिणी के लेखक कल्हण (रचना काल
११४८-११४९) द्वितीय राजतरंगिणी के लेखक
जोनराज (रचना काल १४४६-१४५९)
जोनराज तरंगिणी के लेखक श्रीवर (रचनाकाल
१४५९-१४८६) राजावली पिटक के लेखक प्रजाभट्ट
(सन् १५१३-१५१४) तथा श्री शुक (सन् १५८६)
ने काश्मीर शब्द का ही प्रयोग किया है।
इस प्रकार देखा जा सकता है कि सोलहवीं शताब्दी
तक 'कशीर' 'कश' आदि शब्दो का पता नहीं था।
इसके पश्चात् संस्कृत लेखकों की परम्परा का लोप होता
है। उनका स्थान परसियन तथा उर्दू लेखक लेते हैं।
इस काल में 'कश' 'कशीर' आदि शब्दों की व्युत्पत्ति
तथा उनसे काश्मीर शब्द को जोड़ने का प्रयास किया
जाने लगा।
शक्तिसंगम तंत्र (भाग ३:७:९) में कश्मीर
की सीमा का वर्णन किया गया है। इस तंत्र में
भारत के लगभग ५६ देशों का वर्णन मिलता है।
काश्मीर के सीमा निर्धारण में सहायता मिलती है।
इसके अनुसार शारदामठ से कुंकुमाद्रि अर्थात् पामपुर
तक का क्षेत्र काश्मीर कहा जाता था।
शारदामठमारम्य कुंकुमाद्रितटांतरम्।
तावत्काश्मीर देशः स्यात्पञ्चाशद्योजनान्तकः ॥
एक विचार है। उत्तर कुरु के लोग काश्मीर
में आबाद थे। काश्मीर की सीमा के लिए कहा गया
है। वह शारदा मठ अर्थात् वर्तमान शारदी तीर्थ जो
कृष्णगंगा तथा कनकौरी नदी के संगम पर स्थित है;
वहाँ से लेकर कुंकुमाद्रि अर्थात् पामपुर के केसर
उत्पादक पहाड़ियों तक विस्तृत था। उसका विस्तार
५० योजन था। पामपुर मैं चार बार जा चुका हूँ।
यह छोटा कस्बा है। ऊनी वस्त्र उत्पादन का बहुत
बड़ा केन्द्र है। श्री गांधी आश्रम उत्तर प्रदेश का
ऊन उत्पादन केंद्र है।
केसर की खेती तथा उपज के लिये पामपुर
प्रसिद्ध है। पामपुर के समीप कोई बड़ा पर्वत नहीं
है। बानेहाल से श्रीनगर आने वाली सड़क के दक्षिण
पार्श्व में पर्वतमालाएँ काफी दूर पड़ती हैं। पामपुर
क्षेत्र में छोटी छोटी मिट्टी की पहाड़ियाँ बहुत मिलती
हैं। दूर पर वितस्ता नदी बहती है। समथर भूमि
अधिक नहीं है। भूमि का रंग भूरा है। सेव, बादाम
बबूगोशा के बाग प्रायः मिलते हैं।
कुंकुमाद्रि का अर्थ केसर का पहाड़ होता है।
पामपुर की मृत्तिका पहाड़ियों से इसका अर्थ लगाया
जा सकता है। सुदूर स्थित पर्वतमाला शीत ऋतु
में तुषार पात से ढक जाती है। पामपुर का विस्तृत
भूरा भूखण्ड दोनों ओर हिमाच्छादित पर्वतों के मध्य
अत्यंत सुंदर दिखाई पड़ता है। अक्टूबर मास में
दोनों ओर की पर्वतमालाओं पर तुषारपात आरंभ
हो जाता है।
मैं यह दृश्य देख कर मुग्ध हो गया था। लगभग
एक घण्टा चुपचाप एक सेव के बाग में बैठा रहा।
इस नगर के अतीत को स्मरण करता रहा। नवम्बर
मास सन् १९६३ की काश्मीर यात्रा में वर्णन की
सत्यता देखकर चकित हो गया।
इसी तंत्र में देवी के वर्णन के साथ
उल्लेख है।
[Page Header]
प्रथम तरङ्ग ३५
[Left Column]
काश्मीरात्तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे ।
भोटान्तदेशो देवेशि मानसेशाच्च दक्षिणे ॥
श्लोक ३० पृष्ठ ७
औपधा ( औरसा ? ) श्चानि भद्राश्च
किरातानां च जातयः ।
तोमरा हंसमार्गाश्च काश्मीरास्तंगणास्तथा ॥
मार्कण्डेय, वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराणों में 'काश्मी-
रास्तंगणांस्तथा' उल्लेख आया है । मार्कण्डेय पुराण
में एक स्थान पर सौराष्ट्र के साथ 'काश्मीराश्च
सुराष्ट्राश्च' वर्णन मिलता है ।
यहाँ भोटांत देश के संबन्ध में कहा गया है
कि वह काश्मीर से आरम्भ होकर कामरूप के
पश्चिम तक फैला था । उसके पश्चिम में मानसरोवर,
पूर्व में काश्मीर अर्थात् उत्तर में कामरूप तथा मानस
में है । वर्तमान भूटान पूर्वकालीन भोट्ट देश का एक
खंड मात्र है ।
पुराणो से प्रकट होता है । प्राचीन काल में भोट
शब्द तिब्बत निवासियों के लिये प्रयुक्त होता था ।
भूटान से लेकर काश्मीर अर्थात् हिमालय के उत्तर
का भूखंड तिब्बत का भाग रहा है । मानसेश का
अर्थ शिव का निवास स्थान अर्थात् मानसरोवर है ।
विष्णु पुराण (अंश ४:१९) में वर्णन है । चन्द्रभागा
और काश्मीर आदि देशो पर व्रात्य, म्लेच्छ, शूद्रादि
राजागण राज्य का भोग करेंगे ।
, काश्मीर के प्राचीन गौरव पर विचार करने
लगा । उसे यादकर दुःख और उमड़ते हुए मन के
अतिरिक्त और कुछ मुझे नहीं मिला ।
शक्तिसंगम तंत्र ३:८:१२-१४ में कूर्मप्रस्थ का
वर्णन किया गया है ।
कूर्मप्रस्थं महेशानि कथ्यते श्रृणु साम्प्रतम् ।।१२।।
गोकर्णं दक्षभागे कामाख्या पूर्वगोचरः ।
उत्तरे मानरेश. स्यात् पश्चिमे शारदा भवेत् ।।१३
शारदा शब्द के विषय में कह चुका हूँ । काश्मीर
[Right Column]
के लिये अनेक ग्रंथो तथा स्थानो पर शारदा शब्द
प्रयोग किया गया है । यह बात सिद्ध होती है !
