राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ]
अनार्य शिव, अजस, यक्ष, आदि ने यमुना के तटपर
भेद के नेतृत्व में युद्ध किया था जहाँ इन्द्र ने उन्हें
पराजित किया था। 'ऋग्वेद' उन अनार्यों का भी
वर्णन करता है जो शिश्नदेव की पूजा करते थे।
उन्हें भी इन्द्र ने पराजित किया था।
'जिस समय काश्मीर में 'अहिवंशीय दस्यु' लोग
जिनका स्वामी वृत्र रहता था, उन दिनो आर्य
हिन्दूकुश तथा पामीर के गिरिपाद में रहते थे।
हिमालय के उत्तर में तेथिस सागर था। वह
क्रमशः सिकुड़ता गया। और पृथ्वी के शियर की
गति के कारण चीन में तथा तिब्बत में भूमि का
स्तर ऊंचा कर दिया। चीन में भूमि सूख गयी
और तिब्बत अधित्यका अर्थात् प्लेटो बन गया।
इसलिए तिब्बत को त्रिविष्टप् अर्थात् तीन बार परत
किया हुआ कहा जाता है।
'भूगर्भीय गति का प्रभाव काश्मीर पर भी पड़ा
जो तिब्बत की पश्चिम सीमा से सम्बन्धित है।
पर्वत टूट गया और काश्मीर का जल बाहर निकल
गया। नाग लोग प्राकृतिक उथल पुथल में विनष्ट
हो गये। इस प्रकार जल निकल जानेपर गिरिपाद
से आर्य लोग उतर कर आये और काश्मीर
उपत्यका में आबाद हो गये। उस समय नई नदियां
सिन्धु में आकर मिली। गान्धार सप्तसिन्धु का एक
भाग बन गया।
'वृत्र काश्मीर में मारा गया था। इसका प्रमाण
'भेद' तथा वाराह के वर्णन से प्रकट होता है,
जिनका वर्णन काश्मीर के साहित्य में मिलता है।
भेद के पराजय की बात यमुना तट पर कही गयी
है। काश्मीर के इतिहास में यह कहा गया है कि
सरस्वती देवी भेद पर खड़ी थी। यह बात निर्विवाद
है कि सरस्वती तथा यमुना का उद्गम एक ही शैल
से होता है। भेद मालूम होता है कि उन लोगों
का राजा था जो भेद पर्वत पर रहते थे। उनका
विनाश शायद काश्मीर उपत्यका का जल निकल
जाने के कारण हुआ अथवा राजा सुदास द्वारा इन्द्र
[दायाँ स्तम्भ]
की सहायता से मारे गये थे।
'इन्द्रको वहीं देवरूप नही बल्कि प्रकृति की
प्रभूत शक्ति मानना चाहिए। एक 'त्रित' देवता का
वर्णन वेदों में मिलता है। उसने वृत्र का वध किया
था। वृत्र यहाँ वराह कहा गया है। वैदिक ऋचाओ
से यह बात प्रमाणित होती है कि वराह वृत्र का
निवास बारहमूला में था।
'त्रित' ने वृत्र दैत्य को मारा था जिन्दावेस्ता के
प्रथम अध्याय वेन्दीयाद के १८वें पद में आता है।
यहाँ 'त्रित' को 'श्रेतिन' कहा गया है। 'त्रित' प्राकृतिक
शक्ति का प्रतीक माना गया है। उसे 'त्वष्टार' का
पुत्र माना गया है। त्वष्टार को इन्द्र का पिता
माना गया है। त्वष्टार को इन्द्रके वज्र तथा देवों
के अन्य अस्त्रों का निर्माता माना गया है।
'वरुण, त्रित, इन्द्र के साथ कहा गया है कि
वृत्रको मरुत् ने भी मारा था। भूमि की गति के
कारण जब काश्मीर का जल बारहमूला के पास से
बह निकला होगा तो सम्भव है कि, आन्धी, पानी;
भूचाल तथा वज्रपात हुआ हो। मरुत् से वृत्र वध
को सम्बन्धित करने से यह प्रकट होता है कि
प्राकृतिक उथल-पुथल के कारण काश्मीर का जल
बह गया और आर्यों को काश्मीर तथा वहाँ रहने
वाली जातियों का ज्ञान था।
'मालूम होता है किऋग्वैदिक आर्यों ने काश्मीर
भूखण्ड का कोई नाम नही रखा था। उनके लिए
यह 'दस्युओं' का देश था। वे अपने स्थानो से
आकर आर्यों को परेशान करते थे। पौराणिक
काल में इन्द्र और वृत्र के संघर्ष की बात कथानक
रूप में चलाई गयी। आर्यों ने कालान्तर में
शिवपूजा स्वीकार कर ली। उस समय 'सती सर'
तथा उसमे जल निकलने की घटना को गाथा का
रूप दे दिया गया। नागलोग शिव के भक्त
थे अतएव 'जलोद्भव' नाम के एक दैत्य की
कल्पना कर ली गयी। क्योंकि शिव के भक्त
नागाओं को आर्य जिन्होंने शिव की उपासना स्वी-