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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 984 में से

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पृष्ठ 115

३६ राजतरङ्गिणी
काश्मीरी लेखक क्षेमेन्द्र (सन् ९९० ई०)
ने समयमातृका में कंकाली से काश्मीर का वर्णन
कराया है। इसी समय प्रथम बार 'पंचाल धारा'
अर्थात् पीरपंजाल या पीरपेन्चाल का उल्लेख किया
गया है। बिल्हण (१०६३-१७) ने विक्रमाङ्क देव
चरित के अन्तिम अध्याय में काश्मीर का वर्णन
किया है।
देशी, विदेशी, काश्मीरी सभी लेखकों ने काश्मीर
किंवा कश्मीर शब्द का प्रयोग किया है। 'कश'
काशीर' 'काशगर' 'काशान' आदि नामों से कश्मीर
शब्द को सम्बन्धित करना मौलिक इतिहास को
दूसरे रंग में रंगना कहा जायगा।
राजतरंगिणी के लेखक कल्हण (रचना काल
११४८-११४९) द्वितीय राजतरंगिणी के लेखक
जोनराज (रचना काल १४४६-१४५९)
जोनराज तरंगिणी के लेखक श्रीवर (रचनाकाल
१४५९-१४८६) राजावली पिटक के लेखक प्रजाभट्ट
(सन् १५१३-१५१४) तथा श्री शुक (सन् १५८६)
ने काश्मीर शब्द का ही प्रयोग किया है।
इस प्रकार देखा जा सकता है कि सोलहवीं शताब्दी
तक 'कशीर' 'कश' आदि शब्दो का पता नहीं था।
इसके पश्चात् संस्कृत लेखकों की परम्परा का लोप होता
है। उनका स्थान परसियन तथा उर्दू लेखक लेते हैं।
इस काल में 'कश' 'कशीर' आदि शब्दों की व्युत्पत्ति
तथा उनसे काश्मीर शब्द को जोड़ने का प्रयास किया
जाने लगा।
शक्तिसंगम तंत्र (भाग ३:७:९) में कश्मीर
की सीमा का वर्णन किया गया है। इस तंत्र में
भारत के लगभग ५६ देशों का वर्णन मिलता है।
काश्मीर के सीमा निर्धारण में सहायता मिलती है।
इसके अनुसार शारदामठ से कुंकुमाद्रि अर्थात् पामपुर
तक का क्षेत्र काश्मीर कहा जाता था।
शारदामठमारम्य कुंकुमाद्रितटांतरम्।
तावत्काश्मीर देशः स्यात्पञ्चाशद्योजनान्तकः ॥
एक विचार है। उत्तर कुरु के लोग काश्मीर
में आबाद थे। काश्मीर की सीमा के लिए कहा गया
है। वह शारदा मठ अर्थात् वर्तमान शारदी तीर्थ जो
कृष्णगंगा तथा कनकौरी नदी के संगम पर स्थित है;
वहाँ से लेकर कुंकुमाद्रि अर्थात् पामपुर के केसर
उत्पादक पहाड़ियों तक विस्तृत था। उसका विस्तार
५० योजन था। पामपुर मैं चार बार जा चुका हूँ।
यह छोटा कस्बा है। ऊनी वस्त्र उत्पादन का बहुत
बड़ा केन्द्र है। श्री गांधी आश्रम उत्तर प्रदेश का
ऊन उत्पादन केंद्र है।
केसर की खेती तथा उपज के लिये पामपुर
प्रसिद्ध है। पामपुर के समीप कोई बड़ा पर्वत नहीं
है। बानेहाल से श्रीनगर आने वाली सड़क के दक्षिण
पार्श्व में पर्वतमालाएँ काफी दूर पड़ती हैं। पामपुर
क्षेत्र में छोटी छोटी मिट्टी की पहाड़ियाँ बहुत मिलती
हैं। दूर पर वितस्ता नदी बहती है। समथर भूमि
अधिक नहीं है। भूमि का रंग भूरा है। सेव, बादाम
बबूगोशा के बाग प्रायः मिलते हैं।
कुंकुमाद्रि का अर्थ केसर का पहाड़ होता है।
पामपुर की मृत्तिका पहाड़ियों से इसका अर्थ लगाया
जा सकता है। सुदूर स्थित पर्वतमाला शीत ऋतु
में तुषार पात से ढक जाती है। पामपुर का विस्तृत
भूरा भूखण्ड दोनों ओर हिमाच्छादित पर्वतों के मध्य
अत्यंत सुंदर दिखाई पड़ता है। अक्टूबर मास में
दोनों ओर की पर्वतमालाओं पर तुषारपात आरंभ
हो जाता है।
मैं यह दृश्य देख कर मुग्ध हो गया था। लगभग
एक घण्टा चुपचाप एक सेव के बाग में बैठा रहा।
इस नगर के अतीत को स्मरण करता रहा। नवम्बर
मास सन् १९६३ की काश्मीर यात्रा में वर्णन की
सत्यता देखकर चकित हो गया।
इसी तंत्र में देवी के वर्णन के साथ
उल्लेख है।