कूर्मप्रस्थ की सीमा के सन्दर्भ में कहा गया है । कूर्मप्रस्थ
के उत्तर में (मानेश मानसरोवर), दक्षिण में
गोकर्ण (नेपाल), पूर्व में कामाख्या (कामरूप),
पश्चिम में शारदा (काश्मीर) है । मैने गोकर्ण
महादेव का मन्दिर नेपाल में देखा है । उसका वर्णन
अपनी पुस्तक 'जाग्रत् नेपाल' में किया है । देवस्थान
मुझे बहुत सुन्दर, दिव्य तथा जाग्रत् प्रतीत हुआ ।.
'परेण हिमवन्त' उत्तरकुरु को कहा गया है ।
श्री जिमर ने वैदिक इंडेक्स १:८४ में काश्मीर को
उत्तरकुरु कहा है । पाली साहित्य में उत्तरकुरु का
स्थान सुमेरु के उत्तर बताया गया है । काश्मीर को
को उत्तरकुरु के दक्षिण दिखाया गया है । उत्तर-
कुरु को समुद्र से आवृत बताया गया है । ऐतरेय
ब्राह्मण (८:१४:४) में उत्तरकुरु हिमालय के पार
बताया गया है । वाल्मीकीय रामायण (४:५३:५६)
में उत्तर में समुद्र का होना कहा गया है । ऐतरेय
ब्राह्मण (८:२३) में वसिष्ठ सात्यहव्य ने उसे देव-
क्षेत्र कहा है ।
काश्मीर का उल्लेख वीर पुरुषदत्त के नागार्जुनी
कोण्डा लेख में आता है । पाणिनि ने उसका उल्लेख
(४.२:१३३) किया है । पतंजलि ने (३:२:२ पृष्ठ
१८८, १८९) तथा (१:१:६ पृष्ठ २७६) महाभारत
और वृहत्संहिता में इसका देश रूप में उल्लेख किया
है (१४:२९) ।
रामायण में काश्मीर
आनंद रामायण में काश्मीर का वर्णन मिलता
है । आनंद रामायण के याग कांड सर्ग ३:३२:३४
'श्लोकों' में काश्मीर का उल्लेख आया है । अश्वमेध
यज्ञ का आयोजन भगवान् श्री रामचन्द्रजी ने
किया था । यज्ञ का अश्व छोड़ा गया । वीर
शत्रुघ्न, मंत्री, सामंत, सेना सहित अश्व की रक्षा
के लिये साथ भेजे गये थे । शूरसेन, पांचाल,
कुरुक्षेत्र, कुरु-जांगल, देश होते हुए अश्व ने काश्मीर
३८ राजतरङ्गिणी
में प्रवेश किया। तत्पश्चात् भिल्ल देश, गौड़ देश,
शुकदेश, यवनदेश, ताम्रदेश होता अश्व करतोया
तट पर पहुँचा। वहाँ से चलता ज्वालामुखी के
पर्वतीय क्षेत्रों में अश्व ने प्रवेश किया !
