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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

प्रथम तरङ्ग ३१
भागवत पुराण : ३:१:५२-५६, ५:१.२२,
८:१:१९, ८:१:२३, २७, ८:५:२, १३:१०,
११, १८, २४, २७, ३०, ३३, ८.७:५
ब्रह्माण्ड पुराण : २:१४.४, वायु पुराण : ६२,
मनुस्मृति : १:६१-६३, विष्णु पुराण : ३:२-३
ऋग्वेद : १:८०:१६, २:३३:१३, ८:३०:३,
८:६३:१, ८:५१:१, १०:१००:५
तैत्तिरीय संहिता १:५:१:३ शतपथ ब्राह्मण
७:५.५:३, २:२:१०:२, २-··· ६०१, २:३:८:३
जैमिनो उपनिषद्
ब्राह्मण : ३:१५:१, ऐतरेय ब्राह्मण ५:१४:१:२
३:१:९:४, अथर्ववेद ८:१०:२४, ३:३:२:१
१४:२:४१
५:४:१०:५, पंचविश २३:१:६७।
नीलमत पुराण के अनुसार १२ सौर मास का
एक वर्ष होता है। दो मास का एक ऋतु, ६
ऋतुओं का एक अयन, २ अयनों का एक वर्ष और
४३२००० वर्षों का एक कलियुग होता है। कलियुग
का दूना (८६४००० वर्ष) द्वापर, कलियुग का
तिगुना (१२९६०००) त्रेता काल और चौगुना
(१७२८००० वर्ष) सतयुग किंवा कृत युग काल
होता है। एक मन्वंतर ७१ चतुर्युगों का होता है।
मन्वंतर के अंत में सब कुछ नष्ट हो जाता है। सब
कुछ जलमय हो जाता है। युग का प्रमाण
४३२००० वर्ष तथा मन्वंतर का प्रमाण १७२८०००
वर्ष है। केवल हिमालय, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत,
शृङ्गवान्, गंधमादन, मेरु, माल्यवान्, महेन्द्र, मलय,
सह्य, शक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य, पारियात्र का नाश
नहीं होता। जम्बूद्वीप का सर्वथा विनाश हो जाता है।
प्रलय के पश्चात् स्वयं महादेव जल स्वरूप
स्थित रहते हैं। देवीसती एक नाव का रूप तत्काल
धारण कर लेती हैं।। मनु उस नाव पर सर्व प्रकार
के बीज रख देते हैं। मत्स्य रूप धारण कर विष्णु
उस नाव को एक शृङ्ग की ओर खींच लाते हैं।
उसे पर्वत के मस्तक पर लाकर बांध देते हैं। वह
पर्वत शिखर काश्मीर की पश्चिम दिशा में स्थित
नौबंधन शिखर है। शिखर पुण्यदायक है। पाप
तथा भय को हरता है। कृतयुग के इतना समय
बीत जाने पर मनु पुनः प्रजावर्ग की यथापूर्व रचना
आरम्भ करते हैं।
नावस्वरूप देह धारण की हुई सती देवी
स्वयं भूमि का रूप धारण करती है। छः योजन
लम्बा तथा ३ योजन चौड़ा रम्य विमलोदक
सर बन जाता है। यहाँ देवगण मनोहर
क्रीड़ा करते हैं। इस देश की ख्याति सती देश
(काश्मीर) हो जाती है। जलजो से विवर्जित शीतल
अमल जलपूर्ण देश की सब भूमि मनोहर हो जाती
है। वैवस्वत मन्वंतर के आरंभ में दक्ष अपनी १३
कन्याओं का विवाह मरीचि के पुत्र कश्यप ऋषि
से कर देते हैं। नीलमत पुराण ५०-६७ (ब्रीज)
३३-५५ .(जादू)। नौबंधन तीर्थ का शतपथ
ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है १:८:१:१।
बाइबिल में जलप्लावन किंवा जलप्रलय तथा
नाव और उस पर सब प्रकार के बीज तथा सब
प्रकार के प्राणियो का एक जोड़ा रखने का वर्णन
मिलता है। उस नाव को 'हज़रत नूह का आर्क'
कहते हैं। वह पर्वत शिखर पर जाकर रुक जाती है।
कुरान शरीफ और बाइबिल मे यह गाथा दी
गयी है।
हिमालय और हेमकूट :
प्रलय काल मे हिमालय तथा हेमकूट पर्वतो के
बच जाने की बात नीलमत पुराण मानता है।
हिमालय तथा हेमकूट दो भिन्न-भिन्न पर्वत माने गए
हैं। हेमकूट पर्वत हिमालय के दक्षिण में है। बाण ने
हर्षचरित के अध्याय ७ में कहा है कि अर्जुन ने
राजसूय यज्ञ के समय हेमकूट पर अधिकार किया
था। विक्रमोर्वशीय नाटक के प्रथम अध्याय में
हेमकूट, तथा हेमकूट शिखर का उल्लेख आया है।