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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 111

३२ राजतरंगिणी
यहाँ पर हिमालय के लिये उसरा प्रयोग किया गया चारों युगों के महायुग का काल ४३२००००
है । हेमकूट क्षेत्र को पुरुष वर्ष तथा हिमवत् क्षेत्र को सौर वर्ष है । ब्रह्मा का एक दिन एक सहस्र महायुगों
किन्नर खंड कहा गया है । किन्नर खंड आधुनिक का होता है । इस एक दिन को १ कल्प कहते हैं ।
हिमालय प्रदेशका किन्नौर-मंडल है । किम्पुरुष एक सत्युग का समय मान १७,२८,००० सौर वर्ष है ।
वर्ष है । इसे हिमालय के दूसरी तरफ पुराणों के त्रेता का समय मान १२, ९६,००० सौर वर्ष है ।
अनुसार मानते हैं । द्वापर का मान वर्ष ८,६४,००० वर्ष है । कलियुग
का ४, ३२,००० मान वर्ष है । सृष्टि वर्ष का आदि-
( भागवत पुराण ५:१९; मत्स्य पुराण ११३:२९,
काल आज से ७, १४, ४०,४१,४६,२५६ वर्ष पूर्व
११४:५९;६३-६५, १२१:४९, वायु पुराण ३४.२८,
हुआ है ।
विष्णु पुराण २:२;१२ ।)
ब्रह्मा की एक सहस्र वर्ष आयु जितनी विष्णु की
किम्पुरुष प्रियव्रत का पौत्र और आग्नीध्र के नव
एक घड़ी होती है । बारह लाख विष्णुओ की आयु
पुत्रों में एक था । आग्नीध्र ने अपने पुत्रों के लिये
के जितनी, रुद्र की आधी कला होती है । रुद्र की
जम्बू द्वीप के वर्षों को विभाजित किया था । ( विष्णु
एक अर्बुद आयु के काल का समय अक्षर ब्रह्म का
पुराण २ १:१७ तथा १९ ) । किम्पुरुष वर्ष को उसने
समय होता है ।
अपने पुत्र हेमकूट को दिया था । किम्पुरुष-वर्ष का
राजा द्रुम्न था । कृष्ण तथा जरासंध के संघर्ष में मनुस्मृति के अनुसार कालपरिमाण में १८ निमेष
द्रुम्न ने जरासंध का पक्ष लेकर कृष्ण के विपक्ष में की एक काष्ठा; तीस काष्ठाओं की एक कला; तीस
युद्ध किया था । जरासंध ने गोमन्त आक्रमण के समय कलाओं का एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तों का एक अहोरात्र
पश्चिम पार्श्व में आक्रमणार्थ द्रुम्न को नियुक्त किया होता है । अहोरात्र का विभाग सूर्य के उदय अस्त के
था । भागवत पुराण ( १:६:१२ तथा १०:५२:११ ) कारण होता है । मानव के दो पक्ष पितरों का एक
के अनुसार परीक्षित ने उत्तर के देशों के विजय काल अहोरात्र होता है । कृष्ण पक्ष पित्रो के कर्म करने
में किम्पुरुष देश को जीता था । तथा शुक्लपक्ष शयन निमित्त है । इसी प्रकार भूतों
वैदिक साहित्य में किम्पुरुष के लिये घृणास्पद अर्थात् प्राणियों के लिये दिन चेष्टा तथा रात्रि शयन
शब्दों का प्रयोग किया गया है । कुछ विद्वानों ने निमित्त निश्चित किया गया है ।
इन्हें जंगली, कुत्सित तथा कहीं बंदरों जैसे मनुष्यों
मानव का एक वर्ष देवताओं का एक अहोरात्र
की नकल करने वाला कहा है । ( ऐतरेय ब्राह्मण
होता है । उत्तरायण देवताओं की चेष्टा तथा दक्षिणा-
२:८, शतपथ ब्राह्मण १:२:३:९ तथा ७:५:२:३२;
यन रात्रिकाल माना जाता है । चालीस हजार वर्ष
ऐतरेय ब्राह्मण ३:१:१२.१ ।)
का सत्युग होता है । चार सहस्र वर्षों की संध्या
जगत् सृजन कर्ता ब्रह्मा है । उनकी आयु १०० तथा संध्यांश होता है । त्रेतायुग तीन सहस्र वर्षों का
वर्षों की है । पूर्वार्द्ध काल ब्रह्मा का व्यतीत हो चुका होता है । तीन सौ वर्षों की संध्या तथा संध्यांश
है । अर्थात् अपने जीवन का ५० वर्ष वे व्यतीत कर होता है । द्वापर दो सहस्र वर्षों का होता है । दो
चुके हैं । ब्रह्मा के उत्तरार्द्ध काल के चारों महायुगों सौ वर्षों का संध्यांश होता है । कलियुग एक सहस्र
के प्रथम मास के प्रथम पक्ष के प्रथम दिन की ३ घड़ी वर्षों का होता है । एक सौ वर्षों की संध्या तथा
तथा ४२ पल अब तक बीत चुका है । संध्यांश होता है ।
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