आनंद रामायण ने काश्मीर तथा उसके चारों
ओर के देशों का वर्णन किया है। यह भौगोलिक
वर्णन अंशतः ठीक है। काश्मीर के सीमावर्ती देशो
यथा, गांधार, कांबोज, शिवि आदि देशो का स्पष्ट
उल्लेख नही किया गया है। मालूम होता है कि
आनंद रामायण के लेखक के समय में उन देशों की
गणना यवन किंवा शक देश में होने लगी थी।
भगवान् श्रीरामचन्द्र जी ने उत्तरी दिशा की
तीर्थ यात्रा की थी। उसका वर्णन यात्रा कांड,
आनंद रामायण (सर्ग ९।१-३१) में किया गया
है। उसमे उनका ज्वालामुखी, देवप्रयाग, अलकनंदा
के तट से होते हुए, श्रीबदरी आश्रम पहुँचना
दिखाया गया है। श्रीबदरी आश्रम के पश्चात्
श्रीराम केदारेश्वर गये। वहां से हिमाद्रि पर गये।
यहाँ से महापथ होते हुए मानसरोवर की यात्रा
की। मानसरोवर से बिंदु सरोवर गये। वहाँ से
हिमालय होते हुए मेरु पर्वत गये। तत्पश्चात्
कैलास पर गये। वहाँ से भागीरथी के तट से होते
हुए हरिद्वार आए। हरिद्वार से कुरुक्षेत्र होते हुए
इंद्रप्रस्थ पहुँचे। इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) से मधुवन
(मथुरा), वृन्दावन, गोकुल तथा गोवर्धन होते हुए
अवंतिका अर्थात् उज्जैन गये।
मानसरोवर के पश्चात् देव, गंधर्व, किन्नर
जातियों का उल्लेख आता है। प्रतीत होता है।
भगवान रामचन्द्र काश्मीर के ऊपर अर्थात् उत्तरीय
सीमा स्पर्श करते हुए, मेरु तक पहुंचे थे। भगवान्
श्रीराम वहाँ से कैलास गये। इससे स्पष्ट होता है।
उन्होंने पश्चिम की तीर्थ यात्रा यथा जालंधर,
मूलस्थान, गांधार, कांबोज अथवा शिवि देश की
नहीं की। मेरु के दक्षिण काश्मीर का स्थान
निर्विवाद रूप से सभी प्राचीन ग्रन्थों ने स्वीकार
किया है।
वाल्मीकीय रामायण में काश्मीर. का नाम
मुझे कही पर मिल नही सका। संभव है। अपने
दृष्टिदोष के कारण उसे न देख सका हूँ। परन्तु मै
समझता हूँ कि काश्मीर का स्पष्ट रूप से उल्लेख
रामायण में नहीं है।
योग वासिष्ठ रामायण मे काश्मीर का सबसे
अधिक ऐतिहासिक और प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन
किया गया है। काश्मीर इतिहास पर उससे विशेष
प्रकाश पड़ता है। उस स्थान का वर्णन श्लोक २६
टिप्पणी में किया गया है।
राज तरंगिणी में श्रीराम के काश्मीर आने की
बात तथा उसका क्या प्रमाण है, आदि पर
यथास्थान प्रकाश डाला गया है। एक स्थान पर
उल्लेख मिलता है। राम ने काश्मीर में एक मंदिर
का निर्माण करवाया था।
महाभारत में काश्मीर
महाभारत सभा पर्व (२७:१७) और भीष्म
पर्व (९:५३-६७) में उल्लेख मिलता है। काश्मीर
भारतीय जनपद था। अर्जुन ने इसे दिग्विजय के
समय जीता था। सभा पर्व (३.४०१२:५२) तथा
वन पर्व (५१.२६) के अनुसार काश्मीर निवासी
महाराज युधिष्ठिर के लिये भेंट लाये थे। द्रोण पर्व
(११:१६ तथा ७०:११) में उल्लेख आता
है। काश्मीर को भगवान् श्रीकृष्ण तथा परशुराम ने
विजय किया था। अर्जुन ने अपने दिग्विजय के समय
काश्मीर को जीता था।
तत. काश्मीँरकान् वीरान् क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः ।
व्यजयल्लोहितं चैव मण्डलैर्दशभिः सह ॥
—सभापर्व २७:१७
तिल्लारा मर्मराश्च मधुमत्तः सुकन्दरूः ।
काश्मीराः सिन्धुसौवीरा गान्धारादर्शकास्तथा ॥
—भीष्मपर्व ९:५३-६७
प्रथम तरङ्ग ३६
द्रविडाः सिंहलाश्चैव राजा काश्मीरकस्तथा ।
कुन्तिभोजो महातेजाः पार्थिवो गौरवाहनः ॥
—सभापर्व : ३४:१२
काश्मीराश्च कुमाराश्च घोरका हंसकायनाः ।
शिवि त्रिगर्त यौधेया राजन्या मद्र केकयाः ॥
—सभापर्व : ५२:१४
केकयान् मालवांश्चैव तथा काश्मीरकानपि ।
अद्राक्षमहमाहूतान् यज्ञे ते परिवेषकान् ॥
—म० :-वनपर्व ५१.२६
आवन्त्यान् दाक्षिणात्यांश्च पर्वतीयान् दशेरकान् ।
काश्मीरकानौरसिकान् पिशाचांश्च समुद्रगलान् ॥
—द्रोणपर्व ११:१६
भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजोत्तमाः ।
ततः काश्मीरदरदान् कुन्तिशुद्रकमालवान् ॥
—द्रोणपर्व: ७०:११
