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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३६
सर्वै देव इच्छि वास । तिव्य लब्धै रिषि स्वव्वं ॥
विप्र ब्रज वर वच्छि । सु गुन गंध्रव सव कव्त्रं ॥
किन्नरच्च क्रम सुत धर्म धर । सुरति मान सज्जैति सिर ॥
हरि ब्रह्म ईस संवास सच । जो आक्रम चि इक्क गिर ॥
छं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८३ ॥
॥ और वहां आगे वाल्मीक ऋषित्व को प्राप्त हुवे हैं ॥
पद्धरी ॥ रमनीक ठाम वाचिष्ट राज । तहां वसहि देव देवच्च विराज ॥
इच्छि थान पुव्व क्रत युग प्रमान । रिषि कियो तप्प जर्जित विधान ॥ १८१ ॥
वाल्मीक वीर इक्क वधिक रूप । अति पाप क्रंम आघात कूप ॥
भंजै सु मग्ग तिन भ्रम्म थान । पायौ सु हरिय दरसन विधान ॥ १८२ ॥
चित संप चक्र गद्द पदम वाहु । तन स्याम सुभित पीतच्च प्रबाहु ॥
दिप्प्यौ सु लछी तन रूप सील । कीनी बह तन तिन निसप ढील ॥ १८३ ॥
आयौ सु दिट्ठ गोविन्द वीर । जानी न पुव्व भ्रम्मह सरीर ॥
द्विति दिप्पि दिट्ठ कामच्च कद्दूर । विंक्यो सु पाप मध्यां सम्मूर ॥ १८४ ॥
तव आय रिप्प उपदेस दीन । किचि काज इच्छां यह क्रंम कीन ॥
अग्नी रु बंध तिय मात पुत्त । वंटहि कि पाप पापच्च सजुत्त ॥ १८५ ॥
तिच्छि जाइ कह्यौ वर भीन्न मान । वंक्यौ न पाप किन अंग थान ॥
लग्ग्यौ चरन्न कर धनुष तोरि । आघात घात बानी सजोरि ॥ १८६ ॥
व्याघात नाम सो वधिक थान । भ्रम भ्रग्यौ इक्क वहूक्रच्छ निधान * ॥
छं० ॥ १८७ ॥ रू० ॥ ८४ ॥
गाथा ॥ यों कत्थियं रिषि राजं । तुम कोइ दिवस भ्रमन करि अध्यं ॥
फुनि हम दरसन प्रापं । सध्यं गुर मंच दे कानं ॥
छं० ॥ १८८ ॥ रू० ॥ ८५ ॥
८४ पाठान्तर :- जु । धर्म । दर्शन । लछि । वीर । धर्मह । धरमह । विंक्यौ । मथांस ।
भूर । रिपि । दृट्ठां । रह्वां । क्रम । त्रिय । पुत । संजुत । चरन । तोरी । भ्रग्यो । इक । वृक्ष ।

  • यह पंक्ति कर्नल टोड साहब वाली पुस्तक में नहीं है ॥
    ८५ पाठान्तर :- कोई । प्रमं । ससथ्य । मरा । मरा । गहिय । भट्टै । अब । अबयो ॥

४० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व

सरां सरां यह कहियं । गच्छियं भगताय अंगयं नेहं ॥
भिद्दे तु चक्रम मंटी । दृही निय अब यो देहं ॥
छं० ॥ १८८ ॥ रू० ॥ ८६ ॥
दूहा ॥ बांबी फिर अंगच बली । अंग उदैट्टी जाम ॥
क्षीन सबद मुख निक्कसे । धीर धीर कै राम ॥
छं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८७ ॥
तब धरि सधि कयौ सु रिषि । दिषि प्रबत्न तप पार ॥
बाल्मीक रिषि सो भयौ । सुनि गिरि सुअन विचार ॥
छं० ॥ १८१ ॥ रू० ॥ ८८ ॥
॥ हिमालय के मध्यम पुत्र नंद का वशिष्ट के साथ
आना स्वीकार करना ॥
कवित्त ॥ सुनि सु बचन सिरि सुअन । सर्व विधि राम वाच रचि ॥
मध्य पुत्र गिरि नंद । सोय उच्चरयौ वाच सचि ॥
हौं सु पंग बिन पाय । क्रंम्मि सक्यों न राह दुर ॥
जाय परौं षित घात । करौं उद्दार वाच धुर ॥
पित बाच राम सज्ज्र्यौ सु बन । बाच सु हरिचंद अव्व वहि ॥
सोइ बाच तात ऋत कज्ज रिषि । कोइ सचुक्कहि मुंष मचि ॥
छं० ॥ १८२ ॥ रू० ॥ ८८ ॥
॥ वशिष्ट का अर्बुद नाग को कहना कि जो तू नंद गिरि को
उठा ले चले तौ हमारा कार्य सिद्ध हो ॥
पहरी ॥ अर्बुदा अचल अर्बुदति नाम । क्रित काम पयच षोरौ सु कांम ॥
धर नंद नंद नंदन प्रमान । उच्चार सार लै जाहु थान ॥ १८४ ॥
८६ पाठान्तर :- बांकी । निक्कसै । कौं ॥
८७ पाठान्तर :- दिषि । रिष ॥
८८ पाठान्तर :- गिगिर । सोइ । हों । उच्चर्यौ । पाद । क्रमि । झंमि । सकों । सक्कौं
सक्कै । परों । करों । कोई । चुक्कहि । मुष ॥ इस रूपक की पांचवीं तुक के वाच और सज्ज्र्यौ
शब्दों के बीच में राम शब्द किसी २ पुस्तक में लेखक ने लिखना छोड़ दिया है । तथा इसी तुक
के दूसरे पाद का पाठ हमारे पाठ के सिवाय किसी २ पुस्तक में "पिता वाच सिर अंबु वहि"
करके भी है ॥
१०० पाठान्तर :- इस की पहिली तुक के पहिले पाद का पाठ हमने सं० १६४७ की

