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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 984 में से

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पृष्ठ 119

४० | राजतरंगिणी


बौद्धसाहित्य

बौद्ध ग्रंथों में काश्मीर का बहुत वर्णन मिलता
है। दिव्यावदान शतक, बोधि सत्त्वावदान, कल्पलता,
में उल्लेख मिलता है। काश्मीर के निवासी नाग
जाति के थे।
काश्मीर राज्य के विषय में चीनी यात्रियो ने
लिखा है 'राज्य ७००० ली आवर्त्त में फैला है।
चारो घोर ऊंची पर्वतमालाओ से परिवेष्टित है।
राजधानी वितस्ता के पश्चिम तट पर स्थित है। देश
की भूमि अत्यंत उर्वरा है। अन्न, फल, तथा पुष्प
अत्यधिक उत्पन्न होते हैं। वनस्पतियां तथा ओषधियां
यथेष्ट रूप से मिलती हैं। जलवायु ठंडी है। तथा रुक्ष
है। मनुष्य अत्यंत रूपवान होते हैं। उनका रंग साफ
है। वे विद्यानुरागी हैं। उनमें अश्रमिक (बौद्ध धर्म
नहीं मानने वाले) तथा बौद्ध धर्मानुयायी दोनों है।
स्तूप तथा संघाराम देश में मिलते हैं।'
पर्यटक युवान च्वांग लिखता है "काश्मीर पूर्व
काल में गांधार देश में सम्मिलित था। तृतीय बुद्ध
परिषद् के पश्चात् मोग्गलि पुत्र तिस्स काश्मीर में धर्म
प्रचारार्थ भेजे गये थे। अशोक के समय काश्मीर मौर्य
साम्राज्य के अंतर्गत था। गंधार जातक में काश्मीर
तथा गंधार का उल्लेख मिलता है।"
बौद्धग्रंथों में १६ जनपदों में काश्मीर और गंधार
को सम्मिलित किया है। इनका विवरण पुक्कुसाति तथा
महारुपिन की कथाओं से प्राप्त होता है। जातकों से
पता लगता है। बुद्ध काल में व्यापारीगण विदेश से
काश्मीर और गंधार तक व्यापार करते थे।
मिलिन्द प्रश्न (मिलिन्दपन्हो) में, 'कासिकोसालेऽपि
कश्मीरे गंधारे ऽपि'-का उल्लेख मिलता है। काश्मीर
का गंधार के साथ उल्लेख किया गया है। युवान-
च्वांग ने लिखा है-'कभी गंधार के अंतर्गत काश्मीर
था' कल्हण की राजतरंगिणी, महाभारत तथा किसी
सूत्र से पता नहीं चलता कि कभी किसी ऐतिहासिक
युग में काश्मीर गंधार के अंतर्गत था। राजतरंगिणी
काल से लेकर कोटा रानी के लंबे चार हजार वर्षों
में कही संकेत नहीं मिलता कि काश्मीर गांधार में
सम्मिलित था। भौगोलिक दृष्टि से काश्मीर तथा
गांधार सीमांत देश थे। अतएव काशी, कोशल के
समान बौद्ध साहित्य में गंधार काश्मीर का नाम
से लिया गया है।
महावंश में उल्लेख आता है। स्थविर धौतिक
राजा मिलिंद [ मिनाण्डर ] के समय काश्मीर
गांधार में बौद्ध धर्म प्रचारार्थ आये थे।
भूरिदत्त जातक से मालूम होता है। कृमियों,
फतिंगों, सर्पों, मेढ़कों, कीड़ों, मक्खियों आदि की
हत्या कम्बोज जनपद के लोग करते थे। इन हत्याओं
के कारण मनुष्य विशुद्ध हो जाता था। यूआन च्वांग
ने [सातवी शताब्दी] काश्मीर राज्य के दक्षिण
स्थित राजपुरो अर्थात् वर्तमान राजोरी के लिये लिखा
है-यहाँ के लोग कीड़ों मकोड़ों की हत्या करते थे।
मुझे ऋग्वेद में काश्मीरका उल्लेख नहीं मिला।
'वैदिक कथा।' पुस्तक लिखते समय मैंने वैदिक
साहित्य को अध्ययन किया उस समय इस पर विशेष
ध्यान रखा कि काश्मीर का वर्णन वेद में है या नहीं।
एक दिन श्री डा० ज्वाला प्रसाद सिंघल अपनी
नव प्रकाशित पुस्तक 'स्फिनिक्स स्पीक्स' लेकर मेरे
निवास स्थान १५ कैनिगलेन नई दिल्ली में आये।
उन्होंने वेद में काश्मीर के उल्लेख की चर्चा उठायी।
मुझे कुछ आश्चर्य हुआ।
निसन्देह ऋग् वेद में 'वितस्ता' नदी का नाम
है। वितस्ता काश्मीर से निकल कर पंजाब में बहती
है। वैदिक पुरुषों को वितस्ता नदी का ज्ञान था।
इससे अनुमान लगाया गया है कि काश्मीर मण्डल
का ज्ञान वैदिक पुरुषों को था। इस बात को प्रमा-
णित करने के लिये डा० सिंघल ने अपनी पुस्तक में
तर्क उपस्थित किया है।
मैंने पुस्तक पढ़ने के लिये समय मांगा। इसी
बीच उनके पुस्तक के विषय की चर्चा समाचार पत्रो में