काश्मीर मंडल के विशेष महत्त्व का उल्लेख
महाभारत में मिलता है । काश्मीर मडल में
उत्तर के ऋषियो यथा नहुष, यंयाति, अग्नि तथा
कश्यप का परस्पर विचार विनियम हुआ था ।
काश्मीरमण्डलं चैतत् सर्वपुण्यमरिंदम ॥
महर्षिभिश्चाप्युषितं पश्येदं भ्रातृभिः सह ॥ १० ॥
यत्रोत्तराणां सर्वेषामृषीणां नाहुषस्य च ।
अग्नेश्चैवात्र संवादः काश्यपस्य तु भारत ॥११॥
—वन पर्व : १३०
काश्मीर मंडल के चंद्रभागा तथा वितस्ता
नदियो में सात दिन नित्य स्नान करने पर कहा
गया है, मनुष्य निर्मल हो जाता है ।
सप्ताहं चन्द्रभागां वै वितस्ता भूमिमालिनीम् ।
विगाह्य वै निराहारो निर्मलो मुनिवद् भवेत् ॥७॥
काश्मीरमण्डले नद्यो या. पतन्ति महानदम् ।
ता नदी: सिन्धुमासाद्य शीलवान् स्वर्गमाप्नुयात्॥९॥
अनुशासन पर्व : २५:७०९
उत्तर दिशा में कश्यप का निवास बताया
गया है । काश्मीर उत्तर दिशा में है :
अत्रिर्वसिष्ठो भगवान् कश्यपेश्च महानृषिः ।
गौतमश्च भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ॥३८॥
ऋषीकतनयश्चोग्रो जमदग्निः प्रतापवान् ।
धनेश्वरस्य गुरवः सप्तैते उत्तराश्रितः ॥
—अनुशासन पर्व : १५०:३८-३९
कश्यप की पत्नियां दक्ष की कन्याएं अदिति, दिति,
दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा, प्राधा, विश्वा,
विनता, कपिला, मुनि, कद्रू थी ।
ते भार्ये कश्यपस्यास्तां कद्रूश्च विनता च ह ।
प्रादात् ताभ्यां वरं प्रीतः प्रजापतिसमः पतिः ॥
—आदि पर्व १६:६
दितिर्दितिश्चैदनुः काला दनायुः सिंहिका तथा ।
क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनि ॥१३॥
कद्रूश्च मनुजव्याघ्र दक्षकन्यैव भारत ।
एतासां वीर्यसम्पन्नं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥१३॥
—आदि पर्व : ६५:१२
सुर, असुर दोनों के पूर्वपुरुष कश्यप हैं ।
मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः ।
जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः ॥
—आदि पर्व : ६६:३४
ज्येष्ठ पत्नी अदिति से १२ जनों का जन्म
हुआ था :
त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा ।
मारीचः कश्यपस्तस्यामादित्यान् समजीजनत् ॥
— आदि पर्व : ७५:१०
कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से भगवान्
वामन का अवतार हुआ था ।
कश्यपस्यात्मजः श्रीमानदित्या गर्भधारितः ।
पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रसूता गर्भमुत्तमम् ॥
४० | राजतरंगिणी
बौद्धसाहित्य
बौद्ध ग्रंथों में काश्मीर का बहुत वर्णन मिलता
है। दिव्यावदान शतक, बोधि सत्त्वावदान, कल्पलता,
में उल्लेख मिलता है। काश्मीर के निवासी नाग
जाति के थे।
काश्मीर राज्य के विषय में चीनी यात्रियो ने
लिखा है 'राज्य ७००० ली आवर्त्त में फैला है।
चारो घोर ऊंची पर्वतमालाओ से परिवेष्टित है।
राजधानी वितस्ता के पश्चिम तट पर स्थित है। देश
की भूमि अत्यंत उर्वरा है। अन्न, फल, तथा पुष्प
अत्यधिक उत्पन्न होते हैं। वनस्पतियां तथा ओषधियां
यथेष्ट रूप से मिलती हैं। जलवायु ठंडी है। तथा रुक्ष
है। मनुष्य अत्यंत रूपवान होते हैं। उनका रंग साफ
है। वे विद्यानुरागी हैं। उनमें अश्रमिक (बौद्ध धर्म
नहीं मानने वाले) तथा बौद्ध धर्मानुयायी दोनों है।
स्तूप तथा संघाराम देश में मिलते हैं।'
पर्यटक युवान च्वांग लिखता है "काश्मीर पूर्व
काल में गांधार देश में सम्मिलित था। तृतीय बुद्ध
परिषद् के पश्चात् मोग्गलि पुत्र तिस्स काश्मीर में धर्म
प्रचारार्थ भेजे गये थे। अशोक के समय काश्मीर मौर्य
साम्राज्य के अंतर्गत था। गंधार जातक में काश्मीर
तथा गंधार का उल्लेख मिलता है।"
बौद्धग्रंथों में १६ जनपदों में काश्मीर और गंधार
को सम्मिलित किया है। इनका विवरण पुक्कुसाति तथा
महारुपिन की कथाओं से प्राप्त होता है। जातकों से
पता लगता है। बुद्ध काल में व्यापारीगण विदेश से
काश्मीर और गंधार तक व्यापार करते थे।