४२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
प्रविस कियो गारत्त गिरि । जय जय वचन सरीर हुअ ॥
भै मग मगन सुतन सब्वे सु गिरि । उवरन्नौ नाक सुनाग धुन्न ॥
छं० ॥ १८८ ॥ रु० ॥ १०२ ॥
॥ बिल का पुर जाना और पुष्प वृष्टि सहित जैजैकार होना ॥
दूहा ॥ उबरन्नौ नाक सु नाग धुन्न । दिव अस्तुति परमान ॥
पुष्प वृष्टि इच्छां करिय । जय जय बंधौ तान ॥
छं० ॥ १८९ ॥ रु० ॥ १०३ ॥
॥ नग का हिलना ॥
दूहा ॥ गात सकल गिरि जात को । सब बूड्यौ सम नाग ॥
उबरि नास सैलह तहां । सो हलची बिन लाग ॥
छं० ॥ २०० ॥ रु० ॥ १०४ ॥
॥ नग के हिलने से वशिष्ट चिंता कर ईश आराधन करने लगे ॥
दूहा ॥ नास सुद्दल हल्ल्यौ सुनग । उर अति चिंता जग्ग ॥
अति आतुर वाचिष्ट रिषि । ईस अराधन लग्ग ॥
छं० ॥ २०१ ॥ रु० ॥ १०५ ॥
॥ वाचिष्ट ऋषि ने महादेव का यह आराधन किया ॥
खाटक ॥ ईसंजा गिरिजानने वगरयं । उच्छंग मातंगिनी ॥
चर्मेजा वड्जामवंत जलजं । बुंदं तयं उज्जलं ॥
रख्यं जारति कर्न कामति मलं । दल्यंति तीयं पुरं ॥
त्रिपुरारिं तन तुंग तारन गुरं । जैजै हरं ईसयं ॥
छं० ॥ २०२ ॥ रु० ॥ १०६ ॥
उच्चरि । अगै । पच्छ । संपन । तथ ॥ इस की अंत की तुक का पाठ किसी २ पुस्तक में “भू मग
सुतन सबै सुगिरि । उवस्यौ नाक सु नाक धुन्न” है ॥
१०३ पाठान्तरः-उबयौ । नाक । हयां ॥
१०४ पाठान्तरः-यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है और जब तक कि वह इस
से भी प्राचीन पुस्तक में नहीं मिले तब तक उस को क्षेपक नहीं कह सक्ते । सोह । लह्यो । बुड्यौ ॥
१०५ पाठान्तरः-नाग । वाशिष्ट । आराधन । लग ॥
१०६ पाठान्तरः-उद्धंग । छलजं । जलदं । रिपं । करन । दलंयंति ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ४३
भुजंगी ॥ नमो आदि नाथं स्वयंभू सनाथं । नहीं मात तातं न को मंगि वातं ॥
जटा जूटयं सेषरं चंद्र भालं । उरं चार उद्दारयं रुंड मालं ॥ २०३ ॥
अनीलं असन्नं उपब्बीत राजं । कलं काल कूटं करं सूझ साजं ॥
वरं चंग ओधूत विंभूत ओपं । प्रलै कोटि उग्रंसि कालं अनोपं ॥ २०४ ॥
करी चर्म कंधं हरी पारिधानं । वृषं वाहनं वास कैलास थानं ॥
उमा अंग वामं सु कामं पुरष्यं । सिरं गंग नेचं त्रयं पंच मुष्यं ॥ २०५ ॥
नमः संभवायं सरव्वाय पायं । नमो रुद्रयायं वरहाय सायं ॥
पसूपत्तए नित्तए मुग्गयाए । कपहीं मछादेव भीमं भवाए ॥ २०६ ॥
मषघ्नाय ईसानए चंबकाए । नमो धम्मए धातए अद्धकाए ॥
कुमारो गुरव्वे नमो नील ग्रीवे । नमो व्याधए बाघए हिच्छ जीवे ॥ २०७ ॥
नमो लोहिते नील सिष्षंडए तं । नमो शूलिने चक्षुषे दिव्यए तं ॥
बसूरेतवे संव्वदेवस्तुतेवं । नमो पिंग जाटिष्टाए देव देवं ॥ २०८ ॥
नमो तप्प मानाय ब्रषं धुजाए । नमो ब्रह्मचारी त्रयंब्रह्मकाए ॥
सिवं चातमे चातगे स्वर्गचाए । नमो विश्वमावित्तए विश्वराए ॥ २०९ ॥
नमस्ते नमस्ते नमो सीतताए । नमो सर्ववन्नायने संकराए ॥
नमो ब्रह्मवक्ताय भूत पिताए । नमो वाचपे विश्वपे भूतपाए ॥ २१० ॥
नमो सीससाहस्रए नीतएसं । सहस्रंभुजा नैन साहस्त्र तेसं ॥
नमो पादसाहस्र आसंखकनं । नमो वन्हि चीरन्य हीरन्यवर्ने ॥ २११ ॥
नमो भक्ति आकंपनं संभु देवं । थिरं रिद्धि दाता मनं वच सेवं ॥
प्रसनो भवो ईस तब्बे न कब्बै । तनं ताप विन्नासए चित्त तब्बे ॥
छं० ॥ २१२ ॥ रु० ॥ १०७ ॥
१०७ पाठान्तर :- स्वंभू । समार्थं । नही । मंगी । चंदभालं । उर । रुंडमालं । असनं ।
उपंवीत । कलंकालकूटं । विभूत । सिकाले । अलोपं । करि । बंधं वृपवाहनं । वासं । थानं ।
दामं । कुरष्यं । गंगा । नैनं । उद्रप्रायं । सरवाय । वरदाय । पशू । पत्त । ए । नित । ए । मुग्ग ।
जाए । कपट्टरी । कर्पट्टरी । मषंघ्नाय । इसं । नए । धम्म । ए । धात । ए । गुव्वं । नल । व्याध ।
ए । बाघ । ए । ट्ठिच्छ । सिषंड । एतं । दिव्य । एतं । वसूदेवते के श्वदेवनं । स्तुतेवं । ब्रषंध ।
जाये । त्रयब्रह्म । काए । खर्श । चाये । विश्वमा । वित्तए । नमस । ते । नमस । ते । सीत ।
ताए । साहस । एनीत । एसं । सहस्र । नैन । सहस्र । आसंप । कर्ने । हिरन्य । संभा विनास ।
ए । चित्त ॥ सं० १६४७ की पुस्तक में इस छंद की ८ वीं तुक में को निस्सए शब्द नहीं है ॥

४४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ वशिष्ठ के वचन सुन महादेव का प्रत्यक्ष हो वर
मांगने को कहना ॥
चौपाई ॥ सुनि मुनि बचन ओद मन ईसं । आय धरौ रह्यौ उद्दरि सीसं ॥
बर ! बर ! वानि जानि मंन अंग्गहु । जंपद्धि ईस आस जिहि जग्गहु ॥
छं० ॥ २१३ ॥ रू० १०८ ॥
मंगहु मुनि सज्जन गुन गुन बर । चलै कित्ति जित्ती जिहि धुर घर ॥
ता कित्ती मुकतीह खों खिज्जै । ब्रह्मासन आसन डोखिज्जै ॥
छं० ॥ २१४ ॥ रू० ॥ १०९ ॥
॥ ईस का स्वरूप देख ऋषि का मुदित होना ॥
चौपाई. ॥ देषि सरूप ईस मन उम्मदि । जै जै जीव धन्य वानी बदि ॥
गौर कपूर तेज तन उद्दित । रिषि रोमांचित तब मन मुदित ॥
छं० ॥ २१५ ॥ रू० ॥ ११० ॥
मुदित मन उद्दित तन भारी । धरि बैकुंठ ईस मनचारी ॥
अर्बुद गिरि धरि ध्यान सु ईसं । करै काल तिहि काल जगीसं ॥
छं० ॥ २१६ ॥ रू० ॥ १११ ॥
॥ वशिष्ठ ऋषि का महादेव को नमस्कार करना ॥
साटक ॥ त्रैनैनं चिजटेव सीस चितयं । चैरूप चोसूलयं ॥
चदेवं चिःदसा चिभू चिगुनयं । चीसंधि वेदत्रयं ॥
चैरग्निं चयलच्छि काल चितयं । ग्रामं चयं चैवयं ॥
गंगा चै त्रिपुरारि भासित तनुं । सोयं नमः संभवे ॥
छं० ॥ २१७ ॥ रू० ॥ ११२ ॥
१०८-१०९ पाठान्तरः-मंगहुं । जगहुं ॥ चलै और कित्ति शब्दो के बीच में "ई" शब्द का पाठ
सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है और इधर के समय की लिखित पुस्तकों में है । धुर धुर ।
कीती । मुक्तीह ॥
११०-१११ पाठान्तरः- उमदि । गौरक । पूर ॥
११२ पांठान्तरः-निजटेवसीस । त्रयलच्छिकालं । त्रितयंयाम ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ४५
॥ प्रमथाधिपति ने आनन्दित होकर वर मांगने को कहा ॥
दूहा ॥ आनंद्यो प्रमथाधिपति । वर ! वर ! बंद्यौ बानि ॥
रिषि संगहु उतकंठ मन । सोइ समप्यौँ आनि ॥
छं० ॥ २१८ ॥ रू० ॥ ११३ ॥
॥ वशिष्ट ऋषि का नंदगिरि को अचल करने का वर मांगना ॥
दूहा ॥ फिरि रिषि जंप्यौ संभु सों । जो तुट्ठो मुझ भास ॥
नग चलंतौ अचल करि । पुनि सज्जौ सिर वास ॥
छं० ॥ २१९ ॥ रू० ॥ ११४ ॥
सो आबू गिरि राज गुरु । सुर गिर सम सैलास ॥
त्रिपथ नाम मुनि देव का । वसि रु कियो कैलास ॥
छं० ॥ २२० ॥ रू० ॥ ११५ ॥
॥ महादेव का पर्वत को अचल कर उसमें अचल
नाम से विराजना ॥
कवित्त ॥ तब सु ईस मन मुदित । पानि चंप्यौ गिर गौरव ॥
अचल अचल्ल कहि अचल्ल । भयौ अचलेस नाम तब ॥
सुथिर भयौ नग नंदि । अप्प सिर वास सु सज्यौ ॥
उभय आय तिहि थान । सगन प्रमथाधिप रज्यौ ॥
गिरि नंद नाम हेमल्ल सुतन । अर्बुद नाग सु मिच मन ॥
तिहि नाम त्रिविध भय तिध्य हर । पारस अप्पन अर्थ तन ॥
छं० ॥ २२१ ॥ रू० ॥ ११६ ॥
कवित्त ॥ अचल नाम कहि अचल । अचल विद्या अभ्यासिय ॥
अर्बुद गिरि थिर धरम्यौ । बियौ बानारस बासिय ॥
वष्टित नाम इक वरष । मुक्ति खंभेति जगत गुर ॥
इच्छत नाम इक दीह । करै उपवास सोइ नर ॥
११३-११५ पाठान्तरः-प्रथमाधिपति । बानी । समप्योँ ॥ ११३ ॥ मोँ । तुठो । भग्न पास ॥ ११४ ॥
गुरुं । सं० १६४७ की में "मुदगिर सम सैलास" और सं० १७१० की में "सुर गिर सम सैलास" और
सं० १८५६ में "मेरु समल सैलास" पाठ हैं ॥ त्रिपथा । ताप । सुनि वसि । रुकियौ ॥ ११५ ॥
११६ पाठान्तरः-अच । प्रथमाधिपं । रंज्यो । नम । तिद्य । अथि ॥

