राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 116, कुल 984 में से
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प्रथम तरङ्ग ३५
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काश्मीरात्तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे ।
भोटान्तदेशो देवेशि मानसेशाच्च दक्षिणे ॥
श्लोक ३० पृष्ठ ७
औपधा ( औरसा ? ) श्चानि भद्राश्च
किरातानां च जातयः ।
तोमरा हंसमार्गाश्च काश्मीरास्तंगणास्तथा ॥
मार्कण्डेय, वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराणों में 'काश्मी-
रास्तंगणांस्तथा' उल्लेख आया है । मार्कण्डेय पुराण
में एक स्थान पर सौराष्ट्र के साथ 'काश्मीराश्च
सुराष्ट्राश्च' वर्णन मिलता है ।
यहाँ भोटांत देश के संबन्ध में कहा गया है
कि वह काश्मीर से आरम्भ होकर कामरूप के
पश्चिम तक फैला था । उसके पश्चिम में मानसरोवर,
पूर्व में काश्मीर अर्थात् उत्तर में कामरूप तथा मानस
में है । वर्तमान भूटान पूर्वकालीन भोट्ट देश का एक
खंड मात्र है ।
पुराणो से प्रकट होता है । प्राचीन काल में भोट
शब्द तिब्बत निवासियों के लिये प्रयुक्त होता था ।
भूटान से लेकर काश्मीर अर्थात् हिमालय के उत्तर
का भूखंड तिब्बत का भाग रहा है । मानसेश का
अर्थ शिव का निवास स्थान अर्थात् मानसरोवर है ।
विष्णु पुराण (अंश ४:१९) में वर्णन है । चन्द्रभागा
और काश्मीर आदि देशो पर व्रात्य, म्लेच्छ, शूद्रादि
राजागण राज्य का भोग करेंगे ।
, काश्मीर के प्राचीन गौरव पर विचार करने
लगा । उसे यादकर दुःख और उमड़ते हुए मन के
अतिरिक्त और कुछ मुझे नहीं मिला ।
शक्तिसंगम तंत्र ३:८:१२-१४ में कूर्मप्रस्थ का
वर्णन किया गया है ।
कूर्मप्रस्थं महेशानि कथ्यते श्रृणु साम्प्रतम् ।।१२।।
गोकर्णं दक्षभागे कामाख्या पूर्वगोचरः ।
उत्तरे मानरेश. स्यात् पश्चिमे शारदा भवेत् ।।१३
शारदा शब्द के विषय में कह चुका हूँ । काश्मीर
[Right Column]
के लिये अनेक ग्रंथो तथा स्थानो पर शारदा शब्द
प्रयोग किया गया है । यह बात सिद्ध होती है !
कूर्मप्रस्थ की सीमा के सन्दर्भ में कहा गया है । कूर्मप्रस्थ
के उत्तर में (मानेश मानसरोवर), दक्षिण में
गोकर्ण (नेपाल), पूर्व में कामाख्या (कामरूप),
पश्चिम में शारदा (काश्मीर) है । मैने गोकर्ण
महादेव का मन्दिर नेपाल में देखा है । उसका वर्णन
अपनी पुस्तक 'जाग्रत् नेपाल' में किया है । देवस्थान
मुझे बहुत सुन्दर, दिव्य तथा जाग्रत् प्रतीत हुआ ।.
'परेण हिमवन्त' उत्तरकुरु को कहा गया है ।
श्री जिमर ने वैदिक इंडेक्स १:८४ में काश्मीर को
उत्तरकुरु कहा है । पाली साहित्य में उत्तरकुरु का
स्थान सुमेरु के उत्तर बताया गया है । काश्मीर को
को उत्तरकुरु के दक्षिण दिखाया गया है । उत्तर-
कुरु को समुद्र से आवृत बताया गया है । ऐतरेय
ब्राह्मण (८:१४:४) में उत्तरकुरु हिमालय के पार
बताया गया है । वाल्मीकीय रामायण (४:५३:५६)
में उत्तर में समुद्र का होना कहा गया है । ऐतरेय
ब्राह्मण (८:२३) में वसिष्ठ सात्यहव्य ने उसे देव-
क्षेत्र कहा है ।
काश्मीर का उल्लेख वीर पुरुषदत्त के नागार्जुनी
कोण्डा लेख में आता है । पाणिनि ने उसका उल्लेख
(४.२:१३३) किया है । पतंजलि ने (३:२:२ पृष्ठ
१८८, १८९) तथा (१:१:६ पृष्ठ २७६) महाभारत
और वृहत्संहिता में इसका देश रूप में उल्लेख किया
है (१४:२९) ।
रामायण में काश्मीर
आनंद रामायण में काश्मीर का वर्णन मिलता
है । आनंद रामायण के याग कांड सर्ग ३:३२:३४
'श्लोकों' में काश्मीर का उल्लेख आया है । अश्वमेध
यज्ञ का आयोजन भगवान् श्री रामचन्द्रजी ने
किया था । यज्ञ का अश्व छोड़ा गया । वीर
शत्रुघ्न, मंत्री, सामंत, सेना सहित अश्व की रक्षा
के लिये साथ भेजे गये थे । शूरसेन, पांचाल,
कुरुक्षेत्र, कुरु-जांगल, देश होते हुए अश्व ने काश्मीर