मिलिन्द प्रश्न (मिलिन्दपन्हो) में, 'कासिकोसालेऽपि
कश्मीरे गंधारे ऽपि'-का उल्लेख मिलता है। काश्मीर
का गंधार के साथ उल्लेख किया गया है। युवान-
च्वांग ने लिखा है-'कभी गंधार के अंतर्गत काश्मीर
था' कल्हण की राजतरंगिणी, महाभारत तथा किसी
सूत्र से पता नहीं चलता कि कभी किसी ऐतिहासिक
युग में काश्मीर गंधार के अंतर्गत था। राजतरंगिणी
काल से लेकर कोटा रानी के लंबे चार हजार वर्षों
में कही संकेत नहीं मिलता कि काश्मीर गांधार में
सम्मिलित था। भौगोलिक दृष्टि से काश्मीर तथा
गांधार सीमांत देश थे। अतएव काशी, कोशल के
समान बौद्ध साहित्य में गंधार काश्मीर का नाम
से लिया गया है।
महावंश में उल्लेख आता है। स्थविर धौतिक
राजा मिलिंद [ मिनाण्डर ] के समय काश्मीर
गांधार में बौद्ध धर्म प्रचारार्थ आये थे।
भूरिदत्त जातक से मालूम होता है। कृमियों,
फतिंगों, सर्पों, मेढ़कों, कीड़ों, मक्खियों आदि की
हत्या कम्बोज जनपद के लोग करते थे। इन हत्याओं
के कारण मनुष्य विशुद्ध हो जाता था। यूआन च्वांग
ने [सातवी शताब्दी] काश्मीर राज्य के दक्षिण
स्थित राजपुरो अर्थात् वर्तमान राजोरी के लिये लिखा
है-यहाँ के लोग कीड़ों मकोड़ों की हत्या करते थे।
मुझे ऋग्वेद में काश्मीरका उल्लेख नहीं मिला।
'वैदिक कथा।' पुस्तक लिखते समय मैंने वैदिक
साहित्य को अध्ययन किया उस समय इस पर विशेष
ध्यान रखा कि काश्मीर का वर्णन वेद में है या नहीं।
एक दिन श्री डा० ज्वाला प्रसाद सिंघल अपनी
नव प्रकाशित पुस्तक 'स्फिनिक्स स्पीक्स' लेकर मेरे
निवास स्थान १५ कैनिगलेन नई दिल्ली में आये।
उन्होंने वेद में काश्मीर के उल्लेख की चर्चा उठायी।
मुझे कुछ आश्चर्य हुआ।
निसन्देह ऋग् वेद में 'वितस्ता' नदी का नाम
है। वितस्ता काश्मीर से निकल कर पंजाब में बहती
है। वैदिक पुरुषों को वितस्ता नदी का ज्ञान था।
इससे अनुमान लगाया गया है कि काश्मीर मण्डल
का ज्ञान वैदिक पुरुषों को था। इस बात को प्रमा-
णित करने के लिये डा० सिंघल ने अपनी पुस्तक में
तर्क उपस्थित किया है।
मैंने पुस्तक पढ़ने के लिये समय मांगा। इसी
बीच उनके पुस्तक के विषय की चर्चा समाचार पत्रो में
प्रथम तरंग ४१
मे छपी। उसमें उन्होंने एक नवीन सिद्धान्त का मत को यहाँ पर संक्षेप में उद्धृत कर देना मैं उचित
प्रतिपादन किया है। कुछ समय पश्चात् वे पुन. समझता हूँ।
आये। इस प्रयोग मे उन्होंने स्वीकार किया कि 'यह कहा जाता है कि काश्मीर की भूमि एक
श्री ए. सी. दास के 'ऋग्वेदिक इण्डिया' पुस्तक से झील थी। वह १६००० वर्ग मील क्षेत्र में फैली
वे प्रभावित हुए हैं। उनका सिद्धान्त उक्त पुस्तक थी। यह २००० फीट गहरी थी। चारों ओर
से मिलता है। पर्वतो से घिरी थी। तिब्बत उत्तर मे, कैलास पूर्व
उनके काश्मीर विषयक सिद्धान्त को मैं यहाँ संक्षेप मे, और सप्तसिन्धु का भूमि खण्ड दक्षिण तथा
में उद्धृत कर देना उचित समझता हूँ। उनके दक्षिण पश्चिम में था। हमने देखा है कि जिन्दा-
सिद्धान्त को स्वीकार करने के पूर्व काश्मीर के भूग- वेस्ता में इस चतुष्कोणीय भूमि का नाम 'वरण' अर्थात्
र्भीय ज्ञान का विशेष अध्ययन आवश्यक है। 'वरुण' का देश कहा गया है। उसका उल्लेख 'हफ्त
काश्मीर मे गुहा निवासियो के स्थानो पर खनन हिग्द' अर्थात् 'सप्त सिन्ध' के पूर्व किया गया है।
कार्य केन्द्रीय सरकार द्वारा हुआ है। उनसे काश्मीर 'नागा जाति' चीनी तुर्किस्तान तथा उसके आस पास
उपत्यका के भूगर्भीय रचना पर प्रकाश पडता है। रहती थी। उनके देश के साथ 'गरुड़' का देश मिला
मैंने इन गुफाओं तथा उनमे प्राप्त सामग्रियों को था। दोनो जातियों मे सघर्ष होता रहता था। अत-
सन् १९६२ तथा सन् १९६६ में काश्मीर जाकर एव नागा जाति ने काश्मीर में गरुड जाति के भय
देखा तथा अध्ययन किया है। के कारण शरण लिया।
भूगर्भीय स्तर के अध्ययन से इतना अवश्य स्पष्ट 'कहा जाता है कि काश्मीर में एक भेद पर्वत