बाना रभंति बारानसिय । आबू अर्बुद उद्दरिय ॥
जट विकट जाल विब्भूति रँग । सुरग मुकति ढिग ढिग फिरिय ॥
छं० ॥ २२२ ॥ रू० ॥ ११० ॥
॥ आबू को अचल देख कर वशिष्ट का प्रसन्न होना और अन्य
ऋषियों को वहां यज्ञ के लिये बुलाय जप तप
और वास करना ॥
पद्धरी ॥ अग अचल दिषि वाशिष्ट रिष । मन मुदित भयौ सम आय सिष ॥
छर वासदेव सब गुन समान । आबरन रिद्धि चित चिंतं थान ॥ २२३ ॥
आभासि सिष गौतमह तथ्य । आचर्यौ वास अनि रिष सथ्य ॥
आभासि रिष अनेक ताम । संबोधि बोलि पृथु पृथुक नाम ॥ २२४ ॥
देवलह असित अंबावि सूत्र । सौमिच सर्प्प माली विभूत्र ॥
मह मक्षन सनक जैनेय पैल । दाखभ्य वक्र सुमंत औल ॥ २२५ ॥
दीपाय कित शूलंसि राय । तैतरिय जश्ववक्री सुताय ॥
जैमनिय ध्रुव्व वैसंपयान । घर्षनह लोम असुहोच जान ॥ २२६ ॥
मंडव्य अरति कौसिक्कं दाम । उष्णीष चिवन पर्नाद वाम ॥
घटजात सुबल मोजायनेय । बकवाक परासर वायवेय ॥ २२७ ॥
सचिवाक जात क्रन क्रन्न माख । सनिवाक क्रिताश्रम सुचि पाख ॥
सिषि वांसु पर्षत पारिजात । अगस्ति मारकंडे सुभाति ॥ २२८ ॥
पाविच पानि सर्वेन्य रम्य । किरनाषकेत अगु सेष सभ्य ॥
जंघावं भालकी कोप वेग । गालम हरीय ब्रह्म अगेग ॥ २२९ ॥
कौडिन्न बंध माखी सनक्कु । सानंद सनातन कत्त वक्कु ॥
सांडिल्ल करक वाराह पंग । कौमार अश्व हय घोष मंग ॥ २३० ॥
वेनीय जघन जघ नासकेत । कन्हं कलाप वकीव सेत ॥
अष्टाचवक्र उद्दालकेय । च्यवनह कपिल मातंग जेय ॥ २३१ ॥
११० धयौ । बीयो । लभ्यौ । तिजगत । वानार । भंति । वानारसीय । उद्धरीय । मुति ॥
११८ पाठान्तरः-दिषि । वाशिष्ट । सिष । आचर्य्यौ । प्रिथक । अंकवा । विसूत्र । सप्प । ध्रुव । हरष ।
नह । मंडप । कौसिक । उष्णीक । पनदिवाम । घट । जात । बाल । वाक । बालजाक । वाय । वेय ।
सचि वाक । क्रच । क्रनमाल । सनि । वाक । क्रिताश्री । सिषि । वांस । पर्वत । भाल । की । गालं ।
महि । रिय । कौंडिन । सांडिलं । वेनी । जय । घन । घना । सकेत । कन्ह । वसेत अष्टाह ।

४८ पृथ्वीराजरासो। [ आदि पर्व
॥ यज्ञ का अनुष्ठान सुन कर राक्षसों का एकत्र हो आना ॥
दूहा ॥ जंचकेत दानव दुसह । अरु रषस धुमकेत ।
अप्प सथ्य लीने सकल । आए दुष्टह छेत ॥
॥ छं० ॥ २४३ ॥ रु० ॥ १२१ ॥
॥ ऋषियों का अनलकुंड रचन कर ब्रह्म कर्म प्रारंभ करना ॥
कवित्त ॥ आबू करि रिषि जग्ग। मंच कारन सु मंच जपु ॥
पंड हत्थ नर उंड। अष्ट अंगुल ऊर्द्ध वपु ॥
इय्य तीन अरु अट्ट । मंडि चक्कून समा सम ॥
खप्प समति सम फियौ। फनति बच्यौ देव क्रम ॥
अगिनेव थान अगिनेव धर। बाय कुंड दच्छिन दिसा ॥
नैरत निवर्त धज मंडि कै। ब्रह्म क्रम्म खग्गे रिसा ॥
॥ छं० ॥ २४४ ॥ रु० ॥ १२२ ॥
॥ दैत्यों का ऋषियों के यज्ञ में विघ्न करना ॥
कवित्त ॥ पंच पर्व्व जग्योपवीत । पंच पर्व्वी अधिकारिय ॥
देवो मुनि दुजराज । वैश्य शूद्रह चितकारिय ॥
चर विडाख पशु म्लेच्छ । क्रम चंडाल पंड करि ॥
इह प्रमान दस (विधि*) सुक्रम । जग्ग मंडे सुमंडि हरि ॥
दानव सु दुष्ट दुष्टंसु क्रम । दुष्ट मूच वरिषा करै ॥
पसु मंस रुधिर नंषै सु जल । क्रम विप्र संसुह डरै ॥
छं० ॥ २४५ ॥ रु० ॥ १२३ ॥
वै वेदी वै विप्र। गीत गांयच मंच जप ॥
ता मंझो घन विघ्न । करै आरिष्ट असुर कुप ॥
१२१ पाठान्तर :-यंत्रकेत । राषेस । धुम्रकेत । अप । सथ । अहेत ॥
१२२ पाठान्तर :-आब्बु । रिष्षि । तप । हथ । वर । उरद्ध । वप । अट्ठं । संमंति । खप ।
कीयो । वंचयो । अगिनेव । आगे । नेव थान । अगि । नेव । बाइ । कुंड । दषिन । किसा । रसा ॥
१२३ पाठान्तर :-जग्योपवीत । जुग्योपवीत । सं० १६४७ और १७७० की पुस्तकों में यह पाठ
है "इह विंधि प्रमान दस विधि सुक्रमं"। जंग । जग । सुमंडि । सुदुष्ट । दुष्ट । सुझम्म । वसु ।
मंसु । सुज़ल । कर्म । समुह ॥ (विधि *) विशेष है ॥
१२४ पाठान्तर :-गाइचं । मंडय । मंडे । पर्वत हलावे । मोहिनी । रूप कबाइक धरै ।
नट्टहिं । कबक्क । वै । "वै हथिन तालि न धरै" भी सं० १६४७ की में पाठ है । हरथ्यै ।

५० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
॥ तथापि राक्षसों का उपद्रव शान्त न होना ॥
रूखया ॥ कारयं जग्ग बंधान निंमानयं । रचियं कुंड षंडं थिरं थानयं ॥
आसनं दिव्य देवान आव्हानयं । असुरं कीन उच्चिष्ट जथानयं ॥
छं० ॥ २५१ ॥ रु० ॥ १२८ ॥
॥ तब वशिष्ट का स्वयं कुंड रचन कर यज्ञार्थ बैठना और
चिंतवन करना ॥
दूहा ॥ जब वाचिष्टह जग्ग कजि । सजि कुंडह सुभ थान ॥
तब आसुर अन संक ह्वे । किय उच्चिष्ट उतान ॥
छं० ॥ २५२ ॥ रु० ॥ १२९ ॥
कवित्त ॥ तब चिंतिय वाचिष्ठं । एह आसुर अविचारिय ॥
जग्ग जीच उच्चिष्ट । करैं कातर अव धारिय ॥
सुरन अंस संगहे । हवै नह हव्य हुआवह ॥
सो उपाव संचियै । (जो *) याहि संवरै असुर सव ॥
निम्म्यौ सु सूर संग्राम भर । अरि अलंध षंडन सु षल ॥
सम धरचि जग्ग कारन सकल । विमल सिष्ट सोमै सथल ॥
छं० ॥ २५३ ॥ रु० ॥ १३० ॥
अरिल्ल ॥ अघट घाटं रिषि दृषि निसाचर । परिसि च्यार धरि ध्यान ग्यान बर ॥
चिंतिय ब्रह्म करम किच्छि कामह । भयौ रूप रिषि ब्रह्म सुतामह ॥
॥ छं० ॥ २५४ ॥ रु० ॥ १३१ ॥
१२८ इस रूपक के छंद का नाम जो चंद ने मलयां प्रयोग किया है यह स्रग्वणी नामक
चार रणण का छंद है ॥
पाठान्तरः-बंधाननि । मानयं । रुचियं । आहवानयं । उशिष्ट ।
१२९ पाठान्तरः-वाशिष्ट । सुथांन । अनं ।
१३० पाठान्तरः-चिंतिय । जिष्ट । जिह । करै । हवै न हव्यहु आवह । संयाम । षंडं ।
समं । सैाभै ॥ (जो *) विशेष है ॥
१३१ पाठान्तरः-ईषि । निसाचरं । वरं । ब्रह्मकरम ॥ सं० १७७० की पुस्तक में "ध्यान"
शब्द नहीं है ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ५१
॥ वशिष्ठ का चाहुवानजी को उत्पन्न करना ॥
कवित्त ॥ अनल कुंड किय अनल । सजि उपगार सार सुर ॥
कसन्नासन आसनह । मंडि जग्योपवीत जुरि ॥
चतुरानन स्तुति सह । संच उच्चार सार किय ॥
सु करि कमंडल वारि । जुजित आव्हान थान दिय ॥
जा अग्नि पानि अव अहुति जजि । भजि सु दुष्ट आव्हान करि ॥
उपज्यौ अनल चहुवान तब । चव सु बाहु असि बाह धरि ॥
॥ छं० ॥ २५५ ॥ रु० ॥ १३२ ॥
दूहा ॥ भुज प्रचंड चव चार मुख । रक्त ब्रन्न तन तुंग ॥
अनल कुंड उपज्यौ अनख । चाहुवान चतुरंग ॥
॥ छं० ॥ २५६ ॥ रु० ॥ १३३ ॥
॥ ऋषियों का चाहुवानजी का स्वरूप देख कर उन को
चाहुवान कहना । उन को राक्षसों से युद्ध करने की शक्ति देने
को आशापूरा देवी का स्मरण करना । देवी का प्रत्यक्ष होकर
चाहुवान जी को राक्षसों से युद्ध करने में सहायता देना । राक्षसों
का रसातल को जाना। देवी का चाहुवान जी को अपनी कुल
देवी मानने की आज्ञा करना और उन का अपने वंश भर की
कुल देवी मानना स्वीकार करना । देवी का उन को वर देकर
पधारना । वशिष्ठ का चाहुवान जी को आशीर्वाद देकर अन्य
अनलों का वर्णन करना और दुर्वासा को शाप देकर पठाना ॥
वाधा ॥ उपज्या अनल अनूपम रूपं । नहि आकृति अवर नर दूपं ॥
अंन अभूत सु उन्नत जिष्टं । वंदन भर कि बइ मनु पिष्टं ॥ छं० ॥ २५७ ॥
१३२ पाठान्तरः-अनलकुंड सजि । मंडि । जज्ञोपवित । आह्वान । नाजाने । आबद्दान ।
उपन्यो । चहुआन ॥ पुरातत्त्ववेत्ताओं के स्मरण में रहे कि प्रायः यह कहा जाता है कि अग्निकुलों
की कब उत्पत्ति आबू पर हुई उस का कोई पौराणिक प्रमाण भी नहीं मिलता । अतएव हम एक
यह प्रमाण विदित करते हैं कि कालिंदिका प्रकाश नामक ग्रंथ में पुराणोक्त यह श्लोक लिखा हैः-
श्लोक ॥ दूषयिष्यन्ति यवना, स्सहस्राब्दे गते कलौ ।
तदा रक्षां करिष्यति, याज्ञिकाः क्षत्रियर्षभाः ॥
१३३ पाठान्तरः-रत । ब्रन । बच ।

५२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व

स्याम रोम कपोल विसालं । उन्नत कंध व्यतिय दूसालं ॥
खाल माल खोभै उर क्षोभं । पृथु प्राकृष्ट दिक्क कर दोसं ॥ छं० ॥ २५८ ॥
नयन पृथुज भ्रकुटी सु कहरं । मुख आक्रत्ति बाल घर नूरं ॥
कवच चोन उर चान सरीसं । दल आक्रत्ति भयानक दीसं ॥ छं० ॥ २५९ ॥
तोन पूरि सर बड्डि सु कासं । धरिय पांन सुरबी रवि रासं ॥
खेटक्क खग्ग उनंगी धारं । चाचिवान दिष्यो रिष सारं ॥ छं० ॥ २६० ॥
चाचि आइ रिषि आइ समंगे । चाहुआन कहि सद्द सुरंगे ॥
समरी सकति रिषि गिर वासी । दिय साहाय युद्ध काजि तासी ॥ छं०॥ २६१ ॥
आई सकति सिंघ आरोही । दादस भुजा सु आयुध खोही ॥
खेटक्क खग्ग बरद्दह पासं । घंटा बान ऋती सिर आसं ॥ छं० ॥ २६२ ॥
खप्पर सकति शूल मद पाचं । देषे रूप क्रंम क्रम क्वाचं ॥
आसा पूरि कद्दै रिषि राजं । चाहुवान मंडी कृत काजं ॥ छं० ॥ २६३ ॥
चाल्ली सकति सहाइ अनल्लं । चल्ले सूर सबै कसि बल्लं ॥
खव आए चढि रुष्स ठानं । संह्यौ जुद्ध सबै असमानं ॥ छं० ॥ २६४ ॥


१३४ इस रूपक के छंद २५७ के पाठ में बड़ी गड़बड़ है । एशियाटिक सोसाइटी बंगाल
की छापी हुई पुस्तक में “उपज्यौ अनल अनूपम रूप । नहि आक्रति अवरन रूपं ॥ व्रत अभूत सू
उंनत जिष्टं । चंदन भर कि बहुम नुदिष्टं” ॥ और सं० १७७० की पुस्तक में “उपज्यौ अनल अनोणम
स्तूपं । महि आक्रति अवरम रुपं । जंत अभूत असु उत्तमा जिष्टं । वंदन भरकि बहु मन पिष्टं” ॥
और संवत् १६४७ की में “उपन्त्यौ अनल अनूपम रूपं । नहि आक्रुति अवरम स्तूपं । व्रत अभूत असु
उचंत जिष्टं । चवंदन भरा के बहु मंन पिष्टं” ॥ किन्तु हमारा पाठ कर्नल ड्रोड साहब के गुरु
बारेट झापासिंहजी ने जिस सं० १८५९ की पुस्तक से रासा पढा था उसके अनुसार है ॥ इस में
“तूपं” शब्द हमारे पाठकों को अर्थ करते समय परिश्रम देगा क्योंकि जिस संस्कृत शब्द “तूप”
का यह अपभ्रंश हिन्दी है वह संस्कृत के अच्छे विद्वानों के पढ़ने में भी उस का बहुधा प्रयोग
न होने के कारण बहुत ही कम आया होगा और वह वाचस्पत्यबृहदभिधान और शब्दार्थचिन्तामणि
जैसे बड़े कोशों में भी नहीं मिलेगा परंतु प्रोफेसर बिलसन साहब के कोष में मिलेगा वे इसको
त्रिलिंग में strong अर्थात् बलवान अथवा पुष्ट का वाचके लिखते हैं ॥
पाठान्तर:-उंनित । उंनित । उचतं । दुसालं । प्राकुष्टं । दिक्क । आक्रति । बालहर । आक्रति ।
सरि वीरं खिरासं । उनंगी । चांहि । बान । गिरंवासी । वरदह । कंता । क्रम । मंडी । सहाई ।
ठानं । आवटि । धुंमकेत । सर्कतिय संहृतिय । अध । पासं । तास । तिका । प्रसौनिय । यण्ये
नाम । ताम । संवत् १६४७ और संवत् १७७० की में “धास्यौ कर सिर ले चंहुवानं” । पाठ है ।
धर्यौ । चाहुवान । वधहु । वंस । मान । चहुवान । असमान । गई । हे है । चहुवानं । उपज्जि ।

