राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग २९
महासागर के धरातल तथा समुद्र के नीचे से
निकली है। मूल झील का नमकीन जल क्रमशः
अनेक मीठे चश्मों तथा स्रोतस्विनियों के आते जलों
की बाढ़ के कारण लोप हो गया। उसी समय
बारहकूला के समीप पर्वत जो कि जल के उस स्थान
पर रोक रखा था फट कर अलग होगया। दूसरे
जल के अवरोध अलोढ़ मिट्टी (एल्लूवियन) के
जमा होने में सहायक हुए जोकि बाढ़ों के कारण
पहाड़ी की मिट्टी लाने लगे। वे मिट्टी को बाहर जाने
से रोकने लगे और यही कारण है कि अपनी पड़ोसी
भूखण्डों किंवा प्रदेशों की अपेक्षा काश्मीर उपत्यका
में अधिक मिट्टी जम गयी। क्रमशः इस नवीन
बनी हुई झील में जल के कारण स्वतः गहरी प्रणाली
अपने लिए बना लिए और समय-समय पर वे
अचानक पानी के स्तर के घटाव के कारण कुछ
जल रोकने वाले बारहकूला के पास वाले व्यवधानों
को अपने साथ बहाता गया। इस बात का प्रमाण
कुछ भागों में मिलता है जहां कि चूने के पत्थरों पर
क्रमशः जल के घटाव के कारण किनारों के जल के
कारण घिसते हुए ढालू हो गये हैं। जैसे जैसे समय
बीतता गया और क्रमशः झील के जल का स्तर
नीचा होता गया। पानी जो पहले झील में था वह
झेलम नदी के गति के स्तर में आ गया। और
झेलम नदी ने स्वयं एक नाली का रूप उपत्यका
के सब से निचले भाग में धारण कर लिया और
इस प्रकार वहाँ बारहकूला पास के बचे हुये पानी
रोकने वाले व्यवधानों को घिसने लगी और द्रुतगामी
गतिशील नदी का रूप धारण कर लिया जैसा कि
हम उसे आज उपत्यका को त्याग कर जाते हुए
देखते हैं। चारों तरफ के पर्वतों से आता हुआ
बढ़ता पानी झेलम के कारण बाहर निकलता जाता
है और उपत्यका को अपना पुराना झील का रूप
बनने नहीं देता।” ट्रेवेल इन काश्मीर—७१-७३
कनिंघम द्वारा वर्णित स्थानों को मैंने स्वयं
सन् १९६४ में जाकर देखा। पामपूर की गुफा के
अन्दर एक मन्दिर बना है। गुफा अँधेरी है। लगभग
२१० फीट लम्बी है। आगे चलते-चलते पतली हो
जाती है। इसके विषय में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। इस
गुफा में पानी टपकता रहता है। मक्खी के छाता की
तरह जल टपकने से छत बन गयी है। एण्डरू
विलसन वहाँ जिस समय आये थे। यहाँ पर मनुष्यों
की हड्डियाँ पड़ी थी। मालूम होता है मन्दिर के
दर्शनार्थ कोई यात्री आया रहा होगा और मर गया
था। गुफा में मशाल की रोशनी से जाया जाता है।
यहाँ पर्वत सीधा उठता है। ढाल कम है। उस पर
भूगर्भीय चिन्ह आज भी वर्तमान हैं जिनसे कनिंघम
के तर्क की पुष्टि होती है।
पामपूर तथा समीपवर्ती करेवा पर यदि व्यक्ति
खड़ा हो जाय तो उसे चारों ओर ऊँचा पर्वत
मिलेगा। जमीन भूरी और कुछ बलुई है। यही वेसर
होती है। वनिहाल श्री नगर की सड़क कुछ करेवा
के समीप से जाती है। वहाँ पर करेवा की बनावट
स्पष्ट बताती है कि उसमें तीन तरह की मिट्टी का
स्तर है। कोई भी यात्री बस अथवा मोटर से यात्रा
करते समय इसे लक्ष्य कर सकता है।
गुहा निवासियों की जो खुदाई बर्जहोम काश्मीर
में हुई है वह भी एक टीले पर है। वहाँ पहुँचने के
लिए कच्ची सड़क बनाई गयी है। सड़क बनाने में
ढाल की कुछ जमीन काटी गयी है। मेरी दृष्टि में
यह बात थी। मैंने वहाँ भी टीले अर्थात् करेवा की
बनावट में भूमि के स्तरों की मिट्टी में अन्तर पाया।
श्री खजांची केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग का, जो इस समय
वहाँ टेण्ट लगाकर खनन कार्य कर रहे थे, मैंने ध्यान
आकर्षित कराया। मैंने अपने शिपिंग बोर्ड के चेयर-
मैन के काल में भारत के पत्तनों का भ्रमण किया
है। जल की गति तथा उनके द्वारा भूमि पर पड़े
चिह्नों का अध्ययन किया है। यहाँ की खोदाई से
स्पष्ट प्रतीत होता है कि टीले के निचले भाग में
कभी जल था। उस जल का चिह्न खुले हुए स्थान
पर प्रकट होता है।