हो जाता है कि काश्मीर उपत्यका जल से कभी पूर्ण था। उस पर देवी सरस्वती अपने वाहन मोर पर
थी। पानी कभी निकल गया। सूखी भूमि हो गयी। रहती थी। यह पर्वत भी तोडा गया और सरस्वती
डा० सिंघल द्वारा प्रतिपादित अन्य सिद्धान्तों को, तथा पार्वती ने सरिताओं का रूप धारण कर लिया।
जब तक कुछ और अनुसन्धान न हो जाय और प्रमाण
न मिल जाय, स्वीकार करने मे कठिनता होगी। 'ऋग्वेद' इस कथानक को अर्थयुक्त रूप से
वेद की जिन ऋचाओं का उल्लेख डा० सिंघल ने उपस्थित करता है। 'इन्द्र' का प्रथम कार्य यह था
किया है ओर जो अर्थ उन्होंने लगाने का प्रयास किया कि उसने अहिदस्यु 'वृत्र' तथा उसकी माता संहार
है वे अत्यन्त विवादास्पद हैं। किया। जिन्होंने मेघ से गिरते जल को नागाओ द्वारा
रचित गुहा में बन्द कर रखा था। इन्द्र ने भेद का
'त्रित' के सम्बन्ध में मैंने अपनी पुस्तक 'वैदिक भी निर्धन कर वध कर दिया। दस्युओं का जो वहाँ
कथा' ( २७-३३) में विस्तृत प्रकाश डाला है। पर रहते थे उनका संहार किया। उसने वज्र प्रहार
मैं डा० सिंघल की विवृति का समर्थन करने में अस- द्वारा पर्वत तोड डाला। वह जल बह कर 'सप्तसिन्ध'
मर्थ हूँ। यहाँ स्थानाभाव से विशेष विवृति करना की सात नदियाँ हुई। और समुद्र में जाकर मिल गयी।
अप्रासंगिक होगा। 'भेद' का अर्थ जो डा० सिंघल ने 'त्रित' को वाराह भी कहते हैं। अर्थात् बारह-
लगाया है वह काश्मीरी परम्परा तथा इतिहास से मूला के समीप वह मारा गया था। सरस्वती उनमे
मेल नही खाता। 'गंगोद्भेद' तीर्थ तथा 'भेदादेवी' से मुख्य नदी थी। जो मुक्त की गयी थी। दस्यु लोग
'भेद पर्वत' के प्रसंग मे श्लोक संख्या ३४ की टिप्पणी 'अनासो' अर्थात् नासिका रहित थे। अर्थात् वे चिपटी
तथा परिशिष्ट द्रष्टव्य है। तथापि डा० सिंघल के नाक वाले थे। ऋग्वेद में यह भी वर्णन आता है कि
४२ राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ]
अनार्य शिव, अजस, यक्ष, आदि ने यमुना के तटपर
भेद के नेतृत्व में युद्ध किया था जहाँ इन्द्र ने उन्हें
पराजित किया था। 'ऋग्वेद' उन अनार्यों का भी
वर्णन करता है जो शिश्नदेव की पूजा करते थे।
उन्हें भी इन्द्र ने पराजित किया था।
'जिस समय काश्मीर में 'अहिवंशीय दस्यु' लोग
जिनका स्वामी वृत्र रहता था, उन दिनो आर्य
हिन्दूकुश तथा पामीर के गिरिपाद में रहते थे।
हिमालय के उत्तर में तेथिस सागर था। वह
क्रमशः सिकुड़ता गया। और पृथ्वी के शियर की
गति के कारण चीन में तथा तिब्बत में भूमि का
स्तर ऊंचा कर दिया। चीन में भूमि सूख गयी
और तिब्बत अधित्यका अर्थात् प्लेटो बन गया।
इसलिए तिब्बत को त्रिविष्टप् अर्थात् तीन बार परत
किया हुआ कहा जाता है।
'भूगर्भीय गति का प्रभाव काश्मीर पर भी पड़ा
जो तिब्बत की पश्चिम सीमा से सम्बन्धित है।
पर्वत टूट गया और काश्मीर का जल बाहर निकल
गया। नाग लोग प्राकृतिक उथल पुथल में विनष्ट
हो गये। इस प्रकार जल निकल जानेपर गिरिपाद
से आर्य लोग उतर कर आये और काश्मीर
उपत्यका में आबाद हो गये। उस समय नई नदियां
सिन्धु में आकर मिली। गान्धार सप्तसिन्धु का एक
भाग बन गया।
'वृत्र काश्मीर में मारा गया था। इसका प्रमाण
'भेद' तथा वाराह के वर्णन से प्रकट होता है,
जिनका वर्णन काश्मीर के साहित्य में मिलता है।
भेद के पराजय की बात यमुना तट पर कही गयी
है। काश्मीर के इतिहास में यह कहा गया है कि
सरस्वती देवी भेद पर खड़ी थी। यह बात निर्विवाद
है कि सरस्वती तथा यमुना का उद्गम एक ही शैल
से होता है। भेद मालूम होता है कि उन लोगों
का राजा था जो भेद पर्वत पर रहते थे। उनका
विनाश शायद काश्मीर उपत्यका का जल निकल
जाने के कारण हुआ अथवा राजा सुदास द्वारा इन्द्र
[दायाँ स्तम्भ]
की सहायता से मारे गये थे।
'इन्द्रको वहीं देवरूप नही बल्कि प्रकृति की
प्रभूत शक्ति मानना चाहिए। एक 'त्रित' देवता का
वर्णन वेदों में मिलता है। उसने वृत्र का वध किया
था। वृत्र यहाँ वराह कहा गया है। वैदिक ऋचाओ