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ५३


बाहै आवधि सकती सारं । घर आवहि पडै धर भारं ॥
सह्ने धुमरकेत सकतीयं । जंचकेत चहुआन (सु*) छतीयं ॥ छं० ॥ २६५ ॥
अद्द सु रप्पस दानव तद्दे । गए रसातल नट्ठे चद्दे ॥
देवी आइ अनल्लच पासं । जंपी तथ्य प्रसन्नी तासं ॥ छं० ॥ २६६ ॥
आसापूर कद्दै मो नामं । पुज्जै पुत्र पौत्र परिनामं ॥
कुलह गोत्र मुख्य थप्यै नामं । अप्पों रिद्धि अचल्लच तामं ॥ छं० ॥ २६७ ॥
धास्यौ सिर लै कर चहुवानं । ब्रह्महु वंस अंस जस मानं ॥
जीति अप्य देवी चहुआनं । दिय वर दान गई असमानं ॥ छं० ॥ २६८ ॥
गइ असमान कियौ सद् भारी । धुं! धुं! कार नै! जया सारी ॥
है! है! करि हं! हं! चहुआनं । अनल कुंड उपजे परिमानं ॥ छं० ॥ २६९ ॥
चौ मुष्यौ चौ वेद प्रकारं । जैसो मुख देख्यौ अधिकारं ॥
वेदं स्याम अथर्वन रूपं । रिगु जिजु वेद देव गुन नूपं ॥ छं० ॥ २७० ॥
चित्त चंमकार 'चिहूं दिसि जगिगय । पढत ताव्हि ब्रह्मांड सु जग्गिय ॥
बानी धुनि मुनि हरषि वसीसं । वर वचिष्ट तहां दई असीसं ॥ छं० ॥ २७१ ॥
तोचि वंस हांइ कुंडल धारी । जनु कि अर्क राका विस्त्तारी ॥
थुति करि सेव देव तिच्छि पानं । जै जै तप्प जिते चहुवानं ॥ छं० ॥ २७२ ॥
परिचरि वीर वीर नर केकं । तिच्छि चालुक्क भयौ गुन मेकं ॥
परचरि वर पावार ति वारं । क्रोध रूप जाजुल्य निधारं ॥ छं० ॥ २७३ ॥
जाजुल्लति परिचार न दिष्यौ । र्भिज करि विप्र पौरि तह रष्यौ ॥
तिन कारन वाचिष्ट रिषीसं । अर्बुद नाम गिरि नंद जगीसं ॥ छं० ॥ २७४ ॥
ता ऊपर दुरवासा आए । दै सराप वाचिष्ट पठाए ॥
अव वे दानव दुष्ट सु दाषै । तो रष्या चव कुली सु राषै ॥ छं० ॥ २७५ ॥
वंस छतीस गनीजै भारी । च्यार कुली कुल तिन अधिकारी ॥
सब सु जात जोनी मग दिष्यिय । ए ब्रह्मा अविसेष विसिष्यिय ॥
॥ छं० ॥ २७६ ॥ रू० ॥ १२४ ॥


चिहू । पढ । हरपिव । सीसं । वशिष्ठ । रासा । तप । नरकेकं । तिवारं । पारहारन । तहं ।
उपर । रप्य । छत्तीस । गति । नै । जित्ती । (सु*) विशेष है ॥

५४ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
॥ क्षत्रीयों के छत्तीस वंशों की नामावली ॥
कवित्त ॥ रवि ससि जादव वंस । ककुत्थ परमार सदावर ॥
चाहुवान चालुक्क । छंद सिल्हार आभीयर ॥
दोय मत्त मक्वान । गरुअ गोहिल गोहिल पुत ॥
चापोत्कट परिच्छार । राव राठौर रोस जुत ॥
देवरा टांक सैंधव अनिग । योतिक प्रतिच्छार दधिषट् ॥
कारद्दपाल कोटपाल हुन । हरितट गोर कमाष मट ॥
छं० ॥ २७७ ॥ रू० १३५ ॥
दूहा ॥ धान्यपालक निकुंभ वर । राजपाल कविनीस ॥
काल छुरक्कै आदि दै । वरने बंस छतीस ॥
॥ छं० ॥ २७८ ॥ रू० ॥ १३६ ॥
॥ चारों अग्निकुल क्षत्रीयों ने वशिष्ठ का यज्ञ निर्विघ्न किया ॥
कवित्त ॥ पठन संच रिष जाप । च्यार षिची उप्पाए ॥
कुचिल हीन परिच्छार । पैारि रष्पहु सत आए ॥
१३५-३६ पाठान्तर :-यादव । परमार-रु । तौंबर । चालुक । छिंद । छंदक । आभीवर ।
गुरुआ गोह । गही श्रुत । राठोर । सिंधव । अनग । अनंग । योतिक । प्रतिहा । दधीपट । करेटपाल ।
हुन । हरीतट । गोरक । भाड । जट ॥ १३५ ॥ ध्यानपालक । ध्यान पालकनि । कुंभ । कविनीस ।
द्वै । छत्तीस ॥
कवि चंद के समय में जो छत्तीस कुल क्षत्रियों के प्रसिद्ध थे उन के नाम उसने वर्णन किये
हैं अर्थात् रवि = सूर्यवंशी १ ससि = चंद्रवंशी २ जादव = यदुवंशी ३ ककुत्थ = कछवाहे ४ परमार ५
सदावर = तौंबर ६ चौहान ७ चालुक = सोलंकी ८ छंद = रांदेल ९ सिल्हार १० आभीयर ११ दोयमत्त =
दाहिमा १२ मक्वान १३ गोहिल १४ गहिलोत १५ चापोत्कट = चावडा १६ परिहार = पंढियार १७
राठौर १८ देवडा १९ टांक २० सैंधव = सिंधव २१ अनिग = अनग २२ योतिक २३ प्रतिच्छार २४
दधिषट २५ कारट्टपाल = काठी २६ कोटपाल २७ हुन = हुन, हुण २८ हरितट = हाडा २९ गोर =
गोड ३० कमाष = कमाड, जेठवा ३१ मट = जट ३२ ध्यानपालक वा धान्यपालक ३३ निकुंभ ३४
राजपाल ३५ कालछुरक्कै = कालछुर ३६ । इन के विषय में कवि दलपत रामजी अपने ज्ञाति निबंध
नामक ग्रंथ में लिखते हैं कि रत्नकोश नामक संस्कृत ग्रंथ की टीका में लिखा है कि क्षत्रिय कुल
का आदि पुरुष मनु उस के वंश में से यह छत्तीस हुए हैं ॥
सं० १६४७ और सं० १७९० की पुस्तकों में इन रूपकों के स्थान में रूपक १३७ और उस के
स्थान में इन को लिखे हैं अर्थात् उलट पुलट हैं। हम ने उन का क्रम इस लिये ग्रहण नहीं किया
है कि रूपक १३४ के छंद २७६ की पहिली तुक का अर्थ उस के पीछे इन रूपकों का ही होना
प्रकाश करता है ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो। ५५
चतुर वीर चहुवान । च्यार सुप्पौ चैवाहं ॥
अष्ट अष्ट आरिष्ट । देव चारिष्ट सु साहं ॥
पंमार वाह्र धन धन करह । कह्यौ रिष्य परमार धन ॥
चालुक्क वाह्र चालुक्क दुज । कुसित कुसन संडित तन ॥
॥ छं० ॥ २७९ ॥ रू० ॥ १३७ ॥
अनल कुंड आसंग । उपजि चौआन अनिल घन ॥
सुकर संठि करि वार । धनुष संग्रह्यौ वान वल ॥
तिन रष्खिस परिवार । धार सुष धरनि नि घटिय ॥
षन्त जुषित्त संमुद्दे । तिनह्र सिर सरअन तुह्रिय ॥
बंभान जग्य निर विघ्न किय । पुह्रप दृष्टि सुर सीस रजि ॥
रष्पि सु धरनि पग भुज्ज वर । रिष्ट निवारिय इष्ट भजि ॥
॥ छं० ॥ २८० ॥ रू० १३८ ॥
॥ जिन्होंने द्विजों की रक्षा कियी उनके वंश में पृथ्विराज हैं ॥
दूहा ॥ तिन रक्षा कीनी सु दुज । तिन्हि सु वंस प्रथ्रिराज ॥
सो सिरषत पर वादनह्र । किय राझौ जुविराज ॥
॥ छं० ॥ २८१ ॥ रू० ॥ १३६ ॥
॥ चाहूवानजी के वंश के राजाओं की कथा ॥
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॥ चाहूवानजी से माणिकराजजी पहिले तक तेरह पीढ़ी का वर्णन ॥
पद्धरी ॥ ब्रह्मान जग्य उतपन्न सूर । चहुवान अनल अरि मलन सूर ॥
उत्तंग अंग प्रचंड वाह्र । पहुमीस इंद अरि गिलन राह्र ॥ छं० ॥ २८२ ॥
प्रतिपाल धरनि अंगह्र सु अम्म । श्रुत मान कीन उत्तंग क्रम्म ॥
रत्तो सु जोग भव भोग रास । पुर अमर नाग नर कित्ति जास ॥ छं० ॥ २८३ ॥
१३७-१३८ पाठान्तर :-जाय कुलिल । चहुवान । मुपौ । सुसाहं । वाह्र । हिपि । पंमार ।
मंडि । ततन ॥ १३७ ॥ कुंद । चौहांन । रष्पि । सपरिवार । मुप । निघट्टिय । जुपितं । निरविघन ।
भुज्जवर ॥ १३८ ॥
१३६ पाठान्तर :-रख्या । तिहिं । पृथ्वीराज । पृथिराज । प्रवावंदंनह ॥
१४० पाठान्तर :-बंभ्रान । उत्पच । चहुवांन । मल । मयूर । उतंग । पहुबीसु । इंदू
अरिगिलन । धरनी । अंग । श्रुतमान । उतंग । रतो । सुजोग । भास । क्रिति । तास्रू । अन । सु ।
अन । माहंत । संका । विडार । मानिकं । राजंत । सु । अन । माह्र । भूत । भयंकर । रत ।

५६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्वे

ता सुअन सूर सामंतदेव । अरिसंत मत्त मत्ता जु रेव ॥
महदेव सुअन सोहंत तास । सु प्रसन्न ईस सेवंत जास ॥ छं० ॥ २८४ ॥
बर अजयसिंह सिंघच्च सु राम । नर बीरसिंह संग्राम ताम ॥
सुअ बिंदसूर उद्धारचार । आलोक श्रीय संकाविदार ॥ छं० ॥ २८५ ॥
सुअ बैरसिंह वैरी बिहंड । ध्रुव बीरसिंह अरि बीर डंड ॥
अरिमंत सकल कलि कलन चूर । मानिकं राव चहुआन सूर ॥ छं० ॥ २८६ ॥
॥ महिसिंहजी से धर्मधिराजजी तक का वर्णन ॥
राजत्त * सुअन ता सहस मध्य । महसिंह सिंघ संग्राम पथ्य * ॥
सुअ चंद्रगुप्त सम चंद्ररूप । प्रतापसिंह आरेन दूप ॥ छं० ॥ २८७ ॥

नूप । तत । पूर । बालंन । प्रथम । जग । दुप । पहु । मंह । रत । कोडी । कियो । चल्यौ । प्रमान ।
मांन । थांन । चल्यो । मुकजो । मुक्कयौ । निगम । मुक्क्यो । जित । किति । चौसठि । चित । पायौ ।
जंम । बिप्र । जंम । कदम । कदम । दानेवसल । यांन । स । आनि । उगात । उगात । उतंग ।
पुकस्यान । जरन । जाहुजाहु । जाह जाह । इन्द । सं० १७७० और १६४७ में "नैर पुर रुद्र डरि हक
बजि । मांनि । जज्जेरी । जज्जरीय । पांनि । लगे । डके । सुरूप । मृग । सर्प । अप्प । अप । सद । पुज ॥

    • पक्षपात रहित वृद्ध और विद्वान कवि कहते हैं कि यहां अर्थात् छंद २८६ और २८७
      के बीच में कितनेक छंद लोप हो गये हैं किन्तु चंद कवि ने तो मूल पुरुष श्री चहुवानजी से
      लेकर पृथ्वीराजजी तक पीढ़ावली वर्णन कियी थी कि जिन को सब ऐतिहासिक ग्रंथ और सर्वसा-
      धारण मनुष्य हिन्दुओं का अंतिम बादशाह होना प्रकाश करते और मानते हैं। और क्वचित् चंद
      का नाम विध्वंस करने वाले यह कहते हैं कि ग्रंथकर्त्ता ने अपने अज्ञात होने के कारण खंड विखंड
      वंशावली वर्णन कियी है। इन दोनों सम्मतियों में से हम पहिली से सम्मत हैं क्योंकि प्रथम तो
      चंद कवि अपने वंश परंपरा से इस राजकुल का मुख्य कवि और ख्यात वर्णन करने वाला था और
      यह कदापि संभव नहीं है कि आज तो हम चौहान वंश की शुद्ध अथवा अशुद्ध पीढ़ावली जान सकें
      और हम से सात सौ वर्ष पहिले जो उक्त राजकुल का निज कवि हुवा वह न जानता हो और न
      वर्णन करै । दूसरे चहुवान वंश की पीढ़ावली जो श्रीमान् श्री बूंदी राव राजाजी महोदय ने
      निश्चय कराई है और जो एक चहुवान वंश मात्र की पीढ़ावली हम भी सन् १८७३ से सिद्ध
      कर रहे हैं और वह बूंदी वाली से विशेषांश में मिलती हुई है उन दोनों के अनुसार श्री चहुवानजी
      से. पृथ्वीराजजी एक सौ सतहत्तरवीं १७७ पीढ़ी में हुए सिद्ध होते हैं। अब यहां सूक्ष्म बुद्धि से विचार
      कर देखने की बात है कि छंद २८२ से २८६ तक में जो तेरह १३ नाम क्रम से कवि ने कहे हैं वह
      उक्त दोनों वंशावलियों से बराबर मिलते हैं और "राजत्त सुअन ता सहस मध्य" का अर्थ इन प्रथम
      माणिक्यराजजी के विषय में घट नहीं सक्ता क्योंकि इतना वंश यहां तक बढ़ नहीं सक्ता। इस के
      सिवाय जो पाठक चहुवान वंश की इस परम प्रसिद्ध कथा को जानते होंगे कि तीसरी पीढ़ी में
      अहादेवजी जिनका उपनाम परभंजनजी भी है उनके हाथ से अनजाने प्रमाति ऋषि की एक गाय
      मर गई थी कि जिस पर ऋषि ने शाप दिया था कि "तुम्हारा वंश नाश हो" तदनन्तर ऋषि को

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ५७
सुत सोच सिंघ बर मोह रूप । भूतह भयंक रन रत्त भूप ॥
सुत सेनराइ बह लेन वंत । संप्रति राइ सुभ तत्त संत ॥ छं० ॥ २८८ ॥
सुअ नागहस्त सस नाग राज । अस्यून्त नंद आनंद राज ॥
गिर लोहधीर सुत भ्रम्ममार । सुअ बीरसिंघ संकाबिडार ॥ छं० ॥ १८९ ॥
सुअ विबुधसिंघ सम जोगसूर । जस चंदराय बर अजस दूर ॥
सुत किन्नराज जस किन्न चिंत । हरहरह राइ नर बुडिमंत ॥ छं० १८० ॥
वानन्न राइ बलि अंग तास । सुअ प्रथव राइ पहुमी प्रचास ॥
तिन अनुज अंग राजत अनेक । कलि अलप आउ कित्ती अकेय ॥ छं०॥ २९१ ।
धर्माधिराज रति जोग भोग । पट घंट पित्ति पग्गह सु भोग ॥
मनाने पर उन्होंने अपराध क्षमा कर के कहा कि कितनीक पीढ़ियों तक तो तुम्हारे वंश में एक २
ही पुत्र होता रहेगा फिर वंश बढ़ेगा । इस से भी इस सूत्र का अर्थ माणिकराजजी में नहीं
घट सक्ता ।
तथा उक्त दोनों पीढ़ावलियों को इस रूपक के साथ मिलाने से यह भी ज्ञात होता है
कि छंद २८७ से अर्थात् उस में कहे महिसिंहजी एक सौ अड़तालीस १४८ वीं पीढ़ी में हुए और उन
से फिर सब नाम बराबर क्रम से एक सौ सतहत्तर १७७ वें पृथ्वीराजजी तक मिलते हैं । क्या अब
जो चौदहवीं १४ पीढ़ी से एक सौ सैंतालीस १४७ वीं पीढ़ी तक के बीच के नाम वह भी क्रमवार
चंद्र कवि बिलकुल ही नहीं जानता था अथवा क्या वह उन को निगल कर परलोक में जा बैठा
है? जो कि हमारी वृत्ति सदैव प्रत्येक विषय के अनुकूल अनुमान करने और उस के साध्य को
मान्य करने की है इसलिये प्रतिकूल अनुमान ही क्यों करें और वैधर्म्य की ओर क्यों दृष्टि डालें ।
क्योंकि जो आज विद्वान लोग अन्य बड़े २ प्रसिद्ध ग्रंथों के विषय में ऐसे ही प्रतिकूल ही अनुमान करने
लग जावें और वैधर्म्य का ही आश्रय कर लें तो बड़ा अनर्थ हो जाय । अब हम चौदहवीं १४ पीढ़ी
से एक सौ सैंतालीसवीं पीढ़ी तक के नाम हमारे तथा बूंदी राज्य के शोध किये हुए हमारे
पाठकों के जानने के लिये यहां लिखते हैं । पुष्करजी (विजयपालजी) १४ असमंजसजी १५
प्रेमपूरजी १६ भानुराजजी १७ मानसिंहजी १८ हनुमानजी (धर्म्मपाल) १६ चित्रसेनजी २० शंभूजी
२१ महासेनजी (ऋद्धीशजी) २२ सुरथजी २३ रुद्रदत्तजी (कर्णपालजी) २४ हेमरथजी (रामपालजी)
२५ चित्रांगदजी २६ चंद्रसेनजी (चित्ररथजी) २७ वाल्हीकजी (वत्सराजजी) २८ धृष्टद्युम्नजी
(वरुणजी) २९ उत्तमजी ३० सुनीकजी ३१ सुबाहुजी (मोहनजी) ३२ सुरथजी ३३ भरथजी (मद-
सेनजी) ३४ सत्यकीजी (सत्यकजी और सात्विकजी) ३५ शत्रुजित्जी (केसरीदेवजी) ३६
विक्रमजी ३७ सहदेवजी (इन को जीतकर कुरुवंशी राजा ने दिल्ली ले ली) ३८ वीरदेवजी (भीमसे-
नजी) ३९ वसुदेवजी ४० वासुदेवजी ४१. रथाधीरजी ४२ शत्रुघ्नजी ४३ सुमेरुजी (शालिवाहनजी) ४४
ऋतवर्म्माजी ४५ सुधर्म्माजी ४६ दिव्यवर्म्माजी ४७ यौवनाश्वजी ४८ हरिश्चश्वजी ४९ अजैपालजी
(अजमेर बसाने वाले) ५० भटदलनजी ५१ अनंगराजजी ५२ भीमजी ५३ गोगाजी ५४ शुभकरणजी
५५ उदयकरणजी ५६ जशकरणजी ५७ हरीकरणजी ५८ कीर्त्तिशजी ५९ बालकृष्णजी ६० हरिकृष्णजी