से यह बात प्रमाणित होती है कि वराह वृत्र का
निवास बारहमूला में था।
'त्रित' ने वृत्र दैत्य को मारा था जिन्दावेस्ता के
प्रथम अध्याय वेन्दीयाद के १८वें पद में आता है।
यहाँ 'त्रित' को 'श्रेतिन' कहा गया है। 'त्रित' प्राकृतिक
शक्ति का प्रतीक माना गया है। उसे 'त्वष्टार' का
पुत्र माना गया है। त्वष्टार को इन्द्र का पिता
माना गया है। त्वष्टार को इन्द्रके वज्र तथा देवों
के अन्य अस्त्रों का निर्माता माना गया है।
'वरुण, त्रित, इन्द्र के साथ कहा गया है कि
वृत्रको मरुत् ने भी मारा था। भूमि की गति के
कारण जब काश्मीर का जल बारहमूला के पास से
बह निकला होगा तो सम्भव है कि, आन्धी, पानी;
भूचाल तथा वज्रपात हुआ हो। मरुत् से वृत्र वध
को सम्बन्धित करने से यह प्रकट होता है कि
प्राकृतिक उथल-पुथल के कारण काश्मीर का जल
बह गया और आर्यों को काश्मीर तथा वहाँ रहने
वाली जातियों का ज्ञान था।
'मालूम होता है किऋग्वैदिक आर्यों ने काश्मीर
भूखण्ड का कोई नाम नही रखा था। उनके लिए
यह 'दस्युओं' का देश था। वे अपने स्थानो से
आकर आर्यों को परेशान करते थे। पौराणिक
काल में इन्द्र और वृत्र के संघर्ष की बात कथानक
रूप में चलाई गयी। आर्यों ने कालान्तर में
शिवपूजा स्वीकार कर ली। उस समय 'सती सर'
तथा उसमे जल निकलने की घटना को गाथा का
रूप दे दिया गया। नागलोग शिव के भक्त
थे अतएव 'जलोद्भव' नाम के एक दैत्य की
कल्पना कर ली गयी। क्योंकि शिव के भक्त
नागाओं को आर्य जिन्होंने शिव की उपासना स्वी-
प्रथम तरंग ४३
कश्यपेन तदन्तःस्थं घातयित्वा जलोद्भवम् ।
निर्ममे तत्सरो भूमौ कश्मोरा इति मण्डलम् ॥ २७ ॥
२७ असुर जलोद्भव का वध किया गया। सतीसर के उस भूमि स्थान पर काश्मीर मण्डल
की स्थापना हुई।
कार कर ली थी दैव नाम नही दे सकते थे।
काश्यप जो मानव जाति के आदिपुरुष माने जाते
है उन्हें लाकर बारहकूला के समीप पर्वत विदारण
का आख्यान रच लिया गया। सतीसर इस प्रकार
'काश्यप सर' हो गया। और कालान्तर में काश्मीर
हो गया।
'प्राचीन काल के पुरातत्त्व सम्बन्धी प्रमाणों पर
अपने सिद्धान्त की पुष्टि करता लेखक कहता है :
'इन्द्रने दस्युओं को काश्मीर उपत्यका में नष्ट किया।
इन्द्र ने उनके ९९ दुर्गों को नष्ट किया। काश्मीर के
पूंछ क्षेत्र के सोहन नदी में कहा जाता है कि इन
पाषण युगीय लोगों के पाषाण यान्त्रिक उपकरण
मिले हैं। उनका समय ६,००,००० वर्ष पूर्व माना
जाता है। इस प्रकार आदिकालीन लोग
काश्मीर उपत्यका में रहते थे इसका प्रमाण ५वें
मण्डल के सूक्त ४५ ऋचा ६ पर आधारित किया है।
उसमें 'विशिशिप्र' शब्द को वृत्र माना गया है। वहीं
कहा गया है कि गऊ की शाला खोदी गयी है। और
उससे जल बाहर निकल गया। यहाँ इन्द्र के स्थान
पर माता अथवा प्रकृति के लिए कहा गया है कि
प्रकृति के कारण काश्मीर उपत्यका का जल वह गया
और भूमि निकल आयी। 'विशिशिप्र' शब्द महत्त्व-
पूर्ण है क्योकि दस्युओं के प्रारम्भिक पाषाण युग को
उपस्थित करता है।
'यह बात इससे और प्रमाणित होती है कि वृत्र
तथा उसके दस्यु साथियों के लिए 'इलीविश' शब्द
का प्रयोग मण्डल १ सूक्त ३३ ऋचा १२ में किया
गया है। जिसका अर्थ गुहा में रहने वाले लोग
होते हैं। इससे प्रकट होता है कि दस्यु लोग
पाषाण युगीय गुफा में रहने वाले थे। इन बातों से
प्रकट होता है कि ऋग्वेदोय आर्य उनके सम-
कालीन थे।'
लेखक ने श्री स्टूअर्ट पिगोट के 'प्रिहिस्टारिक
इण्डिया' का उल्लेख करते हुए कहा है : 'सोअन
सभ्यता सोहन नदी का उपत्यका सिन्धु, पूंछ, झेलम
के समीप तथा साल्ट रेंज तक विस्तृत थी।
पाठभेद :
'कश्मीर' का 'काश्मीरा' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२७ (१) जलोद्भव : नीलमत पुराण जलोद्भव
गाथा का वर्णन करता है। जलोद्भव का अर्थ है,
जल से उद्भव अर्थात् जन्म लेनेवाला। काश्मीर में
अत्यधिक ठंड पड़ती थी। कुछ लोगों का अनुमान