५८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ वीसल देव जी का वर्णन ॥
अग दुष बीर बीसल नरिंद । बहु पापरत्त द्रव्यान अंध ॥ कुं० ॥ २८२ ॥
क्रत अक्रित काम क्रित्तह सु कीन । जिन असुर घोर अनि द्रव्य लीन ॥
संसार थागि फुनि द्रव्य काज । उपजाडू मत्ति अजमेर राज ॥ कुं० ॥ २८३ ॥
कौडी सु मोल मज कियौ एक । लीयो न किनह फिरि सचर नेक ॥
कामंध अंध सुझ्यौ न काल । चक अचक जोरि गिरि ढुक्कं माल ॥ कुं० ॥ २८४ ॥
चल्ल्यौ न राजनीतह प्रमान । आनीत बंधि नृप थान थान ॥
सुझ्यौ न अम्म चाल्यौ प्रमान । मुकजौ निगम्म करि अगसमान ॥ कुं० ॥ २८५ ॥
अबलोच छोह खंडिय सु कित्ति । मुक्कयौ अम्म आअम्म जित्ति ॥
दरबार अतिथ दीसै न कोइ । अप्प सुह कित्ति संभरै लोइ ॥ कुं० ॥ २८६ ॥
चौसठि बरस बर राज कीन । पायौ न पुत्र फल सुंष छीन ॥
बल अचछ चित्त चिंत्यौ मु काल । पायौ न सुक्रत कछु करन साल ॥ कुं० ॥ २८७ ॥
गति अंत सुमति होइ बीर । पाबै सु जम्म जज्जर सरीर ॥
द्रषि गयौ सुमन वीसल नरिंद । उपनौ बीर खिति बीष कंद ॥ छं० ॥ २८८ ॥
घन मदन सदन भरि स्त्रब्ब जस्म । तिह परत उठि कत्या कदम्स ॥
६१ रामकृष्णजी ६२ बलदेवजी ६३ हरदेवजी ६४ भीमजी ६५ सहदेवजी ६६ रामदेवजी ६७ वसुदेवजी
६८ श्यामदेवजी ६९ हरिदासजी ७० महीधरजी ७१' वामदेवजी ७२ श्रीधरजी ७३ गंगाधरजी ७४
महादेवजी ७५ शारंगधरजी ७६ मानसिंहजी ७७ चक्रधरजी ७८ शत्रुजितजी ७९ हलधरजी ८०
महाधनुजी ८१ देवदत्तजी ८२ दामोदरजी ८३ काशीनाथजी ८४ लीलाधरजी ८५ धरणीधरजी ८६
रमेशजी ८७ भगवतदासजी ८८ कृष्णदासजी ८९ शिवदासजी ९० हरिपूर्णजी ९१ देवीदासजी ९२
कर्मचंद्रजी ९३' रामदासजी ९४ महानन्दजी ९५ विष्णुदासजी ९६ महारामजी ९७ रेवादासजी ९८
अमरसिंहजी ९९ गंगादासजी १०० मानसिंहजी १०१ विशंभरजी १०२ मथुरादासजी १०३ द्वारिका-
दासजी १०४ माधवजी १०५ सुदासजी १०६ वीरभद्रजी १०७ गोपालजी १०८ गोविन्ददासजी १०९
माणिक्यराजजी दूसरे ( इन के दो पुत्र बड़े हनुमानजी और छोटे सुयीवजी जिन में से पाटवी
हनुमानजी सांभर का राज्य अपनी प्रसन्नतां से सुग्रीवजी को देकर आप पटना जीत वहां के राजा
हुए कि जिन के वंश में इकतीस ३१ प्रकार के घूर्षये चौहान हुवे) ११० सुग्रीवजी (सांभर के
राजा हुए) १११ अंगदजी ११२ केसरीजी ११३ जयंतजी ११४ जगदीशजी ११५ जयरामजी ११६
विजयरामजी ११७ कृष्णजी ११८ जीतयुहुजी ११९ गोबर्हुनजी १२० मोहनजी १२१ गिरिधरजी १२२
उदयरामजी ( उद्यमजी) १२३ भारंगजी १२४ अर्जुनजी १२५ शत्रुंजीतजी १२६ सोमदत्तजी १२७
दुःखंतजी १२८ भीमजी १२९ सत्यपालजी १३० परशुरामजी १३१ रघुरामजी (मांदोट के राजा से
सात दिन लड़कर सांभर छोड़ बुरहानपुर अपने सुसरे के यहां भाग गये और वहीं मरे) १३२
समरसिंहजी १३३ माणिक्यराजजी तीसरे (सांभर इन्होंने पीछे विजय कर ली) १३४ मधुकर्मजी

आदि पर्व ] पृथ्विराजरासो । ५६
॥ ढुंढा दानव की उत्पत्ति और उस का अजमेर के वन में रहना ॥
कत्या कदस्स उर असुर रज्जि । घर ढुंढ नाम दानव उपज्‍जि ॥ कं० ॥ २९९ ॥
जगि जोग नयर जुगनीय थान । पुज्जै सु आय उग्गति विच्छान ॥
रथ च्यार चक्र उत्तंग बाह्र । असि असिय चय्य मुष अग्ग दाह ॥ कं० ॥ ३०० ॥
संभरिय धरा धरनीय ठाच । पुक्कस्यौ नरनि रे जाहु जाच ॥
सिर कोपि रीस धुनि दसन बज्जि ॥ उभरे घग्ग जनु इंदू गज्जि ॥ कं० ॥ ३०१ ॥
प्राचार पाय धुकि धरनि धुज्झि । पुर नयररुद्र उर हक्कि बज्जि ॥
कंपी सु भूमि नव खंड मान । जज्जरिय नाव ज्यौं बाय पान ॥ कं० ॥ ३०२ ॥
लगै न पलक्क द्रग देव चच्छि । डक्कै डकार द्रगपाल गच्छि ॥
दिष्यौ सरूप दानव उतंग । वैराट रूप धरि धस्यौ अंग ॥ कं० ॥ ३०३ ॥
पंषीरु द्रग्ग नर स्त्रप्प भाजि । आघात सह दानव सु गाजि ॥
चिंत चिंत चिंत जुग्गनि प्रधान । पुज्जै सु आनि उग्गति विच्छान ॥ कं० ॥ ३०४ ॥
चहुआन रूप दानव प्रमान । भज्यौ सु पुच आबू सथान ॥
॥ कं० ॥ ३०५ ॥ छ० ॥ १४० ॥
(दामोदरजी) १३५ रामचंद्रजी १३६ संग्रामसिंहजी १३७ शिवदत्तजी (श्यामदत्तजी) १३८ भोगाद-
त्तजी १३९ शिवदत्तजी १४० रुद्रदत्तजी १४१ ईश्वरजी १४२ उमादत्तजी १४३ चतुरजी १४४ सोमेश्वरजी
पहिले (इन के दो लड़के भरथजी १ और उरथजी २ उन में से भरथजी पाटवी के वंश में पृथ्वी-
राजजी हुवे और उरथजी के वंश में बूंदी और कोटा आदि के हाड़ा चौहान हुए हैं) १४५
भरथजी १४६ मुकुटजी १४७ ॥
इसके छन्द २८८ की पहिली तुक के पहिले पाद "सुत मोहसिंह वर मोह रूप ।" में
कवि का गूढ आशय यह समझना आवश्यक है कि वह उसमें तीन नाम वर्णन करता है मोह-
सिंह (सिंहदेवजी) सिंहवर और मोहनरूप कि जिसके सिंह शब्द को अर्थ करने के समय मोह
शब्द के साथ और वर के साथ दोबार लगाने से पृथक दो नाम सिद्ध हो जाते हैं अतएव हमने
सिंह शब्द के नीचे दो लकीर करी हैं। और इसी तरह छन्द २९१ की पहिली तुक के दूसरे
पाद में "प्रथव" शब्द से पृथ्वीराज नामक का निःसन्देह ग्रहण षट् भाषा में व्युत्पन्न विद्वान कर
सक्ते हैं । तदनन्तर बीसलदेवजी के जो वृत्त चंद ने जैसे के तैसे उत्तापित होकर लिखे हैं उनको
मनन करने से विद्वान पाठक सहज ही में यह अनुमान कर सक्ते हैं कि यद्यपि चंद उनके कुल
का वंश परंपरा से राज-कवि था परन्तु वह निःसंदेह बड़ा ही स्पष्ट-वक्ता और पक्षपात रहित
पुरुष था क्योंकि आज इस उनीसवीं शताब्दी में भी जब कि स्वतंत्रता और सभ्यता का सूर्य
पूर्ण प्रकाशित होरहा है तब भी कोई राज-कवि ऐसा स्पष्ट-वक्ता और पक्षपात रहित अपने
यजमान की दुर्गतियों को उसके भावी संतानों के शिक्षार्थ निडर होकर प्रकाश करने वाला
प्रायः किसी के दृष्टि न आया होगा । इस के साथ भाषाओं के शोध करने वाले विद्वानों को चंद

६० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
दूहा ॥ खो दानव अजमेर वन । रचि तह दिन घन अंत ॥
शून्य दिसान न जीव कौ । थिर थावर द्रिगभंत ॥
॥ छं० ॥ ३०६ ॥ रू० ॥ १४१ ॥
मुरिच्छ ॥ संभरि सोर नरिंदच संभरि । पंथ प्रजा पसरै रन जंगर ॥
रम्य अरम्य करी सु धरनिय । रहे मठ कोट अफोट करंनिय ॥
॥ छं० ॥ ३०७ ॥ रू० ॥ १४२ ॥
॥ सारंगदेवजी की राणी गौरीजी का अनलगर्भ सहित रणथंभ
पधारना ॥
दूहा ॥ गौरां चलि रनथंभ गिरि । सारंग सचौ राह ॥
प्रजा पुछंदी महिम धरि । यम्भ अनल गौराह ॥
॥ छं० ॥ ३०८ ॥ रू० ॥ १४३ ॥
अनल अक्षा धरि गौरि सिसु । गय रनथंभ दिसान ॥
राजहव रावत पती । मातुल पष चहुवान ॥
॥ छं० ॥ ३०९ ॥ रू० ॥ १४४ ॥
का यह वाक्यखंड "हक अहक" भी ध्यान देकर समझने योग्य है कि "हक" अथवा "हक्क"
जो हिन्दी भाषा में प्रयोग होता है वह अरबी अथवा फारसी नहीं है किन्तु संस्कृत स्वक शब्द
से है और "अहक" शब्द स्वतः इस बात की स्पष्ट साची देता है । इसी रूपक के छन्द २९९ से
ढुंढा राक्षस की उत्पत्ति चंद कबि वर्णन करता है ॥
१४१ पाठान्तर :- रहितह । रहतहं । दिसानन । जीवक्यै । द्विग । मंत ॥
१४२ पाठान्तर :- पसरौ । अवचिय । रहै ॥
१४३-१४४ पाठान्तर :-सारंग । यभ । गौराह । यभ । रिनथंभ । राजदव । पति ॥
इन रूपकों के पढ़ने पहिले हमारे पाठकों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि
बीसलदेवजी ने अपने लड़के सारंग देव जी को अपने हाथ से मार डाले थे कि जिस के पीछे वे
आप भी सांप के काटने से मर गये और अजमेर अर्थात् संभर का राज्य विना राजा के रह गया
और अजमेर के वन में ढुंढा नामक दावन रहने लगा किन्तु बीसलदेवजी के लड़के सारंगदेवजी
की रानी गौरी के गर्भ था । राणी जी राज्य की यह दशा देखकर अपने पिता रणथंभ के राजा
के यहां चली गईं और वहां सारंगदेवजी के आनल अर्थात् आना राजा उत्पन्न हुए । यह सब
कथा आगे के रूपकों में जब आना राजा अपनी माता से अपने पिता का नाम और सब वृत्तान्त
पूंछेंगे तब कवि माता और पुत्र के संवाद में बीसलदेवजी की कथा सविस्तर वर्णन करेगा। इन रूपकों
में अभी गौरी राणी जी का सगर्भा रणथंभ जाना ही कबि ने वर्णन किया है ॥

आदि पर्व ] पृथ्थीराजरासौ । ६१
॥ आना राजा का जन्म होना और उन का बालपन ॥
भुजंगी ॥ धरै गौर जन्मं आनल्ल राजं । बसे देव गामं दुनी कुच बाजं ॥
नवं वृत्त नित्तं नवं वृत्त सिष्यै । नरं तार तारं नवं स्रत्त भिष्यै ॥ छं० ॥ ३१० ॥
चरं संभरी वात पुच्छंत मित्तं । धरै ध्यान दिष्यै अजमेर चित्तं ॥
कला स्त्रव्व सिष्यंमछा मल्ल वीरं । गिनै मग्ग ओसं पढै मंच धीरं ॥ छं० ॥ ३११ ॥
दिनं सीह अण्वीह आखेट षिखै । ननं नेह निद्रा सुरं सिद्ध मिंखै ॥
करं पाइकं विह्न साइक्क नष्य । भरं भै अभैनं सुयं सव्व रख्यै ॥ छं० ॥ ३१२ ॥
वधै काम कामं अलीहो न भष्यै । सुमै राजसं तामसं सत्त चष्यै ॥
रवै जम्म सेना ग्रहै जम्म भारी। सुई संभरी वात दिष्यै करारी ॥ छं० ॥ ३१३ ॥
कव्है काल कालं अकालं ति बंधै । द्रुतं जोर मा वित्त सौं चित्त संधै ॥
दुच्चं वाच परचंड दुग्गं सरूपं । इसो दिष्यियै राज आना अनूपं ॥
छं० ॥ ३१४ ॥ रू० ॥ १४५ ॥
कवित्त ॥ अति बल बंड प्रचंड । हिंड आखेटक षिखै ॥
घिरन रोज वाराह । बंधि वागुव वर मिखै ॥
वन परवत्त झिरना । निवान (राइ *) राजन सँग हिँडै ॥
राग रंग (भाषा *) कवित्त । दिव्य वानी चित्त संडै ॥
हय हत्थिय देय संकै न मन । षग्ग मग्ग पूनी चढै ॥
चहुआन वंस अवतंस दूम । रंग अनेक आना रचै ॥
॥ छं० ॥ ३१५ ॥ रू० ॥ १४६ ॥
१४५ पाठान्तर :-आनल्ल । वृत्त । नितं । बूत । भृत । बान । पुछंत । सेतं । चितं । सब ।
सिषं । सिपं । महामल्ल । गिनी मंगि आमें । औमें । अवीह । सिद्धं । पायकं । साइकं । नंष्ये ।
भरंभे अभैन सोई सब्व रख्यै । भरं भय भैनं सोई सब्वं रप्ये । भरं भेअभैनं सोयं सब्ब रख्यै । वधे ।
लीहो । होन । सत्तं । चषै । जमं । ग्रहे । जम । सोई । साई । सोइ । संभरि । तिबंधे । जो ।
रभावित्त । सों । दुर्गा । दिंषियै । अनूप ॥
इस रूपक से कविने आना राजा के जन्मादि की कथा वर्णन करना प्रारंभ किया हैं ॥
१४६ पाठान्तर :-राहू । संगे । हिंड़े । कवित्तं । संपै । रंगा । (राइ *) (भाषा *) विशेष हैं ॥