है। जलोद्भव शब्द का अर्थ "तैरता हुआ" हिमखंड है।
नीलमत पुराण में निम्नलिखित जलोद्भवोपाख्यान
का वर्णन दिया गया है :
कृपया सः शिशुनागैरंगले तस्मिन्विवर्धितः ।
यस्मादयं जले जातस्तस्मादेष जलोद्भवः ॥
—77।११८, ११९
आराध्य तपसा लेभे वरं देवात्पिता महान् ।
जलेऽमरत्वं मायाञ्च विक्रमं चातुलं तथा ॥
78।११९, १२०
लब्धवायस्तु दैत्येन्द्रो भक्षयामास मानवान् ।
समीपे सरसस्तस्य नानादेशेव्यवस्थितान् ॥
79।१२०, १२१
दर्भाभिसार-गान्धार-जुहुण्डर-शकान् रसान् ।
तंगणान्माण्डवान् मद्रा नन्तर्गिरिबहिर्गिरि ॥
80।१२१, १२२
४४ राजतरंगिणी
ते हन्यमानाः पांक्तं देशान् संप्रायुवन् भयात् ।
शून्येषु तेषु देशेषु विससार स निर्भयः ॥
४।१३२, १३३
भवदन्वितितं सर्वं यथारूपं मया विभो ।
पालितः संप्रहसुतो दैत्यो नाम्ना जलोद्भवः ॥
१३०।१७५
जलोद्भव असुर का वर्णन वामनपुराण
(८०।१८-३३) में दिया गया है। ब्रह्मा के वर-
लाभानन्तर गर्वतापहारी असुर जलोद्भव का वध
शिव तथा विष्णु के द्वारा हुआ था। यह कथा
नीलमत पुराण में वर्णित कथा से मिलती है ।
शक्र सरोवर पर पौलोमी क साथ क्रीडारत थे ।
परमदुर्जय संग्रह नामा दैत्येन्द्र वहीं रहता था ।
शची को देखते ही काममोहित दैत्य का रेतस्
सलिलाशय में पतित हो गया । कामोन्मत्त दैत्य ने
शची के अपहरण की लालसा की । शक्र तथा
संग्रह में तुमुल युद्ध प्रारम्भ हो गया । इन्द्र का
युद्ध एक वर्ष तक चलता रहा । सङ्ग्रह युद्ध में हत
हो गया ।
उस दुरात्मा के रेतस् से जलोद्भव शिशु
उत्पन्न हुआ । जलोद्भव का नागो ने कृपापूर्वक
विवर्धन किया । जल से उत्पन्न होने के कारण
उसका नाम जलोद्भव पड़ा ।
जलोद्भव देश का वर्णन महाभारत में आया
है । हिमालय समीपस्थ इस देश का होना मिलता
है । इस देश पर भीमसेन ने विजय प्राप्त की थी ।
मैं समझता हूँ कि वह देश काश्मीर है । (सभा
पर्व : ३० । ४)
पितामह ब्रह्मा की तपस्या तथा आराधना द्वारा
जलोद्भवने तीन वर प्राप्त कर लिये थे । जल में
अमरत्व, अतुलनीय विक्रम तथा मायाशक्ति की
प्राप्ति । उस दैत्येन्द्र ने समीपवर्ती दार्वाभिसार, गाधार,
जहूंडर, शक, खस, तगण, माडव, मद्र, अंतर्गिरि और
बहिर्गिरि के निवासियों का भक्षण आरम्भ कर
दिया । काश्मीर के समीपवर्ती सीमांत देशों को
शून करने लगा । उस पापी के कारण देश
जनशून्य हो गया । वह निर्भय हो गया (नीलमत
पुराण श्लोक 76-81 ११८-१२२)
वाग्भट वाग्मीरी में कहते हैं : 'जलोद्भव
के कारण काश्मीर जनशून्य हो गया था। एक
समय मरीचि के पुत्र काश्यप ने जिन्हें कुछ लोग
ब्रह्मा का पौत्र कहते हैं, काश्मीर की यात्रा की ।
कुछ काल तक पवित्र सुमेरु पर्वत पर निवास
करने के पश्चात् काश्मीर भूमि की दुरावस्था को
देखकर उनका ध्यान आकृष्ट हुआ । उन्होंने दुरावस्था
का कारण पूछा । लोगों ने कहा 'जलदेव' 'सतीसर'
में निवास करता है। वह हम लोगों को नष्ट करता
रहा है।
'काश्यप का हृदय करुणापूर्ण हो गया। वह
हरीपुर के समीप नौबंधन में निवास करने लगा ।
वहाँ उन्होंने एक सहस्र वर्ष तक घोर तपस्या की ।
महादेव प्रकट हुए। जलदेव को मारने की प्रार्थना
स्वीकार की । महादेव ने विष्णु और ब्रह्मा को
जलदेव को हटाने के लिये भेजा। विष्णु और
जलदेव का छह सौ वर्षों तक संघर्ष होता रहा ।
'विष्णु ने देखा कि जलदेव जल तथा पंक में
रहकर अपनी रक्षा करता है । उन्होंने बारामूला
के समीप एक जलप्रणाली बनवायी । जल निकल
गया। दैत्य दृष्टिगोचर होने लगा । वह खड्गकर
मार डाला गया । प्रदेश आबाद हो गया । इस
लिये काश्मीर को 'कश्यपसर' कहते हैं।'
रत्नाकर पुराण का अनुवादकर्ता लिखता है,-
'पहले वक्तों में चमनजार काश्मीर में देव और
राक्षस वास किया करते थे । इनमे से एक देव
जलोद्भव नामी था । वह बडा जालिम और सरकश
था । बहुत अरसा तक उसकी लडाइयाँ तीन कारणों
यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ रहीं ।
उसके फना होने के बाद मखलूक खुदा ने इस-